लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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-लिमटी खरे

एक समय में सामाजिक बुराई समझे जाने वाले भ्रष्टाचार ने आजाद हिन्दुस्तान में अब शिष्टाचार का रूप धारण कर लिया है। बिना रिश्वत दिए लिए कोई भी काम संभव नहीं है, यह हमारा नहीं देश की सबसे बड़ी अदालत का मानना है। अस्सी के दशक के मध्य तक भ्रष्टाचार को सामाजिक बुराई समझा जाता था, उस समय भ्रष्टाचार करने वालांे को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था। कालान्तर में भ्रष्टाचार की जड़े इस कदर गहरी होती गईं कि हर सरकारी कार्यालय में भ्रष्टाचार अब रग रग में बस चुका है। सरकारी कार्यालयों के बाबू, अफसर और चपरासी बेशर्म होकर ‘कुछ चढ़ावा तो चढ़ाओ‘, ‘बिना वजन के फाईल उड़ जाएगी‘, ‘बिना पहिए के फाईल कैसे चलेगी‘, ‘अरे सुविधा शुल्क तो दे दो‘ आदि जुमले पूरी ईमानदारी के साथ बोलते नजर आते हैं। याद नहीं पड़ता कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी के उपरांत किसी जनसेवक ने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी चिंता जाहिर की हो। आज कम ही जनसेवक एसे बचे हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप न हों। यह अलहदा बात है कि भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होने में बरसों बरस लग जाते हैं, तब तक मूल मामला लोगों की स्मृति से विस्मृत ही हो जाता है। लालू प्रसाद यादव और सुरेश कलमाड़ी इस बात के जीते जागते उदहारण कहे जा सकते हैं जिन पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों के बावजूद भी कांग्रेसनीत कंेद्र सरकार ने उन्हंे गले लगाकर ही रखा है। विडम्बना यह है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अक्सर ही खुद को सत्यवादी हरिशचंद के वंशज बताकर भ्रष्टाचार पर लंबे चौंड़े भाषण पेलते रहते हैं, पर जब उसे अमली जामा पहनाने की बारी आती है तब भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार बनकर उभर जाता है।

भारत गणराज्य की आने वाली पीढ़ी नब्बे के दशक और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक को किसी रूप में जाने या न जाने किन्तु भ्रष्टाचार के गर्त में भारत को ढकेलने के लिए अवश्य ही याद करेगी। नई दिल्ली के एक समाचार पत्र समूह द्वारा इसी साल अगस्त माह के पहले पखवाड़े में कराए गए सर्वे में यह तथ्य उभरकर आया है कि उमर दराज हो चुके दिल्ली के 65 फीसदी लोगों का मानना है कि आजाद भारत में भ्रष्टाचारियों को अधिक ‘आजादी‘ नसीब हुई है। रिश्वत खोरों के लिए सजा का प्रावधान नगण्य ही है। बिना रिश्वत की पायदान चढ़े देश में कोई भी काम परवान नहीं चढ सकता है। लोगों का मानना था कि इस मामले का सबसे दुखद पहलू यह है कि भ्रष्टाचार की जांच करने वाले लोग खुद भी भ्रष्टाचार की जद में हैं। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के पेंशनर्स का मानना हृदय विदारक माना जा सकता है कि उन्होंने अपने जीवन में सरकारी सेवा के दौरान जनता की सेवा पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ की किन्तु अब उन्हंे भी रिश्वत की सीढ़ी पर चढ़ने पर मजबूर होना पड़ता है। यह है गांधी नेहरू के देखे गए आजाद भारत की इक्कीसवीं सदी की भयावह तस्वीर।

अस्सी के दशक के मध्य तक कमोबेश हर कार्यालय की दीवार पर ‘‘घूस (रिश्वत) लेना और देना अपराध है, दोनों ही पाप के भागी हैं‘‘ भावार्थ के जुमले लिखे होते थे। उसके पहले तक रिश्वत लेने वाले को समाज में बेहद बुरी नजर से देखा जाता था। आज चालीस की उमर को पार करने वाले प्रौढ़ भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि भ्रष्टाचार का तांडव अगर इसी तरह जारी रहा तो आने वाले भारत की तस्वीर कितनी बदरंग और बदसूरत हो जाएगी।

जनसेवक, सरकार, न्यायालय हर जगह भ्रष्टाचार को लेकर तरह तरह की बहस होती है। बावजूद इसके जब भी जमीनी हकीकत को देखा जाता है तो भ्रष्टाचार का बट वृक्ष और विशालकाय होकर उभरता दिखाई पड़ता है। इसकी परछाईं इतनी डरावनी होती है कि आम आदमी ईमानदारी से जीने की कल्पना कर ही सिहर जाता है। आज ईमानदार सरकारी कर्मचारी फील्ड पोस्टिंग के बिना मन मसोसकर रह जाते हैं। अनेक विभागों में न जाने एसे कितने कर्मचारी अधिकारी होंगे जो भ्रष्ट व्यवस्था से समझौता न कर पाने के चलते जिस पद पर भर्ती हुए उसी से सेवानिवृत होने पर मजबूर होंगे।

हद तो तब हो गई जब देश की सबसे बड़ी अदालत की एक पीठ ने भ्रष्टाचार पर अपनी तल्ख टिप्पणी कर डाली। सुप्रीम कोर्ट की पीठ का कहना था कि अगर सरकार भ्रष्टाचार को रोक नहीं सकती तो उसे कानूनन वैध क्यों नहीं बना देती है। सुप्रीम कोर्ट ने सही कहा है कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नही लग रही है। अगर यही सही है तो सरकार भ्रष्टाचार को कानूनी स्वरूप दे दे।

सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी अपने आप में अत्यंत महात्वपूर्ण और आत्मावलोकन करने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है, किन्तु धरातल की हकीकत को अगर देखा जाए तो यह टिप्पणी आम आदमी की लाचारी को ज्यादा परिलक्षित करती है। सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कोर्ट की टिप्पणी भले ही आबकारी, आयकर और बिक्रकर विभाग के बारे में हो पर यह सच है कि संपूर्ण सरकारी तंत्र को भ्रष्टाचार का लकवा मार चुका है। भ्रष्ट सरकारी तंत्र पूरी तरह पंगु हो चुका है। हमें यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि सरकार चलाने वाले जनसेवक नपुंसक हो चुके हैं, उनकी मोटी चमड़ी पर नैतिकता के पाठ की सीख का कोई असर नहीं होने वाला है।

देश में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि ‘‘सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का‘‘ की तर्ज पर जब भ्रष्टाचार पर अकोड़ा और अंकुश कसने वाले ही भ्रष्टाचार के समुंदर में डुबकी लगा रहे हों, तब आम आदमी की बुरी गत होना स्वाभाविक ही है। विजलेंस विभाग आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, पर सरकार में बैठे शीर्ष अधिकारी अपने निहित स्वार्थों के लिए अपने खुद के लिए बस धृतराष्ट की भूमिका को ही उपयुक्त मान रहे हैं।

भारत गणराज्य की स्थापना के साथ ही यहां का प्रजातंत्र तीन स्तंभों पर टिका बताया गया था। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका। इसके अलावा इन तीनों पर नजर रखने के लिए ‘‘मीडिया‘‘ को प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के तौर पर अघोषित मान्यता दी गई थी। विडम्बना यह है कि मीडिया भी इन्हीं भ्रष्टाचारियों की थाप पर मुजरा करते आ रहा है। अपने निहित स्वार्थों के लिए मीडिया ने भी अपनी विश्वसनीयता को खो दिया है। देश भर में हर जगह नेता विशेष के चंद टुकड़ों के आगे मीडिया ने अपनी पहचान मिटा दी है। नेताओं द्वारा मीडिया को अपनी इस सांठगांठ में मिलाने के लिए उन्हें राजनैतिक दलों का सदस्य बना लिया जाता है फिर वह मेनेज्ड मीडिया सरकार की वह उजली छवि पेश करता है कि लोगों को लगने लगता है कि फलां नेता भ्रष्टाचारी हो ही नहीं सकता यह उसके खिलाफ विरोधियों का षड्यंत्र ही है।

इस समय सरकार में शामिल न होकर भी सरकार का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के पति मरहूम राजीव गांधी ने बतौर प्रधानमंत्री कहा था कि केंद्र सरकार से भेजा जाने वाले एक रूपए में से पंद्रह पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। यह बात उन्होंने अस्सी के दशक के पूर्वाध में कही थी। अगर उस वक्त यह आलम था तो आज तो सारी योजनाएं ही कागजों पर सिमटकर रह जाती हैं।

विचित्र किन्तु सत्य की बात भी सरकारें ही चरितार्थ करती हैं। राज्य या केद्र सरकार ही योजनाएं बनाती है, उन योजनाओं के लिए धन जुटाकर आवंटित करती हैं, योजनाओं को अमली जामा भी सरकारों द्वारा पहनाया जाता है। योजनाएं पूरी होने पर उनकी समीक्षा भी सरकारों द्वारा ही की जाती है। इस समीक्षा में अंत में निश्कर्ष यही आता है कि उस योजना में वह खामी थी या फिर उस योजना का पूरा लाभ जनता को नहीं मिल पाया। यक्ष प्रश्न तो यह है कि योजना किसने बनाई और किसने क्रियान्वित की? जाहिर है सरकारी सिस्टम ने, तब इसके लिए जवाबदेही तय होना चाहिए या नहीं और अगर पूरा लाभ नहीं मिल पाया तो इस तरह पानी मंे बहाई गई राशि को सरकारी तन्खवाह पाने वालों के वेतन से उसे वसूल क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

भ्रष्टाचार की अनुगूंज के मध्य भ्रष्टाचार रोकने के लिए तैनात लोकायुक्त ने भी एक सुर से संवैधानिक अधिकारों की मांग आरंभ कर दी है। लोकायुक्त चाहते हैं कि केंद्र सरकार संसद में एक विधेयक लाकर लोकायुक्त संगठन को समेचे देश में एकरूपता प्रदान करे। अब तक अमूमन लोकायुक्त के पद पर किसी बड़ी अदालत के ही सेवानिवृत न्यायधीश को लोकायुक्त बनाया गया है। पिछले चार दशकों का इतिहास इस बात का गवाह माना जा सकता है कि लोकायुक्त द्वारा अब तक छोटे मोटे शिकार के अलावा कौन सी बड़ी मछली को पकड़कर सजा दिलाई हो।

महज रस्म अदायगी के लिए तृतीय या चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी पर प्रकरण बनाकर लोकायुक्त संगठन द्वारा भी रस्म अदायगी ही की जाती रही है। भारत गणराज्य के हर सूबे में लोकायुक्त संगठन ने मंत्री, बड़े अधिकारियों नौकरशाहों या दिग्गजों को दागी करार दिया है, बावजूद इसके किसी के खिलाफ भी कार्यवाही न किया जाना भारत के ‘‘सिस्टम की गुणवत्ता‘‘ की ओर इशारा करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है।

भारत सरकार के कानून मंत्री भले ही भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए वचनबद्ध होने का स्वांग रच रहे हों, लोकायुक्त संगठनों को अधिक ताकतवर बनाने का प्रयास करने का दिखावा कर रहे हों, पर क्या उनमें इतना माद्दा है कि वे स्वयं इस बात की ताकीद लोकायुक्त संगठनों से करें कि उनके पास कितने प्रकरण लंबित हैं, और कितनी शिकायतों पर लोकायुक्त संगठनों ने क्या कार्यवाही की, किन प्रकरणांे को किस आधार पर नस्तीबद्ध किया गया। दरअसल लोकायुक्त के पास जाने का साहस आम आदमी जुटा नहीं पाता है, इसलिए कम ही लोगों को इस बात की जानकारी हो पाती है कि किसके खिलाफ शिकायत हुई और क्या कार्यवाही हुई।

रही बात देश के चौथे स्तंभ मीडिया की तो मीडिया के पास जब लोकायुक्त में दर्ज प्रकरणों की जानकारी आती है, तो मीडिया भी उसका इस्तेमाल ‘‘अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर देय‘‘ की तर्ज पर ही करता है। हर सूबे में भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्री, नौकरशाहों, दिग्गजों की लंबी फेहरिस्त होगी पर कार्यवाही अंजाम तक किसी भी मामले में नहीं पहुंच पाना निश्चित तौर पर मंशा में कमी को ही परिलक्षित करता है।

जो पकड़ा गया वो चोर, बाकी सब साहूकार का सिस्टम आज सरकारी तंत्र में पसरा है। जो भी रिश्वत लेते पकड़ा जाए उसे ही चोर माना जाता है बाकी सारे तंत्र में भ्रष्टाचार को शिष्टाचार की तरह अंगीकार कर लिया गया है। इस मामले में एक वाक्ये का जिकर लाजिमी होगा। मध्य प्रदेश में पंचायती राज की स्थापना के उपरांत प्रदेश मंत्रालय के एक उपसचिव स्तर के अधिकारी स्व.आर.के.तिवारी द्वारा पूूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी से भेंट के दौरान त्रिस्तरीय पंचायती राज की व्यख्या की गई थी। उन्होंने स्व. राजीव गांधी से कहा था कि मध्य प्रदेश में तीन स्तर पर पंचायती (भ्रष्टाचार) राज कायम है।

पहला है सचिवालय जहां नीति निर्धारक बैठते हैं इसे अंग्रेजी में ‘‘सेकरेटरिएट‘‘ कहते हैं इसका नाम बदलकर ‘सीक्रेट रेट‘ कर देना चाहिए, क्योंकि यहां हर काम का रेट सीक्रेट है। हो सकता है आपका काम एक दारू की बॉटल में हो जाए न काहो कि दस लाख में हो। यहां हर काम का रेट सीक्रेट यानी गुप्त ही है।

दूसरा है संचालनालय जिसे आंग्ल भाषा में ‘‘डायरेक्ट रेट‘‘ कहते हैं। संचालनालय में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए हर विभाग के आला अधिकारी की तैनाती होती है। अपने आंग्ल नाम को मूर्त रूप देता है यह सरकारी कार्यालय। अर्थात यहां हर बात का डारेक्ट यानी सीधा रेट है। फलां काम में डेढ़ परसेंट लगेगा, फलां काम में आवंटन के लिए तीन परसेंट देना होगा वरना आप अपनी व्यवस्था देख लीजिए।

अब दो स्तर के बाद तीसरा स्तर आता है जिलों का। हर जिले में इन सरकारी योजनाओं को मैदानी अफसरान द्वारा अमली जामा पहनाया जाता है। हर जिले में जिलाध्यक्ष का कार्यालय होता है। जिलाध्यक्ष का नियंत्रण समूचे जिले पर होता है। जिलाध्यक्ष का काम ही हर बात पर नजर रखना होता है। अंग्रेजी में जिलाध्यक्ष के कार्यालय को ‘‘कलेक्ट रेट‘‘ कहा जाता है। अर्थात जिलांे में प्रदेश या केंद्र सरकार से आने वाली राशि को कलेक्ट किया जाता है, इधर रेट का सवाल ही पैदा नहीं होता है, यहां तो बस कलेक्ट करने का काम ही होता है।

हर सूबे में राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो अर्थात ईओडब्लू अपनी अपनी तर्ज और नाम से काम कर रहे हैं। यह पुलिस का ही एक विंग है, जिसका काम आर्थिक तौर पर हो रहे अपराधों पर नजर रखने का है। सरकारी सिस्टम में आर्थिक तौर पर होने वाले अपराधों की जानकारी ईओडब्लू को देने पर उनका फर्ज तत्काल कार्यवाही करने का है। अमूमन देखा गया है कि ईओडब्लू के मातहत सूचना मिलने पर आरोपी से ही भावताव करने जुट जाते हैं। शायद ही कोई सूबा एसा बचा हो जिसमें आर्थिक अपराध रोकने वाली शाखा में दागी अफसर कर्मचारियों की तैनाती न हो। इन परिस्थितियों मंे अगर इन्हें और अधिक साधन संपन्न बना दिया गया तो निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार का ग्राफ और अधिक बढ़ जाएगा, क्योंकि भ्रष्टाचारी को बचने के लिए इन संगठनों को अधिक राशि रिजर्व स्टाक में रखना पड़ेगा जो उसे अलग से कमानी होगी।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और रसायन मंत्री राम विलास पासवान के बीच भ्रष्टाचार को लेकर हुए कथित संवाद को सियासी गलियारों में चटखारे लेकर सुनाया जाता था। यह वार्तालाप उनके बीच हुआ अथवा नहीं यह तो वे दोनों ही जाने पर चटखारे लेकर किस्से अवश्य सुनाए जाते रहे। कहा जाता है कि जब राम विलास पासवान के मंत्रालय में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंचा तो डॉ. मनमोहन सिंह ने उन्हें बुला भेजा, और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की बात कही। इस पर पासवान भड़क गए और बोले आप हमें मंत्री मण्डल से बाहर कर दें तो बेहतर होगा, हम इसे रोक नहीं सकते, क्योंकि हमें पार्टी चलाना है। पार्टी का खर्च हम आखिर कहां से निकालेंगे?

अस्सी के दशक तक शैक्षणिक संस्थानों में नैतिकता का पाठ सबसे पहले पढ़ाया जाता था। अस्सी के दशक के उपरांत जब से शिक्षा का व्यवसाईकरण हुआ है, तब से आने वाली पौध को नैतिकता का पाठ ही नहीं पढ़ाया जा रहा है। इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब सरकारी स्कूलों का शैक्षणिक स्तर घटिया हो, देश का भविष्य तैयार करवाने वाले शिक्षक शालाओं के बजाए निजी तौर पर ट्यूशन पर जोर दे रहे हों, निजी स्कूलों ने शिक्षा को व्यवसाय बना लिया हो, तब बच्चों को आदर्श और नेतिकता कौन सिखाएगा।

वैसे भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों और मीडिया के भ्रष्ट लोगों के गठजोड़ ने देश को भ्रष्टाचार की अंधी सुरंग में ढकेल दिया है। नैतिकता की दुहाई देकर उसे अपने से कोसों दूर रखने वाले लोगांे ने भारत को अंधेरे में बहुत दूर ले जाया गया है। आज आप किसी भी सरकारी दफ्तर में चले जाएं बिना रिश्वत के आपका कोई काम नहीं हो सकता है। और तो और अब तो मंत्रीपद पाने के लिए भी रिश्वत का सहारा लिया जाने लगा है। देश के अनेक जिलों के कलेक्टर्स के पद भी बिकने लगे हैं। देश में परिवहन, आयकर, विक्रयकर, वाणिज्य आदि जैसे मलाईदार विभागों में तो बिना रिश्वत के एक भी तैनाती नहीं हो सकती है।

बहरहाल माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी चिंता जताकर सरकार को जगाने का प्रयास किया है। न्यायालय का कहना सही है अगर भ्रष्टाचार का खत्मा नहीं किया जा सकता है तो कम से कम इसे कानूनी जामा पहना दिया जाए, ताकि काम कराने वाले को किसी भी काम के लिए सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क की तर्ज पर यह बात तो पता हो कि किस काम के लिए कितनी राशि बतौर ‘चढ़ावा‘, ‘सुविधा शुल्क‘, ‘चढोत्री‘, ‘वजन‘ अथवा ‘शिष्टाचार‘ आदि के लिए अदा करनी है।

जरूरत इस बात की है कि सरकार एक नई व्यवस्था को बनाए, जिसमें हर एक व्यक्तिक की जवाबदेही तय हो, जो इस व्यवस्था का पालन ईमानदारी से न करे, उससे राशि वसूली जाए और उसे आर्थिक और सामाजिक तौर पर दण्डित भी किया जाए। इसके लिए महती जरूरत सरकारी तंत्र में शीर्ष में बैठे लोगों को ईमानदार होने की है। अगर वे ईमानदारी से प्रयास करेंगे तो देश को भ्रष्टाचार के केंसर की लाईलाज बीमारी से मुक्त कराने में समय नहीं लगने वाला, किन्तु पुरानी कहावत है कि ‘‘जगाया उसे जाता है, जो सो राहा हो, किन्तु जो सोने का स्वांग रचे उसे आप चाहकर भी नहीं जगा सकते हैं।‘‘

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5 Comments on "भारत की यह मजबूरी है, भ्रष्टाचार जरूरी है"

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Anil Sehgal
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भारत की यह मजबूरी है, भ्रष्टाचार जरूरी है -by- लिमटी खरे राज्य पाल हंस राज भरद्वाज जी ने कर्नाटक राज्य में जो इतना तूफ़ान लाया हुआ है (जिसमें एक के बाद दूसरा विश्वास प्रस्ताव विधान सभा में कल लाया जाना है) उसका उद्देश्य वह भ्रष्ट्राचार उन्मूलन कहते हैं. इसके उत्तर में मुख्य मंत्री कहते हैं कि उनको विदित है यह करवाने के लिए पैसे कहाँ से आयें हैं. लिमटी खरे जी, यह कर्नाटक का खेल मजबूरी में खेला जा रहा है क्योंकि भ्रष्टाचार हटाना जरूरी है. क्या योग ऋषि बाबा रामदेव जी का भारत स्वाभिमान आन्दोलान भ्रषाचार उन्मूलन कर सकता… Read more »
श्रीराम तिवारी
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वाकई घाव नासूरी है …..चीर फाड़ बहुत जरुरी है …….आप कहेंगे की ये तो हिंसा है ….
पर क्या करें मजबूरी है ….इन्कलाब जरुरी है …….

डॉ. मधुसूदन
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गुजरात भ्रष्टाचारपर बहुत कुछ नियमन बडे सोचसे और युक्ति से कर रहा है। नीचे की वेब साईट देखें।
http://www.indg.in/e-governance/ict-initiatives-in-states-uts

sunil patel
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वाकई इस देश के लिए बहुत शर्म की बात है की देश की सबसे बड़ी अदालत की ने भ्रष्टाचार पर अपनी तल्ख टिप्पणी कर डाली की अगर सरकार भ्रष्टाचार को रोक नहीं सकती तो उसे कानूनन वैध क्यों नहीं बना देती है। कारण भी है. हमें हमारे इतिहास में सच्ची जानकारी नहीं मिलती. स्वाभिमान के केवल पाठ पढाय जाते है. महापुरुषों के पाठ किताबो में केवल पास होने के लिए होते है. स्वाभिमान का जज्बा आएगा कहाँ से. भ्रष्टाचार सरकार तो कभी ख़त्म नहीं कर सकती है कारण कोई भी आपनी आमदनी का जरिया बंद नहीं करता है. सरकार में… Read more »
श्रीराम तिवारी
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bhayank dal -dal men fans chuki bhajpa ko dekh kar sanghi anadar hi andar jar jar ro rahen ..reddi banduon ki bandhua yedurappa sarkaar par aansu bahane ke liye ko bhi khaaki chaddi wala bolne ko taiyaar nahin hai .

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