लेखक परिचय

अनिल गुप्ता

अनिल गुप्ता

मैं मूल रूप से देहरादून का रहने वाला हूँ! और पिछले सैंतीस वर्षों से मेरठ मै रहता हूँ! उत्तर प्रदेश मै बिक्री कर अधिकारी के रूप मै १९७४ मै सेवा प्रारम्भ की थी और २०११ मै उत्तराखंड से अपर आयुक्त के पड से सेवा मुक्त हुआ हूँ! वर्तमान मे मेरठ मे रा.स्व.सं. के संपर्क विभाग का दायित्व हैऔर संघ की ही एक वेबसाइट www.samvaadbhartipost.com का सञ्चालन कर रहा हूँ!

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 १९६२ का भारत चीन युद्ध भारतीय सेना और आम जन का मनोबल गिराने वाला.था! और सारा देश जानता है कि यह अपमान भारत को ‘चाचा’ नेहरू की ‘हिमालयन ब्लंडर्स’ के कारण झेलना पड़ा था! १९६५ में श्री लालबहादुर शास्त्रीजी के नेतृत्व में भारत पाक युद्ध में लाहौर तक पहुँच कर भारतीय सेना का मान और मनोबल बहुत बढ़ा था! चीन के सन्दर्भ में भी सितम्बर १९६७ में भारतीय सेना ने चीन की सेना को जो मुंहतोड़ जवाब नाथुला में दिया था उसका उल्लेख कम ही होता है! यही कारण है कि हाल के दिनों में चीन द्वारा भारत के सिक्किम प्रान्त और भूटान की सीमा पर अंदर तक घुसकर सड़क बनाने का प्रयास किया और भारतीय सेना द्वारा उन्हें बाहर खदेड़े जाने पर सेनाएं आमने सामने खड़ी हैँ और चीन भारत को १९६२ की याद दिला रहा है! शायद वो अभी भी इस मुगालते में है कि भारत की जनता १९६२ के सदमे से उबरी नहीं है! चीन को १९६७ में नाथुला में उसकी भारतीय सेना द्वारा की गयी पिटाई की याद दिलाना सामयिक होगा!
सिक्किम के नाथुला में ११ सितम्बर १९६७ और चोला में १ अक्टूबर १९६७ को जो कुछ हुआ वह अविस्मरणीय है! उस समय जनरल मानेकशॉ ईस्टर्न आर्मी कमांडर थे, जनरल जगजीत सिंह अरोरा कोर कमांडर थे तथा मेजर जनरल सगत सिंह सिक्किम में माउंटेन डिवीज़न के जीओसी थे! और सब जानते हैँ कि इन्ही बहादुर अफसरों ने १९७१ के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में कैसा पराक्रम दिखाया था और पाकिस्तानी सेना के तिरानवे हज़ार सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया था!
१४२०० फ़ीट की ऊंचाई पर नाथुला तिब्बत सिक्किम सीमा पर एक अति महत्वपूर्ण पास है! जो गंगटोक-यातुंग- ल्हासा व्यापार मार्ग से गुजरता है!१७ मार्च १८९० की अंग्रेजी-चीनी समझौते के अंतर्गत तिब्बत सिक्किम की सीमा स्पष्ट रूप से परिभाषित है! लेकिन चीन कभी भी सिक्किम के भारतीय संरक्षत्व से सहज नहीं था! क्योंकि भारतीय सेना सिक्किम में सुरक्षा के लिए तैनात थी! (१९७४ से पूर्व सिक्किम भारतीय संरक्षण में एक देश था जहाँ की अपनी सरकार थी).१९६५ के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय चीन ने भारत से नाथुला और जेलेला पास को खाली करने को कहा और संभवतः दोनों देशों से संयुक्त युद्ध को टालने के उद्देश्य से भारत ने जेलेला पास खाली कर दिया जो आज तक चीन के कब्जे में है!लेकिन मेजर जनरल सगत सिंह ने नाथुला को खाली करने से इंकार कर दिया!इसी नाथुला के क्षेत्र में भारतीय और चीनी सेनाएं केवल कुछ गज़ों के फासले पर तैनात हैँ! और वर्तमान ‘स्टैंड-ऑफ’ इसी क्षेत्र में है!नाथुला के उत्तर और दक्षिण में दो सामरिक रूप से महत्वपूर्ण सेबू ला और कैमल’स बैक भारतीय सेना के ही नियंत्रण में हैँ!इन दोनों चोटियों पर स्थित भारतीय सेना की आर्टिलरी ऑब्जरवेशन पोस्टों से चीनी क्षेत्र में बहुत गहरे तक भारतीय सेना निगाह रख सकती है जबकि जेलेला पास से चीन भारत पर बहुत काम नज़र रख सकता है! तो यहाँ भारतीय सेना लाभ की स्थिति में है!
सितम्बर १९६७ में नाथुला पर दो ग्रेनेडियर्स कि टुकड़ी तैनात थी!यह बटालियन लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह के कमांड में थी! और माउंटेन कमांड के अधीन थी जिसकी कमान ब्रिगेडियर एमएमएस बक्शी के हाथ में थी!
दोनों सेनाओं के संतरी एक दुसरे से केवल एक मीटर की दूरी पर खड़े रहते थे!६ सितम्बर १९६७ को दोनों टुकड़ियों में झड़प हुई जिसमे चीनी सेना के राजनितिक कमिसार भी गिर गए और उसका चश्मा टूट गया!इस घटना से उत्तेजना बढ़ गयी! और भारतीय सेना ने तनाव घटाने के उद्देश्य से उच्च स्तर पर निर्णय लिया कि नाथुला और सेबू ला के बीच में एक तार बाँध दिया जाये ताकि दोनों देशों के सीमा क्षेत्र का पता चल सके!तार लगाने का यह जिम्मा ७० फील्ड कंपनी ऑफ़ इंजिनीर्स को सौंपा गया था! याक ला पास पर तैनात १८ राजपूत को ११ सितम्बर की पौ फटते ही यह कार्य शुरू करना था! उस दिन सुबह बड़ी साफ थी! और दिन निकलते ही जवानों ने लोहे के पिकेट्स नाथुला से सेबू ला तक लगाने शुरू कर दिए!लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह अपनीप्लाटून के साथ वहां मौजूद थे! चीनी पोलिटिकल कमिसार ने लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह से क़ाम रुकवाने के लिए कहा!लेकिन भारतीय सेना को अपना क़ाम बिना रुके पूरा करने के स्पष्ट आदेश थे! अतः दोनों पक्षों में पहले बहस हुई और फिर आपस में झड़प हो गयी जिसमे कमिसार को भी चोट आयीं और वो वापिस अपने बन्कर में चले गए!इसके कुछ मिनट बाद ही एक सीटी की आवाज सुनी गयी और चीनी सेना ने मध्यम मशीन गन से गोलिया चलनी शुरू कर दीं! उस पास पर कोई कवर न होने के कारण ७० फील्ड कंपनी और १८ राजपूत के जवान और अधिकारी खुले में घिर गए और भारी नुकसान उठाना पड़ा! २ ग्रेनेडियर्स के कैप्टन डगर और १८ राजपूत के मेजर हरभजन सिंह ने कुछ सैनिकों को इकठ्ठा करके चीनी एमएमजी पर हमले का प्रयास करा लेकिन दोनों अफसर वीर गति को प्राप्त हो गए!कुल सत्तर जवान और अधिकारी शहीद हुए! और कहीं अधिक घायल हुए!
सेबू ला और कैमल’स बैक पर आर्टिलरी ऑब्जरवेशन पोस्ट पर तैनात अधिकारीयों ने चीनी सेना के बंकरों पर भारी जवाबी फायरिंग कर दी! सेबू ला और कैमल’स बैक ऊंचाई पर होने के कारण चीनी सेना के अधिकांश बंकर नष्ट हो गए और चीनी सेना को भारी जनहानि हुई! उनके मृतकों की संख्या लगभग चार सौ थी!अगले तीन दिन तक भारतीय सेना ने चीनी सेना को कड़ा सबक सिखाया!
१ अक्टूबर १९६७ को पुनः चीनी सेना ने तिब्बत सिक्किम सीमा पर स्थित चोला पास पर भारतीय सेना का सामना किया और उन्हें वहां से खदेड़ने का प्रयास किया! शुरुआती नुकसान के बाद भारतीय सेना के ७/११ ग्रेनेडियर्स और १० जेएके राइफल्स ने मोर्चा संभाला और चीनियों को तीन किलोमीटर पीछे हटने को मजबूर कर दिया! और उन्हें काम बैराक्स पर जाना पड़ा जहाँ वो आजतक मौजूद हैँ! और चोला पास आज तक भारतीय सेना के नियंत्रण में है!
उचित होगा कि चीन अपनी हेंकड़ी दिखाना छोड़े और भारतीय सेना की मारक क्षमता को कमतर आंकने की भूल न करे! वर्ना अबकी बार भारत अक्साईचीन का अपना क्षेत्र वापिस लेने में संकोच नहीं करेगा!
(साभार: उपरोक्त प्रसंग का अधिकांश भाग मेजर जनरल शेरू थपलियाल द्वारा लिखे ‘द नाथू ला सकिरमिश एन्ड चोला इंसिडेंट: व्हेन चाइनीज वेर गिवेन ऐ ब्लडी नोज’ से लिया गया है!)
भारत सरकार से अनुरोध है कि इस विजय गाथा के पचास वर्ष पूरे होने के अवसर पर इस वर्ष सितम्बर अक्टूबर में इस पराक्रम को देश भर के स्कूलों, कालेजों में और सेना की छावनियों में समारोह पूर्वक मनाएं!

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