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तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

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तनवीर जाफ़री

वयोवृध्द गांधीवादी नेता एवं समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का, देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से तंग आकर किया गया आमरण अनशन समाप्त हो गया। केंद्र सरकार ने अन्ना हजारे की अधिकांश मांगों को स्वीकार कर लिया। गोया जंतर मंतर पर एक बार फिर गांधी के सत्य अहिंसा व बलिदान की पताका देश में फहराई। वैसे तो भ्रष्टाचार का विरोध किए जाने की बातें सार्वजनिक रूप से सभी राजनैतिक दलों के सभी राजनेता करते देखे जा सकते हैं। वे भी जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं तथा वे भी जिन्होंने अपने थोड़े से समय के राजनैतिक जीवन में ही अकूत धन संपत्ति कमा डाली है। और वे भी जो भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देते हैं तथा उनसे हर प्रकार के लाभ उठाते हैं। अत: यदि इस प्रकार के पाखंडी राजनेता या अधिकारी भ्रष्टाचार के विरुध्द आवाज उठाएं तो निश्चित रूप से इसे महा एक पाखंड या ढकोसला ही कहा जाएगा। परंतु जब भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की लगाम अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल तथा किरण बेदी या स्वामी अग्निवेश जैसे समर्पित एवं फक्कड़ लोगों के हाथों में हो तो देश की जनता का ध्यान इनकी ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है। और कुछ ऐसा ही नजारा तब देखने को मिला जब महात्मा गांधी की सत्य,अहिंसा व बलिदान की नीतियों का अनुसरण करते हुए 71 वर्षीय अन्ना हजारे संसद में जन लोकपाल विधेयक पारित कराए जाने की मांग को लेकर 5 अप्रैल से आमरण अनशन पर बैठ गए। उनके समर्थन में न केवल पूरे देश में अनशन, भूख-हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, जुलूस व रैलियां शुरु हुईं बल्कि विदेशों में भी उनके समर्थन में रैली व मार्च आयोजित किए जाने के समाचार आए।

सवाल यह उठता है कि जब केंद्र में मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार व योग्य व्यक्ति के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार शासन कर रही हो और कांग्रेस पार्टी स्वयं को गांधी की विचारधारा की अलमबरदार पार्टी बताने का भी दम भरती हो ऐसे में अन्ना हजारे जैसे वरिष्ठ गांधीवादी नेता को आमरण अनशन तक जाने की जरूरत ही क्यों महसूस हुई। मनमोहन सिंह तथा कांग्रेस पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अन्ना हजारे द्वारा सुझाए जा रहे जन लोकपाल विधेयक से आंखिरकार तब सहमत हुए जब अन्ना हजारे अपने तमाम साथियों सहित अनशन पर बैठे तथा इस आंदोलन को असंगठित होने के बावजूद ऐतिहासिक समर्थन मिला। गत् 40 वर्षों से विचाराधीन लोकपाल विधेयक को आख़िर जन लोकपाल विधेयक के रूप में कांफी पहले परिवर्तित कर दिया जाना चाहिए था। यदि राजनीतिज्ञ स्वयं को इतना ही सांफ-सुथरी तथा बेदांग छवि वाला समझते होते तो अन्ना हजारे के आमरण अनशन शुरु करने के एक ही दिन बाद शरद पवार जैसे नेता जोकि स्वयं को प्रधानमंत्री पद का सबसे माबूत दावेदार समझने की गलतफहमी भी पाले हुए थे, भ्रष्टाचार के विरुध्द बने मंत्रिमंडलीय समूह से त्यागपत्र न दे डालते।

बहराल, अन्ना हजारे की कुर्बानी रंग ले आई है। जन लोकपाल विधेयक सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक का स्थान संभवत:लेने को है। देश में भ्रष्टाचार को समाप्त करने विशेषकर उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार को समाप्त करने अथवा नियंत्रित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा। निश्चित रूप से जनप्रतिनिधि व उच्चाधिकारी अब जनलोकपाल विधेयक केभयवश दोनों हाथों से देश को लूटने की अपनी प्रवृति से बाज आ सकेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति अपनी सहानुभूति दिखा कर इस बात के संकेत दे दिए हैं कि भ्रष्टाचार अब बहुत हो लिया और यह सिलसिला अब देश आगे और नहीं बर्दाश्त कर सकता। देश के नौजवानों से लेकर बुजुर्गों तक ने इस आंदोलन को बिना किसी निमंत्रण अथवा रणनीति के जिस प्रकार व्यापक समर्थन दिया तथा हजारे के आमरण अनशन के समर्थन में जो उत्साह दिखाया वह भी न केवल काबिले तारींफ था बल्कि इसे देखकर इस बात का भी सांफ अंदाजा हो रहा था कि देश का बहुसं य वर्ग वास्तव में भ्रष्टाचार तथा भ्रष्टाचारियों से बेहद दु:खी है। खासतौर पर उन जनप्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार से जोकि जनता द्वारा पांच वर्षों के लिए निर्वाचित तो इसलिए किए जाते हैं ताकि वे अपने क्षेत्र का समग्र विकास करते हुए देश के बहुमुखी विकास में अपनी भागीदारी निभाएं। परंतु आमतौर पर यही प्रतिनिधि भ्रष्टाचार, स्वार्थ तथा परिवारवाद में ऐसा उलझ कर रह जाते हैं गोया कि जनता ने इन्हें लूट-खसोट करने, देश को बेच खाने तथा अपने परिवार को जनता की छाती पर जबरन सवार कर देने का लाईसेंस दे दिया हो।

इस आंदोलन का एक पहलू यह भी था कि अन्ना हजारे द्वारा उठाए गए आमरण अनशन जैसे साहसिक एवं बलिदानपूर्ण कदम को अपना समर्थन देने की आड़ में तमाम ऐसे राजनैतिक दलों व नेताओं में भी होड़ मची देखी गई जिनका भ्रष्टाचार से चोली-दामन का साथ है। ऐसे कई नेता हजारे को समर्थन देने के बहाने जंतरमंतर पर भी जा पहुंचे। परंतु अन्ना हजारे व उनके समर्थकों ने उनके ढोंगपूर्ण समर्थन को स्वीकार करने के बजाए उन्हें जंतरमंतर से वापस कर दिया। इसी प्रकार इस दौरान चली भ्रष्टाचार संबंधी राष्ट्रीय बहस में भी उन राजनैतिक दलों को बढ़चढ़ कर अन्ना हजारे का समर्थन करते देखा गया जिनके राष्ट्रीय अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री,मु यमंत्री सभी पर घोर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। परंतु ऐसे दल व इनके नेता भी हजारे को समर्थन देते व कांग्रेस की गठबंधन सरकार को कोसते व भ्रष्टाचारी बताते दिखाई पड़े। जबकि नैतिकता का तकाजा तो यही है कि अन्ना हजारे के आंदोलन का समर्थन तथा भ्रष्टाचार का मुखरित हो कर विरोध करने का अधिकार केवल उसी को होना चाहिए जिसका दूर-दूर तक भ्रष्टाचार से कोई लेना-देना न हो। जो लोग स्वयं भ्रष्टाचार में डूबे हों या भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देते हों अथवा चुनाव हेतु पार्टी फ़ंड में भ्रष्टाचारियों से काला धन लेते हों कम से कम उन्हें तो भ्रष्टाचार का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है।

भ्रष्टाचार के विरुध्द संघर्ष करते हुए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार से लड़ने की आड़ में अपनी कोई संपत्ति अर्जित नहीं की। न ही उन्होंने कोई विश्वविधालय बनाया, न ही किसी प्रकार का उद्योग स्थापित किया,न ही कोई टापू खरीदा, न ही मंत्रियों, मु यमंत्रियों या केंद्रीय मंत्रियों को अपने किसी आयोजन में बुलाकर अपना मान-स मान बढ़ाने का प्रयास किया। उनके किसी भक्त ने हजारे को शायद इस योग्य भी नहीं समझा कि वह भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से संघर्ष करने हेतु कम से कम उन्हें एक हेलीकॉप्टर तो ‘गुप्तदान’ में दे देता? परंतु इन सभी सांसारिक एवं भौतिक संसाधनों के अभाव के बावजूद इस वरिष्ठ गांधीवादी ने अपने आमरण अनशन के बल पर केंद्र सरकार सहित पूरे देश व पूरी दुनिया में रह रहे भारतवासियों को झकझोर कर रख दिया। हजारे की इस कुर्बानी ने उन तमाम तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधियों को भी बौना कर दिया जो कि बातें तो भ्रष्टाचार से लड़ने की करते हैं परंतु अपने साथ भ्रष्टाचारियों का ही समर्थन भी रखते हैं। और जरूरत पड़ने पर इन्हीं भ्रष्टाचारियों के दल को लाखों रुपये चंदा देने से भी नहीं हिचकिचाते। अन्ना हजारे ने न तो कभी किसी राजनैतिक दल के गठन की इच्छा जाहिर की, न ही कभी सत्ता अपने हाथ में लेकर उसमें स्वयं सुधार किए जाने जैसा कोई स्वार्थपूर्ण खाका तैयार किया। उन्होंने वही किया जो गांधी जी किया करते थे। अर्थात् सत्य, अहिंसा और बलिदान के मार्ग पर चलकर सरकार,देश व दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करना।

71 वर्षीय इस महान गांधीवादी नेता अन्ना हजारे के आंदोलन ने एक बार फिर यह भी प्रमाणित कर दिया है कि महात्मा गांधी के आदर्श व उनके सिध्दांत आज भी न केवल प्रासंगिक हैं बल्कि पूरी तरह जीवित भी हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि इस गांधीवादी आंदोलन का समर्थन वह लोग करते भी दिखाई दिए जो गांधीवादी विचारधारा के प्रबल विरोधी हैं। बेशक ऐसी शक्तियों द्वारा हजारे को दिया जाने वाला समर्थन उनके अपने स्वार्थवश दिया गया समर्थन ही था। परंतु हजारे ने गांधी जी के मार्ग पर चलते हुए एक बार फिर देश में महात्मा गांधी की याद को ताजा कर दिया है। इतना ही नहीं बल्कि आज की जिस पीढ़ी ने महात्मा गांधी के बारे में केवल पढ़ा है परंतु देखा नहीं, वह पीढ़ी भी अन्ना हजारे के इस आमरण अनशन को देखकर यह कल्पना करने लगी है कि वास्तव में महात्मा गांधी भी अहिंसा का दामन थाम कर इसी प्रकार अंग्रेजों से भी अपनी बातें मनवाते रहे होंगे।

हिंसा का सिध्दांत यही होता है कि किसी को मार कर, किसी का घर जलाकर या किसी की बस्ती उजाड़ कर अपनी बातें मनवाने का प्रयास किया जाए। इस देश में इस विचारधारा के समर्थक भी कांफी सक्रिय हैं तथा यही लोग महात्मा गांधी को कोसते भी रहते हैं। दूसरी ओर अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अपनी मांग पूरी करवाने का एकमात्र गांधीवादी तरींका यही होता है कि आमरण अनशन,सांकेतिक भूख हड़ताल, क्रमिक अनशन या उपवास आदि रखकर तथा स्वयं दु:ख उठाकर व अपनी जान को खतरे में डालकर अपनी जाया मांगों को पूरा करवाने हेतु सत्ता केंद्र को अपने घुटने टेकने के लिए मजबूर किया जाए। जैसाकि अन्ना हजारे व उनके समर्पित साथियों ने कर दिखाया है। अन्ना हजारे के इस बलिदानपूर्ण कदम ने जहां भ्रष्टाचार के विरुध्द संघर्ष करने में अपना परचम बुलंद किया है वहीं जंतरमंतर पर किए गए उनके आमरण अनशन ने देश को एक बार फिर महात्मा गांधी की याद ताजा कर दी है। निश्चित रूप से देश को अन्ना हजारे जैसे एक-दो नहीं हजारों अन्ना हजारे चाहिए जो समय-समय पर गांधी दर्शन को जीवित रख सकें तथा समय पड़ने पर इसी प्रकार सरकार को सचेत करते रहें।

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3 Comments on "जंतर मंतर पर फिर हुई ‘गांधीवाद की जय’"

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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
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लेख में अनेख बातें संजीदगी सा उठाई गयी हैं.
शुभाकांक्षी
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

शैलेन्‍द्र कुमार
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“सवाल यह उठता है कि जब केंद्र में मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार व योग्य व्यक्ति के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार शासन कर रही हो”
चमचागिरी है जो जाती नहीं

Shailendra Saxena"Adhyatm"
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Shailendra Saxena"Adhyatm"

Tanveer ji,
jai mai ki.
Aapke lekh ko padhkar feel good hua. Mera salaam kubul karen.
Shailendra Saxena”Aadhyatm”
Ganj Basoda.M.P.

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