लेखक परिचय

मुकेश चन्‍द्र मिश्र

मुकेश चन्‍द्र मिश्र

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में जन्‍म। बचपन से ही राष्ट्रहित से जुड़े क्रियाकलापों में सक्रिय भागेदारी। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और देश के वर्तमान राजनीतिक तथा सामाजिक हालात पर लेखन। वर्तमान में पैनासोनिक ग्रुप में कार्यरत। सम्पर्क: mukesh.cmishra@rediffmail.com http://www.facebook.com/mukesh.cm

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nitishlaluoneमुबारक हो बिहारियों आप लोगों ने एकबार फिर से दिखा दिया की जातिवाद भारत खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश की आत्मा मे बसा हुआ है जो आने वाले दशकों मे तो सायद खत्म होने वाला नहीं वरना जातिवाद और जंगलराज के प्रतीक बन चुके लालू यादब बिहार की पहली पसंद न बनते वो भी तब जब उन्हे भ्रष्टाचार के आरोप मे सजा हो चुकी है। बिहारियों का जातिवाद भी कितना कट्टर है की उन्हे नरेंद्र मोदी जैसे पिछड़े समाज या कहें की इन्ही के समाज के व्यक्ति को अपना नेता मानने से परहेज था वो भी तब जब की सारे विरोधी एक सुर मे मोदी को तानाशाह कहते हैं और मानते हैं की मोदी पर किसी का ज़ोर नहीं चल सकता और वो बीजेपी के सबसे बड़े नेता हैं, क्योंकि इन्हे लालू यादव जैसा नेता चाहिए जो न सिर्फ अपनी जाति की बात करे बल्कि तथाकथित अन्य अगड़े समाज को गालियां भी दे।
आज मीडिया भाजपा और उसके शीर्ष नेतावों मोदी और अमित शाह पर तमाम सवाल खड़े कर रही है और इसे बीफ पॉलिटिक्स, असहिष्णुता आदि कम्यूनल एजेंडो की हार बता रही है जबकि ये विशुद्ध रूप से जातिवाद की जीत है हालांकि मोदी और शाह की हार तो है ही क्योंकि वो बिहार को समझ ही नहीं पाये और कुछ गलतियां लगातार करते गए साथ ही इनका हारना भी कुछ हद तक जरूरी हो गया था जिससे कुछ सबक ले सकें, क्योंकि दिल्ली हारने के बाद इन्होने कुछ भी नहीं सीखा जबकि दिल्ली की हार मे भी कुछ हद तक बिहारी फैक्टर था।
जो लोग इस जीत का हीरो नितीश कुमार और उनके सुशासन को बता रहे हैं वो सायद भूल रहे हैं की नितीश कुमार पिछले चुनाव की 115 सीट से 71 सीट पर आ गए है जबकि लालू 22 से 80 सीट पर पहुँच गए हैं जो साफ संदेश दे रहा है बिहार को विकास नहीं जाती और जंगलराज चाहिए। नितीश कुमार को अगर अपने अहंकार से जादा बिहार से प्रेम होता तो आज वो बीजेपी से अलग न हुये होते और बिहार को जो चाहते हो दिला सकते थे क्योंकि वो एनडीए के सबसे मजबूत नेता होते और उनकी बात मोदी भी आसानी से टाल न पाते ऐसे मे बिहार को विशेष राज्य का दर्जा समेत तमाम स्पेशल पैकेज मिल सकता था जिससे बिहारी दूसरे राज्यों मे रोजगार के लिए दर दर भटकने से बच सकते थे। किन्तु सिर्फ अपने अहंकार की वजह से आज बिहार को बर्बाद करने वाले लालू को फिर से पावर मे ला दिया है। किसी कवि ने क्या खूब कहा है “लम्हो ने खता की थी, सदियों ने सजा पायी” हमे ये तो मालूम नहीं की नितीश की मोदी से क्या दुश्मनी थी लेकिन इस दुश्मनी की सजा आने वाले बिहार की पीढ़ियाँ भुगतेंगी, क्योंकि अब बिहार का वही हश्र होना तय है जो दिल्ली का हो रहा है केंद्र से तालमेल न होने के कारण जैसे दिल्ली का विकास ठहर गया है और काम की जगह नित नयी नयी बयानबाजी, बहानेबाजी, आरोप प्रत्यारोप देखने को मिल रहा है उससे कई गुना जादा बिहार मे देखने सुनने के लिए हमे तैयार रहना चाहिए क्योंकि दिल्ली मे तो केंद्र सरकार खुद बैठती है और देश की राजधानी होने के कारण इसकी पूरी तरह से अनदेखी नहीं कर सकती तथा ये पहले से विकसित भी है किन्तु बिहार तो दिल्ली से बहुत दूर है और उसका शासन मोदी को दुश्मन मानने वाले के हाथ मे है तो अब बिहार को केंद्र से जादा उम्मीद तो करनी ही नहीं चाहिए क्योंकि मोदी भी इतने बड़े आदर्शवादी हैं नहीं की वो ही आसानी से सब कुछ भूल जाएँ, और बिहार मे लालू के भय के कारण कोई भी उद्योगपति बिहार जाएगा नहीं जिससे केंद्र के सहयोग के बिना बिहार गुजरात की तरह अपने दम पर प्रगति कर ले।
10 साल पहले जो बिहार सोमालिया बन चुका था उसे फिर से बिहार बनाने के जो सार्थक प्रयास नितीश और बिहार बीजेपी के नेतावों किए थे और दिल्ली मे मोदी के आने के बाद उम्मीद जगी थी की अब बिहार के दिन बहुत जल्द बदल जाएँगे, उसे एक झटके मे फिर से बिहारियों ने वहीं उसी जंगलराज के दौर मे पहुंचा दिया है तो बधाई तो बनती है ना।

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