न्याय व्यवस्था का गिरता हुआ स्तर

judiciary
डा. राधेश्याम द्विवेदी
आज कानून का पालन करने वालों से कानून तोडऩे वालों की प्रतिष्ठा अधिक है। इतना ही नहीं, कानून तोडऩे की ‘क्षमता’ ही लोगों की आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक ‘प्रतिष्ठा’ का मापदंड बनती जा रही है। वैसे तो सभी राजनीतिक पक्ष ऐसी संपूर्ण स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रणाली चाहते हैं, जिन्हें सिर्फ उनके ही पक्ष में निर्णय पाने की स्वतंत्रता रहे। इस हालात में किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की आंखों में आंसू आएंगे ही। उन आंसूओं में प्रायश्चित और वेदना की अहमियत है, जो व्यवस्था को शक्ति प्रदान कर सकती है। भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा वेदना व्यक्त करते समय आंसू नहीं रोक पाने पर अंग्रेजी मीडिया ने दुर्भाग्यपूर्ण टीका-टिप्पणी की । मीडिया यह भूल गया कि संवेदनशीलता कमजोरी नहीं है। ‘बी इंपार्शल बट नॉट इंपेसिव्ह’ मतलब तटस्थ रहो, लेकिन संवेदना शून्य मत रहो। न्यायाधीश की यही खासियत होनी चाहिए। पत्थर तटस्थ नहीं होता, वह तो पथरीला या संवेदना शून्य होता है। यदि न्यायाधीश संवेदनशील नहीं रहेगा, तो इस देश के गरीबों को या दुर्बल घटकों को कभी न्याय नहीं दिला पायेगा । आज की परिस्थिति में तो हर संवेदनशील व्यक्ति की आंखों में आंसू आने ही चाहिएं। यदि शासन या लोकतंत्र के अन्य अंग अपना काम नहीं करेंगे, तो हर काम न्यायपालिका को करनी पड़ेगी । आज ऐसी ही स्थिति निर्मित हो गई है। इसके बावजूद लोगों का विश्वास सिर्फ न्यायपालिका पर है, परंतु न्यायपालिका सुचारू रूप से न्याय कर सके, न तो ऐसी व्यवस्था है, न योजना और न ही वैसी मानसिकता। फिर भी न्यायालय के खिलाफ जो टीका-टिप्पणी होती है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए । ज्ञातव्य है कि शासन के खिलाफ ही सबसे अधिक मामले अदालत में आते हैं और लंबित भी होते हैं। इतना ही नहीं, आज धनवान वर्ग निचले वर्ग को धमकी देता है कि उनकी बात नहीं मानी तो वे उन्हें अदालत में खींचेंगे। अर्थात वह न्यायालय की प्रक्रिया को शोषण के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है। प्रतिपक्षीय न्याय प्रणाली में प्रतिवादी पक्ष हमेशा विलंब चाहता है। ताकि न्याय चाहने वाला पक्ष थककर, अन्याय सहे। वकीलों का व्यवसाय तो उत्तम है, लेकिन वकालत करने वाले कई व्यावसायी उत्तम नहीं हैं। उन्हें तो पैसा कमाने में दिलचस्पी है और लंबित मामलों में विलंब किए बिना आमदनी नहीं हो सकती।
अच्छे वकील न्यायाधीश नहीं बनना चाहते। इसकी वजह है धन। दुर्भाग्य है कि आज तो सभी के लिए न्यायालय एकमात्र ‘शरणतीर्थ’ है। इसलिए इसमें जड़मूल से परिवर्तन की जरूरत है। इसलिए सिर्फ मरहमपट्टी और दोषारोपण करने से काम नहीं चलेगा। वर्तमान न्याय प्रणाली हमें अंग्रेजों से विरासत में मिली है। गांधीजी ने कहा था, ‘‘यह प्रणाली अंग्रेजों ने ‘नेटिव इंडियंस’ को न्याय देने के लिए स्थापित नहीं की थी, बल्कि अपना साम्राज्य मजबूत करने के लिए इस न्याय प्रणाली का गठन किया गया था। इस न्याय प्रणाली में ‘स्वदेशी’ कुछ भी नहीं है। इसकी भाषा, पोशाक तथा चिंतन सब कुछ विदेशी है।’’ अतीत भारत में जो न्याय दिलाने वाली संस्थाएं विद्यमान थीं, उन्हें पूर्णत: समाप्त कर एक केंद्रीभूत तथा सर्वव्यापी न्याय व्यवस्था अंग्रेजों ने स्थापित की। गांधीजी ने यह भी कहा था, ‘‘जिसकी थैली बड़ी होगी, उसी को यह न्याय प्रणाली सुहाती है।’’प्रतिपक्षीय न्याय प्रणाली में न्याय या निर्णय करने की प्रक्रिया गवाहों पर आधारित है और सौ फीसदी सच बोलने वाला गवाह इस धार्मिक देश में कहीं अस्तित्व में ही नहीं है। ईश्वर की सौगंध लेकर गीता पर हाथ रखकर भी असत्य या अद्र्धसत्य कथन कहना अदालत की चारदीवारी में आसान हो गया है। अंतत: यह एक निर्णय प्रणाली मात्र रह गई है। गांधीजी ने इसे ‘खर्चीली ऐशगाह कहा है।’ और यह भी कहा है, ‘इस प्रणाली में कुछ पापमूलक तत्त्व हैं, जिनके कारण वकीलों को भरपूर कमाई करने का अवसर मिलता है।’ इस प्रतिपक्षीय प्रणाली का इस देश की मानसिकता या मिट्टी से कुछ भी संबंध नहीं है। इस प्रणाली में वैयक्तिक न्याय या सामाजिक न्याय मिलता ही है, यह कह पाना मुश्किल है। इसमें तो सिर्फ निर्णय मिलता है। इसलिए देश में एक सामानांतर न्याय व्यवस्था स्थापित करने की जरूरत है, जिसमें लोगों का प्रत्यक्ष सहभाग या सहयोग हो। अदालत की चारदीवारी में झूठ बोलना आसान है, परंतु जनता के बीच बोलने की हिम्मत नहीं होती, क्योंकि सारा समाज या गांव जानता है, सत्य किसके पक्ष में है, लेकिन सभी की कोशिश होती है कि ‘सत्य’ न्यायालय के सामने न आ पाए।आज की न्याय प्रणाली में जीतने वाला भी समाधानी नहीं है। विनोबा जी ने कहा था कि ‘भारत का अपना एक न्याय था और बाहर से आया हुआ एक न्याय भी है । भारत का न्याय’ पंच परमेश्वर द्वारा न्याय था। एक बोले, दो बोले, तीन बोले, पांच बोले परमेश्वर है। आजकल अपने यहां जो न्याय है वह बाहर का है। यह इंपोर्टेड न्याय है। उसे ‘एक्सपोर्ट’ कर देना चाहिए विनोबा जी के विचारों को मैंने इसलिए उद्धृत किया है, ताकि न्याय प्रणाली और समाधान प्रणाली में अंतर स्पष्ट हो सके। इसी के साथ ग्राम स्वराज्य और अदालत मुक्ति का स्वरूप भी स्पष्ट हो और व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक न्याय की कल्पना भी सामने आए कि राज व्यक्ति का नहीं, अपितु कानून का हो। लोकतंत्र ने भी यही माना है। परंतु सिर्फ कानून से समाज परिवर्तन नहीं हो सकता। यदि उसे लोकमत और लोकशक्ति का सहारा नहीं मिलेगा, तो वह ढुलक जाता है। कानून रास्ता खोलता है, पर उस रास्ते से जाने की प्रेरणा नहीं दे सकता। इसलिए आज की न्याय प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है, तभी न्याय और उसमें भी सामाजिक न्याय स्थापित हो सकेगा।अगर आजादी का संपूर्ण आशय स्थापित करना है तो जनता की भाषा में शासन व्यवहार और न्यायालय से संबंधित व्यवहार अनिवार्य किया जाना चाहिए। कामयाब होने के लिए जनता की भाषा में यानी लोकभाषा में लोकतंत्र का न्याय व्यवहार कार्य करे। वरना इसमें सिर्फ ‘तंत्र’ रह जाएगा और ‘लोक’ गायब हो जाएंगे। उनका व्यवहार में कोई स्थान ही नहीं रहेगा। यदि लोकभाषा व्यवहार की भाषा नहीं होगी, तो सामान्यजनों की न्याय व्यवहार में कोई सहभागिता या हिस्सा हो नहीं सकता। आज न्यायालय का क्षेत्र सामान्यजन के लिए अछूता है। वहां बिचौलियों का महत्त्व और मूल्य अधिक है। दूसरी ओर कानून हाथ में लेने की वृत्ति भी बढ़ रही है।
कानून की अपनी कुछ मर्यादाएं हैं। वह तब तक अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता या कामयाब नहीं हो सकता, जब तक उसे लोक सम्मति का आधार प्राप्त न हो। कानून हक प्रदान करता है तथा अवसर उपलब्ध करा देता है, लेकिन यदि वह सामान्यजनों तक नहीं पहुंचेगा, तो प्रेरणादायी नहीं हो सकता।आज तो ऐसी स्थिति है कि कानून का पालन करने वालों से कानून तोडऩे वालों की प्रतिष्ठा अधिक है। इतना ही नहीं, आपकी कानून तोडऩे की ‘क्षमता’ ही आपकी आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक ‘प्रतिष्ठा’ का मापदंड बनती जा रही है। दूसरी ओर सभी राजनीतिक पक्ष ऐसी संपूर्ण स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रणाली चाहते हैं, जिन्हें सिर्फ उनके ही पक्ष में निर्णय देने की स्वतंत्रता रहे। इस हालात में किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की आंखों में आंसू आएंगे ही। उन आंसूओं में प्रायश्चित और वेदना की अहमियत है, जो व्यवस्था को शक्ति प्रदान कर सकती है। अभी यह स्थिति कायम रहेगी, क्योंकि आमूलचूल परिवर्तन के बारे में सोच और चिंतन करने की मानसिकता नहीं है।
अब तो यह बहस चल रही है कि संसद, शासन और न्यायपालिका में से कौन श्रेष्ठ है? इनमें कोई भी श्रेष्ठ हो पिसता तो आम आदमी ही है।सब कुछ घूमफिरकर जनता पर ही आकर टिकता है। थोड़ा-मोड़ा परिवर्तन तो जनता तक दिखता नहीं है। सब कुछ प्रक्रिया की एजेन्सी के अधीन सिमटकर रह जाता है। जब कोई बड़ा परिवर्तन होता है तो वह निचले तपके तक पहुंच पाता है।न्याय व्यवस्था जितना कहना आसान है उतना आसान उसे हस्तगत करना कत्तई नहीं है। इसके लिए कोई एक अंग जिम्मेदार ना होकर पूरी मशीनरी ही जिम्मदार ठहराई जा सकती है और शनैः शनैः ही ये लक्षण व प्रभाव दिखलाई पड़ते हैं।

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