लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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भोपाल गैस त्रासदी के सच से शर्मिंदा है देश

-संजय द्विवेदी

यह सिर्फ हम ही कर सकते थे। कोई और नहीं। भारत के अलावा कहीं की राजनीति इतनी बेशर्म कैसे हो सकती है। यह सुनना और सोचना कितना दुखद है कि एक शहर जहां 15 हजार लोगों की एक साथ मौत हो जाए और उस आरोप में एक भी आदमी पचीस साल के बाद भी जेल में न हो। इस नरसंहार को अंजाम देने वाले आदमी के लिए देश का प्रधानमंत्री फोन करे और राज्य का मुख्यमंत्री उसे राजकीय विमान उपलब्ध कराए। एसपी उसे गाड़ी चलाते हुए कलेक्टर के साथ हेलीकाप्टर तक छोड़ने जाए। न्याय की सबसे बड़ी आसंदी पर बैठा जज आरोपों को इतना कम कर दे कि आरोपियों को सिर्फ दो-दो साल की सजा सुनाई जाए। इतना ही नहीं दिल्ली में 15 हजार मौतों का जिम्मेदार यह आदमी राष्ट्रपति से मुलाकात भी करता है।

इन धिनौनी सच्चाइयों पर अब देश की सबसे जिम्मेदार पार्टी के प्रवक्ता का बयान सुनिए। वे कह रहे हैं कि अगर एंडरसन को देश से निकाला नहीं जाता तो भीड़ उन्हें मार डालती। वे कहते हैं देखिए कसाब को जेल में रखने और सुरक्षा देने में नाहक कितना खर्च आ रहा है। वाह हमारे नेता जी और आपकी राजनीति। बेहतर है जेल के फाटक खोल दिए जाएं, इतने अपराधियों और आरोपियों पर हो रहा खर्च बच जाएगा। इस बेशर्मी का कारण सिर्फ यह है कि हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी का नाम इस विवाद से जुड़ा है। अब कांग्रेस कैसे मान सकती है कि गांधी परिवार के उत्तराधिकारियों से भी कभी कोई पाप हो सकता है। देवकांत बरूआ के ‘इंदिरा इज इंडिया ’ के नारे सुनकर बड़े हुए आज के कांग्रेसजन कैसे चापलूसी की इस प्रतियोगिता में पीछे रह सकते हैं। कांग्रेस के एक दिग्गज नेता का कहना है सजा दिलाने के लिए कानूनों में परिवर्तन करना चाहिए। 25 साल तक आपके ये सुविचार कहां थे मान्यवर। यह तो वही हाल है कि जब गाज गिरी तो जाग पड़े। एंडरसन को पहले भगाइए और अब प्रत्यर्पण की फाइल चलाइए।

यह देश ऐसा क्यों है? बड़ी से मानवीय त्रासदी हमें क्यों नहीं हिलाती? हमारा स्मृतिदोष इतना विलक्षण क्यों है ? हम क्यों भूलते और क्यों माफ कर देते हैं? राजनीति अगर ऐसी है तो इसके लिए क्या हम भारत के लोग जिम्मेदार नहीं है? क्या कारण है कि हमारे शिखर पुरूषों की चिंता का विषय आम भारतीय नहीं गोरी चमड़ी का वह आदमी है जिसे देश से निकालने के लिए वे सारे इंतजाम करते हैं। हमारे लोगों को सही मुआवजा मिले, उनके जख्मों पर मरहम लगे इसके बजाए हम उस कंपनी के गुर्गों के साथ खड़े दिखते हैं जिसने कभी हमें कुछ आर्थिक मदद पहुंचाई। पैसे की यह प्रकट पिपासा हमारी राजनीति, समाज जीवन, प्रशासनिक तंत्र सब जगह दिखती है। आम हिंदुस्तानी की जान इतनी सस्ती है कि पूरी दुनिया इस फैसले के बाद हम पर हंस रही है। राजनीति के मैदान के शातिर खिलाड़ी जो पिछले पचीस सालों में कुछ नहीं कर पाए एक बार फिर न्याय दिलाने के लिए मैदान में उतर पड़े हैं। भोपाल में निचली अदालत के फैसले ने कुछ किया हो या न किया हो, हमारे तंत्र का साफ चेहरा उजागर कर दिया है। यह फैसला बताता है कि कैसे पूरा का तंत्र जिसमें सारी पालिकाएं शामिल होकर गुनहगारों को बचाने के लिए एक हो जाती हैं। आज हालात यह हैं कि इन पचीस सालों के संर्धष का आकलन करें तो साफ नजर आएगा कि जनसंगठनों और मीडिया के अभियानों के दबाव की बदौलत जो मुआवजा मिल सका, मिला। बाकी सरकारों की तरफ से न्यायपूर्ण प्रयास नहीं देखे गए। आज भी भोपाल को लेकर मचा शोर इसलिए प्रखरता से दिख रहा है क्योंकि मीडिया ने इसमें रूचि ली और राजनैतिक दलों को बगलें झांकने पर मजबूर कर दिया।

भोपाल गैस त्रासदी के सबक के बाद हमारी सरकारों को चेत जाना था किंतु दिल्ली की सरकार जिस परमाणु अप्रसार के जुड़े विधेयक को पास कराने पर आमादा है उसमें इसी तरह कंपनियों को बचाने के षडयंत्र हैं। लगता है कि हमारी सरकारें भारत के लोगों के द्वारा भले बनाई जाती हों किंतु वे चलाई कहीं और से जाती हैं। लोकतंत्र के लिए यह कितना बड़ा मजाक है कि हम अपने लोगों की लाशों पर विदेशियों को मौत के कारखाने खोलने के लिए लाल कालीन बिछा रहे हैं।विदेशी निवेश के लिए हमारी सरकारें, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सब पगलाएं हैं। चाहे उसकी शर्ते कुछ भी क्यों न हों। क्या यह न्यायोचित है। जब देश और देशवासी ही सुरक्षित नहीं तो ऐसा औद्योगिक विकास लेकर हम क्या करेंगें। अपनी लोगों की लाशें कंधे पर ढोते हुए हमें ऐसा विकास कबूल नहीं है। इस घटना का सबक यही है कि हम सभी कंपनियों का नियमन करें,पर्यावरण से लेकर हर खतरनाक मुद्दे पर कड़े कानून बनाएं ताकि कंपनियां हमारे लोगों की सेहत और उनके जान माल से न खेल सकें। निवेश सिर्फ हमारी नहीं विदेशी कंपनियों की भी गरज है। किंतु वे यहां मौत के कारखाने खोलें और हमारे लोग मौत के शिकार बनते रहें यह कहां का न्याय है। भोपाल कांड के बहाने जब सत्ता और अफसरशाही के षडयंत्र और बिकाउपन के किस्से उजागर हो चुके हैं तो हमें सोचना होगा कि इस तरह के कामों की पुनरावृत्ति कैसे रोकी जा सकती है। यहां तक की गैस त्रासदी के मूल दस्तावेजों से भी छेड़छाड़ की गयी। ऐसा मुजरिमों को बचाने और कम सजा दिलाने के लिए किया गया। अब इस घतकरम के बाद किस मुंह से लोग अपने नेताओं को पाक-साफ ठहराने की कोशिशें कर रहे हैं, कहा नहीं जा सकता। अब ये प्रमाण सामने आ चुके हैं कि 3 दिसंबर,1984 को दर्ज हादसे की एफआईआर और पांच दिसंबर को कोर्ट के रिमांड आर्डर में भारी हेरफेर की गयी। इतना सब होने के बाद भी हमारी बेशर्म राजनीति हमें न्याय दिलाने का आश्वासन दे रही है। जल्लादों के हाथ में ही न्याय की पोथी थमा दी गयी है। जाहिर है वे जो भी करेंगें वह जंगल का ही न्याय होगा। इस हंगामे में जरूर सरकारें और राजनीति हिली हुयी है किंतु सारा कुछ जल्दी ही ठहर जाएगा। हम भारत के लोगों को ऐसे हंगामे करने और भूल जाने की आदत जो है। भोपाल इस सदी की एक ऐसी सच्चाई और कलंक के रूप में हमारे सामने है जिसका जवाब न हमारी राजनीति के पास है, न न्यायपालिका के पास, न ही हमारे प्रशासन के पास। क्योंकि इस प्रसंग में संवैधानिक पद पर बैठा हर आदमी अपनी जिम्मेदारियों से भागता हुआ दिखा है। दिल्ली से लेकर भोपाल तक, रायसीना की पहाड़ियों से लेकर श्यामला हिल्स तक ये पाप-कथाएं पसरी पड़ी हैं। निचली अदालत के फैसले ने हमें झकझोर कर जगाया है किंतु कब तक। क्या न्याय मिलने तक। या हमेशा की तरह किसी नए विवादित मुद्दे के खुलने तक….।

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7 Comments on "इट हैपेन्स ओनली इन इंडिया!"

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डॉ. मधुसूदन
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एक बिलकुल सीधा सादा सुझाव आगे के लिए —रखता हूं। (१) अमरिकामें O S H A,{Occupational Safety and Health Authority} एक ऑर्गनायज़ेशन है इस संस्थाके प्रावधानों का अध्ययन किया जाए। और सारी सावधानियोंका किसी तीसरी स्वतंत्र संस्थासे —उसका –नियंत्रण करवाया जाए। जिसके अंतर्गत लॉग हो। उसे जांच कर भरा जाए। एक कंपनीका कर्मचारी लॉग भरता है, दूसरी कंपनीका उसको दुबारा अलग लॉगमें उसे सत्यापित करे। OSHA के अतिरिक्त और भी संस्थाएं है। ===सिद्धांत==> जो भी स्तर या मानक अमरिकामें लागू होता है, कमसे कम (अधिक हमपर है) उतना तो सोचा जाए, लागु करे,वही मानक या स्तर को अपना ले। इसमें… Read more »
bhagat singh
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bhai sanjai, jitne bhi khulase ho rahe hain iasme kuch bhi naya nahi hain.yah sab akhbaro me chap cuka hain ki andarsan ko arjun singh ne bhagaya.rajivgandhi ki bhumika bhihi desh janta hain,mamla amrica ka nahi bhi hota to bhi hamari sarkaro ka yahi hal hota. sawal yah he ki hum dubara aise kai bhopl dohrane ki taiyari kar rahe hain.sarkare chahe कांग्रेस ki ho ya bjp ki iska koi khas fark nahi padta.koi inhe bhagata hain koi apradhiyo ko pasamshree se nawajta hain. comred kashyap ne bilkul sahi kaha hain. parmanu sandhi par manmohan singh ne apni sarkar dawn… Read more »
NKKashyap
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Those who are slaves when realise that they are slave they faught for freedom.Those who adopt slavery as lifestyle and there whole existance depends on there masters, right or wrong will be decided by the master so every thing was decided by Andersen we simply obeyed.Even Gom”s decision not to press for extradition of Andersen and sanctioning of Rs 982 cr from taxpayers money sends message to masters you kill we will compensate from public money.Whether MASTERS be Union Carbide,Vedanta or all sez holders & MNCs.Hail Masters NKkashyap Bilaspur cg
mamta
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संजय जी , इक बार फिर आपका लेख झकझोरता है , सोचने पर मजबूर करता है , गैस त्रासदी के समय नेताओं ने खूब मनमानी की लेकिन मीडिया ने भी कोनसा अपना फर्ज निभाया ? हालात इतने बदतर है की आज कवि दुष्यंत बरबस याद आते है की “कैसे कैसे मंजर नजर आने लगे है गाते गाते लोग चिल्लाने लगे है , अब तो इस तालाब का पानी बदलो यारों इसके कमल मुरझाने लगे है

डॉ. मधुसूदन
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॥भारतके शासक और अमरिकाके शासक॥ —-दोनोमें आपही अंतर देख लिजिए॥ १६ जून के, वॉशिंग्टन से प्रसृत समाचार, का सारांश। अमरिकाके राष्ट्रपति ओबामा ने मैक्सिको की खाड़ी में हुए (पेट्रोलियम) तेल के रिसाव के लिए, ब्रिटिश पेट्रोलियम (बीपी) पर सुरक्षाकी अवहेलना का आरोप लगाते हुए कहा; कि वे तब तक चैन से नहीं बैठेंगे, जब तक बीपी नुकसान की पूर्ति नहीं कर देती।(हम २५ वर्ष सोए) आगे ओबामाने कहा, कि, वे, बुधवार को, बीपी के चेयरमैन से मिलने जा रहे हैं, और आगे बोले, कि उनसे कहेंगे, कि बी पी मेक्सिको की खाड़ी के तट्वासी और वहां काम करने वालों को… Read more »
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