लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

images (1)पिछले दिनों उ0प्र0 शासन के एक मंत्री आजम खान को अमरीका के हवाई अड्डे पर जांच के लिए कुछ देर रोका गया। सुना है इससे पहले शाहरुख खान और पूर्व राष्ट्रपति डा0 कलाम के साथ भी ऐसा हो चुका है। आजम खान वहां उ0प्र0 के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ गये थे। दोनों समझ गये कि इस प्रकरण से उन्हें राजनीतिक लाभ हो सकता है। इसलिए उन्होंने यात्रा निरस्त कर दी और भारत आकर खूब शोर किया।

शाहरुख एक प्रसिद्ध कलाकार हैं। उन्होंने भी शोर तो किया; पर यात्रा निरस्त नहीं की। क्योंकि इससे उन्हें करोड़ों रु0 की हानि हो जाती। डा0 कलाम अपनी शालीनता का परिचय देते हुए शांत रहे। उन्हें पता है कि वर्ष 2001 के आतंकी हमले के बाद अमरीका में सुरक्षा बहुत कड़ी कर दी गयी है और मुसलमानों को विशेष निगाह से देखा जाता है। वैसे मुसलमान न होते हुए भी ऐसी जांच से रा.ज.ग. सरकार के रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज गुजर चुके हैं।

वस्तुतः व्यक्ति और समाज एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अतः व्यक्ति के काम का फल पूरे समाज को तथा समाज की छवि का फल व्यक्ति को मिलता है। जब कैकई ने राम के लिए वनवास और भरत के लिए राजगद्दी मांगी, तब राजा दशरथ ने ‘‘रघुकुल रीति सदा चली आई, प्रान जाहुं बरु बचनु न जाई’’ कहते हुए उसकी बात मान ली। भले ही राम के वियोग में उनके प्राण चले गये। राजा हरिश्चंद्र ने भी स्वप्न में दिये अपने वचन के अनुसार अपना राज्य मुनि विश्वामित्र को दे दिया। तभी से यह कथन प्रचलित हो गया –

चंद्र टरै, सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार

पै दृढ़ श्री हरिश्चंद्र कौ, टरै न सत्य विचार।। 

हम सब भारतवासी श्रीराम और हरिश्चंद्र के वंशज होने के कारण प्रायः इन उद्धरणों को याद करते हैं। ऐसे ऐतिहासिक प्रसंग तो हजारों हैं; पर कुछ ताजे प्रसंग भी बताते हैं कि अच्छी या बुरी तथा सच्ची या झूठी बातों की छाया बहुत लम्बे समय तक साथ चलती है।

देश विभाजन के समय पंजाब और सिन्ध में हिन्दुओं का भारी संहार हुआ। यद्यपि नेहरू और माउंटबेटन कह रहे थे कि जनसंख्या की अदलाबदली शांति से हो जाएगी; पर मुस्लिम लीग के इरादे पहले दिन से ही साफ थे। अतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वाले भी इसके प्रतिरोध की तैयारी कर रहे थे। जिन्ना चाहता था कि या तो सब हिन्दू मुसलमान बन जाएं या उन्हें मार दिया जाए; पर संघ के प्रयास से अधिकांश हिन्दू जीवित भारत आ सके। उन्होंने उपद्रवियों को उन्हीं की भाषा में मुंहतोड़ जवाब भी दिया।

जरा सोचें, यदि स्वयंसेवक ऐसा न करते, तो करोड़ों हिन्दू मारे जाते और लाखों नारियों की इज्जत लुटती। अतः उस समय शस्त्र उठाना तात्कालिक धर्म था। उसके बाद ऐसे सामूहिक प्रतिकार का कोई प्रसंग नहीं हुआ; पर आज भी मुसलमानों के फर्जी हितचिंतक संघ को उनका शत्रु बताते हैं, जबकि सच यह है कि स्वयंसेवक अपने पड़ोसियों के दुख-सुख में बराबर का सहभागी होता है, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान या कोई और।

विभाजन काल की इस भूमिका से हिन्दुओं में संघ के प्रति अत्यधिक प्रेम जाग्रत हुआ। उन दिनों सरसंघचालक श्री गुरुजी को सुनने लाखों लोग आते थे। इससे नेहरू को लगा कि संघ राजनीति में आकर उन्हें सत्ता से हटा देगा। अतः उन्होंने गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ को प्रतिबंधित कर दिया। प्रचार माध्यमों से संघ को खूब बदनाम किया गया। तब तक संघ का विस्तार बहुत कम था। अतः स्वयंसेवकों पर घातक हमले हुए और कार्यालय लूटे गये।

संघ ने प्रतिबंध हटाने हेतु सत्याग्रह किया। हजारों स्वयंसेवक जेल गये। न्यायालय में भी यह झूठ ठहर नहीं सका। अतः शासन को प्रतिबंध हटाना पड़ा। इस तप का लाभ संघ को 1975 और 1991 के प्रतिबंधों के समय मिला। दोनों बार आम जनता की सहानुभूति और सहयोग शासन की बजाय संघ के साथ रहा।

यदि 1980 के दशक को याद करें, तो उन दिनों देश भर में सिखों को शक की निगाह से देखा जाता था। कैसा आश्चर्य है कि जिस पंजाब ने पश्चिम से आ रही बर्बर इस्लामी आंधी को सैकड़ों साल तक अपने सीने पर झेला तथा जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सर्वाधिक बलिदान दिये, उन्हें ही आतंकी मान लिया गया।

एक बार मैं बस में यात्रा कर रहा था। उसमें दो सिख भी थे। मार्ग में कुछ पुलिसकर्मी चढ़े। उन्होंने कुछ अटैची और थैलों को इंगित कर पूछा – ये किसका है, खोल कर दिखाओ। फिर उन सिखों से पूछा – तुम्हारा सामान कहां है, उसे भी दिखाओ।

जरा सोचिये, बस के 50-60 लोगों में से दो-चार के ही सामान देखे गये; पर उन दोनों से पूछ कर उनके सामान की विशेष जांच हुई। इससे उन्होंने स्वयं को कितना अपमानित अनुभव किया होगा; पर उन दिनों यह आम बात थी।

वस्तुतः उन दिनों पंजाब में जरनैल सिंह भिंडरवाले का आतंक व्याप्त था। पावन स्वर्ण मंदिर पर उसका कब्जा था। मंदिर के गं्रथी तथा अन्य पदाधिकारी प्राणभय से चुप थे। हर दिन हिन्दुओं की हत्याएं हो रही थीं। अतः वे वहां से भागने लगे। इसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ा। लोग ऊपर से तो शांत थे; पर अंदर ही अंदर गुस्सा उबल रहा था। लोग इस बात से भी नाराज थे कि पीढि़यों से साथ रह रहे, उनके पड़ोसी सिख भी इन हत्याओं का उतना मुखर विरोध नहीं करते, जितनी उनसे अपेक्षा थी।

भिंडरवाले को इंदिरा गांधी ने ही आगे बढ़ाया था; पर जब वह भस्मासुर बन गया, तो मजबूर होकर इंदिरा गांधी को स्वर्ण मंदिर में सैनिक कार्यवाही करनी पड़ी। इससे सिखों में नाराजगी फैल गयी। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद रेडियो पर प्रसारित हुआ कि हत्यारा एक सिख था। राजीव गांधी ने भी बड़े पेड़ के गिरने से धरती हिलने वाली बात कह दी। परिणामतः लोगों के मन में संचित आक्रोश फूट पड़ा। चंूकि हत्या दिल्ली में हुई थी, इसलिए इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव भी वहीं हुआ और हजारों सिख मार डाले गये। बाकी देश में भी आगजनी और लूटपाट का तांडव होता रहा।

इस प्रकरण से दोनों ओर पैदा हुए अविश्वास को शांत होने में वर्षों लग गये। इस समस्या का प्रभाव भारत, और विशेषकर उत्तर भारत में अधिक हुआ; पर अपार जन और धनहानि होने पर भी प्रबुद्ध हिन्दुओं और सिखों ने धैर्य नहीं खोया और आपसी रिश्ते फिर बहाल हो गये।

जहां तक मुस्लिम आतंक की बात है, यह बीमारी पूरी दुनिया में फैल चुकी है। ये आतंकी हिन्दुओं या ईसाइयों को ही नहीं, एक-दूसरे को भी मार रहे हैं। शिया, सुन्नी, पंजाबी, सिन्धी, मुहाजिर, हजारेवाल, पारचिनार, बलूच, कश्मीरी, पठान, पख्तून, तुर्क, कजाक, बंगलादेशी, रोहिंग्या… सब मारकाट में लगे हैं।

इस आतंक से भारत भी बहुत पीडि़त है। पिछले कुछ वर्षों में हुए सैकड़ों विस्फोटों में हजारों लोग मारे गये हैं। दिल्ली, मुंबई, पुणे, हैदराबाद, बंगलौर, श्रीनगर, जम्मू….; सब जगह खून बहा है। इनमें देशी-विदेशी मुसलमान आतंकियों का हाथ होने पर भी किसी बड़े मुसलमान नेता ने खुलकर इनका विरोध नहीं किया। हां, आरोपियों को छुड़ाने के लिए उनके प्रयास लगातार जारी हैं।

ऐसे प्रसंग बार-बार देख और सुनकर लोगों को क्रोध तो आता ही है। और वह कब विस्फोट बन जाए, कहना कठिन है। गोधरा को याद करें। रेल के डिब्बे में भजन कर रहे हिन्दुओं को जब पैट्रोल डालकर जला दिया गया, तो उसकी प्रतिक्रिया से निर्दोष लोग भी नहीं बच सके। फिर भी मुसलमान नेताओं ने कुछ नहीं सीखा। आम मुसलमान आतंकवादी नहीं है। वह शांति से अपनी रोटी कमाना और बच्चों को पढ़ाना चाहता है; पर ये नेता उसे चैन से जीने नहीं देते।

मामला बिल्कुल साफ है। संघ ने झूठे आरोपों और प्रतिबंध का सामना सदा धैर्य और अहिंसक तरीके से किया। इसलिए स्वयंसेवकों पर देश भर में विश्वास किया जाता है। जिस मोहल्ले में शाखा लगती है, वहां के लोग स्वयं को सुरक्षित अनुभव करते हैं। उत्तराखंड का मेरा प्रत्यक्ष अनुभव है कि वहां सरस्वती शिशु मंदिर के आचार्य को विधायक और तहसीलदार से भी अधिक आदर मिलता है।

इसका कारण यह है कि संघ ने सदा सच का साथ दिया और खतरे उठाकर भी गलत का विरोध किया। स्वयंसेवक भी यदि कभी राह से भटका, तो उसे अलग करने में देर नहीं की। पंजाब में हिन्दुओं की हत्याओं पर यद्यपि सिख नेता प्राणभय से चुप रहे; पर उन्होंने भिंडरवाले का समर्थन भी नहीं किया। दूसरी ओर इस्लामी आतंकवादियों के प्रति मुस्लिम नेताओं का व्यवहार प्रायः समर्थन का ही है। इसलिए दुनिया भर में उन्हें शक की निगाह से देखा जाता है।

इतिहास गवाह है कि किसी भी संस्था, पंथ, सम्प्रदाय और मजहब के विकास या विनाश में नेताओं के साथ-साथ उसके अनुयायियों की भी बहुत बड़ी भूमिका रहती है। बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या के कारण भारत की राजनीति मुस्लिम वोटों से अत्यधिक प्रभावित हो रही है। इसलिए उनके आगे अधिकांश राजनीतिक दल सिर झुका रहे हैं; पर अमरीका में तुष्टीकरण की बीमारी नहीं है। इसीलिए आजम और शाहरुख की विशेष जांच हुई और शायद आगे भी होती रहेगी।

यदि मुसलमान चाहते हैं कि उनके माथे से यह दाग मिटे, तो उन्हें अपने बीच से ऐसा नेतृत्व उभारना होगा, जो खतरे उठाकर भी वोटों की दलाली करने वाले नेताओं को खारिज करे। डा0 रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध’ कहकर शायद ऐसे ही लोगों को कुछ संकेत दिया है।

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2 Comments on "जो तटस्थ हैं…।"

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डॉ राजीव कुमार रावत
Guest
डॉ राजीव कुमार रावत

विजय जी
प्रणाम
बहुत अच्छा लेख
बधाई
और लिखते रहें शुभकामनाएं
संघ नेतृत्व को यह जबाव तो हम सब हितचिंतकों एवं शुभचिंतकों को देना ही पड़ेगा़
कि संघ के लोग जब पतित होते हैं तो वह आम कांग्रेसी से भी ज्यादा भ्रष्ट क्यों होते हैं
और संघ का भाजपा के दोगले पन पर कोई नियंत्रण क्यों काम नहीं आता, आज मेरे जैसे
लाखों करोड़ों लोग जो भारतीय संस्कारों में पले होने के कारण स्वतः ही संघ से नजदीकी
महसूस करते थे, कांग्रेस से भी ज्यादा दिशाहीनता एवं जडत्व में भाजपा को देख सिर्फ बाल
नौंच कर खिसिया कर रह जाते हैं, फिर तटस्थ क्यों पाप का भागी बनेगा…..

Dr. Madhusudan
Guest

==>Islam ghor pratikriya hi de sakata hai. (Brain washed manovritti hai)
jo Baahar vahi andar bhi.

==>Pakistan ki ghatanaen kya batati hai?
===>Shiya, Sunni, Sufi—–Saare aapasa men ladenge.

ASHA:
aur (shayad?) pachas varsh lagenge, Islam ko path seekhane men.
==>koi guarantee nahin.

===>Isako “Viscousity” kahate hain.<===

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