लेखक परिचय

अनिल द्विवेदी

अनिल द्विवेदी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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गवर्नर बलरामजी दास टण्डन

गवर्नर बलरामजी दास टण्डन

संदर्भ : राज्यपाल और पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति का विवाद.

ठीक किया कुलाधिपति महोदय यानि राज्यपाल जी ने। किसी भी समारोह का आतिथ्य, एक शख्स की अन्तरात्मा या सम्मान से बढक़र नहीं हो सकता इसलिए पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में गवर्नर बलरामजी दास टण्डन नही पहुंचे। संत तुलसी सही कह गए कि तुलसी तहां ना जाइए, कंचन बरसे मेघ। भगवान शिव का तीसरा नेत्र तभी खुला था जब वे अपनी ससुराल में बिनबुलाए पहुंच गए थे। उसके बाद क्या हुआ था, बताने की जरूरत नहीं। इसी के समानांतर देखिए कि असीमित शक्तियों से घिरे होने के बावजूद टण्डन साहब ने अपनी शक्तियों के पिटारे को कभी नहीं खोला अन्यथा कुलपति प्रो. एस.के. पाण्डे दूसरे कार्यकाल का सुख नहीं भोग रहे होते!
छत्तीसगढ़ राज्य बने 16 साल हो गए। यह पहला मौका है जब राज्यपाल नाम की संस्था को सरेआम टंगड़ी मारने की कोशिश की गई है। बीस-बाइस बरस पहले इसी विश्वविद्यालय के एक कुलपति ने तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री के पैर सार्वजनिक तौर पर छुए थे तो वह भी एक कालिख की तरह ही था। वाइस चांसलर पाण्डे साहब को मैं जितना समझ पाया हूं, वे ईमानदार हैं, मिलनसार हैं, कोई अहम या वीआईपीज जैसा रूतबा भी नही पालते, अगरचे जाने-अनजाने ही सही, यह जो कलंक उनके कार्यकाल में लगा है, विश्वविद्यालय इसे कभी नहीं धो सकेगा।
हमारे राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों में एक किताबी बहस आज तक लोकप्रिय है कि भारत का राष्ट्रपति हो या राज्यपाल, सम्प्रभुतासंपन्न राज्याध्यक्ष हैं या फिर रबर की मुहर..! इसे सत्ता की अंधी अभिलाषा कह लीजिए या कुलपति जैसे सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बाद, एक शख्स में खुद-ब-खुद आ धमकने वाला अंधत्व कि वह राज्यपाल जैसी संस्था को स्वीकारने की तहजीब भी उतार फेंकने को बाध्य है। फिर लाजिमी तौर पर हमने देखा-पाया है कि उच्च शिक्षा मंत्री ने भी अनदेखी किए जाने के कई कडुवे घूँट पीए हैं। चाहे वह तकनीकी विश्वविद्यालय का मामला हो या पं. सुंदरलाल शर्मा विश्वविद्यालय का। मुख्तलिफ ढंग से सोचें तो देखेंगे कि कुलपतियों के भ्रष्टाचार से जुड़ी सैकड़ों शिकायतें राजभवन तक पहुंचती रही लेकिन कड़ी कार्रवाई की दरकार ना हो सकी। अन्य राज्यपालों के कार्यकाल में कुछ चेतावनियों ने कानाफूसियों को जन्म जरूर दिया परंतु यह एक सदानीरा की सतह पर उभरते हुए बुलबुले से अधिक की हैसियत कभी अख्तियार नही कर सका।
दिमाग का यह लचीलापन इशारे करता है कि दरअसल यह उस परिपाटी पर चल निकलने का बगुलामुखी साहस है जिसकी बुनियाद गुरू घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति दिवंगत लक्ष्मण चतुर्वेदी ने रखी थी। सुना था कि वे मुख्यमंत्री और मंत्रियों तक के कागजातों को दरकिनार कर देते थे। इसकी बुनियाद में उनकी ईमानदारीभरी कार्यशैली थी लेकिन जब उन पर एक मशीन खरीदी में 70 करोड़ का घपला करने का आरोप चस्पा हुआ और सीबीआई जांच बैठी तो यह छबि धूल-धूसरित हो गई थी। राज्यपाल टण्डन साहब की नाराजगी के मूल में भी यही बात छिपी है। मीडिया में छपी खबरों को मानें तो रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में हावी भर्राशाही, नियुक्तियां और भ्रष्टाचार की ढेरों शिकायतें उन तक पहुंची थी। इस पर राजभवन की ओर से कुलपति को आरोपी पर कार्रवाई करने की सलाह दी गई तो हीलहवाला देते हुए अनसुना कर दिया गया। इसकी पुष्टि खुद विश्वविद्यालय के कर्मचारी संगठनों ने की है।
देश की राजनीतिक खदान में मैं जिन उजले लोगों को गिनता हूं, उनमें से एक महामहिम बलरामजी दास टण्डन भी हैं। बड़प्पन, ज्ञान और उदारता के प्रतीक हैं तथा जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं। साठ साल से ज्यादा के राजनीतिक जीवन में उन पर छटांकभर का भी आरोप नही लगा। इसलिए इस झूठ को सच मान लेने की भूल नही करनी चाहिए कि महामहिम किसी विश्वविद्यालय में चल रहे निर्माण कार्य या नियुक्तियों में विशेष रूचि रखते होंगे। बतौर राज्यपाल हमने उनका अब तक का शानदार रिकॉर्ड देखा है। जिस कार्यकुशलता और सदाचार के नए कीर्तिमान उन्होंने स्थापित किए हैं, राज्य के आमजन के मन में उनका स्थान ताजिन्दगी पहले नागरिक का रहेगा।
संघ की शाखा से निकले राज्यपाल जी का मूलमंत्र रहा है कि वैचारिक दुश्मनों को भी दोस्त बनाओ। याद कीजिये कि सीडी काण्ड को लेकर कांग्रेस जब टण्डन साहब से मिलने पहुंची तो उन्होंने अपनेपन से भरी सलाह देते हुए कहा था कि यह आपके परिवार का मामला है, वही निबटा लीजिए। और यह उदारमना दिल उन्होंने तब दिखाया था जब कांग्रेस भाजपा का एजेंट होने की तरह काम करने का आरोप लगा चुकी थी। अविभाजित मध्यप्रदेश के राज्यपाल भाई महावीर तथा तत्कालीन मुख्यमंत्री दिगिवजय सिंह के बीच जगजाहिर कटुता थी। दोनों के बीच तनज्जुली इतनी बढ़ गई थी कि आलोचनाओं का आदान-प्रदान सार्वजनिक होने लगा था तभी आयोग-मंडल के अध्यक्षों की नियुक्ति में राज्यपाल को किसी भ्रष्ट चेहरे पर आपत्ति हुई तो दिगगी राजा ने इस सलाह को बड़े मन से स्वीकार करते हुए उस नाम को हटा दिया था। स्पष्ट है कि एक मुख्यमंत्री जब राज्यपाल के सुझाव का इस कदर सम्मान कर सकता है तो किसी विश्वविद्यालय का कुलपति क्यों नही?
शंकराचार्य हों या राज्यपाल, ये दो पद ही इस समाज में ऐसे हैं जो उस तबके की नुमाइन्दगी करते हैं जो समाज में श्वेतरक्त कणिकाओं का काम करता है जो हमारे शरीर को सेहतमंद रखती हंै। वैसे ही संत, वैज्ञानिक, शिक्षक और ऐसे तमाम बुद्धिजीवी या कर्मयोगी समाज को साफ-सुधरे रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं। ऐसी विभूतियों के सम्मान में यदि कुछ होता है तो मन में रचे-बसे इस विश्वास को ठेस पहुंचती है। कुलपतियों से गुजारिश है कि वे अपनी ओछी हरकतों से बाज आएं। इस संस्था की गरिमा और महानता को कायम रहने दें क्योंकि लोग आते-जाते हैं, संस्थाएं कायम रहती हैं। उनका बना रहना भी देश के लिए जरूरी है। इस मामले में सीएम साहब ने नो कमेंटस कहके चातुर्यता जरूर दिखाई लेकिन उनसे जो बड़ी उम्मीद जगी है, वह यह कि यदि राज्यपाल जैसी संस्था भी प्रशासनिक दादागिरी से आहत है तो उसकी लम्बी और गहरी शल्यक्रिया की जरूरत आन पड़ी है। लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी ना है।
अनिल द्विवेदी

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