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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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जीनत जीशान फाज़िल 

मानव सभ्यता के विकास में जंगल का अहम योगदान रहा है। मिट्टी, पानी और हवा की शुद्धता के लिए यह फायदेमंद रहा ही है वहीं आर्थिक रूप से भी यह मनुष्‍य के लिए हितकर साबित हुआ है। इसके कारण ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलती है। आज भी देश की कई आदिम जनजातियां जंगलों की पूजा करती हैं। लेकिन बढ़ती जनसंख्या और विकास के नाम पर औद्योगीकरण ने इसे काफी नुकसान पहुंचाया है। तेजी से बढ़ती आबादी के कारण रहने के लिए जमीन कम पड़ती जा रही है, जिसकी पूर्ति जंगलों को काट कर किया जाने लगा है। यह स्थिति विश्‍व के तकरीबन सभी हिस्सों में देखने को मिल जाएंगे।

भारत का भौगोलिक क्षेत्रफल 32 लाख 87 हजार 263 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 7 लाख 69 हजार 512 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। जो पूरे क्षेत्रफल का करीब 23 फीसदी है। हालांकि इस संबंध में कई समितियों ने अपनी अलग-अलग राय दी है। भारतीय वन सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश में वन पूरे क्षेत्रफल का 19.27 प्रतिशत है। अलग-अलग आकड़ें इस बात का इशारा हैं कि देश में वन सिकुड़ते जा रहे हैं। इसके पीछे मुख्य कारण वनों का तेजी से सफाया होना है। उपग्रहों के ताजे चित्र और आकलन बताते हैं कि देश में हर साल 13 लाख हेक्टेयर वन नष्‍ट हो रहे हैं। जो वन विभाग की ओर से किए जा रहे दावों से आठ गुना अधिक है। माना जा रहा है कि जंगलों पर गैर कानूनी कब्जा और जंगल माफिया इसके सबसे बड़े जिम्मेदार हैं।

कश्‍मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। सिर्फ इसलिए नहीं कि यहां बर्फ की चादर से ढ़के खूबसूरत पहाड़ हैं और मन मोहने वाले रमणीक स्थल हैं बल्कि यहां के जंगल भी इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। पूरे जम्मु व कष्मीर में 20,230 वर्ग किलोमीटर में वन फैला हुआ है जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 19.95 प्रतिशत है। भौगोलिक परिस्थिती के अनुसार राज्य के वन क्षेत्र को तीन हिस्सों लद्दाख, जम्मू और कश्‍मीर में विभाजित किया जाता है। इनमें कश्‍मीर घाटी में करीब 51 प्रतिशत क्षेत्र में जंगल है। परंतु पेड़ों की अवैध कटाई और जंगल की जमीनों पर कब्जा यहां प्रमुख समस्या बनती जा रही है। जिस पर वन विभाग अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रहा है। कष्मीर में जंगलों की कितनी जमीनों पर कब्जा हो चुका है या जमीनों पर ये गैर कानूनी कब्जे किस हद तक पहुंच चुके हैं, इसका आकलन लगाने के लिए यहां के वन विभाग के पास कोई ठोस आंकड़ा नहीं हैं। परंतु विभाग ने पिछले दशकों के दौरान जो आंकड़े एकत्र किया है और जिसे 2009 के दौरान ‘‘डायजेस्ट ऑफ फॉरेस्ट‘‘ में प्रकाशित किया गया है वह काफी चौंकाने वाले हैं।

राज्य वन विभाग ने कश्‍मीर के वन क्षेत्र को 6 हिस्सों श्रीनगर, बडगाम, अंनतनाग, पुलवामा, बारामुला और कुपवाड़ा में बांटा है। डायजेस्ट के अनुसार सिर्फ श्रीनगर सर्किल ‘ए‘ में 119 से 138 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में गैर कानूनी कब्जा है। ऐसे में इन आंकड़ों के माध्यम से अन्य सर्किलों में होने वाले गैर कानूनी कब्जों का अंदाजा लगाना कोई कठिन नहीं है। फॉरेस्ट डायजेस्ट के आंकड़ों में एक दिलचस्प बात यह है कि जंगल की जमीनों पर गैर कानूनी कब्जा लगातार नहीं रहा है बल्कि पिछले कई वर्शों में इसमें कमी और वृद्धि होती रही है। उदाहारणस्वरूप 2001-02 के दौरान सिर्फ पीर पंजाल में ही 8.9 वर्ग किलोमीटर जंगल पर गैर कानूनी कब्जा किया गया जबकि 2002-04 के दौरान इसमें कमी आई और यह 4.5 वर्ग किलोमीटर रह गया। 2004-05 में यह फिर बढ़कर 8.92 वर्ग किलोमीटर हो गया और फिर 2006-07 यह घटकर 5.16 वर्ग किलोमीटर रह गया। 2007-08 में इसमें एक बार फिर वृद्धि दर्ज की गई जबकि 2008-09 में इसमें एक बार फिर कमी हो गई। डायजेस्ट के अनुसार ऐसा ही हाल कश्‍मीर के करीब-करीब सभी वन क्षेत्रों में देखने को मिल जाएंगे।

वन विभाग द्वारा जारी यह आंकड़ा स्वंय विभाग को कठघरे में खड़ा कर देता है। प्रश्‍न उठता है कि जब गैर कानूनी कब्जा एक साल में कम हो जाता है तो अगले वर्श वह फिर कैसे और क्यूं बढ़ जाता है? विभाग ऐसा कोई ठोस उपाए क्यूं नहीं करता है कि जंगल को दुबारा अतिक्रमण से बचाया जा सके? इस संबंध में विभाग के एक पूर्व अधिकारी के अनुसार गैर कानूनी कब्जे में उसी वक्त कमी आती है जब उस पर कब्जा करने वाला स्वंय खाली कर देता है। लेकिन उन्हें दुबारा अतिक्रमण से बचाने के प्रति विभाग का रवैया सदैव उदासीन रहा है। यह बात किसी छुपी नहीं है कि जंगलों पर गैर कानूनी कब्जा और धड़ल्ले से हो रही लकड़ियों की अवैध कटाई के संबंध में वन विभाग को कोई सूचना नहीं होगी। नाम नहीं छापने की शर्त पर विभाग के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि लकड़ियों की अवैध तस्करी के संबंध में राज्य वन विभाग या तो पूरी तरह से अनजान है अथवा वह चुपचाप तमाशा देख रहा है। वन विभाग की उदासीनता का फायदा स्थानीय दंबग भी उठाते हैं। उदाहरण के तौर पर कुपवाड़ा से करीब 20 किलोमीटर दूर करालपूरा ब्लॉक के वारसन ऋर्षिगुण के स्थानीय निवासी सुविधाओं के अभाव में अपने दैनिक जीवन की पूर्ति जंगल से ही करते हैं। स्थानीय पंच गुलाम हसन के अनुसार आर्थिक रूप से कमजोर गांव के लोग चुल्हा जलाने के लिए जंगल की लकड़ी पर ही निर्भर हैं परंतु अन्य क्षेत्रों के स्थानीय दंबग उन्हें लकड़ियां काटने से रोकते हैं और वन विभाग इस पूरे मामले में मूकदर्षक बना रहता है।

बहरहाल वनों को बचाने के लिए केंद्र ने 1988 में राष्‍ट्रीय वन नीति बनाई थी जिसका उद्देष्य एक ऐसी पॉलिसी तैयार करना जिससे कि वनों का संरक्षण किया जा सके। इसके काफी उत्साहजनक परिणाम भी आएं हैं और गैर कानूनी कब्जा तथा अवैध कटाई पर काफी हद तक काबू पाया जा सका है। परंतु शत-प्रतिशत परिणाम उस वक्त तक मुमकिन नहीं हो सकता है जब तक कि हम आम लोगों को इस संबंध में जागरूक नहीं कर लेते हैं। यह समझना जरूरी है कि मानव सभ्यता और जंगल एक दूसरे के पूरक हैं। कश्‍मीर के प्रसिद संत शेख नुरूउद्दीन वली के शब्दों में ‘‘अन पोशी तेली, येली वान पोश‘‘ अर्थात जब तक जंगल है तब तक इंसान के खाने पीने की चीजें मयस्सर हैं। (चरखा फीचर्स)

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