लेखक परिचय

रंजीत रंजन सिंह

रंजीत रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्‍थान से पत्रकारिता में स्‍नातकोत्‍तर की उपाधि प्राप्‍त करने वाले लेखक ऑल इंडिया रेडिया (न्‍यूज) के समाचार संपादक हैं।

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जदयू-राजद गठबंधन-3lalu nitish

रंजीत रंजन सिंह

जदयू-राजद गठबंधन को चाल, चरित्र और चेहरा की बात करनेवाली पार्टी भाजपा पचा नहीं पा रही है। लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के खिलाफ कौन ज्यादा बयान देता है, मानो इसकी प्रतियोगिता भाजपा के अंदर छिड़ गई है। वे लोगों को जंगल राज का डर दिखा रहे हैं और जदयू-राजद गठबंधन को बिहार में जंगल राज-2 का आगाज बता रहे हैं। उन्हें एहसास है कि अगर यह गठबंधन सफल रहा तो भाजपा का क्या हश्र होनेवाला है। बेचारे करें भी तो क्या? अकेले भाजपा में मुख्यमंत्री पद के दर्जन से ज्यादा उम्मीदवार हैं- सुशील मोदी, नंदकिशोर यादव, मंगल पांडे, रामेश्वर चौरसिया, डा. प्रेम कुमार, डा. सी.पी. ठाकुर, गिरीराज सिंह, शाहनवाज हुसैन, रविशंकर, राजीव प्रताप रूढ़ी, शत्रुघ्न सिन्हा आदि। सहयोगी पार्टियों से भी लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान और रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा की भी दावेदारी है। ऐसे भी भाजपा से संभाले अपना घर नहीं संभल रहा। हर कोई खुद को सीएम उम्मीदवार घोषित करते चल रहा है। ऐसे में जदयू-राजद-कांग्रेस का एक सीएम उम्मीदवार घोषित हो जाने से भाजपा की छाती पर सांप तो लोटेगा ही! गांवों में संयुक्त परिवार के लिए एक कहावत है कि अपना घर सुरक्षित रखना है तो पड़ोसी से झगड़ा रखो। यही हाल बिहार भाजपा का है। प्रदेश भाजपा के किसी भी नेता में दम नहीं कि अपने बल-बुते 5 सीटें भी जितवा सके, लेकिन बयानबाजी ऐसी कि बयानबाजी की कोर्स में पीएचडी की उपाधी दी जाए तो भाजपा में सैंकड़ो नेता पीएचडीधारी हो जाएं।

दरअसल भाजपा के अंदर कोहराम सिर्फ सीएम उम्मीदवार और कथित जंगल राज को लेकर नहीं है। जातीय समीकरण और मतदान प्रतिशत को लेकर भी भाजपा परेशान है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपानीत एनडीए को बिहार में 45.3 प्रतिशत वोट मिले। तब एनडीए को 40 में 31 सीटें मिलीं, जिसमें भाजपा की 22 सीटें शामिल हैं। लोकसभा चुनाव के ठीक बाद हुए 10 विधानसभा सीटों के उपचुनाव में राजद-जदयू और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा तो भाजपानीत एनडीए को 37.3 प्रतिशत वोट के साथ केवल 4 सीटें ही मिली। यानी वोटों की संख्या में 8 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई। अगर राजद-जदयू गठबंधन आगामी चुनावों में भी सफल रहा तो समीकरण देखिए। यादव-14.6 प्रतिशत, कुर्मी-3.8 प्रतिशत, दांगी-कुशवाहा-5.7 प्रतिशत और मुस्लिम- 16 प्रतिशत यानी करीब 40 प्रतिशत वोट। इसके अलावा नीतीश का व्यापक प्रभाव महादालितों और अत्यंत पिछड़ी जातियों पर भी है। महादलितों की जनसंख्या 11 प्रतिशत और अत्यंत पिछड़ी जातियों की जनसंख्या 21.3 प्रतिशत है। इन दोनों समुदायों का एक भाग भी जदयू-राजद के खाते में गया तो चुनाव परिणाम का अंदाजा आप लगा सकते हैं। दूसरी तरफ एनडीए की बात करें तो ब्राम्हण-6.4 प्रतिशत, भूमिहार-4.1 प्रतिशत, राजपुत-5.7 प्रतिशत और कायस्थ-1.5 प्रतिशत। यानी अगड़ी जातियों का कुल वोट 17.7 प्रतिशत। इसमें पासवान वोट 5.8 प्रतिशत और दांगी-कुशवाहा वोट 5.7 प्रतिशत जोड़ देने से भी जातीय समीकरण में एनडीए लालू-नीतीश से काफी पिछड़ रहा है। यही वो कारण है कि भाजपा छाती पीट रही है। वरना भाजपा को तो खुश होना चाहिए था कि नीतीश ने लालू से समझौता कर घर बैठे ही उसे कुशासन और जंगल राज का मुद्दा दे दिया। जातीय रूप से निष्पक्ष कौन चाहता है कि लालू राज वापस आए, शायद कोई नहीं! लेकिन बिहार की राजनीति में जाति एक सच्चाई है और इस बार भी यह चुनाव परिणाम को प्रभावित करेगी। भाजपा भी इस सच्चाई को जानती-समझती है। वरना यूं ही नहीं हाशिए पर पड़े रामविलास पासवान की पार्टी को उसने लोकसभा चुनाव में 7 सीटें दे दी। आपको बता दें कि यह वही रामविलास हैं जिन्होंने अपने पाकिस्तान दौरे पर वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ से कहा था कि मैं वही रामविलास पासवान हंू जिसने गोधरा और गुजरात दंगे के बाद वाजपेयी सरकार से इस्तीफा दिया था। रामविलास का यह बयान भाजपा की गाल पर झन्नाटेदार तमाचे से कम नहीं था। लेकिन यह तमाचा भाजपा को सहना पड़ा, क्योंकि मामला जातीय समीकरण और पासवानों के करीब 6 प्रतिशत वोटों का था। लालू-नीतीश तो एक विचारधारा और एक पार्टी से अलग होकर फिर से मिले। यहां तो दो विपरीत धु्रवों का मेल था। जातीय समीकरण साधने के लिए ही उपेन्द्र कुशवाहा से दोस्ती हुई। याद कीजिए वो पल भी जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनवाया था। कितनी हाय-तौबा मचाई थी भाजपा ने! जैसे नीतीश ने कोई गुनाह कर दिया। उसे लगा कि मांझी के नाम पर महादलितों का सारा वोट तो जदयू को चला जाएगा। जैसे ही मांझी को जदयू ने सीएम पद से हटाया भाजपा के दिल में अचानक महादलित प्रेम जाग गया। भले ही भाजपा ने आजतक अपना प्रदेश अध्यक्ष दलित या महादलित को नहीं बनाया हो लेकिन मांझी के लिए उमड़ा प्रेम वाकई देखने लायक था। अब तो मांझी ने भी भाजपा से गठबंधन के लिए 90 सीटों की मांग की है, देखते हैं भाजपा मांझी-महादलित प्रेम के प्रति कितना वफादार है? राजनीति अपनी गति से आगे बढ़ रही है। सत्ता के लिए हर कोई अपनी चाल अपनी सोच-अपनी समझ के अनुसार चल रहा है। भाजपा को भी चाहिए कि दूसरों की चालों पर छाती पीटने के बजाय अपना घर संभाले और देशहित तथा बिहारहित के मुद्दों के लेकर सकारात्मक सोच के साथ चुनावी मैदान में आए। वरना उसकी वर्तमान चाल, चरित्र और चेहरा से तो बिहार में नहीं आएंगे भाजपा के अच्छे दिन!

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