लेखक परिचय

रामेन्द्र मिश्रा

रामेन्द्र मिश्रा

लेखक युवा पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं | समसामयिक मुद्दों पर लेखन, वेब मीडिया में विशेष हस्तक्षेप |

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उत्तरी कश्मीर के बारामुला जिला के वूसान गांव की आशा गांव की सरपंच निर्वाचित कर ली गयीं | वूसान गांव के कुंजर ब्लाक में रहने वाली 52 वर्षीय आशा कश्मीरी पंडित हैं और अपने पति राधाकृष्ण तथा 2 बच्चों के साथ रहती हैं | 90 के दशक में पाक प्रायोजित आतंकवाद के चलते जो लाखों कश्मीर पंडित अपनी भूमि से बन्दूक की नोक पर खदेड़ दिए गए थे, उनमें आशा का परिवार भी था | लेकिन आशा उन परिवारों में से हैं जो हिम्मत करके दुबारा कश्मीर वापस आये | और अब इस मुस्लिम बहुल गांव में आशा सरपंच हैं | जून 2011 में भारत के मुकुट और पृथ्वी का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर घाटी समेत पूरे जम्मू कश्मीर राज्य में पंचायती राज की स्थापना के लिए चुनाव संपन्न हुए | जम्मू कश्मीर में इन चुनावों का अपना महत्व है | लंबे समय के पश्चात कई प्रकार के विवादों तथा आपत्तियों के बावजूद जम्मू कश्मीर में पंचायतों के चुनाव करवाने की प्रक्रिया पूरी हुई और पंचायती राज की स्थापना हुई | राज्य में ये चुनाव 16 चरणों में संपन्न हुए और 75% मतदान हुआ | यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि मतदान के लिए “इलेक्ट्रोनिक वोटिंग” मशीनों की जगह पुरानी मतपेटियों को प्रयोग में लाया गया जिसके लिए राज्य की अपनी 6000 पुरानी मतपेटियों की मरम्मत करवाई गई और शेष 8000 मतपेटियां पंजाब से लायी गईं | राज्य के 22 जिलों, 81 तहसीलों, 143 ब्लाक और 7050 गांवों में प्रतिनिधि चुनने के लिए ये चुनाव हुए | इस चुनाव से 4130 सरपंच और 29719 पंच चुने गए | इन चुनावों में 50,68,975 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया | जम्मू कश्मीर राज्य में ये एक विशेष उपलब्धि है |

वैसे तो पंचायत के चुनाव इस राज्य में अंतिम बार 2001 में हुए थे लेकिन वास्तव में राज्य में सही अर्थों में पंचायत चुनाव 32 वर्ष बाद हुए हैं | आज़ादी के 60 वर्षों में इस राज्य में मात्र चार बार ही मूल लोकतान्त्रिक इकाइयों अर्थात पंचायतों और नगर निकायों के चुनाव करवाए गए हैं | स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इन संस्थानों के चुनाव पहली बार 1958 में करवाए गए | उसके बाद 1962 और 1978 में चुनाव हुए और फिर लंबे समय बाद 2001 में पंचायत चुनाव कराये गए थे | हालाँकि ये चुनाव पहले चरण में ही सिमट गए थे | २००६ में राज्य में पंचायतों को भंग कर दिया गया था | 2001 के चुनाव में 38,02,302 मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया था और 2702 सरपंच एवं 20559 पंचों का चुनाव हुआ था | इस दशक के दौरान राज्य में 8 नए जिले बनाये गए और 22 नए ब्लाक अस्तित्व में आये | उन चुनावों में क्या-क्या गुल खिलाये गए और इन संस्थानों के अधिकार किस प्रकार सीमित रखे गए, यह एक लंबी और दुखदाई गाथा है | यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि सत्ताधारी नेताओं ने पिछली गलतियों से कुछ नहीं सीखा है और कुछ गलतियाँ फिर दोहराई गईं | पंचायती क्षेत्रों का परिसीमन मनमाने ढंग से करना भी ऐसी ही एक गलती है | इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि पंचायती राज के अंतर्गत विकास कार्यों के लिए जो धनराशी आवंटित की जाती है उसका मूल आधार पंचायत इकाई को माना जाता है | अतः जिस संभाग में पंचायतों की संख्या अधिक होगी वहाँ के लिए अधिक केन्द्रीय धनराशी उपलब्ध होगी | इसीलिए जनसँख्या में कम होने के बावजूद जम्मू की तुलना में कश्मीर संभाग में पंचायतों की संख्या अधिक रखी गयी है | ये भेदभाव आजादी के बाद से ही चला आ रहा है और जम्मू तथा लद्दाख की जनता पिछले 6 दशकों से इसे सहन कर रही है | तमाम आरोपों, आशंकाओं, और चुनौतियों के बावजूद ये चुनाव राज्य के विकास की मजबूत नींव रख सकते है अगर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपने किये गए वादे के अनुसार चुने गए प्रतिनिधियों को उनके अधिकार दिलाने में सफल हो जाते हैं | यह शिकायत अभी भी है कि अधिकारी जन प्रतिनिधियों की अनसुनी करते हैं और उनके अधिकारों को दबाने की कोशिश करते हैं |

राज्य के विकास के लिए और जिहादी आतंकियों तथा अलगाववादियों के नापाक इरादों को नेस्तनाबूद करने के लिए राज्य में विशेषकर घाटी में पंचायती राज की स्थापना जरुरी है | इन चुनावों से काफी आशा बंधी है और कश्मीरी लोगों ने भारत के संविधान के प्रति एक बार पुनः अपनी आस्था प्रकट की है | पूरे राज्य में जहाँ मतदान प्रतिशत 75% रहा है वहीँ कुछ इलाकों में तो 85% मतदान हुआ है | विभिन्न अलगाववादी समूहों ने इन चुनावों का बहिष्कार किया था और लोगों को इनसे दूर रहने को कहा था, कई जगह अलगाववादियों और राष्ट्र विरोधी समूहों ने चुनाव में अव्यवस्था भी पैदा करने की कोशिश की, लेकिन उसके बावजूद भी जनता का चुनाव के प्रति इतनी गर्मजोशी दिखाना यह सिद्ध करता है कि आम कश्मीरी भारत के साथ ही अपना भविष्य देखता है और यही वास्तविकता है | पंचायतों के अभाव में जम्मू कश्मीर की जनता प्रति वर्ष अरबों रुपये का घाटा झेल रही थी क्योंकि पंचायतों के अभाव में अरबों रुपये की केन्द्रीय सहायता भी राज्य को नहीं दी जा रही थी | अब पंचायतों की स्थापना के बाद पुनः राज्य को एक बड़ी धनराशी मिलने लगेगी जो अंततः राज्य और जनता के लिए ही हितकारक होगा |

पंचायत चुनाव का उद्द्शेय सत्ता और ताकत का बंटवारा है | इसके द्वारा ही अधिकतम संभावित शक्तियां निर्वाचित सरपंचो और पंचो के माध्यम से आम आदमी तक हस्तांतरित की जा सकती हैं | प्रभावशाली पंचायती राज के द्वारा ही दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक न्याय की पहुँच और शक्तियों का हस्तांतरण संभव हो सकता है | राज्य में पंचायत चुनाव ऐतिहासिक कदम इसलिए भी है कि क्योंकि इसके द्वारा ही विभिन्न विकास और सामाजिक पहलुओं में सुधार सुनिश्चित किया जा सकता है | जब निचले स्तर तक लोकतान्त्रिक ढांचा मजबूत होगा तब स्वतः राज्य में लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक संस्थाओं को बल मिलेगा और जम्मू कश्मीर जैसे राज्य में यह अति आवश्यक है | ऐसे कई विकास के पहलु और नीतिगत मामले हैं जिसके लिए गांव के स्तर पर देखभाल की जरुरत होती है | पंचायत ही दूर दराज के गाँवो और इलाकों में रहने वाले गरीब लोगों को मजबूत कर सकती है और उन्हें नीति निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा बना सकती है | सरपंचो और पंचो की भी ये जिम्मेदारी बनती है कि वे तर्कसंगत न्याय प्रणाली के तहत लोगों की शिकायतों को सुनें और उनके तत्काल समाधान के लिए प्रयासरत हों |

पंचायतों को निचले स्तर पर सरकारी एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर निगरानी रखकर भ्रष्टाचार कम करने में अपना योगदान देना होगा | पंच और सरपंच अपनी प्रभावी निगरानी से ग्राम स्तर पर होने वाले कार्यों की गति के संतुलन के लिए व्यवस्था को पूरी तरह लागू कर उसका नेतृत्व कर सकते हैं | लेकिन इसके साथ ही पंचो और सरपंचो को जनता की मूलभूत जरूरतों के प्रति भी पूरी तरह सतर्क, ईमानदार और असाधारण रूप से उत्तरदायी होने की जरुरत है | मतदाता भी अपने चुने हुए प्रतिनिधियों पर नजर रखें और उनके कार्यों के द्वारा उन्होंने क्या छाप छोड़ी है इसकी निगरानी करें | वे इसके लिए पूरी तरह आजाद हैं कि उनके द्वारा चुने गए पंच और सरपंच अपने इलाकों में कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं, उनकी ईमानदारी कैसी है और वो कैसी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं ? पंचायतों का काम सिर्फ ग्रामीण विकास पर ही केंद्रित नहीं होना चाहिए बल्कि अन्य कार्यक्षेत्रों पर भी समुचित ध्यान देना होगा जैसे शैक्षिक संस्थानों का ठीक प्रकार से काम करना, स्वास्थ्य केंद्र, वितरण प्रणाली तथा जनहित से जुड़े अन्य कोई भी कार्य | इस सबके लिए समन्वित दृष्टिकोण उत्पन्न करने की आवश्यकता है जो आपसी सहयोग और जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतारकर ही संभव हो सकेगा |

राज्य में पंचायती राज की स्थापना शांति और सुरक्षा की गारंटी हो सकती है बशर्ते पंच, सरपंच अपनी ऊर्जा जनता को मजबूत करने में उनकी समस्यायें दूर करने में लगाएं और राज्य में शांतिपरक और विकास का माहौल बनाने के लिए संकल्पित हों | पंचों और सरपंचों पर एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी यह भी होगी कि वे युवाओं पर ध्यान दें, उनके साथ संवाद स्थापित करें और उन्हें रचनात्मक कार्यों में लगाये ताकि उनके हाथ पत्थरबाजी के बजाय किसी अच्छे काम में लग सकें |

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