लेखक परिचय

बालमुकुन्द द्विवेदी

बालमुकुन्द द्विवेदी

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर [मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्‍म] की उपाधि प्राप्‍त करने वाले बालमुकुन्‍द जी २००६ से पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय हैं. शुरूआत आपने नवभारत समाचार पत्र सतना म.प्र. से की इसके बाद दो अन्य संस्थानों मेंकम किया। वर्तमान में आप हिदुस्थान समाचार बहुभाषी समाचार समिति की भोपाल शाखा मे बतौर संवाददाता कार्यरत हैं।

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बालमुकुन्द द्विवेदी

जम्मू-कश्मीर रियासत का भारत में विलय 26 अक्तूबर 1947 को हुआ था, वह आज के वर्तमान भारत द्वारा शासित जम्मू-कश्मीर राज्य से कहीं अधिक था। यहाँ के महाराजा हरिसिंह ने भारत वर्ष में जम्मू-कश्मीर का विलय उसी वैधानिक विलय पत्र के आधार पर किया, जिनके आधार पर शेष सभी रजवाड़ों का भारत में विलय हुआ था। वर्तमान परिस्थति के अनुसार जम्मू-कश्मीर रियासत के निम्न हिस्सें हैं । जिनमें से जम्मू का क्षेत्रफल कुल 36315 वर्ग कि.मी. है जिसमें से आज हमारे पास लगभग 26 हजार वर्ग कि.मी. है। वर्तमान में अधिकांश जनसंख्या मुसलमानों की है, लगभग 4 लाख हिन्दू वर्तमान में कश्मीर घाटी से विस्थापित हैं।

पिछले 63 वर्षों से पूरा क्षेत्र विस्थापन की मार झेल रहा है। आज जम्मू क्षेत्र की लगभग 60 लाख जनसंख्या है जिसमें 42 लाख हिन्दुओं में लगभग 15 लाख विस्थापित समाज है। समान अधिकार एवं समान अवसर का आश्वासन देने वाले भारत के संविधान के लागू होने के 60 वर्ष पश्चात भी ये विस्थापित अपना जुर्म पूछ रहे हैं, उनकी तड़प है कि हमें और कितने दिन गुलामों एवं भिखारियों का जीवन जीना है। पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर से 1947 में लगभग 50 हजार परिवार विस्थापित होकर आये, आज यह संख्या लगभग 12 लाख है, जो पूरे देश में बिखरे हुये हैं। जम्मू क्षेत्र में इनकी संख्या लगभग 8 लाख है।

जम्मू क्षेत्र के 26 हजार वर्ग कि.मी. क्षेत्र में 2002 की गणनानुसार 30,59,986 मतदाता थे। आज भी 2/3 क्षेत्र पहाड़ी, दुष्कर और सड़क संपर्क से कटा हुआ है, इसके बाद भी यहाँ 37 विधानसभा व 2 लोकसभा क्षेत्र हैं। जबकि उसी समय कश्मीर घाटी में 15953 वर्ग किमी. क्षेत्रफल में 29 लाख मतदाता हैं। यहाँ का अधिकांश भाग मैदानी क्षेत्र एवं पूरी तरह से एक-दूसरे से जुडा है, पर विधानसभा में 47 प्रतिनिधि एवं लोकसभा में तीन क्षेत्र हैं। 2008 में राज्य को प्रति व्यक्ति केन्द्रीय सहायता 9754 रूपये थी और बिहार जैसे पिछड़े राज्य को 876 रूपये प्रति व्यक्ति थी। इसमें से 90 प्रतिशत अनुदान होता है और 10 प्रतिशत वापिस करना होता है, जबकि शेष राज्य को तो 70 प्रतिशत वापिस करना होता है।

जनसंख्या में धांधली – 2001 की जनगणना में कश्मीर घाटी की जनसंख्या 54,76,970 दिखाई गई, जबकि वोटर 29 लाख थे और जम्मू क्षेत्र की जनसंख्या 44,30,191 दिखाई गई जबकि वोटर 30.59 लाख हैं।

उच्च शिक्षा में धांधली – उच्च शिक्षा में भी यहाँ धांधली है, आतंकवाद के कारण कश्मीर घाटी की शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई, पर प्रतियोगी परीक्षाओं में उनका सफलता का प्रतिशत बढ़ता है। मेडिकल की पढ़ाई के लिए एमबीबीएस दाखिलों में जम्मू का 1990 में 60 प्रतिशत हिस्सा था जो 1995 से 2010 के बीच घटकर, हर बार 17-21 प्रतिशत रह गया है। सामान्य श्रेणी में तो यह प्रतिशत 10 से भी कम है।

जम्मू-कश्मीर में आंदोलन-संभावनायें – 2005-2006 में अपनी मुस्लिमवोट की राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय दबाव में मनमोहन सरकार ने पाकिस्तान से गुपचुप वार्ता प्रारंभ की। इसका खुलासा करते हुये पिछले दिनों लंदन में मुशर्रफ ने कहा कि टन्ेक्रा कूटनीति में हम एक समझौते पर पहुँच गये थे। वास्वत में परवेज, कियानी -मुशर्रफ की जोड़ी एवं मनमोहन सिंह के नेतृत्व में दोनों पक्ष एक निर्णायक समझौते पर पहुँच गये थे। परस्पर सहमति का आधार था, नियंत्रण रेखा (एलओसी) को ही अंतर्राष्ट्रीय सीमा मान लेना। बंधन एवं नियंत्रण युक्त सीमा, विसैन्यीकरण, सांझा नियंत्रण, अधिकतम स्वायत्ताता (दोनों क्षेत्रों को) इस सहमति को क्रियान्वित करते हुये, कुछ निर्णय दोनो देशों द्वारा लागू किये गये -1. पाकिस्तान ने उत्तरी क्षेत्रों (गिलगित-बाल्टिस्तान) का विलय पाकिस्तान में कर अपना प्रांत घोषित कर दिया। वहां चुनी हुई विधानसभा, पाकिस्तान द्वारा नियुक्त राज्यपाल आदि व्यवस्था लागू हो गई। कुल पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर का यह 65,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल है। भारत ने केवल प्रतीकात्मक विरोध किया और इन विषयों को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाकर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोई कोशिश नहीं की। 2. भारत ने जम्मू-कश्मीर में 30 हजार सैन्य बल एवं 10 हजार अर्धसैनिक बलों की कटौती की घोषणा की। 3. दो क्षेत्रों में परस्पर आवागमन के लिये पाँच मार्ग प्रारंभ किये गये, जिन पर राज्य के नागरिकों के लिए वीजा आदि की व्यवस्था समाप्त कर दी गई। 4. कर मुक्त व्यापार दो स्थानों पर प्रारंभ किया गया। पहली बार 60 वर्षों में जम्मू-कश्मीर के इतिहास में प्रदेश के सभी राजनैतिक दलों और सामाजिक समूहों को साथ लेकर स्थायी समाधान का प्रयास किया गया और विभिन्न विषयों पर विचार करने के लिये पाँच कार्य समूहों की घोषणा की गई। इन कार्यसमूहों में तीनों क्षेत्रों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व था, हर समूह में सामाजिक नेतृत्व भाजपा, पैंथर्स, जम्मू स्टेट र्मोर्चा और शरणार्थी नेता भी थे। 24 अप्रैल 2007 को दिल्ली में आयोजित तीसरे गोलमेज सम्मेलन में जब 4 कार्यसमूहों ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की तो सभी जम्मू, लध्दााख के उपस्थित नेता व शरणार्थी नेता हैरान रह गये कि उनके सुझावों एवं मुद्दों पर कोई अनुशंसा नहीं की गई। उपस्थित कश्मीर के नेताओं ने तुरंत सभी अनुशंसाओं का समर्थन कर लागू करने की माँग की, क्योंकि यह उनकी इच्छाओं एवं आकांक्षाओं के अनुसार था। कार्य समूहों इन रिर्पोटों से यह स्पष्ट हो गया कि अलगाववादी, आतंकवादी समूहों और उनके आकाओं से जो समझौते पहले से हो चुके थे, उन्हीं को वैधानिकता की चादर ओढ़ाने के लिए ये सब नाटक किये गये थे।

बैठक के अंत में गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने पहले से तैयार वक्तव्य हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया, जिसमें केन्द्र सरकार से इन समूहों की रिपोर्टों को लागू करने के लिए उपस्थित सभी प्रतिनिधियों द्वारा आग्रह किया गया था। भाजपा, पैंथर्स, बसपा, लद्दाख यूटी फ्रंट, पनुन कश्मीर एवं अनेक सामाजिक नेताओं ने यह दो टूक कहा कि यह सारी घोषणाएं उनको प्रसन्न करने के लिए हैं, जो भारत राष्ट्र को खंडित एवं नष्ट करने में जुटी हुई हैं। यह भारत विरोधी, जम्मू-लद्दाख के देशभक्तों को कमजोर करने वाली, पीओके, पश्चिम पाक शरणार्थी विरोधी एवं कश्मीर के देशभक्त समाज की भावनाओं एवं आकांक्षाओं को चोट पहुँचाने वाली हैं। बाद में सगीर अहमद के नेतृत्व वाले पाँचवे समूह ने अचानक नवम्बर 2009 में अपनी रिपोर्ट दी तो यह और पक्का हो गया कि केन्द्र राज्य के संबंध की पुर्नरचना का निर्णय पहले से ही हुआ था। रिपोर्ट प्रस्तुत करने से पहले संबंधित सदस्यों को ही विश्वास में नहीं लिया गया। इन पाँच समूहों की मुख्य अनुशंसाएं निम्नानुसार थीं -1. एम. हमीद अंसारी (वर्तमान में उपराष्ट्रपति) की अध्यक्षता में विभिन्न तबकों में विश्वास बहाली के उपायों के अंतर्गत उन्होंने सुझाव दिये कि कानून व्यवस्था को सामान्य कानूनों से संभाला जाये। उपद्रवग्रस्त क्षेत्र विशेषाधिकार कानून एवं सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम को हटाया जाये। 2. पूर्व आतंकियों का पुनर्वास एवं समर्पण करने पर सम्मान पूर्वक जीवन की गांरटी दी जाए। 3. राज्य मानवाधिकार आयोग को मजूबत करना। 4. आतंकवाद पीड़ितों के लिए घोषित पैकेज को मारे गये आतंकियों के परिवारों के लिए भी क्रियान्वित करना। 5. फर्जी मुठभेड़ों को रोकना। 6. पाक अधिकृत कश्मीर में पिछले बीस वर्षों से रह रहे आतंकवादियों को वापिस आने पर स्थायी पुनर्वास एवं आम माफी। 7. इसके अतिरिक्त कश्मीरी पंडितों के लिए एसआरओ-43 लागू करना, उनका स्थायी पुनर्वास।

उमर अब्दुल्ला कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर की समस्या आर्थिक व रोजगार के पैकेज से हल होने वाली नहीं है। यह एक राजनैतिक समस्या है और समाधान भी राजनैतिक ही होगा। जम्मू कश्मीर का भारत में बाकी राज्यों की तरह पूर्ण विलय नहीं हुआ। विलय की कुछ शर्तें थीं, जिन्हें भारत ने पूरा नहीं किया। जम्मू-कश्मीर दो देशों (भारत एवं पाकिस्तान) के बीच की समस्या है, जिसमें पिछले 63 वर्षों से जम्मू-कश्मीर पिस रहा है। स्वयत्तता ही एकमात्र हल है। 1953 के पूर्व की स्थिति बहाल करनी चाहिए। पी. चिदंबरम भी कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर एक राजनीतिक समस्या है। जम्मू-कश्मीर का एक विशिष्ट इतिहास एवं भूगोल है, इसलिए शेष भारत से अलग इसका समाधान भी विशिष्ट ही होगा। समस्या का समाधान जम्मू व कश्मीर के अधिकतम लोगों की इच्छा के अनुसार ही होगा। गुपचुप वार्ता होगी, कूटनीति होगी और समाधान होने पर सबको पता लग जायेगा। हमने 1953, 1975 और 1986 में कुछ वादे किये थे, उन्हें पूरा तो करना ही होगा। विलय कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था, यह बाकि राज्यों से अलग था, उमर ने विधानसभा के भाषण में विलय पर बोलते हुये कुछ भी गलत नहीं कहा। स्वायत्ताता पर वार्ता होगी और उस पर विचार किया जा सकता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी राजनैतिक समाधान की आवश्यकता, सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनिययम को नरम करना, कुछ क्षेत्रों से हटाना, सबकी सहमति होने पर स्वायत्ताता के प्रस्ताव को लागू करना आदि संकेत देकर वातावरण बनाने की कोशिश की और प्रधानमंत्री द्वारा घोषित वार्ताकारों के समूह दिलीप पेडगेवांकर, राधा कुमार, एम.एम. अंसारी ने तो ऐसा वातावरण बना दिया कि शायद जल्द से जल्द कुछ ठीक (अलगाववादियों की इच्छानुसार) निर्णय होने जा रहे हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर समस्या के लिए पाकिस्तान से वार्ता को बल दिया। उन्होंने आश्वासन दिया, आजादी का रोडमेप बनाओ, उस पर चर्चा करेंगे। हमारा एक खूबसूरत संविधान है, जिसमें सबकी भावनाओं को समाहित किया जा सकता है, 400 बार संशोधन हुआ है, आजादी के लिए भी रास्ता निकल सकता है।

वर्तमान आंदोलन :- पाक समर्थित वर्तमान आंदोलन अमरीका के पैसे से चल रहा है। आंदोलन को कट्टरवादी मजहबी संगठन अहले-हदीस (जिसके कश्मीर में 120 मदरसे, 600 मस्जिदें हैं) एवं आत्मसमर्पण किये हुये आतंकवादियों के गुट के द्वारा हुर्रियत (गिलानीगुट) के नाम पर चला रहे हैं। वास्तव में यह आंदोलन राज्य एवं केन्द्र सरकार की सहमति से चल रहा है। देश में एक वातावरण बनाया जा रहा है कि कश्मीर समस्या का समाधान बिना कुछ दिये नहीं होगा। कश्मीर के लोगों में वातावरण बन रहा है कि अंतिम निर्णय का समय आ रहा है।

सुरक्षाबलों को न्यूनतम बल प्रयोग करने का आदेश है। 3500 से अधिक सुरक्षा बल घायल हो गये, सुरक्षा चौकियों पर हमले किये गये, आंदोलनकारी जब बंद करते थे तो सरकार कर्फ्यू लगा देती थी, उनके बंद खोलने पर कर्फ्यू हटा देते थे। अलगाववादियों के आह्वान पर रविवार को भी स्कूल, बैंक खुले।

वास्तविकता यह है कि पूरा आंदोलन जम्मू-कश्मीर की केवल कश्मीर घाटी (14 प्रतिशत क्षेत्रफल) के दस में से केवल 4 जिलों बारामुला, श्रीनगर, पुलवामा, अनंतनाग और शोपियां नगर तक ही सीमित था। गुज्जर, शिया, पहाड़ी, राष्ट्रवादी मुसलमान, कश्मीरी सिख व पंडित, लद्दाख, शरणार्थी समूह, डोगरे, बौध्दा कोई भी इस आंदोलन में शामिल नहीं हुआ, पर वातावरण ऐसा बना दिया गया जैसे पूरा जम्मू-कश्मीर भारत से अलग होने और आजादी के नारे लगा रहा है। उमर अब्दुल्ला द्वारा बार-बार जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय को नकारना, जम्मू-कश्मीर को विवादित मानना, वार्ताकारों के समूह द्वारा भी ऐसा ही वातावरण बनाना, केन्द्र सरकार एवं कांग्रेस के नेताओं का मौन समर्थन इस बात का सूचक है कि अलगाववादी, राज्य एवं केन्द्र सरकार किसी समझौते पर पहुँच चुके हैं, उपयुक्त समय एवं वातावरण बनाने की कोशिश एवं प्रतीक्षा हो रही है। ओबामा का इस विषय पर कुछ ना बोलना इसका यह निहितार्थ नहीं है कि अमरीका ने कश्मीर पर भारत के दावे को मान लिया है। बार-बार अमरीका एवं यूरोपीय दूतावासों के प्रतिनिधियों का कश्मीर आकर अलगावादी नेताओं से मिलना उनकी रूचि एवं भूमिका को ही दर्शाता है।

पिछले दिनों राष्ट्रवादी शक्तियों, भारतीय सेना एवं देशभक्त केन्द्रीय कार्यपालिका का दबाव नहीं बना होता तो यह सब घोषणाएँ कभी की हो जातीं। गत दो वर्षों में केन्द्रीय सरकार द्वारा सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को हटाने, जेल में बंद आतंकियों एवं अलगाववादियों की एकमुश्त रिहाई के असफल प्रयास कई बार हो चुके हैं।

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