लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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डॉ. दीपक आचार्य

शोरगुल में रमना पागलपन से कम नहीं,

आज का सफर कई जोखिमों से भरा हो चला है। जोखिम बाहर के भी हैं और भीतर के भी। कई जोखिम दुर्भाग्यजनित हैं तो कई मानवजनित। अनायास आ टपकने वाले जोखिमों के बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता मगर मानवजनित हरकतें खतरनाक से कम नहीं।

अब नए किस्मों का पागलपन हावी होता जा रहा है। आदमी है ही ऐसी प्रजाति जो कभी शांत नहीं रह सकता। गहरी नींद के पलों को छोड़कर हमेशा उसे कुछ न कुछ हरकत करने की सूझती रहती है।

आजकल रेल हो या बस यात्रा या और कोई आयोजन। अशांत और उद्विग्न मनःस्थिति से परेशान हो चले आदमी के लिए कभी मोबाइल पर जोर से गाने सुनने का शौक परवान पर चढ़ता है तो कभी आपस में अनर्गल चर्चाओं के दौर शुरू हो जाते हैं।

कई बार ऐसे-ऐसे नमूने देखने को मिल जाते हैं जो बसों और रेलों में पूरे समय मोबाइल पर जोर-जोर से बतियाते हुए घर-गृहस्थी से लेकर काम-धंधों और संबंधों तक के पुराणों का वाचन कर डालते हैं। कई बार तो वाहनचालक भी ऐसे-ऐसे शौक पाल लेते हैं कि बस।

हर व्यक्ति को चैन के साथ जीवनयापन का अधिकार है। आरामदायी सफर का अधिकार भी। लेकिन अब सफर भी कहाँ आरामदायी रह गया है। यांत्रिक पागलपन के मौजूदा दौर में सभी को अपनी ही पड़ी है। किसी में यह संवेदनशीलता नहीं रही कि उसके कृत्यों से औरों को कितना परेशान होना पड़ता है।

यात्रियों में कई लोग बीमार और थके-हारे हो सकते हैं जिन्हें सफर में आराम से नींद आने का मौका होता है। कई लोग ध्यान में मग्न रहते हैं तो कई यात्री ऐसे हुआ करते हैं जिन्हें शोरगुल जरा भी पसंद नहीं होता है। जो लोग किसी भी प्रकार से शोरगुल के आदी होते हैं उन्हें दूसरे यात्रियों से भरपूर बद्दुआएँ मिला करती हैं।

ख़ासकर युवाओं में यह रोग महामारी की तरह फैलता जा रहा है। यों देखा जाए तो सार्वजनिक वाहनों बस-रेल में ऊँची आवाज में चिल्लाते हुए बातें करना अथवा अपने मनोरंजन के लिए मोबाइल से तेज शोर में गाने सुनना अपने आप में उन्माद का लक्षण है और इससे साफ पता चलता है कि ऐसा करने वाला व्यक्ति कितना आधा-अधूरा या खाली है। शोरगुल से सुकून और शांति की कल्पना करने वालों को किस श्रेणी में रखा जा सकता है इसे समझदार लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं।

जिसका जीवन अशांत है और मन के भीतर शांति नहीं है ऐसे लोग ही इस प्रकार की हरकतें करते हुए शांति की तलाश करते हैं मगर उन्हें उत्तरोत्तर अशांति और उद्विग्नता ही हाथ लगती है और इस किस्म के लोगों के लिए सफलता अपने आप से दूर भागती रहती है। सफलता उन्हीं लोगों के भाग्य में होती है कि जो जीवन में धैर्य और शांति के साथ कार्य संपादन करने वाले होते हैं।

हम जहां कहीं रहें, अपने भरपूर मनोरंजन का हक है लेकिन दूसरों को तंग करते हुए मनोरंजन करना न स्वस्थ परम्परा है और न ही मानवोचित व्यवहार। दूसरों की शांति भंग करते हुए मनोरंजन की आदत जीवन में एक बार प्रवेश कर जाने पर धीरे-धीरे वह मानसिक विक्षिप्तता के उच्चतम स्तरों की ओर बढ़ती रहती है और एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब आपको कुछ न कुछ घोषित कर दिया जाए। और कुछ नहीं तो नाकारा घोषित होने से कोई रोक नहीं सकता।

आनंद के लिए बाहर झाँकने की बजाय भीतर की ओर दृष्टि घुमाएं और शांतचित्त होकर धैर्य के साथ अन्तस् के नादों को सुनें। ये बाहरी शोरगुल से मिलने वाले तथाकथित आनंद से हजार गुना होंगे और स्थायी भाव लिये हुए भी।

शोरगुल से आनंद पाने वाले लोग संस्कारहीनता के जीवंत प्रमाण हैं और इस एकमात्र लक्षण से उनके पूरे भावी जीवन के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है। इससे बचें और यह संकल्प लें कि हमारी किसी गतिविधि से औरांे को तकलीफ नहीं हो। अन्यथा हमारी ऐसी ही हरकतें चलती रहीं तो आने वाला समय हमारे लिए किसी काम का नहीं रहने वाला।

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