लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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haridwar

यों तो हमारे कार्यालय में हर शनिवार और रविवार को छुट्टी रहती है; पर कभी-कभी शुक्रवार या सोमवार को कोई पर्व या जयंती भी आ जाती है। ऐसे में केन्द्रीय कर्मचारियों की चांदी हो जाती है। आप तो जानते ही हैं कि भारत छुट्टी प्रिय देश है। साल में डेढ़ सौ दिन तो छुट्टी होती ही है। बाकी दिनों में भी ‘हम भारत के लोग’ कितना काम करते हैं, इसे कौन नहीं जानता।

पिछले महीने भी ऐसा ही हुआ। काफी समय से सब घर वाले हरिद्वार की रट लगाये थे। सोमवार को किसी की जयंती थी। मैंने शुक्रवार की छुट्टी और ले ली। इस तरह चार दिन का समय निकाल कर सब लोग हरिद्वार चल दिये। हरिद्वार और गंगा मां के प्रति हमारे पूरे परिवार में अतीव श्रद्धा है। साल में किसी न किसी बहाने से कम से कम दो बार तो हम वहां हो ही आते हैं। कनखल में हमारे पुराने परिचित स्वामी धर्मानंद जी का आश्रम है। भोजन और आवास की वहां ठीकठाक व्यवस्था है, अतः हम लोग वहीं रुकते हैं। वे भी दिल्ली हमारे घर आते रहते हैं। हमारे आने के समाचार से वे भी बड़े प्रसन्न हुए।

यात्रा में अपनी गाड़ी हो, तो बड़ा आराम रहता है। जब चाहे तब चलो और जहां चाहो वहां रुको। दिल्ली से हरिद्वार के रास्ते में ही मेरठ है, जहां शास्त्री नगर में मेरा अभिन्न मित्र सुरेश रहता है। यद्यपि दिल्ली में उसके कई रिश्तेदार हैं; लेकिन यहां आने पर वो मेरे ही घर ठहरता है। हम भी हरिद्वार जाते समय उसके घर अवश्य रुकते हैं। इस प्रकार ये मित्रता पूरे परिवार की हो गयी है।

समय पर्याप्त था, अतः योजना यह बनी कि शुक्रवार की शाम को चलकर रात को मेरठ रुकेंगे और अगले दिन सुबह मेरठ से चलकर दोपहर तक हरिद्वार पहुंच जाएंगे। फिर दो दिन हरिद्वार रहकर सोमवार को वापस दिल्ली आ जाएंगे। इस हिसाब से सब तैयारी हो गयी। मैंने अपना लैपटाॅप रखा, तो बच्चों ने अपने लूडो और कैरम। मांजी ने अपनी गरम पानी की बोतल के साथ वह पुरानी पूजा सामग्री भी रख ली, जो उन्हें गंगाजी में विसर्जित करनी थी। वे हर पूर्णिमा और अमावस्या को घर में हवन करती हैं और पवित्र राख को गंगाजी में विसर्जित कर देती हैं। श्रीमती जी ने रास्ते के लिए कुछ खानपान की सामग्री बना ली। सब काम योजनानुसार हुआ और हम रात होने से पहले ही मेरठ पहुंच गये।

मेरठ पहुंचे, तो बाकी सब लोग तो घर पर थे; लेकिन सुरेश नहीं था। पता लगा कि उनके मोहल्ले के सेठ नंदलाल का निधन हो गया। अतः वो शमशान तक गया है। हमने जब तक चाय पी, तब तक वह आ गया। स्नान के बाद उसने भी चाय पी, और फिर गपशप होने लगी। मैंने पूछा, तो उसने सेठ नंदलाल के जीवन के उतार-चढ़ाव की बड़ी रोचक कथा सुनाई।

सेठ नंदलाल उर्फ नंदू का जन्म भारत के उस भाग में हुआ था, जिसे अब बलूचिस्तान कहते हैं। इन दिनों वह पाकिस्तान का हिस्सा है। वहां उसके पिता मोतीराम का अपना ट्रक था। वे उससे लोगों का सामान इधर से उधर पहुंचाते थे। छुट्टियों में नंदू भी उनके साथ चला जाता था। इस तरह वह भी काफी घूम लिया था। इस भ्रमण की बातें अपने साथियों को बताकर वह उन पर प्रायः रौब भी गांठता था।

इस भ्रमण में उसकी रुचि का एक कारण और भी था। उसकी मां सीता शुद्ध शाकाहारी थी। उनकी रसोई में अंडे का भी प्रवेश नहीं था, जबकि मोतीराम को मांस से भी कोई परहेज नहीं था। अपना यह शौक वह घर से बाहर पूरा कर लेता था। उन दिनों बच्चे यह समझते थे अंडे खाने से शरीर में ताकत आती है। अतः ट्रक पर चलते समय नंदू भी अंडे खा लेता था। यद्यपि मां ने उसे अपने सिर पर हाथ रखकर मांस नहीं खाने की कसम दिलायी थी। अतः वह इससे दूर ही रहता था।

ट्रक वालों का जीवन बहुत अस्त-व्यस्त होता है। रात में सड़कें नापना और दिन में कहीं किनारे पर गाड़ी लगाकर खाना, पीना और सोना; पर नंदू तो बच्चा था। वह नींद आने पर गाड़ी में ही सो जाता था। चलती गाड़ी की छत पर बैठकर पीछे छूटते हुए पेड़ गिनने में उसे बहुत मजा आता था। उस समय वह खुद को किसी राजा से कम नहीं समझता था। जब गाड़ी कहीं खड़ी होती, तो वह चालक की सीट पर बैठकर कभी गियरों को हिलाता, तो कभी स्टियरिंग को। वह सोचता था कि बड़े होकर वह भी इसी तरह ट्रक से दूर-दूर तक घूमेगा।

लेकिन 1947 में देश बंट गया। तब नंदू 15 साल का था। मोतीराम के अपने पड़ोसी बलोच मुसलमानों से अच्छे सम्बन्ध थे। सब एक दूसरे के सुख-दुख में बराबर सहभागी होते थे। इसी कारण 10-15 दिन तक लगातार बाहर रहने पर भी उसे कभी घर की चिन्ता नहीं होती थी। उन दिनों टेलिफोन तो थे नहीं। आते-जाते ट्रक वालों से, या फिर वापस आने पर ही सबको एक दूसरे के हाल समाचार मिलते थे।

बलोच नेता बादशाह खान भारत के साथ या फिर अलग देश के रूप में रहना चाहते थे। वे पाकिस्तान में मिलने के विरुद्ध थे। पंजाबी मुसलमानों के लिए उनके मन में बहुत घृणा थी; पर नेहरू सत्ता के भूखे हो रहे थे। वे चाहते थे कि जैसी और जितनी भी मिले, पर उन्हें भारत की गद्दी मिल जाए। उन्होंने कहा कि बलोचिस्तान बहुत दूर है। बीच में पूरा पाकिस्तान होगा। ऐसे में दिल्ली से हम उसका शासन कैसे करेंगे ? वे भूल गये कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच की दूरी भी हजारों मील है; पर जिन्ना ने कभी इसकी चिन्ता नहीं की।

बादशाह खान ने गांधी जी से भी कहा कि आप हमें भूखे भेडि़यों के आगे मत डालो; पर पता नहीं उनकी क्या कमजोरी थी कि वे नेहरू के आगे बोल नहीं पाते थे। परिणाम यह हुआ कि भारी विरोध के बावजूद बलोचिस्तान को पाकिस्तान में मिला दिया गया। यह घोषणा होते ही वहां भी हिन्दुओं के विरुद्ध मारकाट और लूटपाट शुरू हो गयी। लोग अपने घर, खेत और दुकानें छोड़कर भारत की ओर भागने लगे।

मोतीराम के गांव वाले उसे बिना किसी डर के वहीं रहने को कह रहे थे; पर पिछले कुछ साल से वह आसपास का जो माहौल देख रहा था, उससे वह भयभीत था। पंजाब में लीगी गुंडों का उत्पात सबसे अधिक था। यात्रा के दौरान मोतीराम भी कई बार उनके फंदे में फंसा; पर अच्छी पंजाबी जानने के कारण वह बच निकलता था। मोतीराम को लगता था कि आज भले ही उसके गांव वाले मीठी-मीठी बातें कर रहे हैं; पर कुछ दिन बाद ये भी अपनी असलियत पर उतर आएंगे। इसलिए जितना जल्दी हो, यहां से चल देने में ही भलाई है। सीता को भी नंदू और उसकी दोनों बहिनों की चिंता थी।

लेकिन दो साल पहले ही मोतीराम ने नया ट्रक लिया था। उनकी कुल जमा पूंजी यही ट्रक था। वह इसे छोड़ना नहीं चाहता था। कई दिन इसी असमंजस में बीत गये; पर एक दिन उसके पड़ोस के गांव में भी कुछ हिन्दुओं के घर लूट लिये गये। सब पुरुषों की हत्या कर लड़कियों को उठा लिया गया। यह सुनकर मोतीराम ने अपने ट्रक से ही भारत जाने का निर्णय कर लिया। उसने घर का जरूरी सामान और पैट्रोल के कई केन ट्रक में रख लिये, जिससे रास्ते में यदि तेल न मिले, तो परेशानी न हो।

मोतीलाल के ट्रक पर पिछले कई साल से उसी गांव का सलीम सहायक का काम करता था। वह भी उसके साथ ही यात्रा में जाता था। सलीम का बाप रहमान जंगल से लकड़ी काटकर बेचता था; पर उससे दस प्राणियों वाले परिवार का पेट नहीं भरता था। अतः उसने सलीम को मोतीराम के साथ लगा दिया। सलीम भी मोतीराम को चाचा कहता था। जितने दिन वह ट्रक पर रहता, उतने दिन खाना-पीना मोतीराम के साथ ही होता था। इसके साथ ही मोतीराम उसे 50 रु. महीना और देता था। इस तरह 15 साल का होते तक वह भी कमाऊ प्राणी बन गया।

मोतीराम ने रहमान को शाम को ही बता दिया कि कल सुबह पौ फटते ही वे चल देंगे। रहमान की सलाह पर उसने घरेलू सामान को छिपाने के लिए ट्रक के पिछले हिस्से में लकडि़यां भर लीं। इससे वह लकड़ी ढोने वाला सामान्य ट्रक जैसा लगने लगा। सुबह होने से पहले ही रहमान का पूरा परिवार भी वहां आ गया। मोतीराम ने घर में ताला लगाया और चाबी रहमान को देकर कहा, ‘‘अच्छा भाई, अब चलते हैं। यदि भगवान ने चाहा, तो फिर मिलेंगे। इस घर का तुम ध्यान रखना। यदि हम कभी लौटे, तो देखा जाएगा; वरना सलीम की शादी के बाद बहू को मुंह दिखाई में हमारी तरफ से ये मकान दे देना।’’

रहमान ने मोतीराम को गले से लगा लिया, ‘‘ऐसा मत कहो भाई। खुदा ने चाहा, तो साल दो साल में माहौल ठीक हो जाएगा। तब आप लौटकर अपने इस घर में ही रहना। मेरे रहते कोई इस पर कब्जा नहीं कर सकेगा, ये एक पठान का वादा है।’’

सीता और रहमान की बीवी भी गले लिपट कर रो पड़ीं। दोनों अपनी चुनरी से एक-दूसरे के आंसू पोंछतीं, पर आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मोतीराम ने फिर कहा, ‘‘एक प्रार्थना और है। इस घर में एक छोटा सा मंदिर है। हो सके, तो सुबह शाम वहां दीपक जरूर जला देना। भगवान भोलेनाथ तुम्हारा सदा भला करेंगे।’’

रहमान के पास एक पुरानी बंदूक थी। उसने कारतूस की एक पेटी और बंदूक मोतीराम को देकर कहा, ‘‘इसे रख लो, शायद रास्ते में इसकी जरूरत पड़ जाए।’’ नंदू और सलीम भी गले मिले। नंदू ने अपनी उंगली में पहनी तांबे की अंगूठी सलीम को दी, तो सलीम ने अपनी गोटेदार बलोच टोपी उसे पहना दी। नंदू की छोटी बहिनें अभी नींद में ही थीं। उन्हें सीता ने ट्रक में ही लिटा दिया। सबके बैठते ही मोतीराम ने वाहे गुरु की फतेह बुलाई और धूल उड़ाता हुआ ट्रक एक अनजान यात्रा पर चल दिया। सीता की आंखों से लगातार गंगा-यमुना बह रही थीं। वह बार-बार मुड़कर उस घर को देख रही थी, जो अब सदा के लिए पराया होने जा रहा था।

मोतीराम के लिए सारे रास्ते जाने-पहचाने थे। उसने, सीता और नंदू ने कपड़ों के नीचे कृपाणें बांध रखी थीं। दो अतिरिक्त तलवार और रहमान वाली बंदूक भी अब साथ में थी। फिर भी खतरा तो बना ही हुआ था। उसका विचार था कि एक बार भारत की सीमा में पहुंच जाएं, तो फिर आगे की बात सोचेंगे। उसे खुद पर और अपने ट्रक पर पूरा विश्वास था। इसलिए वह लगातार बिना थके गाड़ी चलाता रहा। दोपहर में एक जंगल में रुक कर उसने कुछ आराम किया। उसकी पत्नी ने लकड़ी बटोर कर खाना बनाया। सबने कुछ खाया और बाकी रात के लिए रख लिया। भगवान का नाम लेकर सब फिर चल दिये। जो रास्ते बंद मिलते, उन्हें छोड़कर वे किसी दूसरी तरफ से आगे बढ़ने की कोशिश करते। इस तरह दो दिन बीत गये।

तीसरे दिन वे जम्मू-कश्मीर की सीमा में पहुंच गये। चारों तरफ हरे-भरे जंगल, ऊंचे पहाड़ और नीचे गहरी घाटियां। नंदू अपनी मस्ती में ट्रक की छत पर जाकर बैठ गया। यद्यपि मां ने उसे बहुत मना किया, पर वह माना नहीं। भीषण थकान के बावजूद मोतीराम लगातार ट्रक चला रहा था। वह हर हाल में आज किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाना चाहता था। उसने सीता से कहा कि वह लगातार उससे बात करती रहे, जिससे उसे नींद न आये; लेकिन इतना होने पर भी चारों ओर से आ रही सुगंधित और शीतल हवा के कारण अचानक उसकी आंख झपक गयी और ट्रक एक गहरे खड्ड में लुढ़क गया।

लुढ़कते ही ट्रक को एक भारी झटका लगा। उस झटके ने छत पर बैठे नंदू को पास की पहाड़ी पर पटक दिया। वह इस झटके से बेहोश हो गया; पर बाकी लोग ट्रक के साथ ही गिरते चले गये। इससे ट्रक की टंकी फट गयी और उसमें आग लग गयी। ट्रक में पैट्रोल के कई केन भी थे, वे भी लुढ़कने से टूट गये। कोढ़ में खाज की तरह ट्रक में लकड़ी भी लदी थी। कुछ ही देर में पूरा ट्रक धूं-धूं कर जलने लगा। मोतीराम, सीता और दोनों बच्चियों ने निकलने का प्रयास जरूर किया होगा। वे चिल्लाये भी होंगे; पर घने जंगल में उनकी चीख पुकार कौन सुनता, और कुछ ही देर में उन सबकी अंतिम क्रिया हो गयी।

कई घंटे बाद जब नंदू को होश आया, तो वहां लोगों की भीड़ जमा थी। ट्रक अभी तक जल रहा था। यह देखकर नंदू के मुंह से एक चीख निकली और वह फिर बेहोश हो गया। होश आने पर उसने खुद को एक अस्पताल में पाया। हुआ यों कि कुछ देर बाद वहां से सैनिकों का एक काफिला निकला। लोगों ने बेहोश नंदू को उनके साथ कर दिया और इस प्रकार वह जम्मू के सैन्य अस्पताल में पहुंच गया। मोतीराम सुखी और शांत जीवन की आशा में भारत की ओर चला था; पर उसे क्या पता था कि उनके जीवन का अंत इस दुखद तरीके से होगा।

धीरे-धीरे कई दिन बीत गये। 15 साल का नंदू इस दुनिया में अकेला रह गया। उसे कोई शारीरिक रोग तो था नहीं; पर उसके दिल और दिमाग को जो झटका लगा था, वह उससे उबर नहीं पा रहा था। वह प्रायः चुप रहता। हंसना और मुस्कुराना उसने मानो छोड़ ही दिया था। यों तो वह पहाड़ी प्रदेश का रहने वाला था। लोकगीत गाते हुए पहाड़ों की सर्पीली घुमावदार सड़कों पर घूमना उसे अच्छा लगता था; पर इस दुर्घटना के कारण अब उसे पहाड़ों से डर लगने लगा। पाकिस्तान से और भी हजारों लोग इधर आये थे। उन्हें जम्मू क्षेत्र में बसाया जा रहा था। इस काम में लगे अधिकारियों ने नंदू से भी इस बारे में पूछा; पर वह अब उन पहाड़ों से घृणा करने लगा था, जिसने उसके माता-पिता और दो छोटी बहिनों के प्राण ले लिये थे।

कुछ दिन बाद सेना के कुछ जवान मेरठ छावनी जा रहे थे। उन्होंने नंदू से पूछा, तो वह साथ चलने को तैयार हो गया और इस प्रकार वह मेरठ आ गया। मेरठ से बड़ी संख्या में मुसलमान पाकिस्तान गये थे। जैसे हिन्दू लोग वहां अपने घर छोड़कर आये थे, ऐसे ही मुसलमानों के भी सैकड़ों मकान और दुकानें यहां खाली थीं। उन्हें उधर से आये हिन्दुओं को दिया जा रहा था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आर्य समाज, हिन्दू महासभा आदि इसमें शासन का सहयोग कर रहे थे। जितना बड़ा परिवार, उतना बड़ा मकान। आने वालों को उनके अनुभव, आयु और योग्यता के अनुसार कुछ काम मिल जाए, इसका प्रयास भी वे संस्थाएं कर रही थीं, जिससे वे स्वाभिमान से जीवनयापन कर सकें।

नंदू चूंकि अकेला था, इसलिए एक कमरा उसे भी मिल गया। काम के नाम पर उसे ट्रक में घूमने के अलावा कुछ आता नहीं था। यों तो वह उस समय आठवीं में पढ़ रहा था, पर अब उसकी पढ़ाई में भी रुचि नहीं थी। हिन्दू संस्थाओं ने उसे कचहरी रोड पर सुंदर चाय वाले की दुकान पर रखवा दिया। वह दिन भर वहां रहता, वहीं खाता-पीता और रात को अपने कमरे पर आकर सो जाता।

सुंदर पास के किसी गांव में रहता था। नंदू के होने से उसे भी बहुत लाभ हुआ। अब वह चाय के साथ परांठे और सब्जी भी रखने लगा। इससे उसकी बिक्री दोगुनी हो गयी। नंदू परिश्रमी और ईमानदार तो था ही। सुंदर की अनुपस्थिति में पैसे भी वही लेता था; पर कभी उसके हाथ से कोई गड़बड़ नहीं हुई।

धीरे-धीरे पांच साल बीत गये। नंदू अब 20 साल का गबरु जवान हो चुका था। परिवार की मृत्यु का दुख भी वह काफी कुछ भूल चुका था। सुंदर की एक ही लड़की थी रेखा। वह अब 18 साल की हो गयी थी। दो साल पहले उसने आठवीं उत्तीर्ण कर पढ़ाई छोड़ दी थी। दुकान पर दोपहर का खाना देने कभी सुंदर की पत्नी आती थी, तो कभी रेखा। नंदू का उन सबसे अच्छा परिचय हो गया था। अपनी पत्नी और आसपास वालों की सलाह पर सुंदर ने नंदू से ही अपनी बेटी का विवाह कर दिया। अब नंदू नौकर न रहकर दुकान का मालिक हो गया। उसकी भाषा-बोली पर भी मेरठ का रंग पूरी तरह चढ़ चुका था। उसे बोलते देख कोई नहीं कह सकता था कि वह बलूचिस्तान का मूल निवासी है। यों तो जिस कमरे में वह रहता था, वह उसे ही आवंटित किया जा चुका था; पर विवाह के बाद उसे बेचकर वह सुंदर के घर पर ही रहने लगा। इस प्रकार उसके जीवन में स्थिरता आ गयी।

लेकिन चाय की यह दुकान नंदू की आंकाक्षाओं को पूरा नहीं करती थी। उसके सामने से जब कोई ट्रक निकलता, तो उसकी आंखें चैड़ी हो जाती थीं। बालपन से ही वह ट्रक पर दूर तक घूमने के सपने देखता था; पर नियति ने उसे चाय की दुकान पर बैठा दिया। विवाह के बाद उसकी वह आकांक्षा फिर जाग उठी। उसने अपने ससुर से बात की। उनके पास गांव में कुछ जमीन थी। उसमें से कुछ बेचने का निर्णय हुआ। पिछले पांच साल में कुछ पैसा नंदू ने भी जमा कर लिया था। कुछ पैसा बाजार से और कुछ बैंक से उधार लेकर एक पुराना ट्रक ले लिया गया। कुछ ही दिन में उसे चलाने का लाइसेंस भी मिल गया और इस प्रकार नंदू के जीवन की गाड़ी फिर से सड़कों पर दौड़ने लगी।

अगले दस साल में नंदू के जीवन में कई मोड़ आये। उसके घर में दो बेटे और एक बेटी का आगमन हुआ। उसने पुराना ट्रक बेचकर नया ले लिया। मकान पर दूसरी मंजिल बनाकर उसे किराये पर उठा दिया। ससुर के देहांत के बाद दुकान भी किराये पर दे दी गयी। आर्थिक स्थिति सुधरने से एक परिवर्तन यह भी हुआ कि लोग उसे नंदू की बजाय नंदलाल कहने लगे।

कहते हैं कि सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। नंदू इन दोनों का अनुभव पहले भी कर चुका था; पर भगवान शायद उसे एक बार फिर ऐसा दृश्य दिखाना चाहते थे।

एक बार नंदू काम से लौटकर घर के पास ट्रक खड़ा कर रहा था। पड़ोस के बच्चे भी वहां खेल रहे थे। अचानक बच्चों की गेंद ट्रक के पीछे चली गयी। उसे उठाने एक लड़का रामू दौड़ा और वह पिछले पहिये से टकरा गया। चीख सुनकर नंदू का ध्यान उधर गया, पर तब तक तो रामू ट्रक के नीचे आ चुका था।

पूरे मोहल्ले में हाय-तौबा मच गयी। रामू के घर वाले थे तो पड़ोसी; पर इस दुर्घटना से वे बौखला गये। नंदू की सास और रेखा ने उन्हें बहुत समझाया कि रामू तो हमारे बच्चे जैसा ही है। वह और हमारे बच्चे साथ-साथ ही खेलते हैं। इस दुर्घटना में नंदू का दोष नहीं है, वह तो सदा यहां पर ही ट्रक खड़ा करता है। शायद होनी बलवान थी, इसलिए ऐसा हो गया। उन्होंने यह भी कहा कि रामू के इलाज का पूरा खर्च वे उठा लेंगे; पर रामू के माता-पिता किसी भी तरह राजी नहीं हुए। वे सम्पन्न भी थे और गांव में प्रभावी भी। उन्होंने पुलिस बुला ली। नंदू के विरुद्ध केस दर्ज हो गया और उसे थाने में बंद कर दिया गया।

उधर रामू को अस्पताल ले जाया गया। उसकी टांगें बुरी तरह कुचली जा चुकी थीं। जहर तेजी से ऊपर की ओर फैल रहा था। उसके जीवन को संकट में देखकर डाॅक्टरों ने घुटनों के पास से दोनों टांगें काट दीं। रामू की मां तो यह सुनते ही बेहोश हो गयी। पिता की हालत भी अच्छी नहीं थी। अगले दिन नंदू को न्यायालय में प्रस्तुत कर जेल भेज दिया गया। वहां से दो महीने बाद उसकी जमानत तो हो गयी; पर उसका लाइसेंस जब्त कर लिया गया। पुलिस ने ट्रक भी थाने में ही खड़ा कर लिया।

नंदू के जीवन में यह दूसरा बड़ा झटका था। दो साल तक मुकदमा चला और फिर उसेे पांच साल की जेल हो गयी। रामू के घर वाले तो और अधिक सजा दिलवाना चाहते थे। उन्होंने सरकारी वकील के साथ कई बड़े वकील और भी खड़े कर दिये। पानी की तरह पैसा भी फूंका। उन्होंने यह कहा कि नंदू का हमारे परिवार से पुराना झगड़ा है। इसलिए उसने जानबूझ कर रामू को कुचला है; पर कोई मोहल्ले वाला इसके पक्ष में गवाही देने को तैयार नहीं हुआ। अतः जज ने इसे नहीं माना।

नंदू के कई शुभचिंतकों का विचार था कि उसे उच्च न्यायालय में जाना चाहिए। उसने बच्चे को जानबूझ कर नहीं कुचला था; पर वह नहीं माना। मुकदमे के चक्कर में दुकान बिक चुकी थी। वह अब घर को भी बेचना नहीं चाहता था, अतः चुपचाप जेल चला गया। जेल जीवन के दौरान ही मांजी का निधन हो गया। पांच साल बाद जब वह छूटा, तो उसके स्वभाव में बड़ा परिवर्तन आ गया। जब भी वह बैसाखियों के सहारे चलते हुए रामू को देखता, उसकी आंखों से आंसू फूट पड़ते। वह अपराधी नहीं था, फिर भी उसके मन में अपराध बोध जड़ जमाकर बैठ गया। रामू के अंधकारमय जीवन का दोषी वह स्वयं को ही मानने लगा। इससे वह अवसाद का शिकार हो गया। एक समय वह दिन-रात परिश्रम करता था; पर अब उसका किसी काम में मन नहीं लगता था। सात साल तक थाने में खड़ा रहने से ट्रक भी बर्बाद हो चुका था। नंदू ने उसे कबाड़ के दाम पर ही बेच दिया।

इस बीच घर का सारा बोझ रेखा पर आ गया। वह बड़ी साहसी महिला थी। उसने हिम्मत नहीं हारी। मकान की ऊपरी मंजिल तो किराये पर थी ही। अब नीचे का अधिकांश भाग भी किराये पर उठा दिया गया। मकान मालिक होकर भी वे एक कमरे में रहने लगे। एक कोने में चूल्हा लगा दिया, तो दूसरे में बिस्तर। रेखा आसपास के कुछ छोटे बच्चों को घर पर ट्यूशन पढ़ाने के लिए बुलाने लगी। अपने बच्चों को भी निजी विद्यालय से निकाल कर सरकारी स्कूल में डाल दिया गया। बच्चे भी समझदार थे। घरेलू परिस्थिति देखकर उन्होंने भी मुंह सिल लिये। उनके साथ के बच्चे आधी छुट्टी में बाहर जाकर खाते और खेलते थे; पर वे अपनी कक्षा में ही बैठे रहते थे। अपनी बालसुलभ चंचलताओं पर उन्होंने मानो ताला लगा दिया था।

नंदू की दिनचर्या भी इन दिनों अजीब प्रकार की थी। वह सुबह नौ बजे घर से नाश्ता करके निकल जाता और दिन भर बाजार में यहां-वहां बैठकर रात को ही घर लौटता था। रात को खाना खाकर वह सोता, तो फिर सुबह ही उठता था। उसे न किसी से शिकवा था और न शिकायत। घर में भी वह बहुत कम बोलता था। बाजार में कई लोगों ने उसे अपने यहां काम पर रखना चाहा। रेखा ने भी इसके लिए आग्रह किया; पर नंदू तैयार नहीं हुआ। उसके जीवन से उत्साह मानो समाप्त ही हो गया था।

इसी तरह पांच साल और बीत गये। रेखा पेट पर पट्टी बांधकर काम में लगी रही। सोने से पूर्व जब वह सीताराम की जुगल जोड़ी के आगे हाथ जोड़ती, तो उसे लगता था कि कोई अदृश्य शक्ति उसे आशीर्वाद दे रही है। उसे विश्वास था कि भगवान के दरबार में देर भले ही हो, पर अंधेर नहीं है। आज नहीं तो कल, उसके दिन भी जरूर बदलेंगे।

इस दौरान मेरठ विकास प्राधिकरण ने उनके गांव की दिशा में नगर विस्तार की योजना बनाकर कई किलोमीटर का क्षेत्र अधिग्रहित कर लिया। रात-दिन काम होने लगा। सड़क, पार्क, बाजार, पानी की टंकी, स्कूल, सिनेमा, मंदिर, सामुदायिक भवन आदि बनने से अगले दो साल में उस क्षेत्र का चेहरा बदल गया। कच्चे मकान और गंदी नालियों की जगह एक बड़ी कालोनी ‘शास्त्री नगर’ बन गयी। गांव में जिन लोगों के पास अपनी जमीनें थीं, उन्हें उसी अनुपात में मकान और नवनिर्मित बाजार में दुकानें मिलीं। रेखा के हिस्से में भी तीन कमरे वाला मकान और बाजार में एक मौके की दुकान आ गयी।

रेखा ने इस अवसर का लाभ उठाया। उसने अपनी दुकान में ‘रेखा साड़ी भंडार’ के नाम से काम शुरू कर दिया। बाजार में नंदू और रेखा के प्रति लोगों में सहानुभूति तो थी ही। अतः उन्हें माल भी उधार मिल गया। अब तक उसके दोनों लड़के भी बड़े हो चुके थे। वे समझदार भी थे और संस्कारी भी। रेखा ने उन्हें दुकान पर ही बैठा दिया। उनके परिश्रम से दो साल में ही दुकान चमक गयी। बड़े लड़के का दिमाग खूब चलता था। वह दिल्ली, मुंबई और अमदाबाद से भी साडि़यां लाने लगा। पहले तो आसपास के गांव की महिलाएं ही दुकान पर आती थीं; पर नये फैशन के माल के कारण धीरे-धीरे शहर भर में ‘रेखा साड़ी भंडार’ का नाम हो गया। दूर-दूर से लोग आने लगे। ग्राहक प्रायः महिलाएं ही होती थीं, अतः दो लड़कियां भी काम पर रखनी पड़ीं।

रेखा को लगता था कि भगवान ने उसकी प्रार्थना सुन ली है। अब नंदू भी बाजार में इधर-उधर घूमने की बजाय अपनी दुकान पर ही आकर बैठने लगा। यद्यपि दुकान के काम में वह कोई रुचि नहीं लेता था; पर उसकी उपस्थिति तो थी ही। दोपहर में रेखा घर चली जाती थी। दोनों लड़के भी कई बार दुकान पर नहीं होते थे। ऐसे में नंदू के रहने से कर्मचारी अनुशासित रहते थे।

इस सारे घटनाक्रम को आज 20 साल हो गये हैं। परिवार की गाड़ी लगातार उन्नति के पथ पर अग्रसर है। ठीक समय पर दोनों बेटों और फिर बेटी का विवाह भी हो गया। बाजार में उनकी दुकान के सामने ही एक दुकान बिक रही थी। रेखा ने उसे लेकर वहां परदों का काम शुरू कर दिया। इस प्रकार दोनों बेटों के काम अलग-अलग हो गये। बेटों के परिवार बढ़ने से तीन कमरे कम पड़ने लगे, तो छोटे बेटे के लिए एक दूसरा मकान ले लिया गया। इस प्रकार रेखा ने अपनी आंखों के सामने दोनों बेटों की स्वतंत्र व्यवस्था बना दी।

इसके बाद रेखा ने कारोबार से पूरी तरह छुट्टी ले ली। अब वह बहुत थक भी गयी थी। यद्यपि नंदू अब भी बाजार जाकर दोनों में से किसी भी दुकान पर बैठ जाता था। साधारण कपड़ों की बजाय अब वह कीमती कपड़े पहनने लगा। जेब में पांच-सात सौ रु. भी हर समय रहते थे। वह कई मंदिरों में दर्शन करते हुए दुकान पर आता था। वहां बाहर बैठे भिखारियों को भी वह निराश नहीं करता था। कथा-प्रवचन और दान-पुण्य में भी उसकी रुचि बढ़ गयी। इसके चलते वह अपने अवसाद से भी काफी कुछ उबर गया। लोगों ने उसे अब सेठ नंदलाल कहना शुरू कर दिया था।

पर पिछले साल रेखा के निधन से नंदलाल को फिर एक गहरा झटका लगा। रेखा ही उसके जीवन का आधार थी। अगर कोई साधारण महिला होती, तो वह टूट जाती; पर रेखा ने न केवल उसे, बल्कि पूरे घर को संभाला। जेल से आकर उसने तो कुछ नहीं किया; पर रेखा ने अपने परिश्रम और बुद्धिमत्ता से परिवार की प्रतिष्ठा को उस ऊंचाई तक पहुंचाया, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

परिणाम यह हुआ कि नंदलाल एक बार फिर अवसाद से घिर गया। अब उसने घर से निकलना ही छोड़ दिया। उसे कई अन्य रोगों ने भी घेर लिया। यद्यपि बच्चों ने अच्छे से अच्छा इलाज कराया; पर जब किसी की जीने की इच्छा ही समाप्त हो जाए, तो फिर डाक्टर और दवाइयां भी क्या करेंगी ? उन्हीं सेठ नंदलाल जी की अंत्येष्टि से सुरेश लौटा था।

अगले दिन हम हरिद्वार पहुंच गये। आश्रम में शाम की पूजा के बाद स्वामी जी प्रतिदिन मानस की कुछ चैपाइयों की व्याख्या करते हैं। आज के प्रसंग में मुनि वशिष्ठ जी भरत को सांत्वना देते हुए कह रहे थे –

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ
हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ।।

सुरेश ने कल ही नंदू से नंदलाल और फिर सेठ नंदलाल तक की कथा सुनाई थी। मुझे लगा कि तुलसी बाबा ने ‘जसु अपजसु बिधि हाथ’ की बात ठीक ही कही है।

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