लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी
भारतवर्ष को पूरे विश्व में विभिन्न प्रकार के धर्मों,आस्थाओं,नाना प्रकार के विश्वास तथा अध्यात्मवाद के लिए जाना जाता है। इस देश की धरती ने जितने महान संत,फ़क़ीर तथा अध्यात्मिक गुरू पैदा किए उतने संभवत: किसी अन्य देश में नहीं हुए। यही वजह है कि भारतवर्ष को राम-रहीम,बुद्ध और नानक की धरती के रूप में जाना जाता है। नि:संदेह भारतवर्ष की पावन धरती पर अनेक महापुरुषों ने अवतार लिया। आज भी हमारे देश में जब कभी राजनैतिक व प्रशासनिक उथल-पुथल के चलते यहां की जनता विचलित होती है तो वह निराश होकर यही कहती है कि यह देश तो भगवान व पीरों-फ़क़ीरों की बदौलत ही चल रहा है। और निश्चित रूप से यही वजह थी कि भारतवर्ष को विश्वगुरू कहा जाता था। परंतु बदलते समय के साथ-साथ जहां जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में ह्रास की स्थिति देखी जा रही है वहीं धर्म व अध्यात्म का क्षेत्र भी अब दाग़दार होने लगा है। देश के धर्मभीरू,आस्थावान व भावुक लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर अपने ही देश के तमाम चतुर बुद्धि लोग स्वयं को भगवान,देवी-देवता या उनका अवतार बताकर देश के शरीफ़ व सीधे-सादे लोगों को ठगने पर तुले हुए हैं। दूसरी ओर ऐसे लोगों के प्रति आस्था रखने वाली जनता अपने ऐसे पाखंडी गुरुओं व स्वयंभू अवतारों के मोहपाश में इस बुरी तरह जकड़ चुकी है कि उसे अपने गुरु अथवा स्वयंभू भगवान के विषय में खुलती हुई हर पोल एक साज़िश नज़र आती है।
देश का यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है आज पूरे देश में इसी प्रकार के सैकड़ों स्वयंभू संत तथाकथित अवतार व नक़ली भगवान जोकि विभिन्न धर्मों से संबंध रखते हैं देश की अलग-अलग जेलों में अपने पापों की सज़ा भुगत रहे हैं। ऐसे ही कई लोग विभिन्न अपराधों के आरोपी हैं और फ़रार होकर पुलिस से आंख मिचौली खेल रहे हैं। किसी पर बलात्कार का आरोप है,कोई ‘अध्यात्म’ की राह पर चलकर अकूत धन-संपत्ति का मालिक बना बैठा है, कोई हत्या आरोपी है,कोई अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करने का दोषी है,कोई सैक्स रैकेट चलाता है,कोई हवाला कारोबारी है तो किसी पर अपने ही शिष्य व शिष्याओं के यौन शोषण का आरोप है। ज़ाहिर है प्रत्येक आम अपराधियों की ही तरह ऐसे स्वयंभू संत तथाकथित भगवान व अवतार भी अपने-आपको बेगुनाह अथवा अपने विरोधियों की साज़िश का शिकार बता रहे हैं। यहां एक सवाल यह ज़रूर उठता है किआख़िर प्राचीन व मध्ययुगीन काल में यहां तक कि आधुनिक युग में जन्म लेने वाले शिरडी वाले साईं बाबा तक पर कोई व्यक्ति इस प्रकार के घटिया व अपमानजनक आरोप क्यों नहीं लगा सका? निश्चित रूप से केवल इसीलिए कि वे सब वास्तविक संत थे। अवतारी महापुरूष थे।

godman उनमें सांसारिक मोहमाया के प्रति कोई लगाव व आकर्षण नहीं था। और वे धर्म व अध्यात्मवाद की जीती-जागती प्रतिमूर्ति थे। परंतु आज के ज़माने में तो संभवत: धर्म व अध्यात्मवाद की परिभाषा ही बदल गई लगती है। पाखंड,अपराध,स्वार्थ,मायामोह, अय्याशी, धन-संपत्ति संग्रह,राजनैतिक संरक्षण,आडंबर व दिखावा ही धर्म व अध्यात्म बनता जा रहा है। आए दिन किसी न किसी साधू व साध्वी का वेश धारण करने वाले किसी न किसी पाखंडी स्वयंभू देवी वा अथदेवता को मीडिया द्वारा बेनक़ाब किया जा रहा है। परंतु उनकी अंधभक्ति व आस्था में डूब चुके उनके भक्त यही कहते दिखाई दे रहे हैं कि हमारे गुुरू अथवा हमारे अवतारी देवी अथवा देवता को फंसाया जा रहा है। उनके विरुद्ध षड्यंत्र व साज़िश रची जा रही है। परंतु ऐसे पाखंडी धर्माधिकारियों के कुछ समझदार शिष्य ऐसे भी होते हैं जो अपने इन पाखंडी व दुराचारी स्वयंभू देवी-देवताओं के बेनक़ाब होने के बाद ऐसे लोगों से पीछा छुड़ाने में ही अपनी भलाई समझते हैं।
सवाल यह है कि ऐसे लोगों को गुरू बनाने,उन्हें अवतारी महापुरुष की नज़रों से देखने तथा उनका महिमामंडन करने का ज़िम्मेदार आख़िर है कौन? शिखर पर बैठने की इच्छा आख़िर किसमें नहीं होती? अपनी पूजा-अर्चना कौन नहीं करवाना चाहता? ख़ासतौर पर हमारे देश में तो जिसे देखो वही व्यक्ति अपना महिमामंडन कराने,स्वयं को गुरू कहलवाने अथवा स्वयंभू रूप से उपदेशक बनने के रोग से पीडि़त है। यहां तमाम लोग ऐसे देखे जा सकते हैं जिन्हें स्वयं ज्ञान हो या न हो परंतु वह व्यक्ति ज्ञान की गंगा बहाने को आतुर दिखाई देता है। स्वयं दुष्चरित्र हो फिर भी दूसरों को चरित्रवान होने का पाठ पढ़ाता नज़र आता है। धर्म व अध्यात्म से जिसका दूर-दूर तक का कोई वास्ता न हो यहां तक कि धर्म व अध्यात्म की परिभाषा भी न जानता हो ऐसे व्यक्ति धर्म व अध्यात्म का ज्ञान बांटते नज़र आते हैं। वैसे भी हमारे देश में अपनी झूठी प्रशंसा सुनने व सुनकर ग़ुब्बारे की तरह फूल जाने का काफ़ी प्रचलन है।यहाँ यदि आप किसी सिपाही को दरोग़ा जी कहिए तो वह खुश हो जाता है। साधारण शिक्षक को प्रोफ़ेसर साहब पुकारने से उसकी बांछें खिल जाती हैं। तमाम लोग एक-दूसरे को महाराज,‘देवता जी’ और ‘मेरे भगवान’ और गुरु जी जैसा संबोधन करते दिखाई देते हैं। यानी महिमामंडन करना व खुशामदपरस्ती दोनों ही बातें हमारे समाज में अपनी जगह बना चुकी हैं। ज़ाहिर है ऐसे में जनता के इस स्वभाव का फ़ायदा उठाने में उन शातिर लोगों को ज़्यादा देर नहीं लगती जो अपनी पूजा व महिमामंडन करवाने के साथ-साथ इसी धर्म व अध्यात्म के ढोंग के माध्यम से धन-संपत्ति भी अर्जित करना चाहते हैं और अय्याशी व ऐशपरस्ती की ज़िंदगी भी बसर करना चाहते हैं।
फिर आख़िर इन हालात का ज़िम्मेदार कौन है? संत कबीर ने ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाएं। बलिहारी गुरू आपने जिन गोविंद दियो मिलाए’, यह श्लोक लिखकर गुरु की महत्तता को भगवान के बराबर बताने का प्रयास किया है। क्या संत कबीर ने कभी सपने में भी यह बात सोची होगी कि भविष्य में इसी भारतवर्ष में ऐसे पाखण्डी व दुराचारी गुरु व स्वयंभू देवी-देवता भी जन्म लेने वाले हैं जो अपनी शक्ल-सूरत,वेशभूषा तो साधू-संतों व देवी-देवताओं जैसी बनाकर रखेंगे परंतु उनके भीतर एक अय्याश,ऐशपरस्त व धनलोभी आत्मा पल रही होगी? संत कबीर ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि कलयुग का स्वयंभू गुरू हत्या,बलात्कार व अन्य जघन्य अपराधों के आरोप में जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहा होगा। परंतु आज की वास्तविकता तो कम से कम यही है। ऐसे कलयुगी,पाखंडी गुरु व स्वयंभू देवी-देवता व तथाकथित भगवान अपने दुष्कर्मों के चलते मीडिया की सुर्ख़ियों में बने रहते हैं, जेलों में अपने कर्मों का फल भुगत रहे हैं या फिर पुलिस से लुकाछुपी करते फिर रहे हैं। आज देश के अधिकांश शहरों व क़स्बों में अनेक ऐसे अनपढ़ लोग देखे जा सकते हैं जिन्हें कथित रूप से देवियों की चौकियां आती हैं। और यह भी देखा जा सकता है कि इस प्रकार की तथाकथित चौकी आने से पूर्व ऐसा परिवार जो रोटी तक से मोहताज था वह ‘देवी कृपा’ से संपन्न हो जाता है। ज़ाहिर है शरीफ़,निश्छल तथा आस्थावान लोगों द्वारा की जाने वाली धनवर्षा ऐसे निठल्ले लोगों को आर्थिक रूप से सुदृढ बना देती है। और ऐसे लोगों को देखकर दूसरे लोग भी कोई व्यवसाय या कामकाज करने के बजाए स्वयं भी पाखंड की इसी दुनिया में प्रवेश कर अपना भाग्य आज़माने लग जाते हैं।
ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि हमारे देश की शरीफ़,सीधी-सादी,भोली-भाली व आस्थावान जनता अपने-अपने धर्मों,समुदायों व विश्वासों के उन्हीं धर्मगुरुओं,देवी-देवताओं,पीर-पैग़म्बरों,ऋषियों-मुनियों, संतों व फ़क़ीरों,महापुरूषों तथा अपने-अपने धर्मग्रंथों का ही अनुसरण करे और उन्हीें को अपना प्रेरणास्त्रोत समझते हुए सद्मार्गों पर चलने की कोशिश करे। हमारे देश में पाए जाने वाले किसी भी धर्म से संबंध रखने वाला कोई भी सद्गुरु ऐसा नहीं मिलेगा जिसने अपने भक्तों से धन-दौलत की उम्मीद रखी हो। किसी भी धर्म का कोई भी अवतार या देवता ऐसा नहीं मिलेगा जिसने अपने भक्तों से धन ऐंठ कर अपने तमाम आश्रम,महल अथवा फ़ार्म हाऊस बनाए हों। कोई भी अवतारी पुरुष या स्वयं को देवता बताने वाला कोई महापुरुष ऐसा नहीं था जो वासना का भूखा रहा हो और अय्याशी व ऐशपरस्ती को उसने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया हो। सभी धर्मों के संतों,फ़क़ीरों,अवतारों व देवी-देवताओं ने अपने शरीर पर बड़े से बड़े कष्ट झेलकर,स्वयं को संकट में डालकर, अपने समय की राक्षसी व बुरी ताक़तों का विरोध कर व उनकी यातनाएं सहकर समाज को जीने का सलीक़ा सिखाया है। ख़ुद फटे कपड़े पहनकर, भूखे रहकर आर्थिक संकट के दौर से गुज़रकर अपने भक्तों की संपन्नता व उनके उज्जवल भविष्य की कल्पना की है। हमारा देश ऐसे ही वास्तविक महापरुषों के अध्यात्मवादी जीवन की बदौलत विश्वगुरू कहा जाता रहा है। लिहाज़ा आम लोगों को यही चाहिए कि वे कलयुग के इन स्वयंभू देवी-देवताओं व पाखंडी अवतारों को अपना गुरु व अपनी आस्था का केंद्र बनाने से परहेज़ करें।

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2 Comments on "कलयुग के यह स्वयंभू भगवान"

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प्रवक्‍ता ब्यूरो
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On the behalf of Shri Krishna Kant Vaidik विदुषी लेखिका ने आज के समाज में उपस्थित तथाकथित धर्म गुरुओं का बड़ा सटीक चित्रण किया है। हमारी देश के पढे-लिखे लोग भी इन ढोंगियों के पीछे-पीछे भागते हैं और उनकी सिद्धियों से कृपा प्राप्त कर अपने जीवन के कष्टों का निवारण करवा कर सुख और समृद्धि लाना चाहते हैं। हमारे सनातन वैदिक धर्म के अनुसार के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के लिए ईश्वरीय कर्मफल व्यवस्था परमात्मा के सार्वभौम नियमों द्वारा संचालित होती है। मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है परन्तु फल परमात्मा के अधीन है। उसे शुभ और अशुभ कर्मों का फल… Read more »
Krishan Kant Vaidik
Guest
विदुषी लेखिका ने आज के समाज में उपस्थित तथाकथित धर्म गुरुओं का बड़ा सटीक चित्रण किया है। हमारी देश के पढे-लिखे लोग भी इन ढोंगियों के पीछे-पीछे भागते हैं और उनकी सिद्धियों से कृपा प्राप्त कर अपने जीवन के कष्टों का निवारण करवा कर सुख और समृद्धि लाना चाहते हैं। हमारे सनातन वैदिक धर्म के अनुसार के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के लिए ईश्वरीय कर्मफल व्यवस्था परमात्मा के सार्वभौम नियमों द्वारा संचालित होती है। मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है परन्तु फल परमात्मा के अधीन है। उसे शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता… Read more »
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