लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

ऐसा शायद देश में पहली बार हुआ है कि मृत्युदंड पाए मानवता के हत्यारे को क्षमा की गुंजाईश टटोलने के लिए आधी रात को सर्वोच्च न्यायालय के कपाट खुले,करीब आधा दर्जन नामचीन वकीलों ने पैरवी की और हत्यारे की सजा बहाल हुई। बावजूद राजनेता और चंद बुद्धिजीवी विधायिका,न्यायपालिका और कार्यपालिका को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में लगे हैं। जबकि लोकतंत्र के इन स्तंभों के संयुक्त प्रयास को त्वरित न्याय प्रक्रिया की कड़ी में देखने की जरूरत है ? जिससे आगे भी अदालतों में अटके मामलों में गतिशीलता आती और अवाम को त्वरित न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ती। लेकिन फैसले और फिर याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के बाद नेताओं के जो बयान आए,वे न केवल आम नागरिक को आहत करने वाले हैं,बल्कि स्वतंत्र न्यायापलिका की निष्पक्ष न्यायप्रयिता पर भी कुठाराघात करते हैं। जबकि भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में इस फॅैसले को एक नजीर के रूप में देखने की जरूरत है।

इस परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि ‘याकूब की फांसी पर सरकार और न्यायपालिका ने एक मिसाल पेश की है। उम्मीद हैं कि सारे मामलों में जाति और धर्म से ऊपर उठकर इसी तरह से फैसले होंगे। हालांकि सदेंह है कि अन्य मामलों में इतनी तेजी आएगी। लिहाजा सरकार और न्यायपालिका की साख दांव पर है।‘ एसआईएम के प्रमुख असदुद्दीन औवेसी ने कहा कि ‘याकूब के साथ इंसाफ ही नहीं हुआ। मजहब के नाम पर पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे को बचाया जा रहा है,कमोबेश यही स्थिति राजीव गांधी के हत्यारों के साथ अपनाई जा रही है।‘ संप्रग सरकार में मंत्री रहे शशी थरूर ने ट्वीट किया कि ‘सरकार ने एक इंसान को फांसी पर चढ़ा कर प्रायोजित हत्या की है,इस फांसी की कार्रवाही ने हमें इतना नीचे गिरा दिया है कि हम हत्यारे के बराबर आ खड़े हुए हैं।‘ मानवता के अतिरेक से जुड़े इन अतिवादी प्रलापों को मान लिया जाए तो फिर देश में संविधान और न्याय व्यस्वथा की  जरूरत ही नहीं रह जाती है ? क्योंकि जब देश के खिलाफ लड़ाई छेड़ने वाले को ही निर्दोष साबित करने के उपाय युद्धस्तर पर होने लग जाएंगे तो भला न्याय,कानून और पुलिस की जरूरत ही कहां रह जाती है ? जो नेता और अधिवक्ता आज त्वरित न्याय प्रक्रिया और फांसी पर सवाल उठा रहें हैं,उनका दल लंबे समय तक केंद्रीय सत्ता पर सिंहासनारूढ़ रहा है,तब क्यों नहीं इन नीति नियंताओं ने भारतीय दंड प्रक्रिया सांहिता से उन धाराओं के विलोपीकरण पर संसद में सहमति बनाई, जो न्यायधीषों को मृत्युदंड का अधिकार देती हैं। मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और अमानवीयता से बड़ा कोई अधर्म नहीं होता। इस सनातन उपदेशात्मक सत्य को जितना नेता और कथित बुद्धिजीवी जानते हैं,उतना ही न्यायप्रिय न्यायाधीष भी  जानते होंगे ?

यदि यह सरकार प्रायोजित फांसी थी तो क्या संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरू और 2008 में मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब को कांग्रेस कार्यकाल में दी गईं फांसियां भी प्रायोजित थीं ? क्या थरूर कांगे्रस सरकार को भी अमानवीय और बर्बर करार देंगे ? इन तीनों आतंकियों की दया याचिकाएं खारिज करते हुए मृत्युदंड की अंतिम मोहर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लगाई है। प्रणब मुखर्जी की कांग्रेस पार्टी में दीर्घकालिक सेवाएं रहीं। इन्हीं  निर्विवाद सेवाओं व कांग्रेस के प्रति निष्ठा के परिणाम के चलते,उन्हें देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठने के योग्य माना गया। यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकार और न्यायपालिका की सक्रियता के साथ-साथ इन तीनों आतंकियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने में महामहिम प्रणब मुखर्जी ने भी त्वरित न्याय की भावना को गतिशील बनाने में अहम् भूमिका निभाई है। क्या दिग्विजय सिंह और शशी थरूर राष्ट्रपति की कार्यशैली को भी संदेह के कठघरे में खड़ा करेंगे ? दरअसल हकीकत तो यह है कि मानवाधिकारों का हनन उन हत्यारों का नहीं हुआ है,जिन्होंने देश के विरूद्ध युद्ध छेड़कर देशद्रोह का काम किया,बल्कि उनका हुआ है,जिनके परिजन आतंकी हमलों और बम विस्फोटों में मारे गए हैं। इसलिए जिस त्वरित न्याय प्रक्रिया के चलते याकूब की फांसी संभव हुई है उसे प्रोत्साहित करने की जरूरत है,न कि लज्जित ?

हमें इस कार्य संस्कृति पर गर्व करने की जरूरत है,क्योंकि सरकार, सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति व महाराष्ट्र के राज्यपाल ने दया, पुनर्विचार और सुधार याचिकाओं को निरंतर सुनते हुए देशद्रोह से जुड़े एक मामले को अंतिम मुकाम तक पहुंचाया। यही नहीं मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले उन आधा दर्जन वकीलों की पुकार पर आधी रात के बाद सर्वोच्च न्यायालय के द्वार खुलवाए,जो याकूब की फांसी को 14 दिन की मोहलत के बहाने आजीवन टालना चाहते थे। दरअसल 30 जुलाई को यह फांसी टल जाती तो अड़ंगों की गुहार लगी ही रहती। इससे त्वरित न्याय की अवधारणा को धक्का लगता और अदालतों में लंबित प्रकरणों की संख्या में इजाफा होता रहता। दया याचिकाओं में अंतिम निर्णय लेने में विलंब के चलते ही पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजोआना,खालिस्तान समर्थक आतंकी देविंदर पाल सिंह भुल्लर और राजीव गांधी के हत्यारे संथम,मुरूगन और पेरारिवलम की फांसी उम्र कैद में बदलीं,जबकि भुल्लर की फांसी टाली जा रही है। निश्चित रूप से इन फांसियों को टालने में सिख और तमिल क्षेत्रीय व जातीय अस्मिताओं को अकाली और अन्नाद्रमुक नेताओं ने राजनीतिक हित साधने के लिए भुनाने का काम किया है। सियासत की ये चालाकियां बर्दास्त से बाहर हैं। हर हाल में इन हत्यारों को फांसी के फंदे पर लटकना ही चाहिए।

फिर भी यदि फांसी के विरूद्ध खड़े लोग इस सजा को अमानवीय व गैर जरूरी मानते हैं तो समाज को धर्म और जाति के आधार पर बांटने की बजाय मृत्युदंड के प्रावधान को खत्म करने के उपाय करें तो बेहतर है। दरअसल दंड प्रक्रिया सांहिता में जब तक मौत की सजा का प्रावधान है,तब तक जघन्य अपराधों में न्यायाधीष मृत्युदंड देते रहेंगे। इस दंड को खत्म करने का अधिकार संसद को है। संसद एकमत से हत्या की धारा 302 और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की धारा 121 को समाप्त करने का प्रस्ताव संसद में ले आए,ऐसा किसी भी सरकार में संभव नहीं लगता ? मृत्युदंड को खत्म करने पर देश की जनता भी तैयार नहीं हो सकती ? इस मुद्दे की सच्चाई जानने के लिए जनमत संग्रह भी कराया जा सकता ? लिहाजा मृत्युदंड पर सवाल उठाना न्यायालय एवं महामहिम राष्ट्रपति की अवमानना है।

मृत्युदंड के प्रावधान को खत्म करने की पहल 2007 में संयुक्त राष्ट्र संघ भी कर चुका है। बावजूद योरोपीय देशों में मौत की सजा का प्रावधान बरकरार है। अमेरिका जो मानवाधिकारों का सबसे बड़ा पैरोकार देश है,वहां तो आलम यह है कि गोरों की तुलना में कालों को ज्यादा फांसी दी गई हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत लगभग सभी इस्लामिक देशों में फांसी का प्रावधान है। कई इस्लामिक देशों में तो मौत की सजा पाए व्यक्ति को पत्थर फेंक-फेंक कर मारा जाता है। चीन में तो बिना किसी संकोच के फांसी दी जा रहीं है। आजादी के बाद अभी तक हमारे देश में जितने लोगों को मौत की सजा सुनाई गई है,उतने लोगों को तो हर वर्ष चीन में फांसी दे दी जाती है। चीन में भ्रष्टाचार के मामले में पति के साथ पत्नी को भी फांसी देने का प्रावधान है।

बहरहाल मृत्युदंड की व्यवस्था पर सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्ीय खंडपीठ,याकूब मेमन के मामले पर यथास्थिति बनाए रखने पर दृढ़ निश्चय रही तो इसलिए,क्योंकि याकूब का जुर्म कठोरतम दंड पाने का अधिकारी था। बल्कि अब होना तो यह चाहिए कि बार-बार बेवजह लगाई जाने वाली दया याचिकाओं पर अंकुष लगे। जिससे मृत्युदंड पाए अपराधियों की सजा को अदालतें आजीवन करावास में बदलने को लाचार न होने पाएं ?लिहाजा याकूब मेमन के मामले में सरकार और न्यायपालिका ने त्वरित न्याय की अवधारणा का पालन करते हुए,याकूब को मुकम्मल मुकाम तक पहुंचाने के लिए निरंतर न्याय-प्रक्रिया की जो तत्परता बरती है,वह काबिले-ए-तरीफ है।

 

 

 

प्रमोद भार्गव

 

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3 Comments on "न्यायायिक तत्परता पर सवाल ?"

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आर. सिंह
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आपलोग किस न्यायायिक तत्परता की बात कर रहे हैं? अंतिम क्षणों का नाटक यदि न्यायायिक तत्परता है,तो हो सकता है,पर फैसले पर बाइस वर्षों की देर हमारे पूर्ण न्यायायिक व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लगा देता है. ऐसा केवल याकूब के मामले में ही नहीं हुआ है,बल्कि यह हमारे सड़े हुए न्यायायिक व्यवस्था की सामान्य पद्धति है.मुझे तो आश्चर्य उन लोगों पर होता है,जो इस न्याय व्यवस्था की प्रशंसा करते थकते नहीं.

suresh karmarkar
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न्यायिक तत्परता केवल आतंकी व् देशद्रोही घटनाओं के लिए ही नहीं बल्कि आर्थिक अपराधों, बलात्कारों ,हवाला दोषियों ,के लिए भी दिखाई देनी चाहिए. और बाकायदा इनकी एक पुस्तक छपी जाय जिसमे विस्तार से अपराधियों और गयी सजा का वर्णन हो. आर्थिक अपराध हुए वर्षों हो जाते हैं ,दोषी दण्डित ही नहीं हो पाता. न्यायालयों और रिक्त पड़े न्यायाधीशों के पद तत्काल भरने की नीति हो. अभी हल ये हैं की लाखों प्रकरण पेंडिंग है ,न्यायालय कितने ही घंटे काम करें इनके फैसले आ ही नहीं सकते,समय लगता है। किन्तु एक बात उल्लेखनीय है की हमारी न्याय व्यवस्था पर आज जनता… Read more »
आर. सिंह
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जनता का विश्वास नहीं,बल्कि जनता की विवशता है.

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