लेखक परिचय

अश्वनी कुमार, पटना

अश्वनी कुमार, पटना

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quran-islamic-terrorism-jihadइस्लाम के नाम पर मानवता के विरुद्ध रची जा रही साजिश का प्रभाव दुनिया को दिखने लगा है| आईएसआईएस, अलकायदा जैसी संगठनों की मानसिकता इस्लाम व उनकी रक्तपात भरी जेहादी जुनूनों के अफीम में मदहोश है| समूचे विश्व में खलीफाई राज लागू करने की महत्वकांक्षा और इस्लाम के नाम पर खौफ मचाने की प्रवृति असभ्यता के पनपने का संकेत है| दुनिया के ऊपर अपने विचारों, आस्था या उसके तौर-तरीकों को थोपने की सनक विकृत मानसिकता का परिणाम है| पेरिस, बेल्जियम, अमेरिका के बाद बांग्लादेश के ढाका शहर में जिस तरह से इस्लाम के बन्दों ने आईएसआईएस का खौफ दिखाया, गैर-मुसलमानों को चुन-चुन कर मारा, इससे क्या साबित हुआ? की इस्लाम की जेहादी व जुनूनी विचारधारा कुरान के कलमों से चलती है, आयतों के कहे अनुसार चलती है, शरियत के उलुलजुलुल नियमों में उलझी है या फिर इस्लाम के माननेवालों की मनोदशा कुरानशरीफ में लिखी बातों पर आधारित है इसलिए उन्हें दुनियादारी, मानवता या सौहार्द नहीं सीखना|

सवाल है, क्या दुनिया में बढ़ रही आतंकवादी घटनाओं को नियंत्रित करने का कोई कारगर उपाय नहीं? क्या दुनिया के ताकतवर देशों की ड्रोन, मिसाइल या बमों के आगे एक धर्म की विचारधारा भारी पड़ रही है? इसलिए की क्यूंकि सीरिया और ईराक में आईएसआईएस के बढ़ते प्रभाव को तमाम कोशिशों के बावजूद भी अमेरिका और पश्चिमी देश उसे नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं| ईराक व सीरिया के ताज़ा हालात असभ्यता और बर्बरता का प्रतीक नहीं है? दुनिया आतंकवाद के तांडव के आगे असहाय है| उनकी बेचारगी, उनकी सहनशीलता इस्लाम के पैरों तले है|

भारत में आईएसआईएस के पनपने की सम्भावना से कटाई इनकार नहीं किया जा सकता| इसलिए की भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और जहाँ की सेक्युलर विचारधारा की मनोवृति ऐसी रही है जैसे वो तो धर्म विशेष के नाम पर उनके स्वागत के पलक पावडे बिछा देंगे| भारत में बढ़ रही इस्लामिक व जेहादी गतिविधियां बेहद खतरनाक ढंग से कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा दे रही है| जहाँ धर्म की आड़ में विभिन्न मदरसों, मस्जिदों में मौलवी जेहाद और आतंक की खुलेआम शिक्षा देते हैं, जेहादी बनने का प्रशिक्षण देते हैं| फिर भी कोई भारतवंशी सेक्युलर ये मानने को तैयार नहीं की आतंक का कोई धर्म होता है| जबकि आंकड़ें बताते हैं की देश में अबतक हुए विभिन्न इस्लामिक आतंकवादी हमलों में 50,000 से अधिक लोग मारे गए हैं|

हमारे यहाँ कोई डोनाल्ड ट्रंप या शेख हसीना जैसे मुसलमानों को इसका जिम्मेदार मानने को कतई तैयार नहीं है| लोग खौफ में जी रहे हैं, हमले हो रहे हैं, मासूम मारे जा रहे हैं, लोगों का घर बर्बाद हो रहा है, घाटी सुलग रही है, जवान शहीद हो रहे हैं, फिर भी आतंक का कोई धर्म नहीं है| कुरानशरीफ की आयतें सेक्युलर भारत के लिए सर आँखों पर है चाहे वो जिहाद या बर्बरता ही क्यूँ न सिखाता हो| किसी में भी हिम्मत नहीं जो इस्लाम के इन जड़ों को प्रतिबंधित करे|

जाकिर नाईक का मसला इतनों दिनों तक छुपा कैसे रहा? भारत की जमीन से दुनिया को जिहाद करने, आतंकी बनने का सन्देश दिया जाता रहा फिर भी हम इतने संवेदनहीन क्यों बने रहे? क्या ये हमारी सुरक्षा तंत्र की विफलता नहीं है? राजनीति और अपने लोकतंत्र की आड़ में धर्मनिरपेक्ष बने रहने की झूठी शान हमारे राष्ट्र-राज्य को बर्बाद कर देगी| अभी तो मजा आ रहा है की आम लोग ही तो मर रहे हैं, जब खास मरने लगेंगे तब शायद उन्हें हकीकत का अंदाज़ा हो पर तबतक देर हो चुकी होगी|

ईराक और सीरिया का रास्ता भारत भी पहुँचता है और भारत का खौफनाक इस्लामिक इतिहास और उसका चरित्र उनके स्वागत के लिए हरसंभव तत्पर रहेगा| फिर तो सारे बम-बारूद धरे के धरे रहे जायेंगें और लोगों को कलमें, आयतें पढने को मजबूर हो जाना पड़ेगा… क्या नहीं!

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