लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आज कैकेई बहुत प्रसन्न थी।महाराज दशरथ ने उसे अपने साथ युद्ध में जाने की अनुमति दे दी थी।

कैकेई भीअजीब नारी थी।कैकेय नरेश की वह लाडली शैशवस्था से अस्त्र शस्त्रों से खेलने की अभ्यस्त हो गयी थी। ऐसे भी राजा की लाडली सुपुत्री होने के कारण उसे ।गृह कार्य सीखने की कोई आवश्यकता थी नहीं।राजकुमारियाँ तो नृत्य ,संगीत और अन्य कलाओं की ओर ही अपना ध्यान लगाती थी।यही उनके लिए आवश्यक भी समझा जाता था।अन्य राजकुमारियाँ अपने बनाव श्रृंगार में ही लगी रहती थी,पर कैकेय नरेश की इस सौंदर्य की प्रतिमा लाडली ने जबसे होश सम्भाला, तब से कलाकार की कूचियों और नृत्य के घुन्घुरुओं के स्थान पर तीर कमान और तलवार से ही खेलती रही।पिता से भी प्रोत्साहन मिला।उन्होंने परम्परा तोड़कर उसके लिए विधिवत अस्त्र शस्त्र ,घुड सवारी ,रथ संचालन की शिक्षा का प्रबंध कर दिया। महारानी कुढती रही, पर महाराज ने उनकी एक न सुनी।महारानी तो यह भी नहीं समझ पा रही थी कि महाराज अपनी लाडली को क्या बनाना चाह रहे हैं।राजगुरु के वचनों को वह इस तरह आत्मसात कर लेती थी जैसे उसने सुधा पान किया हो।उसके कानों में पूर्वज भरत की कहानी भी गूंजती रहती थी।भारत का स्वप्न देखा तो बहुतों ने था,पर अभी भी वह स्वप्न साकार नहीं हुआ था। कैकेई को तो यह भी ज्ञात हो गया था कि इतनी क्षमता किसी में नहीं है,जो इन बिखरे मोतियों को पिरो कर एक माला का रूप दे सके और भारत राष्ट्र का निर्माण कर सके।पिताश्री के मुख से महाराज दशरथ के वीरता की बहुत प्रशंसा सुनी थी और मन ही मन उन्हें प्यार करने लगी थी पर उसे तो यह भी नहीं ज्ञात था कि महाराज की उम्र क्या है?इसी बीच एक सन्देश महाराज दशरथ की ओर से आया,पाणी ग्रहण संस्कार के लिए। कैकेई के रूप और गुणों की चर्चा उन तक पहुँच चुकी थी।ऐसे तो महाराज दशरथ की दो पत्नियां पहले से थी,पर अभी भी उन्हें संतान सुख देखने को नहीं मिला था।गुरु वशिष्ठ ने महाराज को एक और व्याह रचाने की सलाह दी।महाराज दशरथ ने संदेश तो भेज दिया था,पर उन्हें उसके स्वीकृति की कम ही आशा थी। उनको लग रहा था कि कैकेई जैसी रूप वती और गुणवती कन्या किसी नृप की तृतीय पत्नी बनना क्यों स्वीकार करेगी।कैकेय नरेश ने जब अपने अन्तः पुर में यह संदेश भेजा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा,क्योंकि महारानी ने कहलवाया कि बेटी तो महाराज दशरथ की दिन रात पूजा करती है और भगवान से यही प्रार्थना करती है कि वे उसे पति के रूप में प्राप्त हों।महारानी ने जब इस संदेश के बारे में कैकेई को बताया था तो वह शर्म से लाल हो गयी थीऔर भगवान के सामने नतमस्तक हो गयी थी।

महाराज दशरथ और कैकेई के बीच उम्र का अंतर तो स्पष्ट था पर कैकेय नरेश ने अपनी सुपुत्री की इच्छा जानकर इस पाणीग्रहण संस्कार को स्वीकृति दे दी कैकेई को लग रहा था कि उसका सपना महाराज दशरथ के हाथों ही साकार होगा।

महाराज दशरथ के गृह मेंआगमन के पश्चात भी कैकेई अपने सपनों में ही खोई रहती थी।दशरथ कैकेई को बहुत प्यार करतेथे,पर महाराज का का प्यार और उनका संग भी उसे हार्दिक प्रसन्नता नहीं दे पा रहा था।था।वह एक तरह से तड़पती रहती थी।दशरथ भी उसके मन की भावना से अनजान नहीं थे,अतः जैसे ही कैकेई ने उनके साथ युद्ध में जाने की आज्ञा मांगी उन्होंने सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी।अब तो उसका दिल बल्लियों उछलने लगा।अनुभवी सारथी सुमंत को भी थोड़ा आश्चर्य हुआ।सुमंत केवल सारथी नहीं थे।वे महाराज के सखा के रूप में सम्मान पाते थे।

संग्राम असल में देवों और उन लोगों के बीच था,जो देवों के सम्मान और ऋषियों की तपस्या में बिघ्न बने हुए थे।जिन्हें उनकी काली करतूतों के चलते दानव या असुर कहा जाता था।

देव दानव सग्राम जोरो पर था।महाराज दशरथ का रणकौशल देख कर कैकेई मुग्ध हो रही थी।कुछ ही क्षणों में महाराज दशरथ ने दानवों के छके छुड़ा दिए थे,पर अभी भी संग्राम जोरों पर था कि कैकेई को ऐसा अनुभव हुआजैसे सुमंत के हाथों से घोड़ों की लगामछूट रही हो।विद्युत् गति से कैकेई सुमंत के बगल में पहुंच गयी और उसने लगाम ऐसे थाम लिया जैसे वह एक कुशल सारथी हो।सुमंत को शायद चोट लगी थी और उन्हें मूर्छा आ गयी थी,पर कैकेई के पास यह देखने का भी समय कहाँ था? दशरथ को तो पता भी नहीं चला ।उन्होंने तो अपने पराक्रम से देवों को संग्राम में विजयी बनाया,पर अब जब युद्ध समाप्त हो रहा थातो उनकी नजर कैकेई के लगाम थामे हुए लोहू लुहान हाथों पर पडी।दशरथ कुछ समझ पाते तब तक सुमंत की मूर्छा समाप्त हो गयी और वे अकचका कर उठ बैठे।महाराज को एक क्षण लगा स्थिति को समझने में।लगाम अब सुमंत के हाथों में थी और कैकेई के लोहूलुहान हाथ महाराजके हाथों में।उन्होंने उन हाथों को पकड़ कर अपने हृदय से लगा लिया था।कैकेई का ह्रदय तो इतना आह्लादित हो गया था कि उसके मुंह से बोल ही नहीं फूट रहे थे ।वह तो दशरथ को एक टक निहारे जा रही थी।

दशरथ को तो लग रहाथा कियहसंग्राम कैकेई ने जीता है।अगर आज वह साथ में नहीं होती तो शायद युद्ध का परिणाम कुछ और होता।महाराज कैकेई के हाथ सहलाने लगे और भावविभोर होकर बोल उठे,”प्रिय आज तुमने न सिर्फ मेरे और सुमंत के प्राणों की रक्षा की है,बल्कि तुमने तो युद्ध का रूख ही पलट दिया।धन्य हैं कैकेय नरेश और तुम्हारी माताश्री जिन्होंने तुम्हारे जैसी पुत्री रत्न को जन्म दिया है।मेरे धन्यभाग है कि तुम्हारे जैसी पत्नी का पति बनने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ।आज तो मैं तुम्हारे लिए अपने प्राण भी उत्सर्ग कर सकता हूँ।मांगो जो मांगना है।”

कैकेई ने महाराज दशरथ के मुख पर अपना हाथ रख दिया और बोली,”आर्यपुत्र ऐसा बोल कर मुझे लज्जित मत कीजिए ।आपकी जिन्दगी में हीं तो मेरा जीवन है।मैं तो यह सोच भी नहीं सकती थी कि मेरे रहते आपकी जिन्दगी पर आंच आये।मैंने तो केवल अर्धांगिनी और क्षत्राणी के कर्तव्य का पालन किया है। मैं आपके काम आ सकी,यही मेरे लिए सबसे बड़ा वरदान है।”

महाराज दशरथ को कैकेई की बातों पर गर्व तो हुआ,पर वे संतुष्ट नहीं हुए।वे बोले,’प्रिय आज तुमने सुमंत और मेरे प्राणों की रक्षा की है,अतः तुम्हे दो वरदान तो माँगने ही पड़ेंगे।”

अब तो कैकेई बड़े असमंजस में पड़ गयी।वह वरदान मांग कर अपने को तुच्छ सिद्ध नहीं करना चाहती थी पर वरदान नहीं माँगने से अपने आराध्य की अवज्ञा होती थी। कैकेई नेअंत में यही कहा,”ठीक है आर्यपुत्र, मैं अवसर आने पर आपसे दो वरदान मांग लूंगी।”

महाराज दशरथ बड़े उत्साह से अयोध्या लौटे।बड़े धूमधाम से विजय की खुशी मनाई गयी।कैकेई की ईज्जत उनकी निगाह में और अधिक हो गयी।

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समय बीतते देर नहीं लगती।कहाँ तो महाराज दशरथ के प्रासाद का प्रांगण वर्षों से सूना पड़ा था,कहाँ अब उस प्रांगण में चार चार नौनिहालों की किलकारियां गूंजने लगी।महाराजको अपने तीनों रानियों से चार पुत्र रत्नों की प्राप्ति हो गयी थी।कौशल्या ने राम को जन्म दिया था और कैकेई ने भरत को।सुमित्रा तो इन दोनों से अधिक सौभाग्यशालिनी थी।उसे तो लक्ष्मण और शत्रुघ्न के रूप में दो पत्र रत्न प्राप्त हुए थे।बच्चों की किलकारियों से राजमहल गूंजने लगा था।चतुर्दिक आनंद ही आनंद दृष्टिगोचर होता था ।महारानियाँ तो प्रसन्न थी हीं,महाराज भी प्रफुल्लित नजर आते थे।कैकेई को भी कम प्रसन्नता नहीं थी,पर वह मन ही मन उद्विग्न भी थी।उसको लग रहा था कि उसका सपना शायद ही साकार हो। महाराज दशरथ ने तो एक तरह से युद्ध से संन्यास ही ले लिया था।कैकेई को लग रहा था कि उसे अपना अधूरा सपना हृदय में संजोये ही इस संसार से प्रस्थान करना पड़े।उसकी उम्मीद अब टिकी हुई थी तो अपने चारों पुत्रों में। सभी को वह अपना ही पुत्र समझती थी।उम्मीद की इस किरण के केंद्र थे राम,अपने ,भाइयों में सबसे बड़े।होनहार विरवान के होत चिकने पात ।राम बचपन से ही सब भ्राताओं से अलग नजर आने लगे थे।।महाराज तो उन पर प्राण छिडकते थे।लगता था कि राम के बिना वे एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते।अभी सब राजकुमारों की उम्र बहुत कम थी।यह भी तो अभी ज्ञात नहीं था कि वे लोग भविष्य में क्या करेंगे।,

चारो राजकुमार बड़े होने लगे।अब उनके लिए शिक्षा दीक्षा प्रबंध होने लगा।क्षत्रियों पुत्रों को शास्त्र से अधिक अस्त्र,शस्त्रों के शिक्षा की आवश्यकता थी।कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ के कंधों पर इसकी जिम्मेवारी डाली गयी।महाराज राजकुमारों के लिए उनसे सुयोग्य गुरु की कल्पना नहीं कर सकते थे।सभी राजकुमार इतनी तीव्र बुद्धि थे कि थोड़े समय में ही उन्होंने सब विद्द्याओं में कुशलता प्राप्त कर ली।उनमें राम तो अद्वितीय प्रमाणित हुए।उन्होंने तो अस्त्र शस्त्रों संचालन के साथ साथअन्य विद्यायों में भी अल्प काल में महारत हाशिल कर ली।कैकेई तो ऐसे चारों राजकुमारों को प्यार करती थी,पर उसको सबसे दुलारे राम थे।भरत की जन्मदात्रि होते हुए भी वह राम को भरत से अधिक प्यार करती थी।राम भी कैकेई को माता कौशल्या से बढ़ कर मानते थे। चारों भाईयों में एक दूसरे के प्रति अगाध प्रेम था,फिर भी लक्ष्मण का राम की ओर और शत्रुघ्न का भरत की ओर अधिक झुकाव था।भरत तो थोड़ा और बड़ा होने पर अपने अग्रज राम की एक तरह पूजा करने लगा था।लगता था कि राम के एक इशारे पर वह अपने प्राण भी न्योछावर कर सकता हैकौशल्या और सुमित्रा तो अब सदा प्रफुल्लित रहने लगी थी।प्रसन्न तो कैकेई भी थी ,पर उसका हृदय उद्विग्न भी रहता था। महाराज दशरथ तो ऐसा लगता था कि पूर्ण संतुष्ट हो गए थे।उनको तो शायद यह भी लगने लगा था कि समय आने पर अपने सुयोग्य पुत्रों पर राज कार्य की सब जिम्मेवारी सौंप कर वे कभी भी संन्यास ले सकते थे।ख़ास कर राम पर तो वे जान छिडकते थे।वे राम को एक पल भी अपनी निगाहों से ओझल नहीं होने देना चाहते थे।सर्वत्र प्रसन्नता और आनंद ही नजर आता था,पर उस आनंद मय वातावरण में भी कैकेई पूर्ण आनंदित नहीं हो पा रही थी।

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महाराज दशरथ की दरबार में राजर्षि विश्वामित्र का आगमन अचानक ही हुआ था।महर्षि वशिष्ठ को प्रणाम कर जब विश्वामित्र आगे बढे तो दशरथ ने सिंहासन से उतर कर उनकी अभ्यर्थना की।उनको यथोचित आसन दिया और करबद्ध होकर बोले,”धन्य भाग हमारे और हमारी प्रजा की, कि आपकी चरण रज ने हमें पवित्र किया और हमें आपने सेवा का अवसर प्रदान किया।”

राजर्षि ने उन्हें आशीर्वाद दिया।कुछ देर वार्तालाप के बाद अपने आने का उद्देश्य बतलाया।विश्वामित्र के आश्रम के आस पास अन्य ऋषि मुनियों के भी आश्रम थे।पहले तो वे सब निर्विघ्न अपने ज्ञान ध्यान में लगे रहते थे,पर इधर कुछ अर्से से उनके पूजा पाठ में विघ्न पड़ने लगा था।असुरों का एक समूह उनको और अन्य ऋषियों को निरंतर सताने लगा था और उनके ज्ञान ध्यान में विघ्न डालने लगा था। विश्वामित्र ने महाराज दशरथ से कहाकि वे राम और लक्ष्मण को उनके साथ जाने की अनुमति दे दे,जिससे वे आश्रम में रह कर उन असुरों का दमन कर सके और आश्रम में आये विघ्न को दूर कर ऋषियों को निर्विघ्न पूजा तपस्या करने में सहायक बने।

महाराज तो घोरअसमंजस में पड़ गए।वे राजर्षि का अनुरोध ठुकरा भी नहीं सकते थे।राम और लक्ष्मण को जाने की अनुमति देने में भी उनके प्राण निकले जा रहे थे।बड़ी कातर दृष्टि से उन्होंने गुरु वशिष्ठ की और दृष्टि की पर उनके नेत्रों में भी स्वीकृति के लक्षण दिखे,फिर भी उन्होंने प्रार्थना की कि वे स्वयं अपने सम्पूर्ण सैन्य बल के साथ राजर्षि की सेवा के लिए तैयार है।राम लक्ष्मण तो अभी बालक है,वे उन असुरों के समक्ष कैसे टिक पाएंगे?

विश्वामित्र को महाराज की दुर्बलता और उनका राम के प्रति प्रेम ज्ञात था,पर वे यह भी जानते थे कि राम के अतिरिक्त कोई भी इस कार्य को संपन्न नहीं कर सकता है।अतः वे अपनी बात पर अड़े रहे।महर्षि वशिष्ठ ने भी महाराज दशरथ को समझाया कि राजर्षि के संग जाने से राम और लक्ष्मण को अस्त्र सश्त्रों का भी अधिक ज्ञान होगा और उन्हें अपनी जिम्मेवारी निभाने का भी अवसर मिलेगा।महाराज ने भरे दिल से राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ रवाना कर दिया।

राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र के साथ रहकर बहुत कुछ सीखा और असुरों के साथ लड़ने में अद्भुत पराक्रम दिखाया।अनेक असुर निहत हुए। ऋषि मुनि निर्भय हो कर जप तप में लग गए।संयोग बस उसी समय मिथिला के राजा जनक ने अपने जयेष्ठ सुपुत्री सीता के व्याह के लिए स्वयंबर की घोषणा कर दी।विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर जनक के दरबार में पहुँच गए।दोनों राजकुमार वहां पहुँच कर बड़े प्रसन्न हुए।सीता के स्वयंबर में भाग लेने के लिए राजा और राजकुमारों की भीड़ लगी थी,पर कोई भी शर्तानुसार शिव के धनुष को नहीं तोड़ सका।सबसे अंत में राम की बारी आयी।उन्होंने धनुष को चाप चढा कर तोड़ डाला।चतुर्दिक प्रसन्नता फ़ैल गयी।महाराज जनक की प्रजा वृंद तो ख़ुशी के मारे नाचने लगी।धूमधाम से जानकी के पाणी ग्रहण संस्कार की तैयारियां होने लगी। महाराज दशरथ को विधिवत संदेश भेजा गया ।दशरथ तो फ़ूलों नहीं समा रहेथे।कहाँ तो भय बस वे राम लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजना नहीं चाहते थे,कहाँ उनके सुपुत्रों ने अपने पराक्रम से न केवल असुरों को मारकर आश्रम को निरापद किया था,बल्कि स्वयंबर में अपना शौर्य दिखाकर उनके घर में सीता जैसी सुयोग्य पुत्रवधू भी ला दी थी। वे लाव लश्कर सहित पधारे।महाराज के संग उनकी तीनों रानियाँ और भरत शत्रुघ्न भी आये।संयोग ऐसा बना कि न केवल राम बल्कि महाराज दशरथ के चारो सुपुत्र विवाह बंधन में बंध कर अयोध्या लौटे।

अब तो महाराज दशरथ के महल की कौन कहे, उनका पूर्ण राज्य प्रसन्नता से झूमने लगा।महाराज और रानियाँ तो सुन्दर सुशील पुत्र बधुयें पाकर परम सुख प्राप्त करने लगे।फिर भी उस आनंद मय वातावरण में भी कैकेई नहीं प्रसन्न नहीं थी।उसको तो अपना स्वप्न भंग होता हुआ नजर आ रहा था।उसे लग रहा था कि अब वह आर्यावर्त को एक सूत्र में बंधते हुए नहीं देख सकेगी। उसको तो यह भी एहसास होने लगा था कि केवल सैन्य बल पर पूर्ण आर्यावर्त को एक सूत्र में नहीं बांधा जा सकता है।प़र इस उल्लास पूर्ण वातावरण में वह अपने दिल की व्यथा किसे बताती? उसकी बचपन की सहेली मंथरा,जो राज महल में उसके साथ ही आयी थी और जिससे वह कुछ भी नहीं छिपाती थी,वह भी शायद ही इसको समझ पाती।अवसर की प्रतीक्षा के अतिरिक्त अन्य कोई चारा उसके पास नहीं बचा था।

महाराज दशरथ को तो अब लगने लगा था कि राज कार्य की जिम्मेदारी अगली पीढी पर डाला जाए। इसके लिए महर्षि वशिष्ठ से सलाह करके उन्होंने राम को युवराज बनाने का विचार किया।महर्षि वशिष्ठ की भी यही इच्छा थी कि अब राजकुमारों पर जिम्मेवारियों का बोझ डाला जाये।ऐसे भी राम की तेजस्विता से सभी प्रभावित थे। महाराज को यह भी ज्ञात था कि अयोध्या की प्रजा उनके इस प्रस्ताव का अति प्रसन्नता से स्वागत करेगी।महर्षि वशिष्ठ ने शुभ दिन निर्धारित किया ,पर महाराज को लग रहा था कि यह शुभ कार्य कुछ समय पश्चात संपन्न हो,क्योंकि भरत अयोध्या में नहीं थे।वे ननिहाल गए हुए थे।ऐसे तो महाराज जानते थे कि भरत यह जानकार अत्यंत प्रसन्न होंगे,क्योंकि उन्हें मालूम था कि भरत अपने अग्रज का कितना सम्मान करते हैं।पर महाराज निरुतर हो गए ,जब गुरु वशिष्ठ ने बताया कि ऐसा शुभ मुहूर्त फिर बहुत समय तक नहीं है।उन्होंने स्वीकृति दे दी।।महारानियों को जब यह समाचार मिला तो वे फ़ूली नहीं समाई।प्रसन्न तो कैकेई भी थी।उसके प्रिय पुत्र राम का युवराज बनाया जाना उसको हर्षातिरेक से भींगो रहाथा,पर उसके अंतर में एक द्वंद्व भी मचा हुआ था।कि आर्यावर्त को एक सूत्र में पिरोने का स्वप्न कैसे पूर्ण होगा।उसको तो यह भी ध्यान नहीं था कि यहब सब कार्य उसके पुत्र भरत की अनुपस्थिति में हो रहा है।इसी उधेड़ बुन में रात्रि बेला आगयी और सब विश्राम हेतु अपने अपने शयन कक्ष में चले गए।कैकेई भी प्रसन्नता और चिंता के बीच जूझती हुई अपने शयन कक्ष में पधारी।मंथरा को अपनी रानी के माथे पर चिंता की लकीर अवश्य दृष्टिगोचर हुई,पर वह भी इसका कारण समझने में असमर्थ रही।कैकेई को तो यह भी लग रहा था कि मंथरा तो उसके समझाने से भी इसे नहीं समझ सकेगी।कैकेई अपने शयन कक्ष में प्रथम तो महाराज की प्रतीक्षा करने लगी,पर जब वे बहुत देर तक नहीं आये तो उसे लग गया कि कार्य में व्यस्तता के कारण शायद आज की रात वे अलग हीं काटें।

नींद कैकेई के नेत्रों से कोसों दूर थीं।वह एक ऐसी अवस्था से गुजर रही थी कि जिसमे नींद का आना बहुत कठिन था।कैकेई के मन में यह भी विचार आया कि किसी प्रकार इस कार्यक्रम को रोक दिया जाए।पर उससे भी उसे कोई लाभ नहीं दिख रहा था।पता नहीं कब वह निद्रा की गोद में चली गयी,पर अचानक उसे लगा कि वह आर्यावर्त के कोने कोने से आये हुए नागरिकों से घिरी हुई है।सभी उसकी अभ्यर्थना कर रहे हैं।वह देख रही है कि पूर्ण आर्यावर्त में प्रसन्नता की लहर दौड़ रही है।चतुर्दिक हर्षोल्लास का वातावरण है।इतने में उसकी निद्रा भंग हुई।वह समझ नहीं पा रही थी कि इतने हर्षोल्लास का कारण क्या है?यहआर्यावर्त एक सूत्र में कैसे बंधा?उसको तो लगने लगा कि कोई उसका मार्ग दर्शन कर रहा है।अब यकायक उसकी समझ में आने लगा कि यह कैसे संभव हो सकता है।पूर्ण आर्यावर्त में यह हर्षोल्लास सिर्फ राम ला सकते हैं,ऐसा कैकेई को विश्वास हो गया।पर यह होगा कैसे?कैकेई फिर सोच में डूब गयी।रात्रि बेला भी समाप्ति पर आ गयी,पर कैकेई की पलकों पर तो अब नींद का निशान भी नहीं था।अंत में कैकेई अपना सर्वस्व दाव पर लगाने को तैयार हो गयी।उसको लग गया कि इस स्वप्न को पूर्ण करने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।उसे यह भी ज्ञात था कि इस महा यज्ञ में उसका सर्वस्व स्वाहा हो सकता है ,फिर भी उस वीरांगना ने यह दाव खेलने का दृढ निश्चय कर ही लिया।

रात्रि बेला बीत गयी ।फिर दिन आया,पर कैकेई अपने शयन कक्ष में पडी रही।प्रात बेला में सर्वप्रथम मंथरा आयी उसने कैकेई को शय्या पर उदास पड़े देखा। वह कुछ भी नहीं समझ सकी।कैकेई ने नित्य क्रिया से निवृत होने में भी कोई रुचि नहीं दिखाई।मंथरा कोई प्रश्न करती,इसके पहले ही कैकेई ने उसे ईशारे से चले जाने को कहा।मंथरा को इच्छा न होते हुए भी आदेश का पालन करना पड़ा।वह वहां से सीधे कौशल्या के कक्ष में गयी और उन्हें कैकेई के बारे में बताया।कौशल्या और सुमित्रा दोनों कैकेई के शयन कक्ष में उपस्थित हो गयीं,पर कैकेई का मुंह तब भी नहीं खुला ।वह उठकर बैंठी अवश्य पर बोली कुछ भी नहीं।वे दोनों भी कुछ नहीं समझ सकी।उन्होंने महाराज दशरथ को सूचना अवश्य भेज दी।कैकेई समझ रही थी कि महाराज अवश्य पधारेंगे अतः वह उनकी प्रतीक्षा करने लगी।

महाराज दशरथ को जैसे ही यह समाचार मिला,वे कैकेई के शयन कक्ष में उपस्थित हो गए।कैकेई के शयन कक्ष में अब महारानी कैकेई थी और महाराज दशरथ थे।कैकेई को समझ में नहीं आ रहा था कि अपने दिल की बात महाराज को कैसे बताये।विस्तार विवरण से भी शायद ही महाराज उसकी भावना समझ पाते।अगर समझते भी तो शायद वे वैसा नहीं करते जैसा वह चाहती थी।अत: दिल की भावना दिल में ही दबाए हुए वह चुपचाप पडी रही।महाराज दशरथ आज के शुभ दिवस पर अपनी प्रिय रानी को उदास देख ही नहीं सकते थे।आखिर बहुत अनुनय के बाद कैकेई ने अपना मुँह खोला,”प्राण नाथ आपको स्मरण है,आपने बहुत पहले मुझे दो वरदान मांगने का वचन दिया था।”

कैकेई को यह भी लग रहा था कि बात बहुत पुरानी हो चुकी है।हो सकता है कि महाराज उस वचन को भूल भी गएँ हो।अगर ऐसा हुआ तब क्या होगा?

पर महाराज दशरथ तो रघुकुल की शान थे।वे रघुकुल की रीति कैसे भूल सकते थे?उस कुल में तो प्राण न्योछावर करके भी वचन निभाने की परम्परा थी।वे तुरत बोले,”मुझे अपना वचन भी स्मरण है और यह भी स्मरण है कि किस तरह अपने शौर्य और कौशल से तुमने मेरे और सुमंत के प्राणों की रक्षा की थी।”

कैकेई बोली।”आज मैं वे दो वरदान आपसे मांगना चाहती हूँ।”

दशरथ यह सुनकर चौंके अवश्य,क्योंकि उनके समझ में नहीं आ रहा था कि आज इन वरदानों की आवश्यकता कैकेई को क्यों महसूस हुई,पर बोले,”प्रिय तुम तो कभी भी वे वरदान मांग सकती हो।मैं प्राण देकर भी अपने वचन निभाउंगा।”।

कैकेई ने एक एक शब्द पर जोर देते हुए कहा,”पहले वरदान में मै राम के लिए चौदह वर्ष वनवास मांगती हूँ और दूसरे वरदान में भरत की राजतिलक।”

कैकेई एक ही साँस में इतना बोल गयी,क्योंकि उसे मालूम था कि तनिक विलम्ब भी उसके जबान को लड़खड़ा सकता था और तब शायद अपना कथन पूर्ण नहीं कर सकती।

दशरथ को तो अपने कानों पर विश्वास हीं नहीं हुआ और वे सकते में आ गए।बड़ी कातर निगाहों से उन्होंने कैकेई के चेहरे की ओर देखा,पर कैकेई के नेत्रों में उन्हें कठोरता और पीड़ा नजर आई। वे अभी तक समझ नहीं पा रहे थे कि यह क्या हो गया?लडखडाते कदमों से बाहर आये और लगभग मूर्छित अवस्था में धडाम से सिंहासन पर गिर पड़े।महाराज की हालत सुनकर महर्षि वशिष्ठ दौड़े हुए पहुंचे।महाराज ने उन्हें देख कर आँखें खोली और धीरे धीरे उन्हें सब कुछ बता दिया वशिष्ठ समझ गए कि महाराज की इस दुरावस्था का क्या कारण है।वे समझ गए कि महाराज धर्म और स्नेह के उभय संकट से जूझ रहे हैं। उनकी हालत सांप छुछुंदर की भांति हो गयी है।महाराज अपने वचन से पीछे भी नहीं हट सकते थे पर वचन पालन उनके लिए प्राण लेवा सिद्ध हो रहा था।राम,लक्ष्मण,और महारानियों सहित सारा परिवार उपस्थित हो गया।कमी थी तो केवल भरत और शत्रुघ्न की,क्योंकि वे तो ननिहाल गए हुए थे।कैकेई भी नहीं आयी।उसका अंतर्द्वंद्व उसको बेचैन किये हुए था उसने वरदान मांग तो लिया था ,पर उसे लग रहा था कि यह घातक न सिद्ध हो जाए। इस विचार से वह काँप जारही थी ।पर अब तो तीर कमान से निकल चूका था।बहुत सोच समझ कर उसने यह निर्णय लिया था अतः पीछे हटने का भी प्रश्न नहीं था।

राम ने सब पर एक नजर डाली और तुरत अपने पिता कोसंबोधित किया,”पिताश्री आप माताश्री को दिए हुए वचन का मान रखिये।मैं तुरत वन की ओर प्रस्थान की तैयारी करता हूँ।भरत को भी सन्देश भेज दिया गया है।वह भी जल्द ही आ जाएगा। आपका वचन कभी मिथ्या नही हो सकता।आप धैर्य पूर्वक उसका राजतिलक कीजिये।मैं भी चौदह वर्ष वन में बिताकर अयोध्या लौटूंगा वन में जाकर वनवासियों के जीवन के बारे में भी मुझे ज्ञान प्राप्त होगा।हो सकता है कि मैं उनके जीवन को अच्छा बनाने में भी सहायक हो सकूं।अतः आप चिंता त्याग दें।सब कुछ ठीक हो जाएगा।”

महाराज दशरथ की अवस्था देख कर तो यह भी पता नहीं चल रहा था कि वे राम की बात सुन रहे हैं या नहीं ।वे बिना एक शब्द बोले अश्रु पूर्ण नेत्रों से राम की ओर निहारे जा रहे थे।

राम ने बन में जाने की तैयारी आरम्भ कर दी।माता कौशल्या और सुमित्रा की आज्ञा लेने के पहले वे माँ कैकेई के पास उनकी आज्ञा लेने पहुंचे और बोले,”माताश्री आपने बहुत अच्छा किया कि मुझे ऋषि ,मुनि और वन वासियों की सेवा का अवसर प्रदान किया।आप और दूसरी माताएं मिल कर पिताश्री की सेवा कीजिये और उनको दुखी मत होने दीजिये।भाई भरत के आने पर उसे भी समझा दीजियेगा कि वह मन में विषाद न करे और तन मन से प्रजा की सेवा में लग जाए।पिताश्री बहुत बेचैन और दुखी हैं अतः उनको दिलाशा भी आप ही को देनी पड़ेगी।”

माता कौशल्या तो कुछ बोल ही नहीं सकी।अश्रु पूरित नेत्रों से उन्होंने भी आशीर्वाद दिया।लक्ष्मण अपनी माँ को पहले हीं बता चुकेथे कि वे राम का साथ नहीं छोड़ सकते हैं, अतः सुमित्रा ने लक्ष्मण की देख भाल के लिए भी कहा। राम केलिए सबसे कठिन काम था सीता को समझाना।उसके समक्ष उन्होंने वन का बहुत ही भयानक चित्रं प्रस्तुत किया।उन्होंने बताया कि सीता जैसे कोमलांगी केलिए बन में रहना बहुत ही दुष्कर है।बन में तो वही रह सकता है जो पत्थर जैसा कठोर बन गया है।पर सीता ने उनकी एक न सुनी वह अपनी बात पर अड़ी रही।अंत में रामको उन्हें भी साथ चलने की स्वीकृति देनी पडी।

राम सीता और लक्ष्मण वल्कल वस्त्रों में अंतिम विदाई के लिए महाराज के समक्ष उपस्थित हुए।महाराज तो किसी तरह भी अपनेको संभालने में असमर्थ पा रहे थे।फिर भी उन्होंने सुमंत को तीनो को रथ पर ले जाने का आदेश दिया ।वे लोग रथ पर सवार होकर नदी तट तक आये ।फिर सुमंत को रथ समेत लौटा दिए।महाराज तो यह भी उम्मीद लगाये बैठे थे कि शायद वे सब भी सुमंत के साथ ही घूम फिर कर लौट आये।सुमंत जब खाली रथ लेकर वापस लौटे तो महाराज की रही सही उम्मीद भी जाती रही और वे राम राम की रट लगते हुए शय्या पर गिर पड़े।उस दिन जो उन्होंने विस्तर पकड़ा तो फिर नहीं उठ सके कुछ दिनों तक तो राम राम करते हुए विस्तर पर पड़े रहे।शायद उनका प्राण भरत और शत्रुघ्न की प्रतीक्षा कर रहा था।जैसे ही उन लोगों ने अयोध्या में कदम रखा महाराज दशरथ के प्राण पखेरू उड़ गए ।

प्रेम की नौका कर्तव्य सागर के भंवर में फँस कर डूब गयी।थी।पति को अपने प्राणों से बढ़ कर चाहने वाली पतिव्रता अपने पति की हत्यारिणी बन गयी थी। कैकेई तो पत्थर बन गयी थी।उसे तो यह भी नहीं पता चला कि भरत कब ननिहाल से लौटे और कब उन्होंने राज्य का कार्य भार सम्भाला।उसका जीवन एक ही उम्मीद पर टिका हुआ था कि राम अवश्य उसका सपना पूरा करेंगे।

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2 Comments on "कैकेई का अंतर्द्वंद्व"

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आर. सिंह
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नागेन्द्र शर्मा जी यहं कहानी लेखक की कल्पना भी हो सकती है, क्योंकि उसको यह अधिक तर्क संगत जँचा.ऐसे तो रामचरित मानस में मंथरा और कैकेयी खल नायिका के रूप में चित्रित की गयी हैं .लेखक ने कैकेई को नायिका बना दिया है.यह कहानी है ,इतिहास नहीं,अतः इसमें लिखी बातों का आधार ढूंढना मेरे विचार से तो उचित नहीं जंचता ,पर पाठकों की मर्जी.ऐसे भी बाल्मीकि रामायण और तुलसी कृत रामचरित मानस के परे भी बिभिन्न भाषाओं में अन्य अनेक ग्रन्थ राम कथा को आधार बना कर लिखे गए हैं.उन ग्रंथों के बारे में भी हमें नहीं ज्ञात है कि… Read more »
नागेन्द्र शर्मा
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नागेन्द्र शर्मा

युद्ध के दौरान दशरथ के रथ के चक्के की धूरी निकल जाने के कारण रथ गिर जाने ही वाला था कि कैकेयी ने धूरी की जगह अपनी ऊँगली डाल कर रथ के पहिये को गिरने से बचा लिया। यही तथ्य प्रचलित है। सुमंत के हाथ से लगाम संभालने का तथ्य संदेह पैदा करता है। कृपया तथ्य का सोर्स बतलाने का अनुग्रह करें।

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