लेखक परिचय

अरुण कान्त शुक्ला

अरुण कान्त शुक्ला

भारतीय जीवन बीमा निगम से सेवानिवृत्त। ट्रेड यूनियन में तीन दशक से अधिक कार्य करता रहा। अध्ययन व लेखन में रुचि। रायपुर से प्रकाशित स्थानीय दैनिक अख़बारों में नियमित लेखन। सामाजिक कार्यों में रुचि। सामाजिक एवं नागरिक संस्थाओं में कार्यरत। जागरण जंक्शन में दबंग आवाज़ के नाम से अपना स्वयं का ब्लॉग। कार्ल मार्क्स से प्रभावित। प्रिय कोट " नदी के बहाव के साथ तो शव भी दूर तक तेज़ी के साथ बह जाता है , इसका अर्थ यह तो नहीं होता कि शव एक अच्छा तैराक है।"

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italian इटली के विदेश मंत्री की यह घोषणा की दो भारतीय मछुआरों की ह्त्या का आरोप झेल रहे दोनों इटेलियन नौसैनिकों को भारत वापस नहीं भेजा जाएगा, न केवल भारत की न्यायायिक व्यवस्था का खुला मजाक बनाना है बल्कि इसका भी सबूत है की हमारे प्रधानमंत्री की पीठ लाख बार बुश थपथपा दे या लाख बार ओबामा उनकी पीठ पर हाथ फेर दें, पर जहां तक साख का प्रश्न है, दुनिया का कोई भी छोटे से छोटा देश हमें कभी भी आँखें दिखा सकता है और हम शायद कुछ भी नहीं कर सकते हैं। कहावत भी ऐसी ही है की इतिहास कायरों के समक्ष स्वयं को बार बार दोहराता है। इटली के राजदूत ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में स्वयं खड़े होकर इटली की सरकार की तरफ से गारंटी दी थी की चुनावों में वोट डालने के बाद दोनों नौसैनिकों को भारत में चल रहे मुकदमे का सामना करने के लिए वापस भेज दिया जाएगा। अब, जबकि खुद इटली के विदेश मंत्री ने यह घोषणा की है की वे दोनों नौसैनिक वापस नहीं होंगे, तब, भारत सरकार को इटली के राजदूत को तुरंत गिरफ्तार कर लेना चाहिए| राजदूतों को लेकर कितने भी प्रोटोकाल क्यों न हों या अंतर्राष्ट्रीय कायदे या परंपराएं क्यों न हो, पर, यदि बात किसी देश की सार्वभौम सत्ता को चुनौती देने पर आती है तो फिर उस देश की सार्वभौम सत्ता ही सर्वोपरि होनी चाहिए।

पर, भारत सरकार, इटली के राजदूत को गिरफ्तार करना तो दूर, उसे इटली वापस भेजकर, इटली के साथ सभी तरह के राजनयिक संबंध भी नहीं रोकेगी, जैसा की वह तब भी नहीं कर पायी थी, जब भोपाल गैसकांड के लिए जिम्मेदार मल्टीनेशनल कंपनी युनियन कार्बाईड ने उसे धता बताया था या उसके अमेरिकी चेयरमेन वारेन एंडरसन ने भारत के न्यायालयों की मजाक बनाते हुए भारत आने से इनकार कर दिया था। यही हमने क्वात्रोची के मामले में देखा, जो भागकर एक बार इटली गया तो वापस नहीं आया| हमारे देश की सरकारें पश्चिमी देशों और उनकी मल्टी नेशनल कंपनियों के हितों के आगे गरीब भारतवासियों को नहीं पूछतीं और फिर ये तो बिचारे गरीब मछुआरे थे , जो रोज ही अपनी जिन्दगी को दांव पर लगाते थे।

अमेरिकन साम्राज्यवाद और उसके पिठ्ठुओं के आगे हमारी सरकारें कितनी बेबस है, इटली का व्यवहार उसका नमूना है। एक तरफ इटली है, जिसने सभी तरह की राजनयिक रिश्ते दांव पर लगाकर नौसैनिकों को भेजने से मना कर दिया है और इतना ही नहीं भारत को गरिया भी रहा है की भारत ने इस मामले में कूटनीतिक समाधान निकालने की इटली की कोशिशों का कोई जबाब नहीं दिया और ये भी की दोनों देशों के बीच संयुक्त राष्ट्र के समुद्री क़ानून को लेकर विवाद भी है। दूसरी तरफ हमारी सरकार है, जो इटली के राजदूत से बोरिया बंडल समेटकर जाने को भी कहने की हिम्मत नहीं रखती है।

भारत ने इस मामले में शुरू से कमजोरी दिखाई थी। दोनों नौसैनिकों पर केरल की अदालत में मुकदमा चलने को लेकर इटली बहुत परेशान था, क्योंकि उसे लगता था की केरल में अदालत के उपर जनमत का प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए, उसने सरकार के ऊपर दबाव डलवाकर पहले तो सर्वोच्च न्यायालय से पूरे मामले को देहली शिफ्ट करवाया और मामले की सुनवाई के लिए नौसेना कानूनों के प्रावधानों के तहत विशेष अदालत गठित करवाई और फिर भारत से उस संधि को भी फिर से लागू करवाया, जिसके अनुसार दोनों देशों में सजा पाए व्यक्तियों की सजा उनके देशों में पूरी करने का प्रावधान है। याने, सजा भारत की अदालत देगी, लेकिन अपराधी सजा काटेगा इटली में।

प्रधान मंत्री का कहना है कि इटली उच्चतम न्यायालय में दिए गए हलफनामे का सम्मान करते हुए दोनों मरीनों को वापस भेजे| यदि वापस नहीं भेजा जाता है तो इटली को इसके परिणाम भुगतने होंगे| पर, वे परिणाम क्या हैं, वो नहीं बताते| जबाब में उनका कहना है कि उन्होंने विदेश मंत्री से दोनों सैनिकों को वापस लाने के लिए सभी तरह के कूटनीतिक कदम उठाने के लिए कहा है| पर, वैसा नहीं होने पर वे इटली से राजनयिक संबंध तोड़ने की बात कहने से बचते हैं| इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दोनों सैनिकों के भगाने के लिए दोनों देशों की सरकारों में बड़े पदों पर काबिज लोगों के मध्य में कोई साजिश रची भी गयी हो जैसा कि प्रधानमंत्री से मुलाक़ात करने वाले सीपीएम के सांसद के एन बालागोपाल ने इशारा भी किया है कि ये दोनों सरकारों में उच्चतम पदों पर बैठे लोगों के बीच रची गयी साजिश है| देशवासियों के बीच पूरी तरह से अपनी साख गँवा चुकी भारत सरकार के माथे पर ये एक और बड़ा धब्बा है, विशेषकर जब कि कांग्रेस की रहनुमाई में सरकार चल रही है और कांग्रेस को इटली को लेकर हमेशा उलाहने सुनने पड़ते हैं|

भारत में इटली के इस कदम पर गंभीर रोष है। भारत सरकार को कड़ा कदम उठाना ही पड़ेगा। यदि यही काम भारत ने किया होता तो इटली में उसका राजदूत गिरफ्तार हो गया होता या फिर उसे भारत वापस भेज दिया गया होता, इसमें किसी भी भारतवासी को संशय नहीं है। तो फिर, प्रधानमंत्री जी, चेतावनी तो ठीक है, उच्चतम न्यायालय के सामने दोनों नौसैनिकों की वापसी की गारंटी करने वाले इटली के राजदूत को गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं है तो कम से कम चलता तो कीजिये ..आखिर यह सवा करोड़ भारतीयों के सम्मान का सवाल है।

 

अरुण कान्त शुक्ला

 

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