लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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paper_poster_QA44_lकाव्य में रस होता है, छन्द होता है, प्राण होता है, प्रीति होती है, अक्षर काया होती है और एक आत्मा होती है। अपने गांव भी कुछ समय पहले तक रस थे, छन्द थे, प्रीति थी, प्यार थे, रिश्ते नातों के अटूट बंधन थे। उत्सव थे, नृत्य थे, गीत थे, पुलक थी। होली के रंग थे, जल-रस भरा सावन था, मधुरस भरा बसंत था, चैती थी, विरहा था, गिद्धा था, कजरी थी, रक्षा बंधन का नेह था, कजरी तीज थी, करवा चौथ थी। जगमग दीप पर्व थे, राष्ट्रीय स्वाभिमान की स्मृति वाली विजयादशमी थी। उत्तरायण/ दक्षिणायन के मिलनसंधि पर मकर संक्रांति थी। ज्ञानदान था, दीपदान था, भूमिदान था, कन्यादान थे। बिटिया की बिदाई पर पूरा गांव रोता था, बरात की अगवानी और स्वागत में पूरा गांव लहालोट था। नदियां माताएं थीं, नीम का पेड़ देवी था, बरगद का पेड़ भी देव था। पीपल का पेड़ ब्रहम था। कुलदेवता थे, चांद और सूरज भी देवता थे, ग्राम देवता भी थे। मुखिया गांव का मुख था। दुनिया के प्राचीनतम ज्ञानकोष ऋग्वेद में इसे ‘ग्रामणी’ कहा गया।

ऋग्वेद में ग्रामणी’ दक्षिणा दाता हैं। वे ”प्रथमो हूत एति अग्रएति” सबसे पहले आमंत्रित होते हैं और सबके आगे चलते हैं।” (ऋ 10.107.5) दान और दक्षिणा में फर्क करना चाहिए। दान विद्वान का सत्कार है, अनुदान गरीब की सहायता है लेकिन दक्षिणा दान स्वीकार करने वाले के लिए धन्यवाद राशि है। तब दान लेने वाला विद्वान धन लोभी नहीं था, उसने दान स्वीकार किया, दानदाता की महत्ता बढ़ी। वह दानी कहलाया। विद्वान ने ही उसको दानी बन जाने का अवसर दिया। इसलिए अनुग्रह रूप में दक्षिणा थी। दान के बाद दक्षिणा का यही मतलब था। हम सबके प्रथम पूर्वज मनु भी गांव निवासी थे। ऋग्वेद के अनुसार उनके पास हजारों गायें थीं। वे अपने गांव के प्रधान (ग्रामणी) थे। (ऋ10.62.11)। जैसे ग्राम का अध्‍यक्ष ग्रामीण था वैसे ही पुर का प्रमुख पूर्वतिम या पौर। आधुनिक महानगरों का महापौर ऋग्वेद के पौर: से ही विकसित हुआ। लेकिन गौओं को गांव बहुत प्रिय लगते हैं। ऋषि, सविता (सूर्य) से तेज मांगता है और कहता है, ”आपका तेज वैसे ही हमारे पास आये जैसे गायें गांवों को जाती हैं-गांव: इम ग्रामम्” (10.149.4)।

ऋग्वेद में एक वनदेवी हैं अरण्यानी। ऋषि चाहते हैं कि वे ग्रामवासिनी हो जाए, गांव में चलकर रहें, ”हे अरण्यदेवी! आप निर्जन जंगल में रहती हैं। कथ ग्रामं न पृच्छसि-गांव में चलकर क्यों नहीं रहती?” (ऋ 10.146.1)। आगे कहते हैं, ”अरण्य में गौएं चरती हैं। बैल की तरह की आवाजें हैं, चींचीं की ध्‍वनियां हैं। इस वन से सांझ समय तमाम गाड़ियां घास लकड़ी आदि लेकर गांव की ओर निकलती हैं। यह सम्पदा अरण्य देवी भेजती है। मनुष्य रात्रि में अरण्य में डरते हैं लेकिन देवी किसी की हिंसा नहीं करती। ऋषि स्तुति करते हैं कि वे उनके गांव चलें।” (वही 2-6) ऋषि रूद्र शिव से भी ग्राम समृध्दि की प्रार्थना करते हैं, ”ग्राम में चार पैरों वाले जीव संवर्ध्दन को प्राप्त हों, उपद्रव रहित हो।” (ऋ 1.114.1) वे यही अपेक्षा अन्य देवताओं से भी करते हैं, ”तंन्नो मित्रों, वरूणों, मामहन्तामदिति सिन्धु: पृथ्वी उतद्यौ-हमारी कामना (ग्राम समृध्दि) को मित्र वरूण, अदिति, समुद्र, पृथ्वी और दिव्य लोक भी पूरी करें।” (वही)

अथर्ववेद के ”भूमिसूक्त” को ब्लूमफील्ड जैंसे पश्चिमी विद्वानों ने अथर्वा ऋषि की श्रेष्ठ काव्य रचना बताया है। ऋषि अथर्वा की प्रार्थना है, ”ये ग्रामा, यदरण्यं या: सभा:- जहां गांव है, वन है, सभाएं होती हैं और ‘ये संग्रामा: समितयस्तेषु’-जहां ग्राम मिलते हैं, विमर्श करते हैं, हे भूमि हम आपको प्रणाम करते हैं। (अथर्व 19.2.56) वैदिक भाषा में संग्राम का मतलब युद्ध नहीं, ग्राम मिलन था। सं-का मतलब संयुक्त होता है। वे कहते हैं जन विभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं-यहां भिन्न-भिन्न विचार, बोली वाले, अनेक आस्थाओं के लोग रहते हैं।” (वही : 45) विचार स्वातांत्र्य वैदिक काल की अनूठी परम्परा है। लेकिन इस विचारस्वातंत्र्य में मधुरता की मर्यादा है, ”यद वदामि मधुमतद्-जब भी बोले, मधुर बोलें।” (वही: 58) वैदिक कालीन ग्राम संस्कृति ही भारतीय संस्कृति का ऊर्जा गृह (पावर हाउस) थी।

वैदिक काल में व्यक्तिगत सम्पत्ति का विकास हो चुका था। रात में चोरी भी स्वाभाविक थी। हिंसक पशु, पक्षी, सांप आदि से भी भय थे। ऋषि रात्रि को देवी मानकर रात्रि सूक्त में प्रार्थना करते हैं, ”उड़ने वाले, रेंगने वाले सर्प आदि तथा जंगल में रहने वाले हिंसक पशुओं से रक्षा करें। (19.483) लेकिन चोरों का क्या हो? वे यह काम रात में पूजा जप करने वाले और पूरी रात अध्‍ययन करने वाले को सौंपते हैं। (वही: 5) अथर्ववेद में रात्रि सूक्त के बाद कामसूक्त है। मानी बात है, दिन कर्म तप में गया, रात्रि के सन्नाटे में कामदेव आ गये, ”हे काम, आप सर्वव्यापी, तेजसम्पन्न सामर्थ्यशाली मित्र है। हमें शक्ति सम्पन्न बनायें।” (वही 52.2) गांव भरे पूरे थे। वे जातियों, समूहों का संगठन नहीं थे। प्रत्येक गांव का अपना व्यक्तित्व था। पूरा गांव समवेत उत्सवों में खिलता था, दुख में एक साथ दुखी और सुख में समवेत सुखी था। महात्मा गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ में भारत के गांवों की प्रशंसा की। उन्हें स्वयं पूर्ण इकाई बताया। गांव नीति, नियम, प्रीति, प्यार और आचारशास्त्र का विकिरण केन्द्र थे। वरिष्ठजनों की छाया थी। तरूणाई उनकी डाट-डपट, दुलार-प्यार पाकर ही परिपक्व होती थी।

भारत गांवों का देश है। गांव के गठन की मूलभूत इकाई ‘परिवार’ संस्था है। परिवार गठन का मूल आधार अति प्राचीन ‘विवाह’ संस्था है। एस0 ए0 डांगे सहित तमाम मार्क्‍सवादी विद्वान वैदिक काल में विवाह संस्था के विकास को मान्यता नहीं देते। ऐसे लोगों की राय में ऋग्वैदिक काल में विवाह नहीं होते थे, वैदिक समाज पिछड़ा हुआ था और स्वच्छंद था। वे गौर नहीं करते कि ऋग्वेद से लेकर अथर्व और पुराणों तक धरती माता है और आकाश पिता है। पिता और माता जैसे सम्बोधन विवाह बाद ही अस्तित्व में आये। माता और पिता सम्बंध बोधक है। लेकिन ऋग्वेद में पति पत्नी भी है। ऋषि उषा से कहते हैं, ”अपने पति को वक्ष-अंग दिखाने वाली कन्या के समान हे उषा आप पति सूर्य देव के पास जाती हैं।” (1.123.10) यहां प्रीतिकर काव्य विम्ब है। ऊषा यहां सुकुमार कन्या है। वह अपने वक्ष सिर्फ पति को ही दिखाती है। इसी सूक्त में मां भी है। ऊषा युवती है। वह मां के द्वारा सजाई गई कन्या की तरह आती है। वैदिक काल की युवतियों को मां सजाती है वे अपने अंग पति को ही दिखाती है। यहां सामाजिक संगठन के सूत्र और मर्यादा के बंधन भी हैं। वे आधुनिक काल की कन्याओं की तरह अपना सार्वजनिक अंग प्रदर्शन नहीं करती। आधुनिक पत्नियां घर का काम नहीं करतीं, पति अलग काम करते हैं, पत्नी अलग लेकिन वैदिक काल के पति पत्नी साथ-साथ उपासना करते हैं और सोमरस निचोड़ते हैं।” (ऋ0 8.31.5)

दुनिया के किसी भी देश में पति पत्नी के लिए एक साझा शब्द नहीं मिलता लेकिन भारत में ‘दम्पत्ति’ है। मार्क्‍सवादी चिन्तक और भाषा विज्ञानी डा0 राम विलास शर्मा ने ध्‍यान दिलाया है कि दम्पत्ति के रूप में अन्य देशों की भाषाओं में नहीं मिलते। (डा0 राम विलाश शर्मा, भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश खण्ड 1 पृष्ठ 43) क्यों नहीं मिलते? क्योंकि भारतीय ग्राम संस्कृति में पति और पत्नी दो अलग इकाइयां नहीं थी। वैदिक कालीन गांवों में दोनों के मन एक थे, अभी गांवों में पति और पत्नी मिलकर ‘एक मन’ ही हैं। ऋषि कहते हैं, ”अग्निदेव पति और पत्नी के मन को मिलाते हैं।” (ऋ 5.3.2) ऋग्वेद के लगभग आधो से ज्यादा मंत्र अग्नि को समर्पित हैं। विवाह की मजबूती का आधार अग्नि के 7 चक्कर हैं।

‘पाणिग्रहण’ (विवाह) भारत की दिलचस्प और वैज्ञानिक संस्था है। निकाह और मैरिज में वैसी गहराई नहीं है। ऋषि कहते हैं, ”हे कन्या तुम्हें हम पितृकुल से मुक्त करते हैं। पतिकुल से तुमको सम्बद्ध करते हैं। वहां आप गृहस्वामिनी बने, सबको अपने अनुशासन में रखने वाली बनें। साम्राज्ञी श्वसुरे भव, साम्राज्ञी स्वश्रुवा भव, ननान्दरि साम्राज्ञी भव, साम्राज्ञी अधिदेवृषुसासु, श्वसुर, ननद और पूरे परिवार पर तुम शासन करो, 10 पुत्र हों, 11 वां पुत्र पति हो, तुम पशुओं और घर की चिंता करो।” फिर वर वधू से कहते हैं, ”आप कभी पृथक न हों। गृहस्थ धर्म का निर्वहन करते हुए पुत्र, नाती, पोते के साथ आमोद-प्रमोद करें। वैदिक कालीन परिवार अंध आस्था के बजाय कर्म आस्था पर विकसित हुए। कर्म के लिए सबसे बड़ी ताकत है हाथ। अग्नि देवता हैं पर मनुष्य ने हाथों का उपयोग करते हुए अरणियों से अग्नि पैदा की। (ऋ0 7.1.1) ग्रामीण के हाथ हसिया बाली के काम आते हैं। (ऋ0 8.78.10) देवता सिर्फ स्तुतियों से ही खुश नहीं होते, कठोर कर्म न करने पर देवता साथी नहीं बनते। (ऋ0 4.33.1) देवता भी परिश्रम करते हैं। (ऋ 10.106.10) गीता में कृष्ण भी यही बात दुहराते हैं, ”हे अर्जुन मैं कर्म न करूं तो सृष्टि की व्यवस्था ही न चले। कर्म जरूरी है।” सारा मजा हाथ में है, ”अयं मे हस्तो भगवान, अयं मे भगवत्तर: पद:, अयं शिवामिमदर्शन:-मेरा हाथ (ही) भगवान है, यही भाग्यवान है और कल्याण की उपलब्धि कराता है।” (10.60.12)

गांव भरे पूरे हैं। छत पर, गांव के पेड़ पर पक्षी हैं। उनकी आवाज गांव वालों को प्रिय है (ऋ 12.42.1) उनके गीत गायत्री जैसे मधुर हैं। (2.43.1) लेकिन बड़े पक्षियों से उन्हें खतरा है। ऋषि उसे सुरक्षित देखना चाहते हैं, ”गरूणद्युलोक से मनुष्य के लिए दिव्य उपहार लाते हैं, वे ताकतवर हैं लेकिन वे छोटे पक्षियों को न मारे। (ऋ 2.42.2 व 4.26.2) नदियां मोहित करती हैं। वनस्पतियां औषधि देती हैं। धरती ऋतम्भरा है। गांव आनंद मगन है। किसी पुलिस दरोगा की जरूरत नहीं है। ग्राम व्यवस्था राजव्यवस्था के बिना ही गतिशील हैं।” समाज में दण्ड व्यवस्था जरूरी है पुलिस जैसी ‘स्पश’ संस्था ऋग्वेद में भी है। लेकिन ऋग्वैदिक काल का समाज स्वयं में सतर्क है, ”देवता हमारे भीतर रहते हैं। वे हमारे सभी भले बुरे कर्मों की निगरानी करते हैं।” (ऋ 2.27) विज्ञान इस बात को नहीं मानेगा। यूनान और भारतीय दर्शन ने सृष्टि निर्माण का कारण किसी एक आदि तत्तव को माना है। मनुष्य 5 तत्वों धरती, आकाश, अग्नि, वायु और जल से निर्मित है। वैदिकजन इन्हें देवता कहते थे। ये हमारे भीतर हैं। वैदिक समाज गलत काम नहीं करना चाहता, ”हे देवों हमारे हाथ से गलत काम कभी न हो।” (ऋ 6.51) क्योंकि पापी-दुष्कर्मी सत्य का मार्ग नहीं तय कर पाते (ऋ 9.73) तो भी गल्तियां क्यों हो जाती हैं? ऋषि बताते हैं, ”मनुष्य का अंत:करण पाप के लिए नहीं प्रेरित करता। पाप वासनाएं कराती हैं। (ऋ 7.86) क्या गलत है? क्या सही है? इसकी सूची ऋषि नहीं बनाते। ऋषि बताते हैं ”ऐसी संहिता सदा से है।” यानी ऋग्वेद के पहले भी एक सुसंस्कृत समाज था। ऋग्वेद के ऋषि परम्परा से प्राप्त ज्ञान ही गा रहे हैं।

तो इसी अधिष्ठान प्रीति-पयार, वातायन और सामाजिक संगठन से गांव उगे। आधुनिक गांव वैदिक संस्कृति के निर्दोष चेहरे की झांकी है। भारत के गांवों में आज भी उसी परम्परा के अवशेष हैं लेकिन ईसाई-इस्लामी हमले के बाद से गांव संस्कृति भी दरक रही है। अम्मा मैम और चाची आन्टी हो रही हैं। मैम और आन्टी अपनी फिगर काया के प्रति सतर्क है। नतीजतन बिटिया बहुरिया अपनी फिगर को लेकर बेफिक्र है। यौन रोग पहले ‘गुप्त रोग’ थे, इसकी चर्चा शालीनता से होती थी, अब ”यू नो यह नेचुरल फिनामिना है।” यौन शिक्षा का डंका है, हे बेबी, क्रेजी के गीत हैं। ‘तनहाइयां’ का मतलब एकांत नहीं, झलक दिखलाजा है। बसंती इज्जत का सवाल उठाकर घोड़ा नही दौड़ाती, वह इज्जत देने को तैयार है। अमेरिकी संस्कृति गांव में घुस गयी है। ‘नजर लागी राजा तोरे बंगले पर’ की बातें पुरानी हो गयीं। अब ‘बंगले के पीछे खुले आम कांटा’ लगता है। घूंघट विदा हो गया, मेंहदी महावर, सिन्दूर फीके हो गये। बालों का कमजोर होना राष्ट्रीय समस्या है। टी0 वी0 दिनभर बालों को विटामिन देने वाली दवाओं का प्रचार करता है।

स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 नेहरू ने गांव किसान के बजाय औद्यौगिकरण को महत्ता दी। महात्मा गांधी ग्राम आधारित राष्ट्रीय विकास के पक्षधर थे। पं0 नेहरू नहीं माने। गांव उपेक्षित होते गये। ग्राम विकास पर अरबों का बजट बना। राजनेता अफसर और ठेकेदार खा गये। आजादी के 60 बरस हो गये। सरकार शहर में है। अखबार शहर में है। विश्वविद्यालय शहर में है, बड़े स्कूल शहर में हैं। बड़ा अस्पताल शहर में है, कोर्ट कचहरी शहर में है। कप्तान कलक्टर शहर में, लेखक पत्रकार शहर में। गांव का सब्जी दूध सुबह तड़के ही शहर चला जाता है। बिजली शहर में है, वहां जलती है, लेकिन गांव में सिर्फ खम्भे तार ही हैं। शहर में बुद्धि है, वे बुध्दिमान हैं, गांव वाले गंवार हैं। इसीलिए गांव के बच्चों के नाम रामदास, कृष्णकुमार, दिलीप कुमार, अजय प्रताप आदि सांस्कृतिक परम्परा के हैं। शहर के बच्चों में पिंकी, रिंकी, विक्की, मंटी, चिंकी हैं। आक्सफोर्ड डिक्शनरी में भी इनके अर्थ नहीं हैं। गांव में लोकभाषा है, हिन्दी है, या अपनी क्षेत्रीय भाषा है। शहर की हिन्दी हिंग्लिश या अंग्रेजी हो गयी, ”प्लीज इसे अदरवाइज न लें, यू नो प्यारे हिन्दी बोलना डिफीकल्ट है।” गांव ही लोक भाषा बचाए हुए हैं, वे राष्ट्र भाषा के हितरक्षक हैं। वे सनातन संस्कृति के भी रक्षक हैं। प्रीति प्यार के उदाहरण हैं। लेकिन गांव सिकुड़ रहे हैं। शहर फैल रहे हैं। फैलते हुए शहर पड़ोसी इन्हीं गांवों को शहर निगल रहे हैं। गांववासियों ने वेद रचे, वेदांत रचा, उपनिषद रचे, पुराण रचे। भारत के शेक्सपियर तुलसीदास गांव वाले थे। महाकवि निराला ठेठ गंवई थे। हिन्द स्वराज के रचनाकार महात्मा गांधी, एकात्ममानवदर्शन के प्रणेता पं0 दीन दयाल उपाध्‍याय, ‘राम, कृष्ण और शिव’ के व्याख्याता डा0 राम मनोहर लोहिया और ‘भारतीय संस्कृति के चार अध्‍याय’ के लेखक रामधारी सिंह दिनकर गांव संस्कृति से आये। भाषा विज्ञानी डा0 राम विलास शर्मा ऊचगांव सानी (उन्नाव) ने कालजयी दृष्टि दी। ढेर सारे ग्रंथ लिखे। डा0 नामवर सिंह प्रख्यात आलोचक अभी भी गांववाले हैं। गांव प्रेरणा है, गंवार (गांव वाले) मार्गदर्शक। गांव संस्कृति के बीज बचाने चाहिए। जलप्रलय में भी सृष्टि के सारे बीज मनु ने ही बचाए थे। एक और प्रलय सामने है। यह पश्चिमी संस्कृति की हमलावर आंधी है। अब गांव के बीजों की रक्षा के लिए ढेर सारे मनु-मनुष्य चाहिए। हम सब मनुष्य कहे जाते हैं। मनुष्य दरअसल मनु-स्य हैं। स्य का अर्थ ‘का’ होता है, मनुष्य का अर्थ है ‘मनु का’।

गांव और किसान का जोड़ भारत है। ऋषि मर्म और कृषि कर्म मिलकर प्राचीन भारतीय संस्कृति बने। अंग्रेजों के कारण हम इंडिया हुए और पश्चिमी संस्कृति की आंधी में इण्डियन। ग्रामीण भारत में पीने का पानी नहीं लेकिन इण्डियन पेप्सी कोला पीकर प्यासे हैं। इण्डियन सनसनाती ताजगी के बाथरूम सिंगर हैं, ग्रामीण भारतीयों के नसीब में बजबजाती उदासी है। भारत सनातन काल से एक जन, एक संस्कृति, एक राष्ट्र है। इण्डिया हसीन पैक में नया कंट्री। ये पिज्जा वाले हैं, हम चना चबेना वाले। इण्डिया डब्लू0टी0ओ0 के कहे चलता है सो भारत के गांव और खेती का सत्यानाश जारी है। खेती खतरे में है। पहले मानसून और फसल नष्ट करने वाले जंगली जानवर ही किसान के शत्रु थे अब विश्व व्यापार संगठन और संप्रग सरकार भी किसान की शत्रु हैं। भारत कृषि प्रधान देश है, पूरा देश किसान कुल है। किसान अन्नदाता और विधाता हैं बावजूद इसके वे आत्महत्या कर रहे हैं। प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू ने (15 अगस्त 1955) ‘खाद्यान्न आयात को राष्ट्रीय अपमान’ बताया था लेकिन 52 बरस बाद आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा गेंहू आयातक राष्ट्र है। यहां बीते बरस 55 लाख टन गेंहू का आयात हुआ। चालू वित्तीय वर्ष (2007-08) में लगभग यही स्थिति बरकरार रखने की तैयारी है। केन्द्र ने किसानों की गरीबी और खुदकशी से पल्ला झाड़ लिया है। ‘विशेष आर्थिक जोन’ उपजाऊ कृषि क्षेत्र का आकार घटा रहे हैं। किसान नाकारा सिद्ध हो गये। सरकार कृषि अवस्थापना सुविधाओं की जिम्मेदारी से बाहर है। सत्ता दल के नेता कृषि को सब्सिडी संरक्षण देने की राष्ट्रीय नीति पर शर्मिंदा हैं। निजी क्षेत्र ही कृषि का भी उद्धारक है। अब अनुबंध खेती-कान्टै्रक्ट फार्मिंग का नवयुग है। भूमण्डलीकरण के मात्र 16 बरस के भीतर किसानों के महाविनाश की तैयारी है।

भारतीय कृषि व्यवस्था सारी दुनिया में प्राचीनतम है। विश्व के प्राचीनतम अभिलेख ऋग्वेद में विकसित कृषि प्रणाली के ढेर सारे सूत्र हैं। यहां ऋषि भी कृषि से जुड़े। जुताई से बनने वाली नाली को सीता और जुताई को कर्षण कहा गया। भाषा विज्ञानियों के मुताबिक कर्षण से कृषि शब्द बना। भारत कृषि प्रधान देश है। हजारों बरस पहले ऋग्वैदिक काल में यहाँ एक सम्मुनत कृषि व्यवस्था का विकास हुआ। ऋषि मंत्रद्रष्टा थे। कृषि अन्नसृष्टा थी। गीता के कृष्ण अर्जुन को यज्ञ चक्र बताते हैं, ”अन्न से मनुष्य पोषण पाते हैं। वर्षा से अन्न आता है। वर्षा यज्ञ से आती है। यज्ञ सत्कर्मों से आता है। गीता की निष्पत्ति हजारों वर्ष पूर्व ऋग्वेद में भी है। प्रार्थना है कि ”महान द्युलोक और विराट पृथ्वी हमारे यज्ञ को जल से सीचें और पोषण द्वारा हमें पूर्ण करें। (ऋग्वेद 1/22/13) ऋग्वेद के ऋषि के यज्ञ का मतलब आग वाला हवन नहीं है। यहाँ यज्ञ मानवीय सुकर्म हैं। कृषि कर्म यज्ञ हैं। ऋषि इसी यज्ञ में पानी बरसाने की प्रार्थना कर रहे हैं। वैदिक ऋषि सिंचाई के जल की महत्ता से अवगत थे। वे अग्नि से भी पानी बरसाने की प्रार्थना करते है। इनके लिए अग्नि सर्वशक्तिमान हैं वे बाकी देवताओं को भी राजी करने में सक्षम हैं। ऋषि कहते हैं, ”हे अग्नि सभी देवों का सहयोग लेकर वृष्टिवर्धाक मेघ को प्रेरित करो।” (ऋ0 10/98/8) ऋषि जानते हैं कि धरती पर्जन्य से ही उर्वर होती है। ऋषि मरूत देवों से कहते हैं, ”तुम हमारे लिए घुलोक से वर्षा करो” बादलों से कहते हैं, ”आप गरजो। जल से पूर्ण घड़े का मुख नीचे की तरफ करो। पूरा खाली करो।” (ऋ0 5/83/6 व 7)

इन्द्र तब बड़े देवता थे। ऋषि उनसे भी कृषि कर्म की प्रार्थना करते हैं, ”हे इन्द्र हल की मूठ पकड़ो। पूषादेव उसकी निगरानी करे। भूमि उत्तम धान्य तथा जल से पूर्ण हो। प्रत्येक वर्ष हमारे लिए धन्यादि दुहे।” (4/57/7) ऋषियों ने समय की मापनी को ‘वर्ष’ कहा। भारत इसी के चलते भारतवर्ष कहलाया। वर्ष वर्षा के कारण ही समय बोधक बना। इन्द्र ने जल के लिए तमाम युद्ध किये पर अश्विनी देव भी जौ को हल से बोते हैं। (1/117/21) उस वक्त के किसान भी हल जोतते हुए गीत गाते थे। गाना गाकर वे बैलों को पुचकारते थे। किसानों का गायन ऋषियों पर छाया हुआ है। वे मित्र ऋषियों से कहते हैं, ”हे ऋषि खेत जोतने वाला किसान जिस प्रकार बैलों के लिए गाने या तराने गाता है, वैसे ही भलीभांति काव्य गायन करो।” (ऋ0 8/20/19) ऋग्वेद के एक देवता है क्षेत्रपति। इन्हीं देवता के लिए गायी गयी प्रार्थनाओं में पूषन पर हल के ठीक से एक रेखा में चलाने की जिम्मेदारी है। ऋषियों ने हल जोतने से बनी नाली को ‘सीता’ कहा है। सीता से भी प्रार्थना करने में ऋषि नहीं चूके ”उत्तम ऐश्वर्य देने वाली भूमि हम तेरी वंदना करते हैं। (4/57/6) खेत जोतना उस कालखण्ड में कष्टप्रद नहीं है” हल के फाल हमारी भूमि को सुखपूर्वक जोतें। किसान अपने बैलों के साथ सुखपूर्वक चले (ऋ0 4/57/8) क्षेत्रपति की ही तरह मगर कहीं ज्यादा निराले एक और देवता है वेन। वे हिरण्यपक्षी हैं और वरूण दूत हैं। (ऋ0 10/123/6) वे गिद्ध की तरह जल खोजते हैं फिर सूर्य के सहयोग से उसे नीचे भेजते हैं। ”अंतरिक्ष में स्थित उदक को गृध के समान देखते हुए तेजस्वी वेन समुद्र के पास जाते हैं तब सूर्य के समान प्रकाशित कांति से चमकता हुआ पृथ्वी पर प्रिय उदक को पैदा करता है। (ऋ0 10/123/8) समुद्र का जल सूर्य की गर्मी से ऊपर जाता है। वायु दबाव उसे वर्षा में बदलता है। ऋषि ये बातें पूरी तौर पर जानते हैं। वे गाते हैं” वेन आकाश से-अंतरिक्ष से जलों को प्रेरित करता है…. वह सृष्टि के उच्च स्थान आकाश में प्रकाशित होता है ….. अत्यन्त प्राचीन, एक ही स्थान में रहकर शब्द करता हुआ और एक ही ग्रह में वेन के साथ रहने वाले वत्स समान विद्युत अग्नि की मातृभूत अंतरिक्ष में उत्पन्न जल देवता है। जल के उत्पत्ति स्थान उच्चपद में – अंतरिक्ष में वर्तमान मधुर उदक की वाणियाँ उसी की – वेन की स्तुति करती हैं।” (ऋ0 10/123/2, 3)

ऋग्वेद खेत जोतने और सींचने तक के ही कृषि कर्म की चर्चा नहीं करता। उस वक्त के किसान भी खाद (गोबर) डालकर धरती की शक्ति बढ़ाते हैं। (ऋ0 10/101/6)। ऋषि फसल खा जाने वाले पक्षियों को हल्ला करके उड़ाने का भी उल्लेख करते हैं। (ऋ0 10/68/1) फसल कटाई करके गट्ठे भी बांधो जाते थे। (ऋ0 10/101/3) वे फसल को खलिहान में लाते हैं। (ऋ0 10/48/7)। वे अन्न से भूसा भी अलग करते हैं। (ऋ0 10/61/3)। ऋग्वैदिक सांस्कृति राष्ट्र पिछड़ा नहीं था। वह अन्न के लिए कृषि करता था। कृषि के लिए जल की महत्ता से सुपरिचित था। भूमि की उर्वरा शक्ति उसे ज्ञात थी। भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए बार-बार जोतने के यंत्रों का विकास हो चुका था। हल था। हल में फाल था। हल चलाने के लिए वह गोवंश का सदुपयोग कर रहा था। उर्वरा शक्ति मात्र जोतने से ही नहीं बढ़ती इसलिए वह गोबर को खाद के रूप में विकसित कर चुका था। दृष्टा ऋषियों के मध्‍य में एक परिपूर्ण सांस्कृतिक राष्ट्रदर्शन था। वे जल, पृथ्वी, अग्नि और वायु को देवता जान रहे थे। आकाश से वे परिचित थे। ऋषि और कृषि से एक दिव्य दार्शनिक अधिष्ठान भारत में उगा। इसी अधिष्ठान में गाय माता बनी। धरती माता थी ही।

वैदिक काल की परम्परा को ध्‍यान में रखकर संविधान (अनु0 48) ने ”कृषि और पशुपालन को आधुनिक वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने” के निर्देश दिये है। लेकिन राष्ट्र-राज्य ने अपना संवैधानिक दायित्व नही निभाया। स्पेशल इकोनामिक जोन-‘सेज’ (विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र) वरीयता मनमोहन अर्थशास्त्र का नया अजूबा है। मुक्त अर्थव्यवस्था में क्रेता और विक्रेता स्वतंत्र होते हैं। विक्रेता अधिकतम दर पर बेचता है, क्रेता निम्नतम दर पर खरीदता है पर आत्महत्या करते किसान अपनी खेती, गांव और खलिहान मनमाफिक दरों पर बेचने के लिए स्वतंत्र नही। है। सरकार औद्योगिक घरानों के लिए उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण कर रही है। 26800 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण हो गया। 95000 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण की तैयारी है। वाणिज्य मंत्री कमलनाथ ने सेज को विकास का इंजन बताया है, इससे विकास का आधारभूत ढांचा बनेगा पर वित्त मंत्रालय की राय में सन् 2010 तक 160,000 करोड़ रू0 का नुकसान होगा। वाणिज्य मंत्रालय ने इस आंकलन को कागजी बताया है। लेकिन आर्थिक भूमण्डलीकरण के शाही इमाम अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी इसके तौर तरीके पर ऐतराज जताया है।

भाजपा ने सेज अधिनियम 2005 पर पुनर्विचार की मांग की है। जद (यू0) ने पूरा अधिनियम खारिज करने की मांग की है। किसान वैसे भी आहत, हताश और आत्महत्या पर उतारू हैं। ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ के नाम पर उनकी खेती छीनी जा रही है। विशेष औद्योगिक घरानों को व्यक्तिगत अचल सम्पत्ति बनाने के लिए सरकार भारी छूट दे रही है। लायसेंस मुक्त व आयात कर मुक्त आयात की सुविधा है। पूंजीगत सामान पर उत्पादनकर नहीं है। पहले 5 वर्ष तक शतप्रतिशत और बाद के दो वर्ष तक 50 प्रतिशत आयकर छूट है। लाभ को फिर से पूंजी में दिखाने पर अगले 3 वर्ष भी 50 प्रतिशत आयकर छूट होगी। घोषित उद्यम के अलावा विकसित प्लाटों को बाजार भाव पर बेचने की सुविधा है। विशेष आर्थिक क्षेत्र देश के व्यापार कानूनों से मुक्त देश के भीतर स्थित ‘लघु विदेश’ होगा। यहाँ हर तरह की सुविधा होगी, न कानून, न शासन। सो ”मुनाफाखोर उद्यमियों के लिए बम्पर त्योहारी मौका” है।

सवाल यह है कि इसी सेज के ढांचा निर्माण के लिए सीमेन्ट, बिजली के खम्भों और संयत्रों का भी अधिग्रहण क्यों नहीं होता? औद्योगिक पूंजी का अधिग्रहण नहीं होता, तो किसान की पूंजी का ही अधिग्रहण कहां का न्याय है? लाखों ग्रामीणों, किसानों और खेत मजदूरों के विस्थापन की समस्या सामने है। केन्द्र किसान को मुक्त अर्थव्यवस्था का लाभ नहीं उठाने देता। औद्योगिक उत्पाद बाजार भाव पर बिकते हैं, वे अपने उत्पाद की कीमत स्वयं तय करते हैं। कृषि उत्पाद गेंहॅूं, गन्ना और कृषि भूमि की कीमत सरकार तय करती है, किसान सरकार की प्रजा है, शासित है, शोषित है। उद्यमी सरकार के पोषक है, सरकार उनके साथ है, उनकी चाकर है। तो क्या भारतीय राज्यतंत्र पूंजीपतियों के लिए, पूॅजीपतियों द्वारा संचालित, पूंजीपतियों का शासन है।

सेज नीति के प्रस्तोता अटल सरकार के वाणिज्य मंत्री मुरासोली मारन ने शायद ऐसी धंधागर्दी की कल्पना भी नही की होगी। मुरासोली चीन से लौटे थे। उन्होंने चीन के विशेष आर्थिक क्षेत्र-सेज देखे। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के निर्यातोन्मुख उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अप्रैल 2000 में सेज योजना की घोषणा की। जरूरी सुविधाओं और प्रतिबंधों वाले परिपत्र भेजे गये। अटल जी के शासन में पूरा नियंत्रण सरकार के हाथ था लेकिन संप्रग सरकार ने कानून बनाया। संप्रग के मुताबिक राजग सरकार की व्यवस्था उद्यमियों को उत्साहित करने में विफल थी। सरकार द्वारा प्रस्तावित विधोयक की धारा 49 सेज के हित में सेज में बाधक इस विधोयक सहित किसी भी अधिनियम की धारा को निरस्त करने का अधिकार देती थी। संप्रग सरकार का उत्साह समझने के लिए मूल विधोयक की मंशा काफी है।

किसान हाहाकार ने सेज नीति पर कई बुनियादी सवाल उठाये हैं- (1) भूमि सीमित है, सेना, सार्वजनिक अस्पताल, विद्यालय और सरकारी दफ्तर की बात ठीक है। क्या व्यावसायिक हितों के लिए भी भूमि अधिग्रहण किया जाना चाहिए? (2) खाद्यान्न आत्मनिर्भरता स्वतंत्रता, स्वाबलम्बन की प्रथम गारंटी है, क्या कई फसलें देने वाली कृषि भूमि का भी अधिग्रहण औद्योगिक हितों के लिए न्यायोचित है? (3) कृषि भूमि का मालिक किसान है, क्या किसान से सस्ते दर पर जमीन लेकर व्यापारियों को देना न्याय है? (4) सेज व्यापारियों को मुनाफा देंगे? तब व्यापारियों को करोड़ों रूपये की कर छूट का औचित्य क्या है? (5) सेज की असफलता पर भू-उपयोग की क्या नीति होगी? उन्हें मिली भूमि और कर छूट क्या उन पर देनदारी होगी? (6) अंतरराष्ट्रीय स्तर की कृषि उपज बढ़ाने के लिए क्या सरकार इसी तर्ज पर किसानों को कई तरह की छूट और सुविधाएं देकर ”विशेष कृषि क्षेत्र” भी बनाएगी? (7) क्या राज्यस्तरीय अधिग्रहण कानूनों में व्यावसायिक कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण पर रोक लगाना राष्ट्रीय आवश्यकता नहीं है और (8) क्या राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विरोध को देखते हुए सेज कार्रवाई पर संसद में नए सिरे से बहस नहीं हो सकती? मुट्ठी भर औद्यौगिक घरानों के लिए लाखों किसानों को बेघरबार करना कोई राष्ट्रहित नहीं है।

भारत आज दुनिया का नम्बर एक गन्ना उत्पादक प्रथम फल उत्पादक व दूसरा चावल उत्पादक, सब्जी उत्पादक देश है। भारत ने ही सर्वप्रथम कपास की संकर प्रजाति एच04 का आविष्कार किया। यहां 6 ऋतुएं हैं। परिश्रमी किसान हैं। लोक जीवन में ‘उत्तम खेती मध्‍यम बान’ की आस्था है। लेकिन आजादी के प्रथम दिवस (15 अगस्त 1947) से ही खेती उपेक्षित है। पहले खेती किसानी की उपेक्षा पर संसदीय बहसों में उबाल लाता था, अब वह भी खत्म हो गया। किसान लड़ाकू वर्ग और वोट बैंक नहीं बन पाये। राजनीति में जाति और मजहब को प्रथम वरीयता मिली। भूमण्डलीकरण ने राष्ट्रीय सरहदें तोड़ी, प्रधानमंत्री के दिल दिमाग पर भूमण्डलीकृत अमेरिकी जादू और नशा है। वे अमेरिका और भारत में फर्क नहीं करते। अमेरिका की आबादी लगभग 28 करोड़ है, इसके सिर्फ 2 प्रतिशत किसान हैं। कारपोरेट खेती उनके लिए मुफीद हो सकती थी लेकिन अमेरिका में भी औद्योगिक खेती के चलते छोटे किसान खत्म हो गये।

भारत में लगभग 60 करोड़ किसान है। कृषि जोते पारिवारिक बंटवारे के साथ हर बरस छोटी होती जा रही है। औद्योगिक खेती बहुत बड़ी जोतों पर ही लाभ देती है। कारपोरेट खेती ब्राजील और मैक्सिको में भी कामयाब नहीं हुई। भारत के पंजाब में भी इस खेती के बुरे नतीजे ही आये। कर्नाटक में भी यह असफल रही। औद्योगिक घराने फौरन लाभ चाहते हैं। वे रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुध प्रयोग करते है। किसान अपने खेत के प्रति श्रद्धा रखते है। वे उसकी उर्वर क्षमता को स्थाई रखने और बढ़ाने के प्रयास करते हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और औद्योगिक घरानों के लिए मुनाफा ही ब्रह्म होता है। औद्योगिक घराने कृषि और किसान के शोषण दोहन से मुनाफा लेते है। ठेका खेती/कारपोरेट-कान्ट्रैक्ट फार्मिंग का विरोध अभी 2 माह पूर्व (29 मई 2007) सम्पन्न राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में भी हुआ। सिध्दांत भावना है कि पूंजी से ही पूंजी का निर्माण होता है। इसके लिए निजी क्षेत्र को जोड़ना जरूरी है। सरकारी पूंजी और निजी पूंजी में फर्क होते हैं। सरकारी पूंजी निवेश का लक्ष्य समाज कल्याण होता है और निजी पूंजी निवेश का लक्ष्य सिर्फ मुनाफा। जिसकी पूंजी होगी, उसी के लिए आगे पूंजी का निर्माण भी होगा। डब्लू0टी0ओ0 और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ पूरे देश को ही ‘मण्डी’ बना रहे हैं।

अमेरिका के किसान लुप्त प्राय: प्रजाति बन गये, सन् 2000 के आखिरी दशक में हुई जनगणना में अमेरिकी इतिहास में पहली बार किसान अलग से वर्गीकृत नहीं हुए। केन्द्र भारतीय कृषि को विश्व व्यापार संगठन के अर्थशास्त्र से चलाता है। यूरोपीय संघ, जापान, कनाडा और अमेरिका सहित सभी विकसित देश कृषि क्षेत्र पर भारी भरकम सब्सिडी देते है तभी तो उनके कृषि उत्पाद भारत आकर भी सस्ते रहते है। इसके ठीक उलट वे भारत पर सब्सिडी घटाने का दबाव बनाते है। भारत आयात शुल्क भी घटाता है। भारत तेल उत्पादन में बढ़ा चढ़ा था, सरकार ने शुल्क घटाया, तेल आयात बढ़ गया। केरल के नारियल किसान घाटे में गये, वे आयातित तेल कीमतों के सामने नहीं टिक पाये। यही मार महाराष्ट्र के तिलहन किसानों पर भी पड़ी। सरकार ने एक बार फिर कुछ समय पहले तेल आयात कर घटाया है। देशी गेहूं का समर्थन मूल्य सस्ता है। आयातित गेहूं मंहगा है। मनमोहन सरकार विदेशी किसानों को फायदा पहुंचाती है। स्वदेशी किसान सल्फास खाकर मर जाते हैं।

दरअसल भारतीय कृषि का अलग अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र है। कृषि भारत की विशेष जीवन पद्धति भी है। प्राचीन काल से ही कृषि यहां राज्य संरक्षित थी। हरित क्रांति के पीछे राज्य प्रयोजित कृषि संवर्ध्दन, समर्थन और बजट की ताकत थी। स्वामीनाथन जैसे कृषि-ऋषि की योजनाएं थी। लुटेरे अंग्रेजीराज के वक्त भी भारतीय कृषि के उत्थान के लिए रायल कृषि आयोग (1928) ने तमाम उपाय सुझाये। उसके भी बहुत पहले सम्राट अशोक ने कृषि को वरीयता दी। उसके भी पहले महाभारतकाल में नारद को युधिष्ठिर ने बताया कि आपकी कृपा से किसानों को हम सारी सुविधाएं देते हैं, कृषि वर्षा पर निर्भर नहीं है। लेकिन संप्रग राज में कृषि चौपट है।

-हृदयनारायण दीक्षित

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3 Comments on "भारत के गांव जीवमान कविता है"

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hiten bhatt
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It is very thougtful thenks

डॉ. मधुसूदन
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(१) सेज के ढांचा निर्माण के लिए सीमेन्ट, बिजली के खम्भों और संयत्रों का भी अधिग्रहण क्यों नहीं होता? (२) औद्योगिक पूंजी का अधिग्रहण क्यों नहीं होता? (३) तो किसान की पूंजी का (भूमिका) ही अधिग्रहण कहां का न्याय है? (४) औद्योगिक उत्पाद बाजार भाव पर बिकते हैं, उद्योजक, अपने उत्पाद की कीमत स्वयं तय करते हैं। फिर, कृषि उत्पाद गेहूं, गन्ना, और कृषि भूमि की कीमत सरकार क्यों तय करती है? (५) किसान सरकार की ही, प्रजा है, शासित है, शोषित है। और उद्यमी निवेशक सरकार के पोषक(चुनावी चंदा देते) है, तो, सरकार उनके साथ है, उनकी चाकर है।===… Read more »
sunil patel
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धन्यवाद दीक्षित जी. बहुत अच्छा लिखा है. वाकई किसी समय गाव आत्म निर्भर थे. देश वास्तव में विकसित तभी हो सकता है जब कृषि को संरक्षण मिले.

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