लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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कई दिन से शर्मा जी के दर्शन नहीं हो रहे थे। अतः कल मैं उनके घर चला गया; पर वे वहां भी नहीं थे। भाभी जी से पूछा, तो गुस्से में बोली, ‘‘सुबह से ‘मोदी लैन’ में लगे हैं।’’

– ये मोदी लैन क्या चीज है भाभी जी ?

– वर्मा जी, आप किस दुनिया में रहते हैं। आजकल तो हर कोई ‘मोदी लैन’ में लगा है।

– भाभी जी, पहेलियों की जलेबी न बनाकर ठीक बात बताइये। जब से जेब खाली हुई है, तबसे दिमाग भी खाली जैसा हो गया है।

– बिल्कुल ठीक। यहां भी तो यही हाल है। आपके शर्मा जी पैसे निकालने के लिए कभी बैंक जाते हैं, तो कभी ए.टी.एम.। वहां हनुमान जी की पूंछ जैसी अंतहीन लाइनें लगी हैं। उसका नाम ही आपके शर्मा जी ने ‘मोदी लैन’ रख दिया है।

इतने में ही शर्मा जी आ गये। उनके चेहरे से लग रहा था, मानो एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी करके लौटे हों। मैडम जी ने चाय का पानी चढ़ा दिया। जितनी देर में चाय तैयार हुई, शर्मा जी ने अपनी कमर सीधी कर ली।

– शर्मा जी, कुछ पैसे मिले ?

– हां वर्मा, तीन घंटे ‘मोदी लैन’ में लगने के बाद 1,500 रु. निकाल कर लाया हूं। कल किस्मत इतनी अच्छी नहीं थी।

– क्यों ?

– क्यों क्या, चार घंटे बाद जब ए.टी.एम. देवता के दर्शन हुए, तो उन्होंने अंगूठा दिखा दिया। सरदी में खड़े-खड़े मेरी टांगे ही अकड़ गयीं। ये तो गनीमत हुई कि गुप्ता जी अपनी गाड़ी से मुझे घर तक छोड़ गये। वरना शायद वहीं दिल का दौरा पड़ जाता, तो तुम इस समय शमशान घाट पर मुझे श्रद्धांजलि दे रहे होते।

– राम-राम शर्मा जी, शमशान जाएं आपके दुश्मन।

– भइया, दुश्मन हों या दोस्त; पर मोदी का ये कदम आम जनता को तो बड़ा भारी पड़ रहा है।

– लेकिन लोग कह रहे हैं कि इससे भविष्य में बड़ा लाभ होगा ?

– भविष्य में जब होगा, तब देखेंगे; पर आज तो ‘मोदी लैन’में खड़े-खड़े टांगे टूट रही हैं।

– लोग कह रहे हैं कि नेताओं के घरों में जो बड़े नोट भरे पड़े थे, उन्हें अब रद्दी वाले भी लेने को तैयार नहीं है ? मोदी के इस मास्टर स्ट्रोक के बाद कई नेताओं के चेहरे की पॉलिश ऐसे उतरी है, जैसे कपड़े पर चढ़ा कच्चा रंग। इसीलिए वे अंट-संट बक भी रहे हैं।

– वर्मा जी, बड़े लोगों की बात बड़े लोग जानें। लोग कहते हैं कि बहुत सारा काला धन नेताओं के पास है। इस नोटबंदी का लाभ तो तब होगा, जब आगे आने वाले चुनावों में खर्चा कम हो। काले धन का दूसरा ठिकाना रियल एस्टेट में माना जाता है। यदि चार-छह महीने बाद मकान सस्ते हो जाएं, जिससे गरीब आदमी भी अपने सिर पर एक अदद छत डाल सके, तो मैं चौराहे पर जाकर ‘मोदी जिन्दाबाद’ के नारे लगाऊंगा। लेकिन आज तो मोदी ने पूरे देश को लाइन में लगा दिया है। हम और आप तो राशन, मिट्टी का तेल, बिजली और पानी के बिल के लिए कई बार घंटों तक लाइनों में खड़े हुए हैं; पर इंटरनेट युग वाली नयी पीढ़ी ने तो ऐसी लाइनें कभी नहीं देखीं। जिनके पास काला धन है, उन्हें सजा कैसे और कब मिलेगी, यह तो मोदी जाने; पर हमें लाइन में खड़े होने की सजा क्यों दी जा रही है ?

शर्मा जी चाय पीकर फिर लेट गये। वापस लौटते हुए मुझे एक मजाकिया गीत याद आया, जो हम बचपन में गाते थे।

चल चमेली बाग में, मेवा खिलाएंगे।

मेवे की डाली टूट गयी, माली बुलाएंगे।

माली की चद्दर फट गयी, दरजी बुलाएंगे।

दरजी की सुई टूट गयी, लोहार बुलाएंगे..।

यह गीत काफी लम्बा चलता था। अपनी कल्पना के अनुसार इसमें नये-नये नाम जुड़ते चले जाते थे। कई बार हम इसमें अपने अध्यापकों के नाम भी जोड़ देते थे। शर्मा जी की बात सुनकर मुझे नये संदर्भों में एक बार फिर ये गीत याद आ गया; पर आज मैं इसे इस तरह गाना चाहूंगा।

चल चमेली लैन में पैसे दिलाएंगे।

पैसे नहीं मिल पाए तो चुप्पी लगाएंगे।

ठीक भी तो है। बचपन में तो हम कभी दरजी और कभी लोहार को बुला लेते थे; पर आज का बड़ा प्रश्न ये है कि अपने ही पैसे के लिए, काम-धंधा छोड़कर, कई घंटे ‘मोदी लैन’ में लगने के बाद जब ए.टी.एम. की स्क्रीन घोषणा कर देती है, ‘‘क्षमा करें, कैश खत्म हो गया है”, तो हम किसे बुलाएं ? बैंक मैनेजर को, उर्जित पटेल को, अरुण जेतली को या फिर नरेन्द्र मोदी को ?

– विजय कुमार,

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