लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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historyमनुष्य के वैभव काल में उसके ‘सदगुण’ उसकी ढाल बनते हैं, जो हर प्रकार की आपदा से उसकी रक्षा करते हैं। परंतु पराभव काल में वही सदगुण उस व्यक्ति की विकृति  बन जाते हैं। स्वातंत्रय वीर सावरकर ने ‘सद्गुण विकृति’ की इस रहस्यमयी पहेली को भारतीय इतिहास के संदर्भ में बड़ी सावधानी और विवेकशीलता से स्पष्ट किया है।

दीये की आवश्यकता तभी पड़ा  करती है जब अंधकार आ धमकता है। इस प्रकार सन 712 से लेकर 1206 (गुलाम वंश की स्थापना तक का काल) की अवधि ऐसी है जिसे भारतीय इतिहास के ‘वैभव और पराभव की संधि’ कहा जा सकता है। हमारा मानना है कि वैभव मरा नही था, जीवित था और दीपक की भांति अंधकार से लड़ रहा था, जबकि कुछ लोगों ने यह भ्रम स्थापित किया है कि सर्वत्र पराभव ही पराभव था, वैभव कहीं नही था।

संधि की इस दीर्घावधि में देश में कुछ नये तात्कालिक आधार पर कुछ अवगुणों को सद्गुणों के नाम पर अपनाने की प्रवृत्ति में वृद्घि हुई। इतिहास के विषय में यह सर्वमान्य सत्य है कि इसमें एक सदगुण कालांतर में विकृति को प्राप्त हो जाता है। इसलिए भारत ने जिन सदगुणों  का आश्रय इस समय अपने वैभव की रक्षार्थ लिया वे कालांतर में हमारे लिए विकृति बन गये। वास्तव में ये सदगुण हमारी राष्ट्रीय दुर्बलता का प्रतीक थे, जिन्हें हमने आपद्धर्म माना, वही हमारे लिए आपदा-मर्म बनकर छा गये और इतनी गहनता से छाये कि फिर उनके अंधकार में हमें कुछ दिखाई ही नही दिया। कदाचित यह भी सत्य है कि हम आज तक भी उस अंधकार से बाहर नही निकल पाए हैं।

आर्य से हिंदूकरण

हमारा प्राचीन संबोधन आर्य था। महाभारत तक यह आर्य शब्द हमारे लिए प्रयुक्त होता रहा। परंतु कालांतर में शनै: शनै: हम आर्य से हिंदू बनते चले गये। लोगों की यह भ्रांति है कि हिंदू शब्द हमें मुस्लिमों से मिला है और ‘इण्डिया’ हमें अंग्रेजों से मिला है। जबकि ईसा से 327 वर्ष पूर्व जब सिकंदर यहां आया था तब उसके साथ आए लेखक मेगास्थनीज ने ‘इण्डिका’ पुस्तक लिखकर इस देश के विशाल भूखण्ड का नामकरण इण्डिया के रूप में करने की भूमिका तैयार कर दी। उसके ग्रंथ में सिन्धु नदी को इण्ड्स तथा उसके समीप रहने वाले लोगों को ‘इण्डु’ अथवा इन्दु कहकर संबोधित किया गया। कालांतर में मौहम्मद साहब से सदियों पूर्व अरबी फारसी में इस सिंधु को हिंदू कहकर पुकारा गया। इस विषय को सूक्ष्मता से समझने के लिए पाठकवृंद स्वामी विज्ञानानन्द जी की पुस्तक ‘हिंदू का नाम, लक्षण और भविष्य’ पढ़ सकते हैं। क्योंकि यहां इस विषय पर चर्चा करना उचित नही होगा। परंतु यह सही है कि ‘हिंदू’ शब्द हमें अपने वेदों के सिंधु शब्द के अपभ्रंश के रूप में मिला है। इस पर कुछ लोग विवाद की स्थिति तक पहुंचने का प्रयास करते हैं, जो कि उचित नही है। आज केवल यह मानना चाहिए कि वैदिक संस्कृति को सबसे अधिक अपने लिए अनुकूल कौन मान रहा है? यदि वह हिंदू है तो उसे यह बताया जाना चाहिए कि तू आर्य का उत्तराधिकारी है, जाग और लक्ष्य सिद्घि के लिए उठ खड़ा हो।

विभिन्न संप्रदायों का विकास

हम जिस काल की चर्चा कर रहे हैं अब उस पर आइए। सन 712 से 1206 ई. तक भारतवर्ष में विभिन्न सम्प्रदायों का अस्तित्व उठ खड़ा हुआ। इन संप्रदायों का अस्तित्व वैदिक धर्म के पतनोन्मुख होने तथा हमारा हिंदूकरण होने की फलश्रुति थे। बौद्ध और जैन संप्रदाय वैदिक व्यवस्था को सुधारने के लिए जन्मे थे, परंतु ये दोनों धीरे धीरे अलग सम्प्रदाय बन गये। अलग बनते बनते इतनी दूर निकल गये कि स्वयं को वैदिक धर्म से सर्वथा अलग ही घोषित कर लिया। मूल में सुधार करने के लिए जब कोई आंदोलन जन्म लेता है तो विश्व इतिहास की साक्षी यही है कि धीरे-धीरे वह आंदोलन मूल धर्म का समानांतर सम्प्रदाय बनकर खड़ा हो जाता है।

अवतारवाद की धारणा का विकास

प्राचीन वैदिक धर्म वैष्णव और शैव धर्मों में विभक्त हो गया। तब समाज पर अपने अन्य साथी सम्प्रदायों का प्रभाव पड़ना आरंभ हुआ। बौद्ध और जैनियों ने अवतारों की वेद विरूद्ध धारणा दी, जिसे हमने अपनाना आरंभ कर दिया। जनता को एकसूत्र में बांधे रखने के लिए नये नये सामाजिक मानदण्डों की खोज की जाने लगी।

यहां पर यह ध्यान देना चाहिए कि नये मानदण्डों की खोज भी किसी सीमा तक एकसूत्रता की वैदिक अवधारणा को स्थापित करने हेतु ही की गयी थी। इनके पीछे सोच अच्छी हो सकती है, परंतु परिणाम आशाओं के विपरीत आया। जैसे बौद्घों और जैनियों ने जब अवतारवाद का सिद्घांत दिया तो हिंदू आर्यों ने उस अवतारवाद को शीघ्रता से अपनाना चाहा। बड़ी भारी भीड़ उधर आकर्षित होने लगी। तब उस भीड़ को वेदधर्म के झण्डे नीचे  रोके रखने के लिए हमने भी घोषणा कर दी कि हमारे पास भी दो-दो अवतार-राम और कृष्ण हैं। इन अवतारों की घोषणा से बौद्ध धर्म की ओर भागती भीड़ तो रूक गयी, परंतु हम अपनी ऊंचाई से नीचे खिसक गये। यहां पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जब अधिक क्षति हो रही हो तो न्यून क्षति पर समझौता कर लेना चाहिए। जिस हिंदू को हम आज आर्य के सर्वथा विपरीत खड़ा पाते हैं, यह इसी मानसिकता और परिस्थितियों से निर्मित हुआ है। इसमें उसका कोई दोष नही है। दोष उन लोगों का और उस व्यवस्था का है जिसके ऊपर समाज के सुधारने का दायित्व होता है।

हम एक स्थान पर फिसले तो देश में संप्रदायों की और अवतारों की बाढ़ आ गयी। दक्षिण भारत में आलवार संत, वैष्णव आचार्य, भक्ति मार्ग की अलग धारा बही तो देश के दूसरे भागों में कहीं तांत्रिक संप्रदाय या वाममार्ग आया तो कहीं नाथ संप्रदाय आया। कहीं गोरखनाथ, जालंधर नाथ, कृष्णपाद, भर्तृहरि, गोपीचंद, और चौरासी सिद्घों के शिष्यों ने अपनी अपनी विशिष्टता स्थापित करने का प्रयास किया। सारा देश सम्प्रदायों से भर गया।

सिद्घांतों से समझौता करने का परिणाम था ये। एक स्थान पर सिद्घांत से समझौता किया गया थोड़ी ढील दे दी गयी-व्यवस्था में तो उसी का परिणाम क्या निकला? यह क्रम यही नही रूका। देश की वर्णव्यवस्था जाति व्यवस्था में परिवर्तित होने लगी। लोगों ने पाखण्डों को जीवन का आवश्यक अंग बना लिया। इसलिए किसी के पिताश्री यदि चतुर्वेद पाठी (चतुर्वेदी) थे तो पुत्र ने भी स्वयं को चतुर्वेदी लिखना आरंभ कर दिया। त्रिवेदी की संतान ने स्वयं को त्रिवेदी और द्विवेदी की संतान ने स्वयं को दुबे या द्विवेदी लिखना आरंभ कर दिया। जब आर्य से चतुर्वेदी, त्रिवेदी या द्विवेदी केवल परंपरागत स्वरूप में रह गये तो सारा समाज ही रूढ़िवाद की दल दल में फंस गया। सारा हिंदू समाज ऐसी ही सामाजिक विसंगतियों में फंसकर रह गया।

अच्छा परिणाम भी निकला

बौद्ध धर्म की अवतारवाद की धारणा के सामने अपने नये-नये कई अवतार घोषित करने से हिंदू समाज को एक भारी लाभ ये हुआ कि बौद्ध धर्म बर्मा, तिब्बत, चीन आदि बाहरी देशों की ओर खिसक गया और भारत उसकी चपेट में आने से बच गया।

यहां पर वेदों के प्रति आस्था यथावत बनी रही, यद्यपि वेदों के अर्थ कुछ भिन्न रूपों में सामने आए और वेदों के नाम पर कुछ अनर्थ भी होने लगे, परंतु वेदों के प्रति लोगों का सम्मान भाव कम नही हुआ। यदि बौद्ध धर्म देश में फेेलता तो वेदों के प्रति रही सही निष्ठा भी समाप्त हो गयी होती। सारा खो देने से बेहतर है अधिकांश को विकृत में ही सही, पर समेटे रखना।

परदा व सती प्रथा का प्रचलन

कौटिल्य ने लिखा है कि जब दूसरे राज्य की शक्ति अधिक हो तो उससे संधि कर ली जानी चाहिए। जब यह देखा जाए कि न दूसरा हमें परास्त कर सकता है और न हम दूसरे पर विजय पा सकते हैं, तो आसन अर्थात उदासीन नीति का अनुसरण करना चाहिए…जो राजा बल में अपने  तुल्य व अपने से श्रेष्ठ हों, उनके प्रति संधि की नीति उत्तम है। यदि अपने बलशाली के साथ युद्ध किया जाएगा तो उसकी वही गति होगी जो पदाति की हस्ति से लड़ते हुए होती है। कच्चे बर्तन जैसे परस्पर टकराकर टूट जाते हैं, वैसे ही बराबर बल वाले राजा परस्पर लड़कर नष्ट हो जाते हैं।

कौटिल्य ने बलशाली राजा के साथ देश, काल,  परिस्थिति के अनुसार विविध प्रकार की संधियों का उल्लेख किया है। संधि से कौटिल्य का तात्पर्य प्रजा को कष्ट न होने देने से है। अत: राजा को सबल शत्रु से अपनी भूमि का दान करके, या धनादि देकर, या अपनी सकल आय का कुछ भाग देकर इत्यादि कई प्रकार से संतुष्ट कर उससे संधि को प्राथमिकता देनी चाहिए।

वैभव और पराभव के जिस संधि काल का हम यहां उल्लेख कर रहे हैं, उसमें हमारे समाज ने यद्यपि इस्लाम का साहस के साथ सामना किया और निरंतर 500 वर्ष तक सामना करते करते इस्लामिक राज्य को देश में स्थापित नही होने दिया, स्वतंत्रता के लिए संघर्ष चलता रहा। हमारे देश के शासक वर्ग और जनता ने इस्लामिक आक्रांताओं को स्वयं से अधिक बलशाली तो नही माना परंतु उन्हें स्वयं से अधिक क्रूर और आततायी अवश्य माना। इसलिए कुछ ऐसी व्यवस्था विकसित की गयी कि दानवी आक्रांताओं से संधि भी न करनी पड़े और अपनी रक्षा भी हो जाए। इसी सोच ने और हमारी दुर्बलता ने हमें सदगुणों के नाम पर कुछ अवगुणो को अपनाने की ओर प्रेरित किया।

तब पर्दा प्रथा और सती प्रथा का प्रचलन हुआ। एक प्रकार से कौटिल्य के संधि नियमों का विस्तार था यह।  यद्यपि कौटिल्य ने पर्दा प्रथा या सती प्रथा की बात नही कही थी। परंतु देश, काल परिस्थिति के अनुसार आत्मरक्षा में निर्णय लेने हेतु उसने समाज को स्वतंत्र तो छोड़ा ही था। इसलिए समाज ने संधि न करके भी संधि करने की नई खोज कर डाली। शत्रु से अपनी बहन बेटियों की अस्मिता को सुरक्षित रखने हेतु उन्होंने पुराणों में तत्समय रचे जा रहे साहित्य में पर्दा प्रथा और सती प्रथा का वेदविरूद्ध उल्लेख कर डाला। यहां तक कि प्राचीन काल से ही इन दोनों के अस्तित्व की काल्पनिक कहानियां गढ़ लीं। क्योंकि भारत में किसी बात को प्रामाणिकसिद्ध करने के लिए उसे प्राचीनसिद्ध करना आवश्यक है। आज तक हम देखते हैं कि किसी पचास वर्ष पुराने मंदिर पर भी प्राचीन शब्द अवश्य लिखा होता है।

मिथ्या आरोप मढ़े जाने लगे

पर्दा प्रथा और सती प्रथा भारत में अब से पूर्व कभी नही रही थी। परंतु अब इस प्रकार की कुरीतियों को भी प्राचीनसिद्ध करने के लिए मिथ्या आरोप मढ़े जाने का समय आ गया। महाकवि भवभूति ने अपने नाटक ‘महावीर चरितम्’ में श्रीराम पर आरोप लगाया गया कि जब राम और सीता परशुराम जी से मिलने गये तो राम ने सीता से कहा-प्रिये! ये परशुराम गुरू हैं, अत: ‘कृतावगुण्ठन’ हो जाओ, अर्थात पर्दा कर लो। इसी प्रकार महाकवि माघ के ‘शिशुपाल वध’ काव्य में भी लिख दिया गया कि जब नारी के मुख से पर्दा हट जाता है तो क्षण भर के लिए उसके मुख की छवि की झलक मिल जाती है।

सत्यकेतु विद्यालंकार पर्दा प्रथा पर लिखते हैं…उल्लेखनीय है कि पर्दे की प्रथा का प्रचार विशेषतया उन्हीं  प्रदेशों में था जो यवन, शक, कुषाण, हूण आदि विदेशी जातियों द्वारा आक्रांत हुए थे, मध्य भारत तथा दक्षिणी प्रदेशों में इसका प्रचलन नही हुआ था। यही कारण है कि अजंता, एलोरा, सांची, भरहुत आदि में स्त्रियों के जो चित्र अंकित हैं या जो स्त्री मूर्तियां विद्यमान हैं, उनमें कहीं भी स्त्रियों को पर्दे में नही दिखाया गया है।

जिस प्रकार पर्दा प्रथा को  लाकर जोड़ा गया उसी प्रकार सती प्रथा को भी काल्पनिक आधार पर वेद विरूद्ध जाकर हमारे प्राचीन ग्रंथ रामायण व महाभारत में स्थान दे दिया गया। रामायण में वेदवती के ज्वलित जात वेदस्य में अपने को गिरा देने का प्रसंग दिया गया तो महाभारत में पाण्डु की पत्नी माद्री को इसी प्रकार अपने पति के साथ सती होते दिखाया गया। जबकि विष्णु पुराण के रचयिता ने कृष्ण की आठ पत्नियों को उनके साथ सती होते दिखा गया।

कुल मिलाकर हम अपने चरित्र को बचाने के लिए चरित्र को ही विद्रूपित कर रहे थे। भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए भूत को सुरक्षित और संरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक होता है। यदि आप जाने अनजाने किसी प्रकार से अतीत से छेड़छाड़ करेंगे तो भविष्य के साथ स्वयं ही छेड़छाड़ हो जाएगी। क्योंकि भविष्य भूत की कोख में सोता है और वर्तमान की गोद में पलता है।

यहां पर यह भी दृष्टव्य है कि यदि माद्री जैसी पत्नी ने पांडु के साथ सती होने का निर्णय भी लिया तो यह निर्णय स्वेच्छा से लिया गया निर्णय था। इसमें किसी प्रकार का दबाव नही था, इसलिए इस निर्णय को किसी के अनिवार्य व्यवस्था (नजीर) बनाकर प्रस्तुत  नही किया जा सकता। जबकि कालांतर में सतीप्रथा को दबाव में अनिवार्य कर दिया गया। ऐसी स्थिति धर्म के नाम पर एक ‘सामाजिक आतंक’ था। ऐसी स्थितियों को देखकर तो कहा जा सकता है कि हम बौद्घिक रूप से नितांत पंगु पन की अवस्था में प्रविष्ट हो गये थे।

नारी को वेद शिक्षा का अधिकार नही

नारी को परदे में रखकर घर की चारदीवारियों में धकेलने के लिए एक अन्य अवगुण हमने अपनाया और वह था कि उनसे वेद के पठन-पाठन का अधिकार छीन लिया। कह दिया गया कि ‘स्त्रीशूद्रौनाधीयाताम्’ अर्थात स्त्री और शूद्र को विद्याभ्यास नही करना चाहिए। हमारा मानना है कि अतीत के गर्भ में समायी किसी भी रूढ़ि या वेदविरूद्ध परंपरा के प्रचलन में आने में कई बार किसी बाध्यता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हमारे यहां मुस्लिम आक्रांताओं ने स्त्रियों पर जिस प्रकार अमानवीय अत्याचार किये थे, उन्हें देखकर हिंदू समाज ने  नारी अस्मिता की रक्षार्थ ही पर्दाप्रथा, सती प्रथा और विद्याभ्यास का उनका समान अधिकार उनसे छीन लिया था। कालांतर में इन वेद विरूद्ध परंपराओं को बलात् लागू कराया गया और जिस अन्याय से बचने के लिए इन अवगुणों को सदगुण मानकर अपनाया गया था उससे भी अधिक अन्याय हमने स्वयं ने नारियों पर कर डाले।

संकुचन और संक्रमण का काल

वास्तव में हिंदू समाज का यह वैभव और पराभव का संधिकाल संकुचन और संक्रमण का काल था। जिसमें इस्लाम हमारे साथ और हम उसके साथ समायोजन या समन्वय स्थापित करने में असफल हो रहे थे। हमारे भीतर दोष केवल एक था कि हम इस्लाम को अपना हृदय तो सौंप सकते थे, परंतु अपना धर्म नही सौंप सकते थे, और इस्लाम को हमसे हमारा हृदय नही अपितु धर्म चाहिए था। बस, यही वह बात थी जो दोनों में टकराव का कारण बनी रही। हिंदू समाज ने लंबा संघर्ष करने का मन बना लिया पर आवश्यकता के अनुसार रणनीति ऐसी बनायी कि स्वयं को बचाव की मुद्रा में और संकुचन की मुद्रा में भी ले आये। उसी रणनीति का परिणाम था-पर्दा प्रथा, सतीप्रथा का प्रचलन और नारी से विद्याभ्यास का अधिकार छीनने का अतार्किक निर्णय। इस निर्णय ने अनुसूइया, सीता, कुंती, द्रौपदी, सावित्री, गांधारी, गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं की श्रंखला को हमसे एक झटके में तोड़ दिया। महात्मा बुद्ध के धर्म को विदेशों में ले जाने वाली संघमित्रा और उनकी अन्य भिक्षुणी साध्वियों की परंपरा अभी बहुत पुरानी नही पड़ी थी। पर काल ने सब कुछ परिवर्तित कर दिया। इसके उपरांत भी हमें यहां यह देखना है कि परिवर्तन हो किसलिए रहा था? तो उत्तर यही मिलेगा कि अपनी स्वतंत्रता को, अपने धर्म को और अपने देश को दुर्दांत आतंकी आक्रांताओं के चंगुल से बचाने के लिए। यह अलग बात है कि संघर्ष सदियों का चल गया और हमने जिन अवगुणों को चरित्र की रक्षा के लिए गुण मानकर अपनाया था वह हमारे लिए पतन का कारण बन गये।

आज का इतिहासकर हमारे  इन्हीं अवगुणों को हमारे पिछड़ेपन का और प्राचीन काल से ही हमारे जंगली होने के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है। हमें समझाता है कि तुम तो सदा से ही जंगली रहे हो और तुम्हें सभ्यता सिखाने का काम तो विदेशियों ने किया है। काश! इतिहास हमारे अवगुणों में भी इतिहास खोजता।

उन्हें हम कैसे पचाते

हिंदुओं के साथ मुस्लिम आक्रांताओं ने स्वयं को समायोजित करने में असहजता अनुभव की। अलबरूनी लिखता है-‘हिंदू प्राय: हर बात में हमसे भिन्न हैं। उनकी भाषा भिन्न है और भाषा की भिन्नता अरबों के साथ उनकी निकटता में सबसे बड़ी बाधा है। धर्म की दृष्टि से भी वे हमसे भिन्न हैं। जिन बातों पर उनका विश्वास है हम उनमें से किसी को भी नही मानते। इसी प्रकार हमारे जो धार्मिक विश्वास हैं उनमें से कोई भी उन्हें मान्य नही है।….हिंदुओं और मुसलमानों में रहन सहन, खानपान और आचार विचार की भी बहुत भिन्नता है। यह भिन्नता इस सीमा तक है कि हिंदू  लोग अपने बच्चों को हमारे नाम से, हमारे वस्त्रों से और हमारे तौर तरीकों तक से डराते हैं और हमें शैतान की संतान बता कर हमारे प्रत्येक कार्य को उन सभी कार्यों के विरूद्ध बताते हैं, जिन्हें कि वे अच्छा और समुचित मानते हैं। हिंदुओं में आत्मगौरव की भावना इतनी गहरी है कि वे अन्य सबको अपने से हीन मानते हैं। उनका विश्वास है कि पृथ्वी पर उनके देश के समान कोई देश नही है, उनके समान कोई जाति नही है, उनके समान कोई धर्म  नही है और उनके शास्त्रों के समान कोई शास्त्र नही है।

कदाचित हिंदुओं की यह आत्मगौरव की भावना ही उन्हें विदेशी शत्रुओं से संघर्ष के लिए प्रेरित कर रही थी। अलबेरूनी बड़े पते की बात कह गया है यहां। जिस देश में लोग अपने देश से उत्तम कोई देश, अपने धर्म से बढ़कर कोई धर्म, जाति से बढ़कर कोई जाति, शास्त्रों से बढ़कर कोई शास्त्र मानने के लिए उद्यत नही होते हैं, वही तो स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर सकते हैं। उन्हें आप स्वतंत्रता के सैनानी तो कह सकते हो परंतु उन्हें कायर कभी नही कह सकते। और यह गौरव की भावना तब बनी हुई थी जब अल्बेरूनी ने ही महमूद के अत्याचारों को निम्न शब्दों में रेखांकित किया था-‘हमारे जिहादी सैनिकों की तलवार ने सारे देश को एक ऐसे जंगल के समान बना दिया है जिससे सब झाड़ झंखड़ों को अग्नि ने भस्मसात कर दिया है। हिंद के सब वीर मनुष्य पैरों से कुचल दिये गये हैं।

जब ऐसी भयानकता का क्रम नित्यप्रति देखने को मिलता रहा हो तब स्वयं को संकुचित कर बचाव के नाम पर कुछ दोषों के साथ समन्वित करने की हिंदू समाज की बात समझ में आ सकती है। आवश्यकता इतिहास के मुख से तथ्यात्मक और वस्तुपरक इतिहास सुनने की है। हमें हमारे अवगुणों को सद्गुणों के रूप में महिमामण्डित करने वाला इतिहास पढ़ाया गया है। जिससे हमारी धारणा अपने विषय में ही ऐसी बन गयी है कि हम स्वयं को प्रारंभ से ही बौद्घिक रूप से पिछड़ा हुआ  अनुभव करने लगे हैं। विदेशियों ने यह विचार हमारे भीतर हमारे ही विषय में भरने में सफलता प्राप्त की है। इसीलिए हमे अपना ओजस्वी इतिहास ना तो लिख सके और ना ही उसे समझ सके। यही कारण है कि प्रचलित इतिहास हमारे भीतर ओज और तेज भरने में सर्वथा असफल सिद्ध हुआ है।

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1 Comment on "‘काश! इतिहास हमारे अवगुणों में भी ‘इतिहास’ खोजता’"

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RAJESH SINGH
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आपके लेख से कई अनजाने पक्ष की जानकारी प्राप्त हुई ! एक गम्भीर और विचारशील लेख कई नए पक्ष और नए प्रश्न भी सामने लाता है !

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