लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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taj-factडा. राधेश्याम द्विवेदी
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (भा.पु.स.) भारत की सांस्कृतिक विरासतों के पुरातत्वीय अनुसंधान तथा संरक्षण के लिए एक प्रमुख संगठन है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का प्रमुख कार्य राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन स्मारकों तथा पुरातत्वीय स्थलों और अवशेषों का रखरखाव करना है। इसके अतिरिक्त, प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के प्रावधानों के अनुसार यह देश में सभी पुरातत्वीय गतिविधियों को विनियमित करता है। यह पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 को भी विनियमित करता है। यह संस्कृति मंत्रालय के अधीन है।
भारत में संग्रहालय की अवधारणा अति प्राचीन काल में देखी जा सकती है जिसमें चित्र-शाला (चित्र-दीर्घा) का उल्लेख मिलता है। किंतु भारत में संग्रहालय का दौर यूरोप में इसी प्रकार के विकास के बाद प्रारंभ हुआ। पुरातत्वब विषय अवशेषों को संग्रहित करने की सबसे पहले 1796 ई. में आवश्यसकता महसूस की गर्इ जब बंगाल की एशियाटिक सोसायटी ने पुरातत्वीपय, नृजातीय, भूवैज्ञानिक, प्राणि-विज्ञान दृष्टिि से महत्वर रखने वाले विशाल संग्रह को एक जगह पर एकत्र करने की आवश्यिकता महसूस की। किंतु उनके द्वारा पहला संग्रहालय 1814 में प्रारंभ किया गया। इस एशियाटिक सोसायटी संग्रहालय के नाभिक से ही बाद में भारतीय संग्रहालय, कोलकाता का जन्म4 हुआ। भारतीय पुरातत्वइ सर्वेक्षण में भी, इसके प्रथम महानिदेशक एलेक्जेंकडर कनिंघम के समय से प्रारंभ किए गए विभिन्नक खोजी अन्वेमषणों के कारण विशाल मात्रा में पुरातत्व‍ विषयक अवशेष एकत्रित किए गए। ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग’ के तहत देश में 41 से अधिक संग्रहालय हैं। स्थाल संग्रहालयों का सृजन सर जॉन मार्शल के आने के बाद हुआ, जिन्होंवने सारनाथ (1904), आगरा (1906), अजमेर (1908), दिल्लीव किला (1909), बीजापुर (1912), नालंदा (1917) तथा सांची (1919) जैसे स्था9नीय संग्रहालयों की स्था1पना करना प्रारंभ किया। भारतीय पुरातत्व( सर्वेक्षण के एक पूर्व महानिदेशक हरग्रीव्स द्वारा स्थेल-संग्रहालयों की अवधारणा की बड़ी अच्छीथ तरह से व्या8ख्या की गई है: ‘भारत सरकार की यह नीति रही है कि प्राचीन स्थ लों से प्राप्‍त:- किए गए छोटे और ला-लेजा सकने योग्यह पुरावशेषों को उन खंडहरों के निकट संपर्क में रखा जाए जिससे वे संबंधित है ताकि उनके स्वा्भाविक वातावरण में उनका अध्यटयन किया जा सके और स्थाहनांतरित हो जाने के कारण उन पर से ध्याधन हट नहीं जाए।’ मॉर्टिन व्‍हीलर द्वारा 1946 में भारतीय पुरातत्वो सर्वेक्षण (ए एस आई) में एक पृथक संग्रहालय शाखा का सृजन किया गया। आजादी के बाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में स्थ6ल-संग्रहालयों के विकास में बहुत तेजी आई। वर्तमान में, भारतीय पुरातत्वब सर्वेक्षण के नियंत्रणाधीन 41 से अधिक स्थलल संग्रहालय हैं।
ताज संग्रहालय:- सर्वप्रथम भारत के वायसराय लार्ड कर्जन (1899-1905 ई.) के काल में ताज संग्रहालय की स्थापना ताजमहल के मुख्य प्रवेश द्वार के पश्चिम में स्थित दो षटकोणीय कमरों में की गई थी। कालांतर में खान बहादुर मौलवी जफ़र हुसैन- मानद क्यूरेटर एवं अधीक्षक, पुरातत्व सर्वेक्षण, उत्तरी मण्डल, आगरा, ने इस संग्रहालय को विकसित करने में बहुमूल्य योगदान दिया। उस समय संग्रहालय में आगरा के किले तथा ताजमहल की प्राचीन निर्माण योजनाओं का प्रारूप, पत्थर के नमूने, जड़ाऊ कार्य में उपयोग होने वाले औजार, कुछ रंगीन चित्र, शाही फरमान, सनद, (भूमि संबंधित अभिलेख/आलेख) आगरा के किले से मिले लेख, ताजमहल निर्माण में प्रयुक्त कीमती पत्थरों के नमूने पुराने चित्रों का संग्रह इत्यादि प्रदर्शित किए गए थे। वर्तमान ताज संग्रहालय पश्चिमी जलमहल में स्थित है, जो कि ताजमहल परिसर का ही अभिन्न अंग है यह एक दुमंजिला भवन है जो पश्चिमी दीवार के मध्य में एक ऊँचे आसन/मंच पर चतुष्कोणीय छज्जे के रुप में निर्मित है निचला तल संग्रहालय के तौर पर प्रदर्शित किया गया है, जबकि ऊपरी तल का उपयोग संग्रहालय के कार्यालय के तौर पर किया जाता है।
वर्तमान में प्रदर्शित पूर्ण विकसित संग्रहालय ने अपना कार्य 18 सितम्बर 1982 से प्रारंभ किया था। इसे ताज के पश्चिमी नौबतखाना में शिफ्ट कर दिया। संग्रहालय में प्रत्येक विषय को प्रदर्शित करने के लिए विशेष तौर पर दीर्घाऐं विकसित की गई हैं। संग्रहालय में मुख्य हाल के अलावा तीन दीर्घाओं को सम्मिलित किया गया है जिसमें प्रदर्शित अधिकतर सामग्री ताजमहल के निर्माण एवं मुगल काल से संबंधित है। इसकी तीन गैलरियों में ताज के मूल नक्शे, शाहजहां-मुमताज के हाथी दांत पर बने चित्र, पुराने हथियार, पेंटिंग्स, ताज की पच्चीकारी व नक्काशी में इस्तेमाल किए गए विभिन्न देशों से मंगाए गए पत्थरों की जानकारी, बर्तन, शाही फरमान, सोने व चांदी के मुगलकालीन सिक्के प्रदर्शित हैं। मौटे तौर पर इसमें मुगल लघु चित्र, पांडुलिपियाँ, शाही फरमान, सनद सुलेखन/खुशनबीसी (कुरान की आयतें लिखने की शैली) के नमूने शस्त्र, बरतन, ताजमहल की निर्माण योजनाओं के प्रारूप एवं ताज परिसर के चित्र, पेंटिंग, पच्चीकारी (कीमती पत्थर-रत्न, इत्यादि जड़ना) कार्य, आगरा किले के दो संगमरमर खम्भों के पुरातन अवशेष प्रदर्शित किए गए हैं। मुख्य हाल-चहुल मजलिस (चालीस की सभा) की 1612 ई. की एक दिलचस्प पांडुलिपि भी प्रदर्शित की गई है जिसमें सम्राट शाहजहाँ (1628-1658) के हस्ताक्षर हैं और 4 फरवरी 1628 की तिथि के साथ शाही मुगल मोहर भी लगी हुई है, साथ ही अन्य महत्त्वपूर्ण शाही फरमान (आदेश), दस्तावेज, ब्रिटिश कलाकार डेनियल द्वारा सन् 1795 ई. में तैयार आरेख चित्र भी प्रदर्शन के लिए रखे गए हैं।
ताज संग्रहालय का आंतरिक दृश्य:- एक अन्य दिलचस्प जनरल पेरन का आदेश जो मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के काल का है जो ताजगंज के बगीचे के फलों की नीलामी के विवरण के आंकड़े प्रदर्शित करता है। शाहजहां के शाही फरमान जिसमें विभिन्न गांवों को दिए गए भूमि अनुदान एवं शेख हातिम को दिए गए अनुदान के वंशानुगत भूमि हक की अनुमोदित करने वाले फरमान भी दीर्घा में प्रदर्शन हेतु रखे गए हैं। शाहजहाँ के दिनांक 1042 हिज़री (अगस्त 1632 ई.) के फरमान की प्रतिलिपियाँ जो जयपुर (राजस्थान) के राजा जय सिंह को संबोधित करते हुए जारी किया था। इसमें शाही इमारत ताजमहल निर्माण के लिए मकराना (मकराना तहसील, जिला नागौर, राज्य राजस्थान) से मकराना संगमरमर पत्थर की निरंतर आपूर्ति संबंधी निर्देश हैं भी प्रदर्शन के लिए रखी गई है। ताज महल की प्रतिमूर्ति के साथ ही एक विश्व मानचित्र भी प्रदर्शित किया गया है जिसमें ताजमहल निर्माण में प्रयुक्त विभिन्न जड़ाऊ कार्य के लिए कीमती पत्थरों को विश्व के किन-किन स्थानों से लाया गया था चिन्हित किए गए है साथ ही अर्ध कीमती पत्थरों के नमूने भी प्रदर्शित किए गए हैं।
दीर्घा 1 में खुशनवीसी (सुलेखन) कला, मिर्जा मुहम्मद सुलेमान (दारा शिकोह के बेटे) और मुहम्मद शाह (शाहजहाँ के दूसरे बेटे) शूजा अब्दुर रशीद दैल्मी, मुहम्मद हुसैन अल कातिब तथा मूलराज जैसे उस काल के सुप्रसि़द्ध खुशनवीसों का कार्य भी प्रदर्शन के लिए रखा गया है। कुछ जेड पत्थर और चीनी मिट्टी की वस्तुए जैसे जेड का नक्काशीदार कुरान रखने को स्टैण्ड, एक अलंकृत लोटा जिस पर जेड की सुन्दर नक्काशी की गई है, पत्थर पर जड़ा दर्पण कलाडान के कटोरे एवं बर्तन जो विषैले खाद्य पदार्थ के सम्पर्क में आने पर रंग बदल लेते थे या टूट जाते हैं, तलवारें, खंजर इत्यादि भी इस दीर्घा में प्रदर्शित किए गए हैं।
शाहजहां और मुमताज के खाने की जांच के लिए खास बर्तन था। खाने से पहले खास तरह के बर्तन में जांच करवाते थे। इस बर्तन का नाम ‘जहर परख रकाबी’ है। खास बात थी कि जहर युक्त भोजन डालते ही यह रंग बदला देता है। जहर मिला भोजन मिलाते ही यह रंग बदला देता है। बर्तन रंग नहीं बदल सकता तो यह खुद टूट जाता है। यह आज भी म्यूजियम में रखा हुआ है। चीनी मिट्टी का यह बर्तन 17वीं शताब्दी में निर्मित है। बादशाह के लिए हर पल खतरा रहता था, खास तौर पर विषाक्त भोजन का। इसी वजह से इस बर्तन का इस्तेमाल किया जाता था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने ऐसे दुलर्भ चीजों का संग्रह किया है। ताज म्यूजियम में 17वीं शताब्दी की एक खास रकाबी (तश्तरी) है। इसमें खानपान की कोई चीज रखकर परोसी जाए तो रंग बदलकर या फिर टूटकर बता देती है कि इसमें विष है। मुगल शासक इसका प्रयोग खानपान में जहर से बचने के लिए करते थे। ताजमहल के पश्चिमी नौबतखाना में बने ताज म्यूजियम में शहंशाह शाहजहां के समय के हथियार व बर्तन सुरक्षित रखे हैं। इनमें से एक गैलरी में हथियारों के साथ सेलाडन (एक तरह की चीनी मिट्टी) से बनी रकाबी भी है। मिट्टी से बनी रकाबी जेड ग्रीन ग्लेज्ड कोटिंग की वजह से धातु के जैसी नजर आती है। जहर परख ‘रकाबी शाहजहां (1628-1657) के समय की है। ताज म्यूजियम के निर्माण के समय इसे दिल्ली म्यूजियम से यहां लाया गया था। शाहजहां के अलावा किसी मुगल बादशाह ने इसका प्रयोग किया या नहीं, इसकी कोई जानकारी नहीं है। वैसे जयपुर के म्यूजियम में भी इस तरह के बर्तन हैं। डॉ. अमित अग्रवाल, आगरा कॉलेज बताते हैं कि किसी केमिकल के इस्तेमाल से ही जहर के संपर्क में आने पर रकाबी का रंग बदलना संभव है। उस पर किसी केमिकल की कोटिंग की गई होगी, जो जहर के संपर्क में आते ही रंग बदलती होगी। इसके बारे में बिना जांच के पता नहीं चल सकता।
चीन से हुई शुरुआत:- सेलाडन से बर्तन बनाने की शुरुआत चीन में हुई थी। वहां के एक मकबरे की खोदाई में 25 से 220 ईस्वी में सेलाडन से बने बर्तन मिले थे। लंबे समय तक चीन के शाही परिवार ऐसे बर्तन इस्तेमाल करते रहे। बाद में यह जापान, कोरिया और थाईलैंड पहुंचे। सेलाडन से बनी रकाबी बहुमूल्य तो है लेकिन पुरातत्वविद् यह अनुमान नहीं लगा पा रहे कि इसे बेचा जाए तो कितनी धनराशि मिल सकती है। वैसे ऐसी ऐतिहासिक वस्तुओं की नीलामी हो तो कीमत करोड़ों तक पहुंच सकती है। चीन से ही यह भारत आए। मुगल काल में इस तरह के बर्तनों का उपयोग हुआ है। अनुमान है कि निर्माण के समय इसमें कोई रसायन मिलाया गया होगा जो विष से प्रतिक्रिया कर इसका रंग बदल देता होगा। हालांकि इस रसायन के बारे में किसी को जानकारी नहीं है।
चीनी मिट्टी के बर्तन पूरी दुनिया में मशहूर हैं. खास तौर से पश्चिमी देशों के राजघरानों में मेहमानों की दावत हमेशा चीनी मिट्टी के बर्तनों में ही होती है. तो ब्रिटेन के राजकुमार विलियम की शादी जैसा अहम अवसर इससे कैसे अछूता रहता. कंपनी के मार्केटिंग मैनेजर गैरी कीयू ने बताया कि इन बर्तनों को खास तरह से बनाया जा रहा है और इसके लिए चीन की सबसे बेहतर चीनी मिट्टी और भट्टियों का प्रयोग किया जा रहा है. उन्होंने कहा, “इन्हें 1600 डिग्री से अधिक तापमान पर बनाया जा रहा है. इससे इनके आकार या इन पर हुई चित्रकारी में कभी भी बदलाव नहीं आएगा. यह प्लेटें केवल टूट सकती हैं, खराब नहीं होंगी. यह हमारा उन्हें शुभकामना देने का एक अनोखा तरीका है.”

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