लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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shakurशैलेन्द्र चौहान
दिल्‍ली की सियासत में अहम भूमिका अदा करने वाली झुग्गियों को लेकर अब राजनीति की तस्‍वीर बदल रही है। जहां पहले झु‍ग्‍गी टूट जाने के बाद नेताओं के सिर्फ बोल सुनने को मिलते थे, वहीं अब खबर लगते ही विधायक से लेकर स्‍थानीय नेता सभी जमा हो जाते हैं। कड़ाके की ठंड के बीच दिल्ली के शकूरबस्ती इलाके में झुग्गियों को उजाड़े जाने को लेकर इन दिनों राजनीतिक घमासान शुरू है। तमाम दलों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। हाल ही में रेलवे प्रशासन ने शकूर बस्ती में करीब 500 झुग्गियों को धराशायी कर दिया था। तुरंत इस मामले पर राजनीति होने लगी। रेलवे ने इस मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिश की तो मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल ने रेलवे के साथ केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया। जबकि कांग्रेस ने इसका ठीकरा दिल्ली सरकार के सिर पर फोड़ा। कांग्रेस और आप एक दूसरे पर आरोप मढ़ रहे हैं। वहीं कांग्रेस, आप, टीएमसी, जेडीयू ने इसे लेकर संसद में सरकार को घेरने का ऐलान कर दिया। इस मुद्दे को आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस लोकसभा में उठाएगी। शकूर बस्ती के लोगों का आरोप है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान एक मासूम बच्ची की मौत हो गई जबकि कार्रवाई करने वाली रेलवे का कहना है कि यह आरोप गलत है। बच्ची की मौत पहले ही हो चुकी थी। इस मामले में दिल्ली सरकार ने मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे दिए। इसके बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस मामले की कड़ी निंदा करते हुए ट्वीट किया, ‘‘इस कड़कड़ाती ठंड में रेलवे के अधिकारियों ने झुग्गियों को हटाने का काम किया जिससे एक बच्चे की मौत हो गयी। भगवान उन्हें माफ नहीं करेगा।’’ सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस को गत विधानसभा चुनावों के दौरान एक बार फिर गरीबों की याद आ गई। कांग्रेस प्रचार समिति के अध्यक्ष अजय माकन ने मीडिया के समक्ष एनसीटी ऑफ दिल्ली राइट टू हाउसिंग, शेल्टर एंड प्रॉपर्टी टू स्लम ड्वेलर्स एक्ट-2015 का बिल पेश किया था और कहा था कि यह बिल गरीबों को पक्के घर देने का ब्लू प्रिंट है। दिल्ली में कांग्रेस की सरकार बनते ही इस बिल को पारित किया जाएगा। जहां भी झुग्गी क्लस्टर हैं, वहां पक्के मकान बनाए जाएंगे। इसमें डूसिब, एमसीडी और डीडीए की जमीन पर बने झुग्गी क्लस्टर की जगह पक्के मकान बनाने का प्रपोजल है। ये झुग्गीवासी कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक है जिसे पिछले चुनावों में आप ने हथिया लिया है। गरीबों को पक्का घर देने की बात 2008 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने की थी और 895 कालोनियों को नियमित करने के नाम पर प्रोविजनल सर्टिफिकेट भी बांटे गए। लेकिन 2008 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कालोनियों को नियमित करने और गरीबों को पक्के मकान देने पर सरकार की ओर से कोई गजट नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया। उस समय दिल्ली और केंद्र दोनों में ही कांग्रेस की सरकार थी। गत चुनावों में झुग्गियों की राजनीति में भाजपा ने गंभीरता से सेंध लगाने की कोशिश की थी। लेकिन वह कामयाब नहीं हो पाई क्योंकि दिल्ली की झुग्गियों के निवासियों में आम धारणा है कि ‘जब-जब भाजपा की सरकार आई है झुग्गियों की शामत आई है।’ भाजपा ने अपने विजन डॉक्युमेंट में बिना किसी समय सीमा का जिक्र किए ही दिल्ली को झुग्गी मुक्त करने का वादा कर दिया गया था। ‘जहां झुग्गी – वहां मकान’ का नया नारा भाजपा ने दिया था। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां सार्वजनिक भूमि पर बसे हुये अनाधिकृत रिहायशी इलाके हैं। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां सरकार द्वारा परिभाषित सात अनियोजित रिहायशी इलाकों में से एक है। इन झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में करीब 4.2 लाख परिवारों के लोग रहते हैं, जो दिल्ली की कुल आबादी का लगभग पंद्रह फीसदी है। भारत में वर्ष 2001 में की गई जनगणना के दौरान देश की सबसे बड़ी झुग्गी-बस्तियों के निवासियों की ही गिनती की गई थी लेकिन वर्ष 2011 में छोटी झुग्गी-बस्तियों के निवासियों की भी गिनती की गई। इस जनगणना के परिणामों की रिपोर्ट गुरुवार, 21 मार्च को प्रकाशित की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में 1 लाख 38 हज़ार झुग्गी-बस्तियों हैं जिनमें 6 करोड़ 40 लाख लोग रहते हैं। भारत की एक-तिहाई आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है जिनमें से 17.4 प्रतिशत लोग झुग्गी-बस्तियों जैसे ग़रीब इलाकों में ही रहते हैं। भारत की राजधानी दिल्ली में ऐसी बस्तियों में रहनेवाली आबादी 15 प्रतिशत है जबकि कोलकाता और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में क्रमशः 30 और 29 प्रतिशत लोग झुग्गी-बस्तियों के निवासी हैं। भारत की वित्तीय राजधानी मुम्बई में ऐसे लोगों की संख्या 40 प्रतिशत है।
ऐसी बस्तियों में 70 प्रतिशत लोगों के पास टीवी सेट हैं। इस मामले में वे शहरी अपार्टमेंटों के निवासियों से थोड़ा ही पीछे हैं। झुग्गी-बस्तियों के 64 प्रतिशत निवासियों के पास सेल फ़ोन हैं और आम शहरी आबादी के पास भी इतने प्रतिशत लोगों के पास सेल फ़ोन हैं। नेताओं के तौर तरीकों में हुए हालिया परिवर्तन के चलते झुग्गीवासियों को जो नुकसान हो रहा है वह यह कि मध्यवर्ग में ईर्ष्या की यह भावना पनपने लगी है कि क्या केवल झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले ही दिल्ली के निवासी हैं। इसलिए सिर्फ उन्हें खुश करने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि कई जगहों पर इन झुग्गी-झोपड़ियों का रहन-सहन मध्यवर्गीय जैसा हो गया है। मीराबाग, रघुवीर नगर, निहाल विहार आदि जगहों पर झुग्गियां पक्की हो चुकी हैं। यहां दो तल्ले के मकान भी दिखते हैं। इन्हें पानी-बिजली पहले से ही मुफ्त में हासिल है। इनके घरों में सुख-सुविधा के सारे सामान पहले से मौजूद हैं, जैसे कलर टीवी, फ्रिज, पंखे, कूलर वगैरह। यहां के कई सारे बच्चे पब्लिक स्कूलों में पढ़ रहे हैं। इलाज के लिए यहां के लोग सरकारी अस्पतालों में नहीं, निजी अस्पतालों में जाते हैं। ऊपर से तमाम सरकारी सुविधाएं भी इनको मिली हुई हैं। क्या वास्तव में ऐसा हुआ है या यह एक सैंपल मात्र है जहां शनैः शनैः व्यवसाय, राजनीति और बिल्डरों हस्तक्षेप बढ़ गया है जिसके कारण बाहरी लोग झुग्गीवासियों को थोड़ा पैसा देकर उन झुग्गियों पर काबिज होते जा रहे हैं ? और अगर वाकई में झुग्गियों में इतनी सम्पन्नता आई है तो यह बात स्वागत योग्य है। इसमें ईर्ष्या जैसी बात नहीं होना चाहिए। उन्होंने ये सुविधाएं मुफ्त में नहीं मेहनत की दम पर हासिल की हैं। लेकिन असलियत यह भी है कि झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहने वाली आबादी, दिल्ली की सबसे असुरक्षित आबादियों में से एक है। अगर बेहद निचले स्तरों के आधार पर भी देखा जाये तो इनके निवासियों को राज्य से मिलने वाली सुविधाओं का स्तर बेहद खराब है। निवासी घर ढहाये जाने के खतरों के बीच जीवनयापन करते हैं। इसके अलावा उन्हें बुनियादी स्तर का वैसा राजनीतिक संरक्षण भी नहीं मिल पाता, जो बाकी असुरक्षित रिहायशी इलाकों को मिला हुआ है। ज़्यादातर निवासी असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। पुरुष गलियों में ठेलाचालक, रिक्शा ड्राइवर, सुरक्षा गार्ड, बढ़ई, निर्माण मज़दूरों के तौर पर काम करते हैं। कुछ पुरुष निर्माण कामों के लिये मेट्रो से गुड़गांव और गाजियाबाद भी जाते हैं। महिलायें या तो फैक्ट्रियों से लाये गये कुछ बुनियादी कामों को घर पर बैठकर करती हैं या फिर पास की कालोनियों में मध्यम और उच्च मध्यम परिवारों में घरेलू श्रमिकों के रूप में काम करती हैं। यह कार्यबल दुनिया की दूसरी सबसे अधिक आबादी वाले शहर, दिल्ली की आबादी का 11% हिस्सा है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि झुग्गी निवासियों का सरकार के साथ ऐसा सम्बन्ध है जिसमें वे सरकार के सामने कमज़ोर प्रार्थी के रूप में प्रतीत होते हैं। वे कतई ऐसे नागरिक नहीं लगते जो अपने अधिकारों के आधार पर मांग कर सके । उनकी राजनैतिक कमजोरी बस्ती के ढहाये जाने जैसे खतरों के हमेशा बने रहने से स्पष्ट हो जाती है। राज्य प्रतिनिधियों, स्थानीय पुलिस और डीडीए अधिकारियों द्वारा रोज़ की जाने वाली निगरानी, उगाही और शोषण इस कमजोरी और शक्ति असंतुलन को बनाये रखते है। दिल्ली के रिहायशी इलाकों में, चाहे वे नियोजित हों या अनियोजित, रेसिडेंट्स वेलफेयर एसोशियेशन (आरडब्ल्यूए) की एक सामुदायिक संस्था के रूप में मौजूदगी बहुत आम है। जिसके पदाधिकारी, निर्वाचित प्रतिनिधियों और सरकारी एजेंसियों के अधिकारियों के साथ बातचीत में समुदाय के प्रतिनिधि के बतौर काम करते हैं। हालांकि कई बार ‘झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों’ की जगह ‘स्लम’ शब्द का भी इस्तेमाल कर दिया जाता है, लेकिन दिल्ली सरकार द्वारा बनायी गयी श्रेणियों और उनके अनुक्रम के अनुसार ये दोनों शब्द दिल्ली में दो अलग तरह के रिहायशी इलाकों से सम्बन्ध रखते हैं। आधिकारिक शब्दकोष के अनुसार- स्लम का सम्बन्ध स्लम डेज़ेग्नेटड एरिया (एसडीए) से है। इन क्षेत्रों का जिक्र साल 1956 के एक कानून में किया गया है। ये डेज़ेग्नेटड स्लम उस सूची का हिस्सा हैं जिसे साल 1994 से अपडेट नहीं किया गया है। इन रिहायशी इलाकों को प्रशासनिक रूप से मान्यता प्रदान कर कुछ बुनियादी सुविधायें दे दी जाती हैं। दूसरी तरफ, झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जेजेसी) के वजूद को आधिकारिक तौर पर मान्यता तो मिली है, लेकिन उन्हें ‘स्लम डेज़ेगनेटेड एरियाज़’ जैसी कानूनी सुरक्षा हासिल नहीं है। इस तरह सभी अनियोजित रिहायशी इलाकों में से झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां सबसे ज़्यादा कमज़ोर और असुरक्षित आबादी वाले इलाके हैं। हालांकि दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जेजेसी) में जबरदस्त अंतर हैं। इसके बावजूद इन सभी बस्तियों में जो एक समानता है, वो है वहां के निवासियों के ज़मीन पर कमज़ोर दावे, और इन बस्तियों में होने वाली बहुत सी घटनाएं ज़मीन पर इन कमज़ोर दावों से तय होती है। सामान्य तौर पर, ये ऐसी जगहें हैं जहाँ निवासियों को अपनी नागरिकता के अधिकार से समझौते करने पड़ते हैं, न तो उनको सार्वजनिक सेवायें हासिल हैं और न ही उनको अपनी जमीन पर सुरक्षित मालिकाना हक हासिल है। ऐसी स्थिति में इनके निवासियों में असुरक्षा का भाव हमेशा मौजूद रहता है। अब समय आ गया है कि इनके आवास और सुविधाओं पर एक समग्र नीति बनाई जाए ताकि वे शहर के मलिन द्वीप न होकर एक बेहतर क्षेत्र दिख सकें। भारत की एक ख़राब तस्वीर इन बस्तियों से अक्सर प्रचारित होती रही है जिसे बदलने की आज आवश्यकता है।

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1 Comment on "झुग्गी पॉलिटिक्स"

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Himwant
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अनाधिकृत कब्जे को बढ़ावा देना अराजकता को बढ़ावा देना है. लेकिन गरीबी और गृह-हीन लोगो की चिंता करना कल्याणकारी राज्य का कर्तव्य है. लेकिन प्रदेश सरकार अगर किसी सार्वजनिक उपक्रम कि जमीन पर अनाधिकृत कब्जे को शह दे तो वैसी सरकार देश और संविधान के लिए खतरा है.

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