लेखक परिचय

अखिलेश आर्येन्दु

अखिलेश आर्येन्दु

वरिष्‍ठ पत्रकार, टिप्पणीकार, समाजकर्मी, धर्माचार्य, अनुसंधानक। 11 सौ रचनाएं 200 पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। 25 वर्षों से साहित्य की विविध विधाओं में लेखन, अद्यनत-प्रवक्ता-हिंदी।

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अखिलेश आर्येन्दु

बात महज इतनी-सी नहीं है कि जम्मू-कश्मीर सरकार मीडिया पर जो आरोप लगा रही है उसमें सच्चाई कितनी है। बात गहरी है। उस गहराई को कई कोणों से समझने की जरूरत है। मीडिया पर यह आरोप पहली बार नहीं लगाया गया है। सरकार इसके पहले भी कोई न कोई बहाना लेकर मीडिया के चरित्र को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करती रही है। ताजा आरोप, सरकार के खिलाफ जो निराधार खबरें छापने और सरकार के प्रति निंदा प्र्रस्ताव अभियान चलाने का है, इस पर कोई यूं ही यकीन नहीं कर लेगा। सवाल यह है कि मीडिया राज्य सरकार के प्रति क्या कोई नफरत की भावना रखता है ? या सरकार को जानबूझ कर बदनाम करने की मंशा पाले हुए है? इसमें से कोई भी व्यक्ति या संस्था यह यकीन नहीं कर सकते कि सरकार के प्रति जम्मू-कश्मी र का मीडिया दुराग्रह पाले हुए हैं। दूसरी बात मीडिया राज्य सरकार की किन बातों को लेकर दुराग्रह पाले हुए है? क्यों पाले हुए है? जब तक इन सवालों का माकूल जवाब सरकार नहीं देती तब तक मीडिया को कठघरे में खड़ा करने का कोई तुक समझ में नहीं आता है।

राज्य सरकार यदि इन आरोपों की वजह से अखबारों में सरकारी विज्ञापनों को रोकती है तो यह भी कोई औचित्य पूर्ण कदम नहीं माना जा सकता है। इसका मतलब मीडिया को सरकार तब विज्ञापन देगी जब उसकी हर गलत नीतियों का समर्थन करके इसके पक्ष में इन्हें औचित्यपूर्ण ठहराए। यह तो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है।

और रपट की जांच किसी सक्षम संस्था द्वारा कराए जाने की अनुशंसा पर एक निश्पक्ष दृष्टिकोण रखने की जरूरत है। यह बात ठीक है कि राज्य सरकार की न तो सभी नीतियों को गलत ठहराया जा सकता है और न तो सही । मीडिया को इसमें अपनी स्थिति और स्वभाव के मुताबिक कार्य करने की जरूरत है। सारे देश में केंद्र या अन्य राज्य सरकारें मीडिया में जो विज्ञापन देते हैं उनमें कोई ऐसी शर्त नहीं होती कि जब तक मीडिया तारीफ का पुल न बांधे तब तक उन्हें सरकारी विज्ञापन नहीं दिया जाएगा। यह लोकतांत्रिक देश भारत में ही संभव है। मीडिया न तो सरकार से बंधी है और न तो सरकारी फैसलों से। मीडिया अपने कार्य और अनुशासन से जरूरत बंधा है। इस लिए सरकार को मीडिया और अपनी सीमाओं को समझना चाहिए। यह बात जरूर गौर करने वाली है कि दोनों को अपनी सीमाओं को जरूर समझना चाहिए। एक-दूसरे को दुराग्रह या परेशान करने की मंशा से कभी कार्य नहीं करना चाहिए।

प्रकाशकों की इस बात में दम जरूर लगता है कि जो अखबार सरकार के संकेतों पर नहीं चलते हैं उनके विज्ञापन रोक दिए जाते हैं। ऐसा आरोप प्रकाशक महज जम्मू-कश्मी र की सरकार पर नहीं लगा रहे हैं, इसके पहले भी कुछ विशेष स्थितियों में प्रकाशक लगाते रहे हैं। हां, यह बात जरूर गौतलब है कि मीडिया को देश, संस्कृति और सेना के खिलाफ ऐसा कुछ नहीं लिखना चाहिए जो देश या राज्य सरकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो। लेकिन यदि शासन और प्रशासन में किसी भी हिस्से या विशय में गड़बड़ी है तो उसे पूरी निष्पकक्षता के साथ उजागर करना मीडिया का पहला धर्म है। इस ‘धर्म’ का निर्वाह यदि मीडिया कर रहा है तो उसे सरकार विरोधी कदापि नहीं माना जा सकता है। राज्य सरकार को इस पक्ष को बिना किसी दुराग्रह के अवष्य समझना चाहिए। राज्य सरकार यदि झूठी प्रशंसा के बदले ही विज्ञापन देने का नियम बनाया है तो यह उसकी सोच में बहुत बड़ा ‘दोष’ है। इस दोश पर उसे गम्भीरता से ध्यान देना चाहिए।

रपट में यह भी कहा गया है कि मीडिया संस्थान द्वारा अपने प्रकाशकों की प्रसार संख्या बढ़ाकर बताने की बात भी कही जा रही है। इस रपट की हकीकत को समझना चाहिए। रपट कहीं राज्य सरकार को खुश करने या मीडिया को बदनाम करने की नियत से तो नहीं प्रस्तुत की गई है? यह ऐसा सवाल है, जिसपर गौर करने की जरूरत है, क्योंकि मीडिया संस्थान रपट को दुराग्रहपूर्ण बता रहे हैं।

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