लेखक परिचय

अरुण तिवारी

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अरुण तिवारी

नवाचारों को नीति की दरकार

’’10 दिन के भीतर ई रिक्शा, दिल्ली की सङकों पर फिर से दौङने लगेंगे’’- भारत सरकार के परिवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी जी द्वारा की गई यह घोषणा संकेत है कि इससे ई रिक्शा चालकों और मालिकों की रोजी-रोटी का फिर से इंतजाम हो जायेगा। यह संकेत अच्छा है और अदालत का आदेश भी कि ई रिक्शा सङकों पर चलें, लेकिन कुछ नियम-कायदों के साथ। किंतु वह संकेत कतई अच्छा नहीं, जो ई रिक्शा पर अस्थाई रोक का आदेश आने के अगली सुबह अखबारों में दिखाई दिया। याद कीजिए कि आदेश आने के बाद लगातार कई दिन तक एक नामी आटो कंपनी के तिपहिया का विज्ञापन कमोबेश सभी अखबारों में हमने देखा। ऐसे में शक होना स्वाभाविक है। क्या बिना नामी ब्रांड वाले वाहनों पर रोक-टोक का छिपा कारण नामी कंपनियों की साजिश है ? ऐसी कोशिशें, स्थानीय नवाचारों को आगे बढाने के मार्ग में बाधक हैं या साधक ? ये विचारण्ीय प्रश्न हैं। आइये, विचारें।

जरूरमंदों के लिए सस्ती तकनीक की अधिकारिक या कहिए कि मान्यताप्राप्त कोशिशें हमारे देश में इतनी नहीं कि गरीब-गुरबा की पकङ में आ सकें; किंतु गैरमान्यता प्राप्त कोशिशों और नवाचारों में हिंदुस्तान बहुत आगे है। ऐसी जुगतों को हम अक्सर जुगाङ’ कहते हैं। ’जुगाङ’ शब्द संस्कृत के ’युक्ति’ शब्द से निकलकर पहले जुगत और फिर जुगाङ में तब्दील हो गया। इस जुगाङ के कारण देहातों में जाने कितने काम कम खर्च में चलते हैं! कितनी जिंदगानियां आसान हो जाती हैं!! ऐसी ही एक तकनीक से तैयार एक चलते-फिरते वाहन का नाम ही हमने ’जुगाङ’ रख दिया है। सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले डीजल इंजन का इस्तेमाल कर बनाया गया वाहन! यह जुगाङ पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कितने ही इलाकों में सवारी, दूध, सब्जी, अनाज… खासकर किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी व किफायती साबित हुआ है। इसके निर्माण की कम लागत, एक लीटर डीजल में एक घंटा चलने तथा अधिक बोझ उठाने की क्षमता के कारण यह सामान व सवारियों की ढुलाई के लिए एक प्रिय वाहन के रूप में जाना जाता रहा है।

याद कीजिए, कुछ वर्ष पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश ने इसे संकट में ला दिया। इससे राजस्थान से लेकर बिहार तक कितने ही जुगाङ मालिक व चालकों में कोहराम मच गया। वर्ष-2012 में बिहार के भागलपुर में इसके विरोध कई माह से एक आंदोलन छिङा रहा। मशीन चालित ठेला चालक संघ व दियारा गंगा मुक्ति आंदोलन ने मिलकर इसके खिलाफ धरना-प्रदर्शन व रैलियां की। मांग थी कि मशीन चालित जुगाङ ठेले से रोक हटे। मुख्यमंत्री को लिखी अपनी अपील में आंदोलनकारियों ने जुगाङ को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बताते हुए एक लाख परिवार यानी 10 लाख से अधिक लोगों की आजीविका बचाने का निवेदन किया था। अकेले भागलपुर, बांका, मुंगेर, खगङिया, मधेपुरा, पूर्णिया, कटिहार जिले में ही 25 हजार जुगाङ ठेले आदेश की चपेट में आये। रोक से कष्ट सिर्फ जुगाङ ठेला चालकों का ही नहीं बढा; कष्ट उन पर निर्भर व्यापारियों, स्कूली बच्चों, नौकरीपेशा यात्रियों व दूध-सब्जी विक्रेताओं का भी बढा।

erickshawगौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस बिना पर जुगाङ पर रोक के आदेश को लागू कराने को कहा था कि यह मोटर वाहन एक्ट-1988 की धारा 2(28) में उल्लिखित परिभाषा से आच्छादित होता है। न्यायालय ने जुगाङ वाहन चलाने को मोटर वाहन कानून का उल्लंघन माना था। न्यायालय ने कहा था कि न इनका बीमा है, न ड्राइवर के पास लाइसेंस। दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी के बारे में प्रावधान करना मुश्किल है। वे आंदोलनकारी भी यही कह रहे थे और दिल्ली के ई रिक्शाचालक भी। उनका कहना था कि जुगाङ ठेला एक्ट बनाकर वाहन को परमिट तथा ड्राइवर को लाइसेंस प्रदान किया जाये। नंबर दो, लाइसेंस दो… टैक्स लो। उन्होने इसके लिए बीमा की भी मांग कीं। एक तरह से वे जुगाङ ठेलों के लिए उन सब सुविधायें व शर्तों की मांग करते रहे, जो मोटर वाहन एक्ट के तहत् एक वाहन को प्राप्त होती हैं या उस पर लागू होती है। वे जुगाङ ठेलों के लिए कानूनी मान्यता चाहते थे। वे जुगाङ को कानून के दायरे में लाने तथा उसकी पालना करने को तैयार थे। उनका यह भी दावा था कि जुगाङ मान्यता प्राप्त कई अन्य वाहनों की तुलना में 60 प्रतिशत कम प्रदूषणकारी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि शेष वाहन कुछ नकद देकर ’’प्रदूषण नियंत्रण में है’’ की चिप्पी चिपकाकर कितना भी प्रदूषण छोङने के लिए मान्यता हासिल कर लेते हैं, जुगाङ को फिलहाल यह सुविधा प्राप्त नहीं है। ….तो फिर अङचन कहां है ?

जवाब मिला – ’’ जुगाङ पर रोक से गरीब-किसान का नुकसान होता है। कंपनियों को फायदा होता है। जुगाङ रुकेगा, तो बङी-बङी कंपनियों के मंहगे मालवाहक वाहन की बिक्री बढेगी। जुगाङ का निर्माण लघु उद्यमियों द्वारा किया जाता है, अन्य वाहन बङे उद्यमियों के उत्पाद हैं। सब बङों के साथ हैं। यह उन्ही की ही साजिश है। अङचन यहां है।’’ …. तो क्या सचमुच अङचन यहां है ? यह वाहन नहीं, पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर उठा गंभीर प्रश्न है। इसकी गंभीरता से पङताल की जानी चाहिए।

दिल्ली में फिटफिट मोटरों के हटाये जाने के साथ ही दिल्ली सरकार ने वाहन चालकों को जीप के लिए ऋण तथा परमिट मुहैया कराये थे। अब ई रिक्शा पर रोक के बाद नई नीति! हालांकि दिल्ली की अदालत की राय एकदम वाजिब थी। ई रिक्शा को सङक पर उतारने से पहले सरकार को इनके लिए नीति व नियम बनाने चाहिए थे। आगरा नगर निगम ने पिछले एक साल से ई रिक्शा चालकों को लाइसेंस मुहैया कराये हुए हैं। खैर! देर आये, दुरुस्त आये। अब जुगाङ पर रोक से प्रभावितों वाले राज्यों के शासनाधीशों को भी चाहिए कि वे सरकार की ई रिक्शा नीति से प्रेरणा लें। वाजिब शर्तों के साथ जुगाङ वाहनों की मान्यता हेतु नीति व नियम बनायें। उन्हे फिर से सङकों पर दौङायें।

देश में कितने ही नवाचार इसीलिए व्यापक उपयोग का हिस्सा नहीं बन पाते, चूंकि वे कानूनी मान्यता के जटिल जाल से पार पाने से पहले ही सिमट जाते हैं। यदि कानूनी मान्यता के बिना हर नवाचार के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का चलन चालू हो गया, तो देश में नवाचारों का सिलसिला ही रुक जायेगा। यह अच्छा नहीं होगा। लिहाजा, नवाचारों को आगे बढाने में कानून मददगार बने। जटिल जाल को सरल करें। ई रिक्शा और जुगाङ की नहीं, हर नवाचार के सार्वजनिक उपयोग की व्यापक व समग्र नीति बनाये।

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