लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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-आलोक कुमार-
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पटना के राजनीतिक व मीडिया के गलियारों में ऐसी चर्चा ज़ोरों पर है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद एक बड़ा विघटन तीर वाली पार्टी में होगा (इसका जिक्र मैंने महीनों पहले अपने एक स्तम्भ में भी किया था)। अगर मेरी और मेरे सूत्रों की मानें तो शरद यादव का इस पार्टी से रुखसत होने में महज एक औपचारिकता मात्र भर शेष है। ये बात भी शायद अब किसी से छुपी नहीं है कि शरद भाजपा के साथ गठबंधन तोड़े जाने के पक्ष में नहीं थे, स्वाभाविक भी था शरद यादव को एनडीए के संयोजक का रुतबा हासिल था और ये राजनीति में उनकी महत्ता बरकरार रखने के लिए ये काफी अहम भी था, यदा-कदा प्रधानमंत्री के कन्शेंशस–कैंडिडेट के रूप में उनका नाम तो उछल जाता था। वैसे भी जेडी (यू) में नीतीश के अलावे सारे लोग रबर स्टांप ही हैं और शरद भी अब तक मजबूरी वश ही इस पार्टी में बने हुए हैं, शरद यादव की सबसे बड़ी मजबूरी शायद उनका अपना कोई जनाधार व निर्वाचन क्षेत्र का ना होना है। लोकसभा चुनावों की घोषणा के बाद शरद यादव पर नालंदा से चुनाव लड़ने का भी काफी दबाब बनाया गया था लेकिन शरद इसके लिए एकदम तैयार नहीं थे शायद इस के पीछे के खेल को शरद भलीभांति समझ चुके थे! इसके विरोध में एवं नीतीश पर दबाब बनाने के लिए ही शरद ने अपने गुट के कुछ मंत्री व विधायकों के साथ एक अलग बैठक पटना में की थी और इस बैठक से सत्ता के गलियारों में राजनीति कुछ दिनों के लिए काफी गरमाई भी थी। खैर नीतीश की इच्छाओं के विरुद्ध येन-केन–प्रकारेण शरद ने मधेपुरा से चुनाव लड़ने का जुगाड़ तो कर लिया (यहां ये बताना जरूरी है कि शरद का मधेपुरा में सबसे बड़ा संबल विजेंद्र यादव, बिहार सरकार के मंत्री, ही हैं)। लेकिन इस बार लालू–पप्पू यादव कॉम्बिनेशन शरद पर भारी पड़ता दिख रहा है और शरद दीवारों पर लिखी इस इबारत को भली-भांति भांप चुके हैं। शरद एक अनुभवी नेता हैं और चुनावी –पिटारे में जेडी (यू) के लिए क्या छिपा है उससे अनभिज्ञ भी नहीं ही होंगे! ऐसे में एक ढहते हुए किले में उनका टिकना उनके के लिए तो अवश्य ही कहीं से भी मुफीक नहीं ही है। वैसे भी हाल के दिनों में के.सी त्यागी की नीतीश से बढ़ती हुई नज़दीकियां भी शरद के लिए कुछ अच्छे संकेत नहीं दे रही हैं, लोकसभा चुनावों की घोषणा से पहले से ही नीतीश द्वारा के.सी त्यागी को कुछ ज्यादा ही प्रोजेक्ट किया जाना भी शरद को खटक ही रहा होगा! वैसे तो त्यागी शरद के कारण ही राजनीति और जेडी (यू) में आगे बढ़े हैं लेकिन सच ही कहा गया है राजनीति के खेल में कोई किसी का सगा नहीं होता है, सब दांव के यार ही होते हैं। त्यागी जानते हैं कि जेडी (यू) में रहना है तो नीतीश को अपना मदारी बनाने में ही होशियारी व समझदारी है और यहीं से जुड़ी और शुरू होती है तीर वाली पार्टी के अगले विघटन की कहानी। भरोसेमंद खबरियों की अगर मानें तो पटकथा तैयार बस फिल्म फ्लोर पर आनी बाकी है। केसी त्यागी को जेडी (यू) का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का मूड नीतीश लगभग बना ही चुके हैं और वो दिन दूर नहीं, जब शरद और उनके समर्थक मंत्री एवं विधायक नीतीश के खिलाफ खुलेआम बिगुल फूंकते हुए नजर आएं!

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