लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

(महाभारत पर आधारित उपन्यास अंश)

(अभिमन्यु का प्राणोत्सर्ग)

युद्ध का तेरहवां दिन। आज नन्दिघोष पर बैठने के पूर्व ही न जाने क्यों मेरी बाईं आंख फड़क गई। सामने से एक शृगाल रोते हुए मार्ग काट गया। एक क्षण के लिए किसी अनिष्ट की आशंका प्रबल हुई। लेकिन मन ने मन को समझाया – अनिष्ट तो युद्ध का अभिन्न अंग है। पिछले बारह दिनों में कौन सा शुभ कार्य संपन्न हुआ था? नित्य लगभग एक अक्षौहिणी सेना का संहार होता था। इससे बड़ा अनिष्ट क्या हो सकता था? मैंने बुरे विचार मन से निकाले और अपनी व्यूह-रचना के अग्रिम मोर्चे पर आ डटा।

त्रिगर्त देश के असंख्य संशप्तक पुनः मेरे सम्मुख आए। मेरी वीरता और पराक्रम को बार-बार चुनौती देने लगे। उन्हें ज्ञात था कि किसी की चुनौती मैं अस्वीकार नहीं करता। महाराज युधिष्ठिर की सुरक्षा का दायित्व भीम, अभिमन्यु, सात्यकि और धृष्टद्युम्न को सौंप, श्रीकृष्ण की सम्मति ले मैं संशप्तकों की ओर मुड़ गया। कल के युद्ध में भीम और सात्यकि के पराक्रम को देख मुझे विश्वास हो चला था कि कर्ण, दुर्योधन, अश्वत्थामा आदि योद्धाओं से निपटने में वे पूरी तरह सक्षम थे।

संशप्तक एक पूर्व निर्धारित रणनीति के अन्तर्गत युद्ध करते-करते मुझे कुरुक्षेत्र से दूर दक्षिण दिशा में ले गए। मैंने भी आज सभी संशप्तकों के विनाश का निर्णय ले रखा था। अतः उनका संहार करते हुए आगे बढ़ता गया। सूर्यास्त तक समस्त संशप्तक काल के गाल में समा चुके थे। मैं अपने अभियान में पूर्ण सफलता प्राप्त कर अपने शिविर में लौटा।

लेकिन यह क्या? पूरे पाण्डव शिविर में श्मशान की शान्ति थी – कौरव पक्ष में दुन्दुभि बज रही थी। नित्य युद्ध की समाप्ति के पश्चात शिविर में वापस आने पर रथ से उतरने के पूर्व अभिमन्यु अभिनन्दन के लिए उपस्थित रहता था। आज वह कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था। हृदय किसी अनिष्ट की आशंका से व्याकुल हो उठा। नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। श्रीकृष्ण का प्रिय भानजा और मेरा वीर पुत्र है, अभिमन्यु। उसका वध करने की सामर्थ्य कौरव-पक्ष में किसके पास है? मन ने एक सिरे से इस संभावना को नकार दिया।

लेकिन होनी को कौन टाल सकता था? मेरे हृदय का टुकड़ा महापराक्रमी वीर अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो चुका था। महाराज युधिष्ठिर ने अश्रुपात करते हुए यह सूचना मुझे दी। अविश्वास का कोई कारण नहीं था।

हाय! मैं सुभद्रा को अपना कौन सा मुंह दिखाऊंगा? पुत्रवधू उत्तरा को क्या उत्तर दूंगा? माता कुन्ती से कैसे दृष्टि मिलाऊंगा? यह महासमर मुझसे इतना बड़ा मूल्य लेगा, मैंने कल्पना तक नहीं की थी। अभिमन्यु का शव मेरे सामने पड़ा था। उस किशोर को तो अभी ठीक से वस्त्र पहनना भी नहीं आता था। क्या पहनना चाहिए, क्या नहीं, क्या खाना चाहिए, क्या नहीं, यह सुभद्रा का विवेक तय करता था। वह तो नित्य शस्त्र और शास्त्र के अभ्यास में लगा रहता था। इस धरती के सोलह वसन्त ही तो उसने देखे थे।

नीचे झुककर अचानक मैंने उसका मस्तक उठा गोद में रख लिया। लाख प्रयासों के बाद भी मेरे नेत्रों से बहते आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। मेरे हृदय से मेरे मस्तिष्क का नियंत्रण समाप्त हो चुका था। मेरे होंठ खुले और बुदबुदाए –

“मेरे अभि, एक बार……सिर्फ एक बार मुझे पिताजी कहकर पुकार लो। ये कान तुम्हारे स्वर सुनने के लिए आतुर हैं। बोलो पुत्र, कुछ तो बोलो। स्वर्ग का द्वार तोड़कर भी मैं तुझे वापस ले आऊंगा।”

पर वह नहीं बोला, बोलनेवाला भी नहीं था। हृदय में तनिक भी धड़कन होती, तो वह अवश्य कहता –

“स्वागत पिताश्री, स्वागत! संशप्तकों पर निर्णायक विजय के लिए बधाई……..।”

श्रीकृष्ण ने मेरा सिर अपने अंक में छिपा लिया। वे नहीं चाहते थे कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, महापराक्रमी अर्जुन का विलाप सामान्य जन देखें। लेकिन मुझे सदा स्थितप्रज्ञता का उपदेश देने वाले श्रीकृष्ण क्या स्वयं को संभाल पा रहे थे? अपनी दोनों आंखों से उमड़ते अश्रुकणों को नीले उत्तरीय से पोंछते हुए, उन्हें प्रत्यक्ष देखा था मैंने। मैं उनकी गोद में सिर छुपाए घंटों सुबकता रहा। वे मेरी पीठ सहलाते रहे। समीप खड़े युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव की सिसकियों के स्वर कानों में लगातार आ रहे थे। कोई किसी को ढांढ़स बंधाने की स्थिति में था क्या? कौन किसको ढांढ़स बंधाए?

श्रीकृष्ण ने सबसे पहले स्वयं को नियंत्रित किया, सान्त्वना देते हुए बोले –

“मित्रो! इतने व्याकुल न हों। जो युद्ध में पीठ नहीं दिखाते, उन सभी शूरवीरों को एक दिन इसी मार्ग से जाना पड़ता है। एक सच्चे क्षत्रिय के लिए यह शोक का नहीं, गर्व का विषय है। ब्रह्मा ने प्रजा का उचित समय पर संहार करने के लिए मृत्यु को स्वयं उत्पन्न किया था। समय आने पर वह सबका संहार करती ही है। युद्ध में शत्रु का सामना करते हुए मत्यु हो जाय, सभी शूरवीरों की यह प्रबल इच्छा होती है। किसी भी प्राणी की उपलब्धि उसके जीवन काल से नहीं आंकी जाती, वरन्‌ इससे आंकी जाती है कि उसने अपने लंबे या छोटे जीवन काल में कितने महान कार्य किए। हमारे वीर अभिमन्यु ने सोलह वर्ष की अल्प आयु में वह पराक्रम दिखाया जो एक सौ पचास वर्षीय भीष्म के लिए भी संभव नहीं था। अतः आप सभी दुख और शोक को त्यागकर मेरे महापराक्रमी भांजे की अन्त्येष्टि की तैयारी करें।”

मैंने एक बार पुनः अपने रक्तवीर्य से निर्मित, हृदय के टुकड़े महावीर अभिमन्यु के संज्ञाशून्य शरीर को देखा। उसके आधे खुले नेत्र अपनी तर्जनी से सदा के लिए बंद कर दिए। मैं नहीं चाहता था कि उपर से सुन्दर दृष्टिगत होनेवाला यह क्रूर जगत पुनः उसके दृष्टिपथ में आए। मैंने उत्तरीय उतार उसका शरीर ढंक दिया।

मैं अभिमन्यु की मृत्यु का वृत्तान्त जानना चाह रहा था। भीम, सात्यकि, धृष्टद्युम्न भी उसकी रक्षा आखिर क्यों नहीं कर सके? मुझे उत्तर चाहिए था। मौन तोड़ते हुए युधिष्ठिर ने कहना शुरु किया –

“महाबाहो! संशप्तकों से लड़ने के लिए तुम्हारे जाते ही आचार्य द्रोण ने अपनी सेना के लिए चक्रव्यूह की रचना की। अग्रभाग में जयद्रथ के साथ वे स्वयं उपस्थित थे। उनके पीछे दुर्योधन, दुशासन, कर्ण और कृपाचार्य थे। मुझे बन्दी बनाने की इच्छा से उन्होंने पूरी शक्ति से हमपर आक्रमण बोल दिया। द्रोणाचार्य अच्छी तरह जानते थे कि तुम्हारे अतिरिक्त चक्रव्यूह की भेदन-विधि अपने पक्ष में किसी को ज्ञात नहीं थी। हमें चिन्ता में देख वीरवर अभिमन्यु मेरे पास आया। उसने बताया कि चक्रव्यूह में प्रवेश की विधि उसे ज्ञात है पर बाहर निकलने की कला से अनभिज्ञ है।

“एक बार चक्रव्यूह छिन्न-भिन्न हो जाय तो हम अपने पराक्रम के बल पर बाहर तो स्वतः आ जाएंगे।” भीम ने आश्वस्त किया।

अभिमन्यु के नेतृत्व में हमलोगों ने व्यूह में प्रवेश किया। उसने भगवान विष्णु की भांति अचिन्तनीय पराक्रम दिखाया। कौरव सेना के योद्धाओं के मुंह सूख गए, नेत्र चंचल हो रहे थे, शरीर से रक्त के साथ पसीना बह रहा था, रोएं खड़े हो गए थे। द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, शल्य, जयद्रथ, दुर्योधन आदि योद्धा पीछे हटने के लिए विवश हो गए। कौरव सेना के पास अगर कोई उत्साह था तो सिर्फ रणभूमि से भाग निकलने का। महारथी कर्ण इसे सहन नहीं कर सका। अपने छोटे भाई सुदृढ़ के साथ सामने आ अभिमन्यु से युद्ध करने लगा। लेकिन वह भी अभिमन्यु के तेज को सह नहीं सका। अभिमन्यु ने बात की बात में कर्ण का धनुष काट मर्मभेदी बाणों से उसे बींध डाला। उसका छत्र, उसकी ध्वजा काट डाली। कर्ण ने दूसरा धनुष ले कई बाणों से पुनः प्रहार किया। अभिमन्यु ने अविचल भाव से सब झेलते हुए एक मुहूर्त्त भर में एक तीक्ष्ण बाण से उसका धनुष पुनः काट डाला। उसके सामने ही उसके छोटे भ्राता का शिरच्छेद किया और पांच घातक बाणों के प्रबल प्रहार से कर्ण को मूर्च्छित कर दिया। कर्ण-वध की तुम्हारी प्रतिज्ञा को स्मरण कर उसने उसका वध नहीं किया। शीघ्रगामी घोड़ों को हांक कर्ण का सारथि उसे युद्धभूमि से बाहर ले गया।

अभि के मार्ग में जो भी योद्धा आया, वह या तो पीठ दिखाकर पलायन कर गया, या तो वीरगति को प्राप्त हुआ। उसने दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण, शल्य के छोटे भ्राता, उसके पुत्र रुक्मरथ, महारथी वृन्दारक, सुषेण, दीर्घलोचन, कुण्डभेदी, कोसलनरेश, मगध राजकुमार अश्वकेतु, मर्तिकावत के राजा भोज, शत्रुंजय, चन्द्रकेतु, मेघवेग और सुवर्चा जैसे राजाओं को देखते-देखते मार गिराया।

दस हजार महाबली राजाओं का वध कर वह वीर शिरोमणि युद्धक्षेत्र में ऐसे विचर रहा था जैसे वन का सम्राट – वनराज।

कर्ण, द्रोण, जयद्रथ, दुर्योधन, दुशासन, अश्वत्थामा आदि योद्धा उसके सम्मुख आने का साहस नहीं कर पा रहे थे। व्याकुल कर्ण और दुर्योधन द्रोण के समीप पहुंच अभिमन्यु-वध की युक्ति पूछने लगे। आचार्य चुप थे। दुर्योधन ने उनपर आरोपों की झड़ी लगा दी। कर्ण ने विनम्रता से कहा –

“आचार्य! अगर आपने कोई युक्ति नहीं बताई, तो महाकाल का रूप धारण किए इस अर्जुन-पुत्र को कोई रोक नहीं पाएगा। आपने इसे युद्ध-कौशल की शिक्षा दी है। शिष्य की दुर्बलता गुरु को ज्ञात रहती है। अभिमन्यु के पराक्रम में भी कही-न-कही कोई-न-कोई छिद्र होगा। यदि आप महाराज दुर्योधन के सच्चे हितचिन्तक हैं, तो वह भेद बताइए, वरना यह सिंह-शावक प्रलय बन हम सबको मृत्यु का ग्रास बना डालेगा। युद्ध आज ही समाप्त हो जाएगा।”

द्रोणाचार्य चुप थे।

क्रमशः

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