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अवधेश पाण्‍डेय

मीडिया में आजकल उत्तरप्रदेश छाया हुआ है, यहाँ जिनके ऊपर कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी है वही उसे पलीता लगा रहे हैं, अचानक ही अपराध की खबरों का ग्राफ बहुत ऊपर चढ गया है, जैसे विगत चार वर्षों से प्रदेश शान्त रहा हो और अब एकाएक अपराधों की बाढ सी आ गयी हो. लेकिन इसका उत्तर तो निश्चय ही नहीं है. वास्तव में अपराध का स्तर तो पिछले दशक से घटने की बजाय और बढता जा रहा है और वर्तमान परिस्थितियों में कोई भी सरकार अपराध पर नियंत्रण करने में असमर्थ ही होगी ऐसा जान पडता है.

मीडिया में खबरें बनने का कारण अपराध नहीं, प्रदेश का चुनावी माहौल है. बडा से बडा नेता छोटी से छोटी घटनाओं पर हो हल्ला मचा रहा है और उसका राजनीतिक लाभ लेने के लिये उसे मीडिया के द्वारा खूब प्रचारित प्रसारित करवा रहा है. इस मामले में काँग्रेस पार्टी सबसे ज्यादा लाभ की स्थिति में है और उसका देश की इलेक्ट्रानिक मीडिया पर अघोषित नियंत्रण है. इसलिये उसके नेताओं को मीडिया में प्रमुखता से कवरेज दी जा रही है. भट्टा पारसोल और मीडिया के दम पर काँग्रेस पार्टी प्रदेश की चुनावी राजनीति में मुख्य लडाई में आ गयी है और अब मीडिया के सहयोग से अगले विधानसभा चुनावों तक कमोवेश यही स्थिति बनी रहेगी.

उत्तरप्रदेश के विगत चुनावों मे मायाराज समाजवादी पार्टी के गुण्डाराज के विरुद्ध आया था और माया ने जाति व्यवस्था (जिसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया गया) और एक नारे “चढ गुण्डन की छाती पर, मोहर लगेगी हाथी पर” के दम पर जनता का विश्वास जीता. यह गुण्डे कोई और नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के नेता लोग थे. आज भी देखें तो समाजवादी पार्टी इससे मुक्त होने का कोई विचार रखती है, ऐसा प्रतीत भी नहीं होता. लेकिन समाजवादी पार्टी को हराने के लिये माया ने भी जमकर गुण्डों का सहारा लिया था, जिसे अब प्रदेश की जनता भुगत रही है. बीते चार वर्षों में शासनकाल में प्रदेश के कई मंत्री व विधायक कानून को ठेंगा दिखा चुके हैं. यह बात और है कि बीएसपी में माया जैसा दूसरा नेता न होने की वजह से म‌ाया ने जिसे चाहा, बाहर फेंक दिया और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर उन्हे जेल भी भेजा. उनका यह निर्णय बहुत कुछ उनकी प्रतिष्ठा बचाने में उपयोगी साबित हुआ.

अपराध और राजनीति में के मूल में नेता अफसर और अपराधियों का गठजोड है, जिसने आम व्यक्ति को राजनीति से लगभग दूर कर दिया है. चुनाव में होने वाले खर्च और और जोखिम को देखते हुए राजनीति में आना आसान भी नहीं. जनता भी पोस्टर बैनर देखती है, व्यक्ति की नियत नहीं, इसलिये प्रचार प्रसार का खर्च वहन करना सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं, अत: जनता के पास चुनने के लिये विकल्प कम ही होते हैं. चुनावों में विभिन्न दलों और निर्दलीय किन्तु मजबूत प्रत्याशियों की हत्या होना भी उतरप्रदेश में आम बात है, जो एक आम व्यक्ति को राजनीति से दूर करती है. 2004 के लोकसभा चुनावों में गोण्डा से भाजपा प्रत्याशी घनश्याम शुक्ला की मौत की सीबीआई जाँच अभी भी अधूरी है इण्डियन जस्टिस पार्टी के बहादुर सोनकर की हत्या के राज से पर्दा उठेगा, यह कहना मुश्किल है. भाजपा तो घनश्याम शुक्ला की हत्या को भूल चुकी है तो उनकी पत्नी नन्दिता आज उसी समाजवादी पार्टी की विधायक हैं, जिसके नेता पर घनश्याम शुक्ला की हत्या का आरोप लगा था.

देश में बढते अपराध, भ्रष्टाचार आदि के लिये जिम्मेदार वह व्यक्ति नहीं जिसे आपने चुना है, जिम्मेदार वह लोग हैं, जिन्होने उस व्यक्ति को चुन कर अपना प्रतिनिधि बनाया है. मुझे बतायें कि कितने स्थानों पर जनता खुद जाकर किसी ईमानदार व्यक्ति से चुनाव लडने के लिये प्रेरित करती या कहती है. कितनी पार्टियाँ अपने ईमानदार कार्यकर्ता को टिकट देती हैं. वस्तुत: ईमानदार व्यक्ति को यह बताया जाता है कि राजनीति तुम्हारे लिये नहीं है. अब जब आप प्रामाणिक व्यक्ति को अपना जनप्रतिनिधि नहीं बना सकते तो बदले में एक अच्छी सरकार की कल्पना व्यर्थ है. सरकार का मुखिया चाहकर भी ऐसे अपराधी जनप्रतिनिधियों पर अंकुश नहीं लगा सकता और उत्तरप्रदेश सरकार इसका उदाहरण है.

वर्तमान में प्रदेश के राजनीतिक परिदृ्श्य को देखें तो हमें मुख्य रूप से चार दल बसपा, सपा, काँग्रेस और भाजपा नज़र आते हैं. पश्चिम में रालोद तो पूर्व में नवोदित पीस पार्टी की भूमिका सीमित ही होगी. सपा और बसपा में नेतृत्व संकट नहीं है, यहाँ निर्विवाद रूप से माया और मुलायम परिवार का ही कब्जा रहेगा. काँग्रेस तो राहुल के नेतृत्व में ही लडेगी, और जीतने की स्थिति में मुख्यमंत्री राहुल की ही पसंद का होगा, इसमें कोई संशय नहीं. सबसे दयनीय स्थिति भाजपा की है, अपने वास्तविक मुद्दों को तिलांजली देकर, बहुत से जनाधार विहीन नेताओं वाली यह पार्टी कल्याण सिंह का कोई विकल्प नहीं तैयार कर सकी. वर्तमान में योगी आदित्यनाथ को छोड कोई अन्य नेता अपनी भी सीट जीतने की स्थिति में नहीं दिखाई देता.

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर विष्लेषण करने से पता चलता है कि कम से कम आने वाले चुनाव में हमें विधानसभा में साफ सुथरे लोग दिखेंगे ऐसा असंभव सा लगता है, क्योकि सभी पार्टियों को चुनाव जिताऊ उम्मीदवार चाहिये, जनप्रतिनिधि नहीं. ऐसे में फिर से जिम्मेदारी जनता पर है कि वह अपने आने वाले समय को कैसा बनाना चाहती है, अगर विधानसभा में अपराधियों को भेजेगी तो लचर कानून व्यवस्था की जिम्मेदार वह खुद होगी कोई और नहीं. जनता का एक मन होना चाहिये कि किसी भी सूरत में अपराधी चुनाव न जीतने पायें. अगर अपराधी आपके प्रतिनिधि नहीं होंगे तो यकीनन प्रदेश की स्थिति में सुधार होना तय ही है और अगर फिर से अपराधी सदन में पहुचे तो क्या होगा यह आप देख सुन ही रहें हैं….

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3 Comments on "उत्तर प्रदेश का जंगलराज!! जिम्मेदार कौन?"

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vimlesh
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हो रहा भारत निर्माण चल रही हमरी भौजी की दुकान मनमोहन सिंह बेचे सामान सरे साथी है बेईमान सब कोई बोले देश महान डा.सुब्रमण्यम स्वामी ने देहरादून में ये आरोप लगाया की इधर देश में कोहराम मचा है और राजमाता सोनिया जी (सोनिया भौजी) और युवराज पिछले चार दिन से switzerland में बैठे हैं .अब पिछले कुछ सालों में सुब्रमण्यम स्वामी ने देश विदेश में ये इमेज बनायी है की वो अनर्गल प्रलाप नहीं करते हैं .. जो बोलते हैं सोच समझ कर बोलते हैं …नाप तोल कर बोलते है …….कुछ भी बोलने से पहले पूरी रिसर्च करते हैं ……..पिछले… Read more »
vimlesh
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अजब राहुल (गांधी) की गजब कहानी अस्वीकरण (DISCLAIMER): मैं किसी राजनैतिक पार्टी का समर्थन नहीं करता हूँ. जो मायावती ने किया, मैं उसका भी समर्थन भी नहीं करता हूँ . पर जब मैंने उत्तर प्रदेश में हो रहे किसान आन्दोलन पर राहुल गाँधी की पाखण्ड भरी टिप्पणी सुनी, तब मुझे बहुत बुरा लगा. राहुल गाँधी: “उत्तर प्रदेश में जो कुछ हुआ उसे देखकर मुझे अपने आपको भारतीय कहने में शर्म आती है.” यू. पी. के लिए शर्मिन्दा होने की इतनी भी क्या जल्दी है? आज़ादी के पहले से लेकर आज़ादी के बाद तक, 1939 से 1989 तक ( इक्का दुक्का… Read more »
आर. सिंह
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उत्तर प्रदेश मेंजिस जंगल राज की बातें की जारही है वह क्या दूसरे राज्यों में नहीं है?चार वर्षों तक चुप्पी के बाद मायावती शासन के अंतिम वर्ष में लोग और मिडिया दोनों मुखर हो गए हैं,पर मुझे तो ऐसा नहीं लगता की पांचवे वर्ष में जुर्म का ग्राफ उपर उठा है.दूसरी बात यह है,क्या जुर्म के इस ग्राफ का उसी समय के दूसरे राज्यों के ग्राफ से तुलना की गयी है.? अगर ऐसा है तो केवल उत्तर प्रदेश के जुर्म का लेखा जोखा देने के बदले अगर तुलनात्मक आकडे प्रस्तुत कए जाते तो वह ज्यादा प्रभावशाली और निष्पक्ष सिद्ध होता.ऐसे… Read more »
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