लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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यूपी में भारतीय जनता पार्टी की इस ‘सुपर लैंड-स्लाईड विक्ट्री’ से ये स्पष्ट है कि जनता के मिजाज और नब्ज को मोदी-शाह और उनकी टीम ने बाकी ‘सबों’ से बेहतर भाँपा l इस ‘सब’ में मोदी – भाजपा विरोधी पार्टियाँ भी हैं , मीडिया का वो तबका भी है जो भाजपा की जीत का आक्लन तो कर रहा था लेकिन उसे भी ‘ऐसी’ जीत की उम्मीद नहीं थी , मीडिया का वो तबका भी है जिसे भारतीय जनता पार्टी की जीत का संशय था और संशय की वाजिब वजहें भी थीं ,इसमें मैं भी शामिल था l सच कहूँ तो किसी को ऐसी उम्मीद नहीं थी , यहाँ तक की भाजपा के शीर्ष के नेताओं को भी नहीं और इसे कईयों ने स्वीकारा भी l

 

बेशक यूपी के नतीजों ने ‘सबों’ का चौंका दिया , आज फिर से ये साबित हो गया कि लोकतन्त्र में जनता हतप्रभ करने वाले परिणाम देती है , भले ही आगे चल कर ‘वो (जनता)’ खुद ही ठगी क्यूँ ना जाए !! चुनावों की यही अनिश्चितता ही लोकतन्त्र के लिए ‘ संतलक (leveler)’ का काम करती है l यूपी में आज जैसे नतीजे आए हैं ऐसे नतीजे देश की चुनावी –संग्राम में पहले भी आए हैं और गौरतलब है कि जनता ने अपने नतीजे खुद बदले भी हैं l अप्रत्याशित नतीजों (अपार बहुमत) के अपने “प्रतिक्षेप –प्रतिघात (repercussions)’ भी होते हैं और ऐसे नतीजे ज्यादा‘आघात योग्य- सुभेद्य (vulnerable)’ होते हैं , ऐसा खुद दिल्ली और बिहार की जनता ने मात्र नौ महीने और डेढ़ साल के अल्पकाल में ही साबित कर दिया था और इस को ध्यान में रखकर आत्म-मुग्धता से बचते हुए भारतीय जनता पार्टी को कुछ ज्यादा ही सजग व सचेत रहने की जरूरत हैl
जब जनादेश बड़ा होता है तो जनाकांक्षाएँ भी बड़ी होती हैं , समीक्षा- संवीक्षा (scrutiny) भी ज्यादा होती है और ‘एक छोटी सी भूल’ भी ग्राफ को तेजी से नीचे गिरा देने का काम करती है l राजनीति भी एक ‘खेल’ है और जैसा की खेलों में होता है कि “अगर एक मैच में आपने दोहरा –तिहरा शतक लगाया तो अगले मैच में भी जनता –प्रशंसक –समर्थक को कम से कम शतक से नीचे कुछ और नहीं मंजूर होता है l”

अपार बहुमत अपार जिम्मेवारियों और आकांक्षाओं के भारी बोझ के साथ आता है और इसी बोझ के दबाब में विश्वास के टूटने का डर ज्यादा भी होता और विश्वास टूटता भी जल्द है जैसा कि भाजपा के साथ दिल्ली और बिहार में हुआ था l अब ये देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय जनता पार्टी इस ‘भारी बोझ’ के साथ कैसे आगे बढ़ती है ! उम्मीद है भारतीय जनता पार्टी अपनी पिछली गलतियाँ नहीं दुहराएगी और जाति -धर्म से ऊपर उठकर यूपी और सिर्फ यूपी की जनता के विश्वास को कायम रखते हुए ‘सबों’ बेहतरी ही उसकी प्राथमिकता होगी !!

 

मेरे विचारों में ये जनादेश यूपी का यूपी के द्वारा यूपी के लिए है ना की ये देश का जनादेश है l भारतीय जनता पार्टी और उनके सलाहकारों , रणनीतिकारों और शुभ-चिंतकों को चुनावी –राजनीति का ये फलसफा ध्यान में अवश्य ही रखना होगा कि विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दे – समीकरण अहम भूमिका निभाते हैं , किसी प्रदेश के विधानसभा चुनाव के परिणामों को देश का मिजाज समझने से पहले अपने आप को प्रदेश के पटल पर साबित करना होता है और अपने साबित-सत्यापित प्रत्यायककों ( credentials) के साथ ही आप ‘देश’ के सामने उस मॉडल के साथ जा सकते हैं l
जनता ने तो अपना काम कर दिया अब भारतीय जनता पार्टी पर यूपी के संदर्भ में अपने द्वारा किए गए लोक-लुभावन बड़े-बड़े वादों पर खरा उतरने का समय है l अब तो ये वक्त ही बताएगा कि हिंदी हार्ट-लैंड के सबसे महत्वपूर्ण राज्य की जनता को इस अपार समर्थन के एवज में भारतीय जनता पार्टी से क्या मिलता है ? जनता के हाथों में ‘जो’ था उससे ज्यादा उसने भारतीय जनता पार्टी को दे दिया l विपक्ष नाम की चीज अब भारतीय जनता पार्टी की राह में रोड़ा नहीं बनने जा रही है क्यूँकि जनता ने विपक्ष रहने ही नहीं दिया है और ये भी तय है कि अब अपनी नाकामियों का ठीकरा विपक्ष पर ना तो फोड़ा जा सकता है और अगर फोड़ने की कोशिशें हुईं भी तो जनता उसे स्वीकार नहीं करने वाली l

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