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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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दिनेश परमार

संसार में लोग कर्इ प्रकार के होते है। रंग-भेद की दृषिट से काले-गोरे,मानसिक दृषिट से मेधावी-मंदबुद्धि वाले,संस्कारों की दृषिट से सभ्य-असभ्य या और भी कोर्इ प्रकार हो सकता है। यह उनकी प्रकृति के अनुरुप ही तय होता है। ठीक उसी प्रकार इस माया के संसार में, जिसमें कोर्इ भी सत्य सर्वदा सत्य रहेगा यह निषिचत नहीं है, ऐसे इस रहस्यमय,परब्रह्रा-आविष्कृत जगत में समस्याएं भी कर्इं प्रकार की होती है। जिनका समाधान मनुष्य अति-प्रयत्न के द्वारा ही खोज सकता है। हा यह बात अलग है कि इन समस्याओं का जनक स्वयं मानव ही है। समस्याएं भी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरुप कर्इें प्रकार की होती है। जैसे अन्तरराष्ट्रीय समस्या, राष्ट्रीय समस्या, या प्रांतीय समस्या कोर्इ भी हो सकती है। इसके अलावा सामाजिक,धार्मिक या राजनैतिक समस्या,किसी की व्यकितगत समस्या भी होती है। कुछ समस्याएं सतही रुप से एक जैसी दिखार्इ देती है किंतु वास्तव में उनकी मूल प्रकृति में अंतर होता है। जो सामान्यतया दिखार्इ नहीं देता। उनमें सतही तौर से समानता भासित होने के कारण उनके समाधान में हमें अति परिश्रम करना पडता है। कभी-कभी वे सुलझने के स्थान पर और अधिक उलझकर रह जाती है।

जैसे अपनी एक राष्ट्रीय समस्या है; कश्मीर-विवाद, यह समस्या अपने लिए स्वतंत्रता-काल से यक्ष-प्रश्न बनी हुर्इ है जिसका उत्तर राजनीति के कर्इ भीम-अर्जुन नहीं दे सके। यहां तक कि ‘पालिटिकल-युधिष्ठिर इसके समाधान के लिए उत्साह के साथ आगे आए किंतु सुलझाना तो दूर रहा बेचारे खुद उलझकर रह गए। इसका कारण कोर्इ ज्यादा विशेष न होकर केवल इतना है कि जब यह मसला अपना असितत्व प्रकट कर रहा था तभी अपने देश के कुछ कर्णधार बिना सोचे-समझे, बिना विचारे, विशेषज्ञों की सलाह के बगैर इसे संयुक्त राष्ट्र में ले गये। याने वे इस राष्ट्रीय समस्या को अन्तरराष्ट्रीय स्तर की समस्या समझ बैठे, बस! तभी से इसने अपने आप को ‘असमाधान की स्थिति में डाल दिया। उनकी नजर में उपरी रुप से दो देशो के बीच के विवाद यद अन्तरराष्ट्रीय ही थे।

यह क्यों हुआ? क्योंकि वे इसकी मूल प्रकृति को नहीं समझ पाये। विषयान्तर की चिंता न करते हुए यदि कहूं तो श्री नेहरु प्रथम तो इसे समझ ही नहीं पाये और जब समझे तो अपनी सेकुलर नजर से। एक निहायत राजनीतिक विवाद को दे दिया धार्मिक रुप। बस फिर क्या था! पूरा देश उलझकर रहा गया।

विचारक कह गये है कि ‘ समस्या का समाधान हमेशा वहीं होता है जहां से उसकी उत्पतित हुर्इ है। याने समस्या का समाधान उसकी मूल प्रकृति में निहित होता है। अत: जिसने समस्या का मूल खोज लिया समझिए उसने उसका समाधान भी खोज लिया। किंतु यदि समस्या के मूल को खोजे बिना ही उसका समसधान करने का प्रयास किया तो वह समाधान ही उस समस्या को मजबूत करने व उसका विकास करने वाला सिद्ध हो जाता है। कश्मीर के साथ भी यही हुआ।

भीषण संघर्षो के उपरांत सन 1947 में अपने देश ने आजादी प्राप्त की। लम्बे समय तक विदेशी-विधर्मी शासकों के अधीन रहने कारण हमें अपने मूल का थोडा विस्मरण हो गया। इसका प्रभाव यह हुआ कि हम अपनी सोच को उन्हीं की भांती साम्रज्यवादी बना बैठे। आजाद भारत के लिए संविधान निर्माण करना था अत: संविधान-सभा गठित की गयी। जिसमें संविधान-निर्माण की प्रकि्रया प्रारम्भ हुर्इ। समथ ही देशी रियासतों के एकिकरण के लिए भी विचार-योजनाओं का दौर चला श्री पटेल के नेतृत्व में रियासत एकिकरण विभाग बनाया गया इस विभाग ने प्रभावी ढंग से कार्य किया व कुछ ही दिनों में देश-भर की 542 रियासतों में से कश्मीर,हैदराबाद व जूनागढ इन तीन रियासतों को छोडकर बाकि सभी को भारत संघ में मिला दिया गया।

कालांतर में जूनागढ व हैदराबाद का विलय भी सहज ही हो गया। किंतु कश्मीर रियासत का विलय तत्कालीन राजनीति कारणों से सम्भव नहीं हो सका। इसके लिए थोडे बहुत जिम्मेदार श्री नेहरु भी रहे। बाद में जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया तो वहां के शासक राजा हरिसिंह ने विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये स्पष्टत: कश्मीर अब बिना किसी किंतु-परंतु के भारत का अविभाज्य अंग बन गया था। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा सम्भव नहीं हो सका। शख अबददुला की षडयंत्रकारी सोच के कारण संविधान में कश्मीर के लिए कुछ विशेष प्रावधान कर दिए गए जो आज भी अपने देश के लिए ‘कलंक बने हुए है। यथा:-

1.धारा 370(याने विषेश दर्जा )

2. अलग संविधान

3. कश्मीर को छोडकर शेष भारत के कोर्इ भी नागरिक कश्मीर में भूमि नहीं खरीद सकते। किंतु कोर्इ भी कष्मीरी भारत के किसी भी भाग में भूमि खरीद सकता है।

4. संसद में बने कोर्इ भी कानून कश्मीर में लागू करने के लिए कश्मीर विधान सभा की सहमती आवष्यक है।

5. वहां पर राष्ट्रपति शासन भी लागू नहीं हो सकता।

6. यहां तक कि कश्मीर में प्रवेश के लिए परमिट की अनिवार्यता लागू कर दी जिसे जिसके विरोध स्वरुप श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपने प्राणों की आहुति देनी पडी।

इसके अलावा भी कर्इ प्रावधान थे। मैं ने उपर कहां कि समस्या के मूल को जाने बिना समाधान करने के प्रयास उस समस्या के लिए मजबूत कारक ही सिद्ध होते है।

कश्मीर के सम्बंध में यही हुआ। कश्मीर को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए संविधान में जितने भी प्रावधान किये गये वे सभी अलगाव के ही कारण बने। क्योंकि ये समाधान ही अपने आप में समस्यामूलक है। एक प्रकार से वे ही वैमनस्य का प्रतिपादन करते है।

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