लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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पंडित सुरेश नीरव

आजकल कालेधन की वापसी को लेकर लोगों में एक अजीब-सी खब्त सवार हो गई है। जिसे देखो वही कालेधन की वापसी को लेकर नथुने फुला रहा है। और-तो-और साधु,बाबा और योगी तक जो कभी धन को विकार और धिक्कार मानते थे आज कालेधन और सफेद धन के लपड़े में पड़कर अपनी इज्जत का जलूस निकलवा रहे हैं। हद हो गई दादागीरी की। अरे भाई अगर मुकद्दर से किसे के पल्ले सात फेरे देकर कालाधन पड़ भी जाए तो आप सार्वजनिकरूप से उसकी निजी संपत्ति मांगने लगेंगे। अब अपनी जिंदगी के खूंटे से चालीस साल से बंधा कालाधन जिसे हम प्यार से कल्लो कहते हैं हमारी कुल जवानी का मूलधन है जो दो बच्चों के ब्याज की शक्ल में परिवार के आंगन में मंहगाई की तरह खूब फूल-फल रहा है। अब कोई गुंडा हो या साधु उसे वापस मांगने लगे तो ये कहां की शराफत है। हम तो हरगिज़ नहीं लौटानेवाले। वापसी की तो बात छोड़ो वापसी की भनक भी उसे लग जाए कि मैं कालेधन की वापसी की भूमिगत ढंग से सोच भी रहा हूं तो हमारी कल्लो के डैडी जोकि दिल्ली पुलिस में हैं मार-मार के मुझे बाबा रामदेव बना देंगे। मुझे नहीं बनवाना अपनी इज्जत का फलूदा। हम शरीफ आदमी हैं। औसत भारतीय पति की तरह आए दिन बीबी से पिटते रहते हैं लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि मीडिया के सामने खड़े होकर रोएं-चिल्लाएं। यह हम ग्रहस्थों की नितांत व्यक्तिगत गतिविधि है। बाबाओं के लिए जरूर ये एक अनोखा तजुर्बा हो सकता है। इसलिए वे खुशी के मारे जोश में होश खोकर मीडिया के सामने आ सकते हैं। पर अपुन ठहरे खानदानी शरीफ ग्रहस्थ। हमें क्या लेना-देना। हमतो अपने कालेधन के स्याह जलबों में ही मस्त रहते हैं। वैसे भी सफेद नमक से काले नमक में ज्यादा आयुर्वेदिक गुण होते हैं। अब देखिए न अपने पडौस के वैद्यजी पिछले चालीस साल से काले नमक का नियमित सेवन करके सफल दांपत्य जीवन जी रहे हैं। पड़ौसी दबी जवान में बताते हैं कि उनका कंपाउंडर तो काले नमक के साथ काली मिर्च के सेवन का भी शौकीन है। गजब की काली मिर्च है। एक कालीमिर्च के सांवलेपन पर पचास गोरेपन की क्रीम की ट्यूबें कुर्बान। कसम खुदा की एक नजर जो इस कालेपन का नज़ारा देख ले तो उसकी नजर और दिल दोनों काले हो जाएं। और मुंह काला हो जाने का हादसा कभी भी घट जाए ऐसा दुर्घटना-बाहुल्य है उसका सौंदर्य। अपने कालेधन को देखकर तो इस उम्र में भी अपुन कलफ लगे कुर्ते की तरह अकड़ जाते हैं। कंठ में खुजली मचने लगती है और तड़ से अपुन- काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं-जैसा भावुक गीत खांस देते हैं। कालेधन का मामला है ही बड़ा सेंसटिव। खासकर अपने शाइनिंग इंडिया में। जहां दफ्तरों में बैठे काले अंगरेज ऑरीजनल अंगरेजों के डैडी बने बैठे हैं। वहां आप कालेधन के निवेश के बिना अपनी फाइल आगे बढवा कर तो देखिए। बाबू से अगर आपने गुस्से में कालेधन की वापसी की मांग कर दी तो आप कालेपानी की सजा भुगतते हुए एक दिन काले ज्वर की चपेट में आकर किसी कालागढ़ की गुमनाम काली पहाड़ी में जिंदा ही दफ्न कर दिए जांएगे। ये सब बरगलानें की बाते हैं कि हम कालेधन को वापस ले आएंगे। एकबार कालाधन देनेवाले से भी तो पूछ लो। कल ही हमने अपने मुहल्ले के भैयन से पूछ लिया कि कालेधन की वापसी पर आपके क्या विचार हैं। तो पिटते-पिटते बचे। भैयन लाठी ठोंकते हुए बोले- अपना तबेले में बीसठो भैंसे दिन-रात जुगाली करती हैं। यही अपना कालाधन हैं। हम कहता हूं कि कौन ससुरे में इत्ती दम है कि हमारे तबेले में झांके भी। हम उसकी टांगें तोड़ दूंगा। ये पशुधन ही हमार कालाधन है। हमसे कालाधन मांगेंगे चिरकुट कहीं के। अरे भाई जिसकी लाठी उसी की भैंस। भैंसवा मांगोगो तो ससुर लाठी ही ना खाओगे। लाठी चाहे पब्लिक की हो या पुलिस की। भैंसवा तो बाकादा भैस ही होती है ना। कोई योगी-भोगी नहीं। इसको ज़रा-सा भी डंडा मारा तो झट से फिलिमवा में गीत आ जाएगा कि- मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा। भैयनजी के प्रवचन ने अपनी आंखें तो सही टाइम पर खोल दीं। और अपुन बाबा या अन्ना होने से बाल-बाल बच गये। अपुन की समझ में आ गया कि भैंस अकल से बड़ी होती है क्योंकि वह भी कालाधन है। इसलिए अपुन का हाथ तो सोते-जागते कालेधन के समर्थन अब अपने आप ही उठ जाता है। और मुखारविंद से ये संपादित भजन भी फूट पढ़ता है कि-आओ मेरे घर धन-श्याम-धन श्याम..नॉट घनश्याम…।

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