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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-सुरेश गोयल धूपवाला-
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विजय दशमी 1925 को डॉ. केशवराव बलीराम हेडगेवार ने नागपुर में स्कूल में पढऩे वाले आठ-दस बच्चों को साथ लेकर संघ शाखा की शुरूआत की। खो-खो, कबड्डी, छोटे-छोटे खेलों व देशभक्ति के गीतों के साथ बालकों में राष्ट्र के प्रति संस्कार देने का कार्य शुरू किया। आखिर सवाल उठना स्वभाविक है कि इसके पीछे उनका क्या प्रयोजन था। यहां से यह समझ लेना आवश्यक है कि डॉ. हेडगेवार एक उच्च शिक्षित विद्वान व दूरदर्शी व्यक्ति थे। भारतीय संस्कृति व दर्शन के महान पंडित थे। बचपन से ही उनके मन में अंग्रेजी सत्ता के प्रति विद्रोह की भावना जन्म ले चुकी थी। उनके मन मस्तिक में बार-बार यही प्रश्न कोंधता था कि 1000 वर्षों से हमारा देश गुलामी की जंजीरों में क्यों जकड़ा हुआ है। हुण, शक, तुर्क, मुगल व अंग्रेज आकर यहां देश पर क्यों काबिज हो जाते हैं। हमारा देश बाहुबल, आर्थिक सम्पन्नता व बौद्धिक सम्पदा में विश्व का अग्रणी राष्ट्र है। फिर हम बाहरी आक्रमणकारियों के हाथों पराजित हो रहे हैं। हमारे मंदिर, सांस्कृतिक केंद्र, शिक्षा केंद्र नष्ट-भ्रष्ट कर दिए जाते हैं और देश की धन संपदा लूट ली जाती है। यहां तक कि हमारी अस्मिता भी लूट ली जाती है। सोने की चिड़िया और विश्व में आध्यात्मिक गुरु कहा जाने वाला देश पतन के कगार पर आखिरकार कैसे पहुंच गया। आखिर वे गहन मंथन के बाद इस परिणाम पर पहुंचे कि हमारा देश छोटे-छोटे रजवाड़ों में बंटा हुआ है। उनमें आपसी तालमेल व समन्वय का अभाव है। वे अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय हितों को बलिदान कर रहे हैं और इसका सीधा लाभ विदेशी आक्रमणकारी शक्तियां उठा रही हैं। वे इस नतीजे पर पहुंचे कि हमारा देश एक सांस्कृतिक राष्ट्र है। हजारों वर्षों से धर्म, भाषा व संस्कृति के आधार पर हम एक हैं। पूरे देश को एकसूत्र में पिरोए बगैर हम इस समस्याव से निजात नहीं पा सकेंगे। इसके लिए उन्होंने हिंदू राष्ट्रवाद अर्थात सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दर्शन इस देश को दिया। हिंदू राष्ट्रवाद के संबंध में उन्होंने स्पष्ट रूप में कहा कि हिंदू शब्द राष्ट्रीयता का बोधक है। यह किसी धर्म, मजहब या सम्प्रदाय के प्रति इंगित नहीं करता। हम सब इस देश में रहने वाले भारतीय हैं। हम सब भारत माता के पुत्र हैं। इसी विचार को लेकर उन्होंने देश को एक नई सोच व दिशा दी। राष्ट्र स्वयंसेवक संघ के रूप में संगठन का बड़े पैमाने पर विस्तार किया गया।

उनके निधन के बाद संगठन की बागड़ोर द्वितीय सर संघ चालक माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर ने संभाली जिन्हें गुरु जी के नाम से संबोधित किया जाता है। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद पं. नेहरु ने इसका दोष संघ पर मढ़ दिया और संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संघ नेताओं को बिना किसी दोष के गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन बाद में जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद संघ को इस आरोप से मुक्त कर दिया गया। राष्ट्र में विभिन्न क्षेत्रों में काम करने की दृष्टि से संघ ने व्यापक योजना का निर्धारण किया, जिसमें 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में गुरु जी की प्रेरणा से एक राजनीतिक संगठन भारतीय जनसंघ की स्थापना की गई। पार्टी के माध्यम से राष्ट्रीय समस्याओं पर गहन चिंतन किया गया, जिसमें कश्मीर की समस्या भी एक बड़ी गंभीर थी। कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग नहीं मानने वालों को उन्होंने गंभीर चुनौती दी और इसके लिए अपना बलिदान तक दे दिया। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद, पंचनिष्ठा और अंतयोदय का विचार देकर राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के नए द्वारों को खोला। पहले राष्ट्र, फिर पार्टी और उसके बाद स्वयं पार्टी का मुख्य सूत्र बना। मुगल सराय स्टेशन पर पं. दीनदयाल उपाध्याय की निर्मम हत्या कर दी गई, जो आज तक एक रहस्य बना हुआ है। राजनीतिक पार्टी के रूप में जनसंघ ने अपनी संख्यात्मक शक्ति को पूरे राष्ट्र स्तर पर विस्तृत रूप दे दिया था। जून 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। देश के हजारों नेताओं को काल कोठरियों में डाल दिया गया। इसकी परणीति में लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में जनता पार्टी की स्थापना की गई। जनसंघ ने जनता पार्टी में अपना विलय कर दिया गया। 1977 में देश में जनता पार्टी की सरकार बनी, लेकिन वह अधिक समय तक नहीं चल सकी। दोहरी सदस्यता के नाम पर जनसंघ के घटक पर आरोप लगा कर पार्टी को तोड़ दिया गया। 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की गई, जिसके अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी बने। सन् 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने, बेशक वह कई पार्टियों की मिलीजुली सरकार थी, लेकिन उन्होंने देश में विकास के नए मार्गों को खोला, जिसमें देश की बड़ी नदियों को जोड़ने की योजना, चतुर्भुज सड़क परियोजना, पोखरण में परमाणु विस्फोट, महंगाई से निजात व रसोई गैस की खुली बिक्री जैसे अहम कदम उठाए। विश्व शक्ति के रूप में भारत उभर सामने आया। लेकिन इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार 2004 से 2014 तक देश पर काबिज रही। भ्रष्टाचार, घोटालों, महंगाई व अराजकता ने देश को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया। ऐसे में चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने नरेंद्र मोदी पर देश की जनता ने भरोसा जताया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक के स्वयंसेवक के रूप मेंं अपने सामाजिक जीवन की शुरूआत करने वाले नरेंद्र मोदी ने भारतीय संस्कृति व राष्ट्रभक्ति के संस्कार कूट-कूट कर भरे हुए हैं। पिछले 90 वर्षों का राष्ट्र कल्याण के लिए विकसित विचारधारा व चिंतन उनको विरासत में मिला है। उनके खून में संघ स्थान की मिट्टी की खुश्बु रची बसी है। भारत को विश्व के शीर्ष स्तर पर ले जाना उनका एक मुख्य स्वप्र है। वो देश को एक परम वैभवशाली राष्ट्र के रूप में विकसित होता देखना चाहते हैं। वो अपने अंदर विज्ञान व तकनीक के मामले में देश को शिखर पर ले जाने की इच्छाशक्ति पाले हुए हैं। निसंदेह उनके नेतृत्व में भारत एक महान राष्ट्र बनेगा। देश में अब अच्छे दिन आ चुके हैं। देश की 125 करोड़ जनता बिना किसी धर्म, सम्प्रदाय व जाति के भेद के बिना निरंतर पूरे समाज को एक समान आगे बढ़ते हुए देखगी।

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