लेखक परिचय

राम कृष्ण

राम कृष्ण

टेलि. 4060097 सम्पादन प्रमुख : न्यूज़ फ़ीचर्स ऑ़फ़ इण्डिया संस्थापक अध्यक्ष : उत्तर प्रदेश फ़िल्म पत्रकार संघ श्रेष्ठतम लेखन के लिये स्वर्णकमल के राष्ट्रीय पुरस्कार से अलंकृत 14 मारवाड़ी स्ट्रीट . अमीनाबाद . लखनऊ 226 018 .

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रामकृष्ण

जॉनी वॉकर की याद है न आपको ? किसी ज़माने में हिन्दी फ़िल्मों की हास्य विधा का वह एकछत्र सम्राट रह चुका है। तो मद्रास जा रहा था वह उस दिन, किसी शूटिंग के सिलसिले में। रास्ते में पता चला कि उसी गाड़ी से किसी मुशायरे में शिरकत करने सुप्रसिद्ध गीतकार शकील बदायूनी भी हैदराबाद तक का सफ़र कर रहे हैं – एक दूसरे शायर खुमार बाराबंकवी के साथ। दोनों ने ही एक दूसरे को दूर से देखा, लेकिन जो पुरमज़ाक योजनाएं उनके दिमाग़ में चक्कर काट रही थीं उस वक्त उसने दोनों को ही अनदेखा कर डाला।

पहल की थी खुद शकील बदायूनी ने। एक बड़े स्टेशन पर उतर कर प्लैटफ़ार्म पर चहलकदमी करने वाले नौजवानों के एक झुण्ड से बहुत संजीदगी के साथ उन्होंने कह डाला – अजीब हैं आप लोग। बगल की बोगी में जॉनी वॉकर साहब तशरीफ़फ़र्मा हैं, और आप साहबान को उसकी जानकारी भी नहीं? आप जैसे नौजवान तबके से मिल कर तो उनको बेइन्तहा खुशी होती है, उनसे मुलाक़ात क्यों नहीं करते आखिर?

और यह पता चलते ही जॉनी की बोगी के सामने जो मजमा जमा हो गया वह क़ाबिलेदीद था। दरवाज़ों, खिड़कियों के शीशे टूट गये, सहयात्रियों का माल-असबाब तितर-बितर हो गया, लोग ज़बर्दस्ती अन्दर पिल पड़े। लेकिन ख़ुद जॉनी वॉकर – कहां था वह उस समय?

मजमें के ताबड़तोड़ प्यार से बचने के लिये वह अपने डिब्बे के गुसलखाने में घुस गया था। किस्सा-कोताह यह कि गाड़ी चल खड़ी हुई, और उसके प्रशंसकों को उससे मिले बगैर ही डिब्बे से उतर आना पड़ा।

लेकिन जॉनी वॉकर भी कम ज़िन्दादिल नहीं निकला। अगला स्टेशन आते ही वह उस बोगी में पहुंच गया जिसमें बड़ी मासूमियत के साथ शायर-द्वय ताश खेलने में मशगूल थे। और उन लोगों ने भी इस अचम्भे के साथ जॉनी का इस्तकबाल किया जैसे ट्रेन में उसके अस्तित्व का बोध उन्हें पहली बार हो रहा हो

खैर, गाड़ी अपनी रफ़्तार से चलती रही, और उसी रफ़्तार से उनकी गुफ़्तगू भी। अगला स्टेशन आने के पांच मिनट पहले, हाथ-मुंह धोने के इरादे से, शकील साहब गुसलखाने में चले गये थे। उस स्टेशन पर उन्होंने चाय लाने का आर्डर दिया था।

लेकिन अभी शकील साहब बाथरूम के अन्दर ही थे कि गाड़ी प्लैटफ़ार्म पर आ लगी। जॉनी वॉकर के लिये तो वह एक सुनहरा मौका था। वह प्लैटफ़ार्म पर उतरा, मिनट भर में ही उसने अपने प्रशंसकों की भीड़ एकत्र कर डाली, प्यार के साथ उनसे बातचीत करने का सिलसिला चालू किया, कि अचानक बीच में ही वह बोल उठा – और मुकरी साहब भी तो हैं मेरे साथ। उनसे नहीं मिलोगे क्या?

— कहां, किस जगह? — भीड़ ने उत्सुकता प्रकट करते हुए पूंछा था।

— उस बाथरूम में। लोगों से मिलने-जुलने में वह डरते हैं न, इसीलिये वहां छिप गये हैं। लेकिन तुम्हारी भी क्या तारीफ़ अगर उनको बाहर न निकाल लिया ।।।

और इतना सुनते ही मजमा बाथरूम का दरवाज़ा तोड़ने में लग गया। शकील साहब परेशान। आखि़र यह क्या हादसा हो गया? तभी उनके कानों में आवाज़ पड़ी – अरे मुकरी साहब, बाहर तशरीफ़ लाइए न? इतने सारे मेहरबान आपसे मिलने के लिये बेताब हैं।

यह आवाज़ जॉनी वॉकर की थी। लेकिन उस समय शकील साहब का बाहर निकलना मुमकिन भी था क्या?

किस्सा-कोताह यह कि गाड़ी चलने के बाद जब शकील साहब गुसलखाने से बाहर निकले तो चाय वाला अपने बर्त्तन लेकर जा चुका था, और अगला स्टेशन आने में ढाई घण्टे की देर थी।

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