लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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-निर्मल रानी

केंद्र में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने अपने पिछले शासनकाल में देश में बेराज़गारी कम करने के उद्देश्य से जो सबसे प्रमुख योजना लागू की थी उसका नाम था राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना अर्थात् नरेगा। बाद में इसी योजना को महात्मा गांधी के नाम पर समर्पित कर इसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार योजना (मनरेगा)का नाम दे दिया गया। बताया जा रहा है कि मनरेगा भारत की ही नहीं बल्कि विश्व की सबसे बड़ी ऐसी महत्वाकांक्षी योजना है जिसके अंतर्गत बड़े पैमाने पर बेराज़गारों को रोज़गार दिए जाने का प्रावधान है। इस योजना के अंतर्गत देश के समस्त बेराज़गारों को विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे रहकर अपना जीवन बसर करने वालों को एक वर्ष में कम से कम सौ दिन का रोज़गार दिए जाने की गारंटी दी गई है। सरकार द्वारा मनरेगा के अंर्तगत रोज़गार मुहैया कराने हेतु विशेष रूप से विकास संबंधी अनेक योजनाएं भी सृजित की जाती हैं। इनका संचालन केंद्रीय विकास मंत्रालय की देख-रेख में होता है जबकि रोज़गार मुहैया कराने तथा मज़दूरों को भुगतान कराए जाने का जिम्‍मा राज्‍य सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा पूरा किया जाता है।

जब यह योजना शुरु हुई थी उस समय इसके ऐसे सकारात्मक परिणाम देखने को मिले थे जिससे यह महसूस होने लगा था कि संभवत: अब मनरेगा योजना देश के गरीबों के लिए वरदान साबित होगी। उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे श्रमिक बाहुल्य राज्‍यों से हरियाणा व पंजाब की ओर मजदूरी करने की ग़रज से आने वाले श्रमिकों का यहां आना कम हो गया था। अपने ही क्षेत्र में रोज़गार पाने की वजह से ग्रामीणों में खुशी का माहौल व्याप्त था। यहां तक कि बिहार व उत्तर प्रदेश में हाशिए पर जाती हुई कांग्रेस पार्टी को इसी योजना ने पुन: जीवित कर दिया था। परंतु जैसे-जैसे यही मनरेगा पुरानी पड़ती जा रही है वैसे-वैसे यह योजना अब गोया बेराज़गार मज़दूरों के लिए नहीं बल्कि भ्रष्टाचारी अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों तथा मनरेगा से जुड़े दलालों के लिए वरदान साबित होती जा रही है। परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्‍यों से उन्हीं श्रमिकों का रोज़गार हेतु होने वाला पलायन पुन: आरंभ हो गया है।

मनरेगा के नाम पर होने वाला फर्जीवाड़ा तथा लूट-खसोट देश में लगभग सभी राज्‍यों के सभी जिलों में अपने-अपने ढंग से किया जा रहा है। हद तो यह है कि यू पी ए अध्यक्ष सोनिया गांधी का संसदीय क्षेत्र रायबरेली भी मनरेगा के नाम पर मची लूट से अछूता नहीं है। रायबरेली जिले में मनरेगा की योजनाओं पर काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी हड़पने की जांच भी रायबरेली के जिलाधिकारी करा चुके हैं तथा वहां हुआ फर्जीवाड़ा प्रमाणित हो चुका है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों में मनरेगा के नाम पर धांधली किए जाने के समाचार हैं। चित्रकूट जैसे कुछ जिले तो उत्तर प्रदेश में ऐसे हैं जहां श्रमिकों की सं या से चालीस गुणा अधिक फर्जी नाम के जॉब कार्ड बनवा कर करोड़ों रुपयों की लूट मचाई गई है। यदि कुछ राजनीतिज्ञों की मानें तो प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी की सरकार जानबूझ कर इस योजना का लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंचने देना चाहती। और इसी मंशा के तहत मनरेगा की धनराशि को नेताओं, अधिकारियों तथा दलालों के बीच बंदरबांट किया जा रहा है। मध्य प्रदेश से प्राप्त एक समाचार के अनुसार एक स्थान पर तमाम ऐसे श्रमिकों के नाम पर ‘जॉब कार्ड’ बनवा लिए गए जोकि भगवान को प्यारे हो चुके हैं और इन मृतकों के नाम पर बेशर्म भ्रष्टाचारियों ने लाखों रुपये डकार लिए। मध्य प्रदेश से ही एक और दर्दनाक समाचार कुछ दिनों पूर्व प्राप्त हुआ था। मनरेगा केलिए काम करने वाले कुछ मजदूरों ने गांव के दबंग सरपंच से जब अपनी मादूरी मांगी तथा उसके समक्ष इस बात पर आपत्ति भी जताई कि सरपंच के जिन कृपा पात्रों ने मादूरी नहीं भी की तो उन्हें हजारों रुपयों का भुगतान कर दिया गया जबकि उन्हें काम करने के बावजूद उनकी मादूरी तक नहीं दी गई। उस दबंग सरपंच को एक मेहनतकश मजदूर का इस प्रकार जुबान खोलना नहीं भाया और उसने अपनी खून पसीने की कमाई मांग रहे उस मजदूर की लाठियों से पीट-पीट कर हत्या कर डाली।

ऐसी ही शर्मनाक घटना की खबर पिछले दिनों राजस्थान के दौसा जिले के गोदालिया गांव से सुनने को मिली। यहां 99 मजदूरों से 11 दिन तक लगातार काम करवाया गया और उन्हें मजदूरी के नाम पर एक रुपया प्रति मजदूर प्रतिदिन के हिसाब से 11 दिन की दिहाड़ी के रूप में मात्र 11 रुपये दिए गए। मजदूरों ने गांव में जो तालाब अपना खून-पसीना बहा कर खोदा था वह पानी से लबालब हो गया है तथा उन मजदूरों के कठोर परिश्रम का गुणगान कर रहा है। परंतु इस योजना का संचालन कर रहे अभियंता तथा अन्य दलालों ने उन गरीब मजदूरों को सरकार द्वारा निर्धारित सौ रुपये दिहाड़ी देने के बजाए मात्र एक रुपया दिहाड़ी देना ही मुनासिब समझा। कल्पना की जा सकती है कि भीषण मंहगाई के वर्तमान दौर में दिनभर अपना पसीना बहाने के बाद जिस श्रमिक को मात्र एक रुपये प्राप्त होंगे उस मजदूर के दिल पर आंखिर क्या बीतती होगी। राजस्थान में इससे पहले भी पूर्व मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के अपने जिले झालवाड़ से भी इसी प्रकार के कई घोटाले उजागर हो चुके हैं। बिहार राज्‍य के अधिकांश जिलों से भी मनरेगा के नाम पर होने वाली लूट के समाचार प्राप्त होते रहते हैं। पिछले दिनों बिहार विधानसभा में हुई हिंसक घटना भी इसी प्रकार के घोटाले को उजागर करते हुए घटी थी। विपक्ष का आरोप था कि नीतीश कुमार की सरकार द्वारा साढ़े ग्यारह हजार करोड़ रुपये का बड़ा घोटाला मनरेगा के नाम पर ही किया गया है जिसका कोई हिसाब किताब नहीं है। हालांकि इस विषय पर सी बी आई की जांच भी शुरु हो गई थी परंतु पटना उच्च न्यायालय ने फिलहाल सी बी आई की जांच पर रोक लगा दी है।

मनरेगा के नाम पर इस प्रकार खुलेआम हो रही लूट खसोट तथा मजदूरों की खून पसीने की कमाई को हड़पने की प्रवृति आखिर हमें किस निष्कर्ष पर पहुंचने को बाध्य करती है। निश्चित रूप से देश से बेरोजगारी दूर करने के प्रयासों के पक्ष में चलाई गई इतनी बड़ी योजना स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहले कभी शुरु नहीं की गई। यह योजना केवल बेरोजगारी ही दूर नहीं करती बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों, बांधों, तालाबों, जौहड़ आदि के अभाव को भी दूर करती है तथा इसके अंतर्गत वृक्षारोपण भी कराए जाते हैं। ऐसे में यदि यह योजना भ्रष्टाचारियों, लूटेरों तथा रिश्वतखोर माफियाओं तथा भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की भेंट चढ़ जाए तो इससे आखिर हमें क्या संदेश मिलता है। एक तो यह कि नरेगा के लूटेरे ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले विकास कार्यों के विरोधी तथा दुश्मन हैं। दूसरा यह कि लूटेरों का यह नेटवर्क गरीब मजदूरों को उनके अपने घरों में चैन से बैठकर दो वक्त क़ी सूखी रोटी खाते हुए भी नहीं देख सकता। और यदि यही मजदूर बेराोगारी के चलते अपने-अपने गांवों को छोड़कर अप्रवासी जीवन बसर करने हेतु अन्य राज्‍यों में पलायन करते हैं तो इसके लिए भी यही लूटेरे व भ्रष्टाचारी ही जिम्‍मेदार हैं। यहां यह कहना भी गलत नहीं होगा कि माओवाद व नक्सलवाद जैसी वर्तमान गंभीर समस्या की जड़ भी कहीं न कहीं ऐसे ही भ्रष्ट व लुटेरे असामाजिक तत्व भी हैं।

ऐसे में प्रश्न यह है कि मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना को जन-जन तक पूरी पारदर्शिता के साथ कैसे पहुंचाया जाए? हमारे देश का बिचौलिया तंत्र चाहे वह सरकारी हो या गैर सरकारी पैसों की खातिर क्या कुछ नहीं कर सकता? शर्म-हया, इज्‍जत-आबरू, नैतिकता, कर्तव्य आदि सभी की तिलांजलि पैसों की खातिर दी जा सकती है। कभी हमारे प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि केंद्र सरकार यदि आम लोगों के कल्याण हेतु एक रुपया भेजती है तो उसमें से केवल 25 पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं। वर्तमान समय में राहुल गांधी ने अपने पिता राजीव गांधी से भी अधिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अब यह कहा है कि एक रुपये में से 25 पैसे नहीं बल्कि 10 पैसे ही आम लोगों तक पहुंच पाते हैं। गोया 90 प्रतिशत धनराशि बिचौलियों, अधिकारियों, दलालों, जनप्रतिनिधियों, सरकारी कर्मचारियों तथा दबंगों द्वारा लूट खाई जाती है।

सवाल यह है कि राहुल गांधी को इन बातों की इतनी स्‍पष्‍ट जानकारी होने के बावजूद क्‍या लूट का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा? सोनिया गांधी तथा वसुंधरा राजे सिंधिया के गृह जिलों में मनरेगा के अंतर्गत मची लूट-खसोट के बावजूद क्‍या मनरेगा आगे भी इसी लचर अंदाज से संचालित होती रहेगी तथा इसका लाभ बेरोज़गार मज़दूरों के बजाए लुटेरे व भ्रष्‍टाचारी ही उठाते रहेंगे?

मेरे विचार से जहां यूपीए सरकार ने मनरेगा जैसी विश्‍व की सबसे बड़ी बेरोज़गारी दूर करने वाली योजना को शुरु करने की हिम्‍मत जुटाई है वहीं इसे पूर्णरूप से पारदर्शी तथा विकासोन्‍मुख बनाने हेतु भी एक और मनरेगा की सहयोगी योजना शुरु करे जिससे कि प्रत्‍येक मेहनतकश, बेरोज़गार मज़दूर को उसकी खू़न पसीने की कमाई पूरी पारदर्शिता के साथ प्राप्‍त हो सके।

इसे पारदर्शी बनाने हेतु मानव निर्मित व्‍यवस्‍था के बजाए कंप्‍यूटर प्रणाली से संचालित व्‍यवस्‍था पर अधिक भरोसा किया जा सकता है। केंद्र सरकार को इस विषय पर गंभीरता से तथा अविलंब चिंतन कर किसी निष्‍कर्ष पर तत्‍काल पहुंचने की ज़रूरत है। इसके अतिरिक्‍त मनरेगा के लुटेरों को सज़ा देने हेतु विशेष एवं कड़े क़ानून बनाए जाने तथा ऐसे लोगों को तत्‍काल दंड दिए जाने हेतु विशेष अदालतें गठित किए जाने की भी ज़रूरत है।

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