लेखक परिचय

कुन्दन पाण्डेय

कुन्दन पाण्डेय

समसामयिक विषयों से सरोकार रखते-रखते प्रतिक्रिया देने की उत्कंठा से लेखन का सूत्रपात हुआ। गोरखपुर में सामाजिक संस्थाओं के लिए शौकिया रिपोर्टिंग। गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातक के बाद पत्रकारिता को समझने के लिए भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी रा. प. वि. वि. से जनसंचार (मास काम) में परास्नातक किया। माखनलाल में ही परास्नातक करते समय लिखने के जुनून को विस्तार मिला। लिखने की आदत से दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण, दैनिक जागरण भोपाल, पीपुल्स समाचार भोपाल में लेख छपे, इससे लिखते रहने की प्रेरणा मिली। अंतरजाल पर सतत लेखन। लिखने के लिए विषयों का कोई बंधन नहीं है। लेकिन लोकतंत्र, लेखन का प्रिय विषय है। स्वदेश भोपाल, नवभारत रायपुर और नवभारत टाइम्स.कॉम, नई दिल्ली में कार्य।

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कुन्दन पाण्डेय

भारत में लोकतंत्र कहाँ है ? कहीं नहीं लेकिन अराजकता हर कहीं हैं। संसद में, विधानसभाओं में, विधानसभाओं में होने वाली मारपीट में, केन्द्र सरकार में, राज्य सरकार में, मंत्रियों में, नेताओं में, राजनीतिक दलों में, सांसदों में, सांसदों द्वारा संसद में प्रश्न पूछने के लिए पैसा लेने में, विधायकों में, चुनावों में, चुनावी प्रत्याशियों में, केन्द्रीय विभागों व कर्मचारियों में, राज्य सरकार के विभागों व कर्मचारियों में, पुलिस में, सेना में, गरीबों के शोषण में, विदर्भ के कपास किसानों की आत्महत्याओं में, गन्ना किसानों को महीनों बाद मिलने वाले भुगतानों में, ठेकेदारों के मानकों के विपरीत निर्माणों में, अभियंताओं सहित सभी सरकारी कर्मचारियों के ऊपरी आमदनी में, उद्योगपतियों के करापवंचन में, आदिवासियों को उनकी जंगली जमीन से बेदखल करके नक्सलियों के रहमोकरम पर छोड़ने में, उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के हरैया में इंजिनियर मनोज गुप्ता, दिल्ली के बार में माडल जेसिका लाल, पत्रकार शिवानी भटनागर व निरुपमा पाठक, कवियित्रि मधुमिता शुक्ला, विधायक कृष्णानंद राय व राजू पाल तथा बह्मदत्त द्विवेदी आदि की हत्याओं में तो केवल अराजकता ही अराजकता है लोकतंत्र कहीं है ही नहीं।

कांग्रेस भाजपा दोनों के चुनावी चन्दों में, सभी राजनीतिक दलों की जाति व वोटबैंक की राजनीति में, मुस्लिमों का विकास के लिए नहीं बल्कि केवल वोटबैंक के लिए तुष्टिकरण में, बंग्लादेशी घुसपैठियों को भारत का नागरिक व मतदाता बनाने में, बोफोर्स तोप दलाली के अभियुक्तों के न पकड़े जाने में, संसद हमले के सजायाफ्ता अफजल की फाँसी की दया याचिका का निपटारा न होने में, इंदिरा गाँधी द्वारा 25 जून, सन् 1975 से लगभग 19 माह तक थोपे गये असंवैधानिक आपातकाल में, आपातकाल लागू होने के ठीक पहले तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ के इस कथन में कि “इंदिरा ही भारत है और भारत ही इंदिरा है” संजय गांधी के पं. जर्मनी के एक अखबार को दिए एक साक्षात्कार में कि “मुझे डिक्टेटरशिप पसंद है, लेकिन हिटलर जैसी नहीं।” क्या इस डिक्टेटरशिप में कहीं लोकतंत्र होगा ? ताज्जुब की बात यह है कि सिर्फ इंदिरा गाँधी के बेटे होने के कारण ऐसा आसानी से कहा गया। देश के लगभग सभी राज्यों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व रखने वाली कांग्रेस पार्टी में इंदिरा गांधी के वंशजों के एकछत्र राज में । इन सभी तथ्यों में भी कहीं लोकतंत्र है ? नहीं है।

सातवें दशक के प्रारम्भ में संसद के अपने पहले भाषण में प्रखर समाजवादी डॉं. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि “यह हमेशा याद रखा जाय कि 27 करोड़ आदमी 3 आने रोज के खर्च पर जिंदगी गुजर-बशर कर रहे हैं जबकि प्रधानमंत्री नेहरु के कुत्ते पर 3 रुपए रोज खर्च करना पड़ता है।” क्या नेहरु के इस कृत्य में लोकतंत्र है ? “अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट के अनुसार देश की 70 प्रतिशत से अधिक जनता की दैनिक आमदनी 20 रुपए से कम है।” उसी लोकतांत्रिक भारत में तथाकथित (कांग्रेसी) युवराज राहुल गांधी हाल ही में डेढ़ दिवसीय यात्रा पर दक्षिण भारत गए थे। चेन्नई से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित दैनिक में छपे ब्यौरे के मुताबिक “उनकी इस यात्रा पर मोटामोटी लगभग 2 करोड़ रुपए व्यय हुए।” सत्ताधारी दल के महासचिव की गैर सरकारी यात्रा पर 2 करोड़ खर्च करना कैसे लोकतांत्रिक हो सकता है?

सन् 2000 के एक आंकड़े के अनुसार उस वर्ष एक भारतीय नागरिक की औसत आमदनी केवल 29.50 रुपए थी, जबकि उसी समय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व केन्द्रीय मंत्रिमण्डल पर रोजाना 1000 करोड़ रुपए अर्थात् औसत आमदनी का लगभग 70,000 गुना रोजाना खर्च होता था आज तो यह बढ़कर कई गुना हो गया होगा। क्या उपरोक्त आंकड़ें स्वस्थ लोकतंत्र की गाथा बयान करते हैं? नहीं न।

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के शब्दों में लोकतंत्र की परिभाषा, “ लोकतंत्र जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन है। ” अर्थात् लोकतंत्र की नींव उसका मतदाता होता है जबकि बहुमत का मतदाता अभी भी गाँवों में रहता है, जो लोकतंत्र में अपनी भूमिका से व्यापक रुप से असंतुष्ट है। यही हाल गरीबों, मजदूरों, आदिवासियों व भूमिहीन किसानों का भी है। ये सभी एक स्वर में कहते हैं “कोई नृप होऊ, हमें का हानि।” सामान्यत: भारतीय लोकतंत्र के बहुमत का मतदाता 5 वर्षो में एक बार बतौर चुनाव प्रत्याशी अपने सांसद या विधायक या जनप्रतिनिधि का द्वार पर आये भगवान सरीखा दर्शन करने की ही भागीदारी निभा पाता है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने एक बार कहा था कि “वे पाते है कि स्थानीय शासन कार्यो में उनका कोई हाथ नहीं है और छोटा से छोटा राजकर्मचारी भी उनके प्रति किसी रुप में उत्तरदायी नहीं है, उल्टे वही उन पर धौंस जमाता है और अंग्रेजों के गुलामी के समय की तरह ही उनसे रिश्वत वसूलता है। लोकनायक आगे कहते है कि इस सच्चाई का सामना करना होगा कि जनता को स्वराज्य-भावना की अनुभूति नहीं हो पायी है। हमारे लोकतांत्रिक क्रियाकलाप में केवल थोड़े से शिक्षित मध्यम वर्ग के लोग संलग्न है और उनमें भी वही हैं जो प्रत्यक्ष रुप से राजनीतिक कार्यों में लगे हुए है।” उपरोक्त कथनों से आशय स्पष्ट है कि 5 वर्ष में एक बार मत देकर जनप्रतिनिधियों व सरकार पर अंकुश नहीं रखा जा सकता।

इंदिरा गाँधी की हत्या की प्रतिक्रिया में हुए सिखों के राष्ट्रव्यापी कत्लेआम के बारे में राजीव गाँधी ने कहा था कि “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो जमीन काँपती ही है।” क्या भारतीय लोकतंत्र में प्रभावशाली लोगों द्वारा ऐसा बयान देना लोकतांत्रिक है ? गुजरात दंगे के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने कम से कम मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी। क्या भारतीय लोकतंत्र में गरीबों, बेबसों, लाचारों, वंचितों, अंत्योदयों, भूमिहीन किसानों, मजदूरों, आदिवासियों के जीवन का कोई महत्व नहीं ? क्या उपरोक्त तबकों के जीवन का एक छोटे पौधे के बराबर भी महत्व नहीं है ?

प्रधानमंत्री रहते राजीव गाँधी ने भ्रष्ट सिस्टम को स्वीकारते हुए कहा था कि, “आज देश में सत्ता के दलाल इस तरह बढ़ गए हैं कि हम ऊपर से एक रुपया भेजते हैं तो लक्षित लोगों तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं।” क्या ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था ( सिस्टम) लोकतांत्रिक हैं ? क्या भारत के प्रधानमंत्री के अपने ही लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के सामने इतने बेबस और लाचार होने में लोकतंत्र है ? यदि भारतीय प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार से इतने बेबस, लाचार हैं, तो अनपढ़, ग्रामीण, दलित, पिछड़े, भूमिहीन किसान, मजदूर तथा आदिवासी इस भ्रष्ट व्यवस्था (सिस्टम) से कितने बेबस लाचार रहते होगें, इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है।

संविधान की मूल प्रति में राम और कृष्ण के चित्र हैं, पर नेताओं द्वारा काल्पनिक बताये जा रहे हैं। लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर का हमलावर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मृत्यु दंडित राष्ट्रद्रोही है, तो भी उसके नाम पर एक मजहब को लुभाने के प्रयत्न हो रहे हैं। मतदान केवल भारतीय नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन बंग्लादेशी घुसपैठिए भी मतदाता सूचियों में दर्ज हैं। जम्मू कश्मीर को विशेषाधिकार प्रदान करने वाली धारा 370, जिसे घिस-घिस कर समाप्त हो जाने की बात कही गयी थी, वो प्रतिदिन मजबूती प्राप्त करने वाला गिरि बनता जा रहा है। नीति निर्देशक तत्वों में उल्लिखित समान नागरिक संहिता बनाने का न्यायालय बारम्बार निर्देश दे रहा है, फिर भी केन्द्र सरकार इसे नहीं बना रही है। क्या इस अवतरण के किसी भी तथ्य में कहीं भी लोकतंत्र हैं ? नहीं।

वास्तव में बहुत से तंत्रों ने मिलकर लोकतंत्र के चारो ओर एक दुष्चक्र बना लिया है, जिससे निकलने के लोकतंत्र के सारे प्रयत्न व्यर्थ होते जा रहे हैं। भारत में लोकतंत्र कहीं है ही नहीं, है तो एक “सुविधाशुल्कतंत्र, घोटालातंत्र या घूसतंत्र” जो की अब व्यवस्था या सिस्टम का सभी लोगों द्वारा अंगीकृत किया जाने वाला सामान्यत: सबसे “शिष्टतंत्र” बन गया है, जिसके माध्यम से केन्द्र से चले 100 पैसे गाँव के अन्त्योदय तक पहुँचते-पहुँचते 15 पैसे ही रह जाते हैं। एक नेतातंत्र है, जिसमें नेता दो संवैधानिक पदों पर रह सके इस हेतु एक पद को लाभ का पद न मानने की व्यवस्था कर दी गयी।

यह नेतातंत्र सभी लाभकारी कार्य करते हैं – यथा किसी न किसी खेल संस्था में वर्चस्व बनाते हैं, आईपीएल की टीम खरीदते हैं, शिक्षण संस्थायें पेट्रोल पम्प व गैस एजेंसी चलाते हैं, खुद व्यवसाय करते हैं, उद्यम चलाते हैं, एन. जी. ओ. इत्यादि चलाते हैं, कभी पत्नी के नाम से, कभी बेटे व अन्य रिश्तेदारों के नाम से।

एक अपराध तंत्र है, जिसमें अत्यधिक ईनाम व ऊँचे राजनीतिक आका तक पहुँच रखने वाले अपराधी बनिए, समाज में, पुलिस में आपका सम्मान बढ़ता जाएगा । एक पुलिस तंत्र है, जो राज्यों के मुख्यमंत्रियों के निजी नौकर की तरह भड़काऊ भाषण के आरोप में वरुण गाँधी पर रासुका लगाकर न्यायालय में पिट जाते हैं।

“कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि लोकतंत्र में एक सर्वशक्तिशाली भ्रष्टतंत्र है जिसमें ऊपर से नीचे तक एक ईमानदार आदमी पिसकर (जीवन जीने की जगह) या तो आत्महत्या कर लेगा या ईमानदारी का सदा सर्वदा के लिए परित्याग कर देगा ।”

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sunil patel
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सत्य वचन. अच्छा लेख. कडवे तथ्य. धन्यवाद कुंदन जी.

लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
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कुंदन जी सप्रेम साहित्य जोग
आपका लेख प्रसंसनीय है ” हार्दिक बधाई ””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””’

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