लेखक परिचय

प्रतिमा शुक्ला

प्रतिमा शुक्ला

मूलत: लखनऊ से हूं। पत्रकारिता जगत में कार्यरत हूं। कविताएं, जनसरोकार के विषयों पर महिला और बाल कल्याण पर स्वतंत्र लेखन कार्य पिछले कई वर्षों से कर रही हूं। वर्तमान कार्यक्षेत्र नई दिल्ली हैं।

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प्रतिमा शुक्ला

पटियाला हाउस कोर्ट की घटना, हमें संवैधानिक विचारधारा की वकालत करने पर दोगला साबित करती है। एक तरफ जहां हम संविधान निहित देश के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का विरोध कर रहें, वहीं जेएनयू के छात्रों को ‘देशद्रोही’ बता रहें है।
दूसरे ही क्षण हम उन छात्रों व पत्रकारों को न्यायालय परिसर में पीटने की घटना को न्यायसंगत बताते है, यह सरासर न्यायालय व संविधान को कमतर करना है। यह घटना इसलिए अपाच्य है क्योंकि कानून के संरक्षक वकील ही कानून को तोड़़ते पाये गये, वकील बिना किसी रोक टोक व कोर्ट परिसर की अनदेखी करते हुए दिखे, जेएनयू की घटना ने देश के अग्रिम पंक्ति के महानुभावों के विचारों में भी दो धड़े कर दिये है, एक जो इस घटना को राष्ट्रविरोधी बता रहें हंै। जेएनयू में कार्यरत प्रोफेसर पर निगाह रखे व जांच करानी चाहिए। दिल्ली हाई कोर्ट ने जेएनयू देशद्रोह मामले की एनआईए से जांच कराने की मांग से जुड़ी याचिका मंगलवार को खारिज कर दी।
वहीं इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देकर ऐसे वक्तव्यों का प्रचार व प्रसार कर रहें। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का ताजा घटनाक्रम बेहद चिंताजनक है। इस विश्वविद्यालय की गिनती देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित उच्चशिक्षा संस्थानों में होती रही है। यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसे मान-सम्मान हासिल है।
जेएनयू की एक खासियत वामपंथी सोच वाले परिसर के रूप में भी रही है। दशकों से अमूमन यहां के छात्रसंघ पर वामपंथी छात्र संगठन ही काबिज होते आए हैं। जेएनयू मामला दिन प्रतिदिन गरमाता जा रहा है। देश विरोधी नारे लगाने के आरोप में गिरफ्तार हुए जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पेशी के दौरान दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में जमकर हंगामा हुआ साथ ही पेशी के दौरान वकीलों और कुछ युवकों ने भारत माता की जय के नारे लगाए साथ ही आरोप लगाया कि कोर्ट परिसर में बीजेपी विधायक ओपी शर्मा और कुछ अन्य ने नारेबाजी कर रहे युवकों की पिटाई की है। इस दौरान मीडियाकर्मियों से भी बदसलूकी की। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में मौजूद पत्रकारों से भी दुव्यवहार किया। प्रदर्शन कर रहे वकीलों ने महिला पत्रकारों के फोन छीन लिए और उन्हें कोर्टरूम के अंदर नहीं जाने दिया। महिला पत्रकारों को धमकी भी दी। पुलिस मारपीट के आरोपी बीजेपी विधायक को मेडिकल टेस्ट के लिए ले गई है केस भी दर्ज किया जा सकता है। बीजेपी विधायक ओपी शर्मा और उनके समर्थकों पर छात्रों और महिला पत्रकारों से बदसलूकी का आरोप लगा है। पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर विधायक के समर्थक नारेबाजी कर रहे थे। बीजेपी विधायक ओपी शर्मा ने आरोपों पर सफाई देते हुए कहा, मैं कोर्ट से निकल रहा था, तभी हमने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे सुने और इसका विरोध किया। जिस पर लोगों ने मुझे धक्का दिया। इसी प्रतिक्रिया में कुछ लोगों ने उस शख्स के साथ मारपीट की जो नारेबाजी कर रहा था। दिल्ली पुलिस के कमिश्नर बीएस बस्सी ने कहा कि कन्हैया के खिलाफ मजबूत सबूत मिले, वीडियो में साफ तौर पर दिखा कि वह देश विरोधी नारे लगे और देश के खिलाफ भाषण दिया। जेएनयू में आतंकी अफजल गुरु के समर्थन में कार्यक्रम आयोजित करने और देश विरोधी नारे लगाने के आरोप में जिन 8 अन्य छात्रों का नाम सामने आया है, छात्र संगठनों ने उन्हें जेएनयू की जांच समिति के सामने उपस्थित न होने के लिए कहा, इन छात्रों की एकडमिक गतिविधियों पर रोक लगा दी गई, उन्होंने आरोप लगाया है कि जांच कमेटी स्वतंत्र नहीं है। इसी क्रम में आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता आशुतोष ने सोमवार को दावा किया कि जेएनयू विवाद पर उन्हें दूसरी बार जान से मारने की धमकी मिली है. आप नेता ने कहा कि इस मुद्दे पर उन्होंने पुलिस से संपर्क किया है। आशुतोष ने ट्वीट किया, ‘‘जेएनयू मुद्दे पर मुझे व्हाट्सएप्प पर जान से मारने की धमकी मिली और कहा गया कि जिस तरह आतंकवादी मारे जाते हैं वैसे ही हम तुम्हें मार देंगे। दिल्ली पुलिस को सूचित किया। ऐसा 24 घंटे में दूसरी बार हुआ। वहीं दूसरी ओर जेएनयू परिसर में नौ फरवरी को आयोजित कार्यक्रम का एक नया वीडियो सामने आया है जिसमें विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार उस भीड का हिस्सा है जिसमें कुछ लोग भारत विरोधी नारे लगा रहे हैं। एक जगह कन्हैया कुछ पुलिस अधिकारियों के नजदीक खडे़ दिखते हैं और कुछ युवकों का परिचय पत्र जांच रहे, जो संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी पर लटकाने के खिलाफ आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए हुए थे। इस घटना से विश्वविद्यालय की छवि पर आंच आई है, और जेएनयू के तमाम लोग भी उतने ही दुखी हैं जितने कि बाहर के लोग। दिल्ली पुलिस ने बीते शुक्रवार को छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह और आपराधिक षड्यंत्र के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। इसके एक दिन बाद सात और छात्रों की गिरफ्तारी हुई, उन्हीं आरोपों में जिनमें कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया गया था। कुछ कार्रवाई विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी अपने स्तर पर की है। एक अनुशासनात्मक समिति की सिफारिश पर आठ छात्र निलंबित कर दिए गए। कन्हैया कुमार का कहना है कि वे और उनका संगठन कभी राष्ट्र-विरोधी गतिविधि में शामिल नहीं रहेय उन्हें राजनीतिक कारण से फंसाया जा रहा है। सच क्या है, इसकी जांच होनी चाहिए। बारीकी से जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जेएनयू का यह घटनाक्रम तीखे राजनीतिक विवाद का भी विषय हो गया है।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह समेत कई केंद्रीय मंत्रियों ने कड़े बयान जारी किए तो दूसरी ओर विपक्ष के कई नेताओं ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के तौर-तरीके पर सवाल उठाते हुए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किए जाने के आरोप लगाए हैं। तो क्या दिल्ली पुलिस की कार्रवाई गैर-आनुपातिक थी? जो हो, यह जेएनयू के लिए घोर चितांजनक मामला है। उसकी छवि को इन दिनों जैसी क्षति हुई है, शायद ही पहले कभी हुई हो। इसलिए यह विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षक समुदाय और विद्यार्थी जमात, सबके लिए गहरे मंथन का समय है कि कैसे इस तरह की अवांछित गतिविधि न होने दी जाए। विश्वविद्यालय की लोकतांत्रिक परंपरा और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए भी यह जरूरी है।

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