लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी
इंटरनेट के माध्यम से सूचना के क्षेत्र में आई क्रांति के वर्तमान दौर में आए दिन पूरे विश्व से आने वाले तमाम ऐसे समाचार,चित्र व वीडियो सांझा किए जा रहे हैं जिन्हें देखकर कोई भी इंसान जल्द विश्वास नहीं कर सकता। उदाहरण के तौर पर कहीं जंगल का राजा शेर किसी जेबरा के साथ खड़ा एक ही घाट पर पानी पीता दिखाई देता है। कहीं यही शेर किसी हिरण के बच्चे की जान बचाता नजर आ रहा है। कहीं बंदर व कुत्ते में गहरी दोस्ती दिखाई दे रही है तो कहीं कुत्ते व बिल्लियां एक साथ एक ही बर्तन में दूध पीते नजर आ रहे हैं। गोया पशुओं में अविश्वसनीय तरीके से सौहाद्र्र बढ़ता दिखाई दे रहा है।पशुओं में ही मां की ममता के कई हैरतअंगेज कारनामे भी देखने को मिलते रहते हैं। मिसाल के तौर पर जंगल में एक भैंस अपने छोटे से बच्चे को शेर के मुंह से बचाने के लिए अपनी जान पर खेलकर शेर से लड़ जाती है और अपने बच्चे को शेर के जबड़े से बाहर निकाल लाती है। इतना ही नहीं बल्कि शेर द्वारा अपने बच्चे पर किए गए हमले से आहत भैंस उसी शेर को अपनी सींगों से उछाल-उछाल कर इतना मारती है कि शेर दम तोड़ देता है।पिछले दिनों एक ऐसा ही वीडियो सोशल मीडिया में देखा गया। लगभग 8 फीट लंबा एक संाप चिडिया के घोंसले में जाकर चिडिया के बच्चे को निगल जाता है। चिडिया के बच्चे की मां ने जैसे ही यह दृश्य देखा वह सांप पर टूट पड़ी और अपनी चोंच से उसने सांप पर लगातार इतने हमले किए कि वह विशाल सांप अपनी जान से हाथ धो बैठा।
गोया इस प्रकार के उदाहरण हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि पशु-पक्षियों में अभी भी मां की ममता न केवल कायम है बल्कि उनमें परस्पर सद्भाव भी पहले की तुलना में अधिक बढ़ता जा रहा है। ड़े दुर्भाग्य का विषय है कि ठीक इसके विपरीत स्वयं को बुद्धिमान व पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ प्राणी समझने वाली मानव जाति इस मामले में पशुओं से कहीं बदतर होती जा रही है। अर्थात् यदि मानवीय कारगुजारियों की तुलना पशुओं के बजाए राक्षसों से की जाए और ऐसी घटिया सोच व प्रवृति रखने वाले मानव को राक्षस ही कहा जाए तो यह कहना भी गलत नहीं होगा। निश्चित रूप से हम इंसानों में भी मां की ममता से जुड़े अनेकानेक किस्से बेहद प्रचलित हैं। विभिन्न धर्मशास्त्रों एवं तमाम ऐतिहासिक घटनाओं में मां की ममता से जुड़ी तमाम घटनाएं सुनने को मिलती हैं। बड़े अफसोस की बात तो यह है कि वर्तमान युग में देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से प्रायः ऐसे कई समाचार सुनने को मिलते हैं जो मानव जाति पर तो कलंक प्रतीत होते ही हैं साथ-साथ कलयुग के इस दौर में मां की ममता को भी एक मिथक मात्र साबित करते हैं। उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों अपने ही देश से एक समाचार आया कि एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपनी एक जवान बेटी को जान से मारकर फावड़े से उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। और उन टकड़ों को जमीन के नीचे दबा दिया। लड़की का कुसूर केवल इतना था कि उसने अपनी मां को उसके प्रेमी के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया था। और मां को इस बात का संदेह हो गया कि कहीं वह लडकी अपने पिता को उसकी इन करतूतों के बारे में बता न दे।
आमतौर पर तो यही देखा जाता है कि कोई भी मां अपनी बेटी की आबरू लुटते हुए नहीं देखना चाहती और न ही देख सकती है। परंतु दुर्भाग्यवश अब ऐसे समाचार भी सुनाई देने लगे हैं जिनसे यह पता चलता रहता है कि मात्र अपनी व्यक्तिगत् अय्याशी व ऐशपरस्ती के लिए किसी मां ने अपनी सगी बेटी को ही गलत रास्ते पर डाल दिया। गत् दिनों एक समाचार यह मिला कि एक मां के किसी व्यक्ति के साथ अवैध संबंध थे। मां ने अपनी मात्र 12 वर्षीय पुत्री को भी अपने पुरुष मित्र के साथ नाजायज संबंध बनाने के लिए मजबूर किया। उस बच्ची ने अपने भाई को जब इस घटना की सूचना दी तब कहीं जाकर वह लडकी अपनी आबरू बचाने में सफल हो सकी। अन्यथा उसकी मां ने तो अपनी ओर से उसका जीवन नरक बनाने का पूरा प्रबंध कर ही दिया था। आज इसी समाज में तमाम अनेक ऐसे किस्से भी सुनने को मिलते हैं कि कोई मां अपनी बेटी के रिश्ते के लिए किसी ऐसे वर की तलाश करती है जो गाड़ी-बंगला रखता हो और आर्थिक रूप से पूरी रह संपन्न हो भले ही वर की आयु लड़की के पिता की आयु से अधिक ही क्यों न हो। यहां भी ऐसी कलयुगी मांएं बेटी के अलावा अपनी निजी ऐशपरस्ती का प्रबंध भी सुनिश्चित करना चाहती हैं। अन्यथा किसी लडकी को उसकी आयु के बराबर के पति की ही तलाश होती है। ऐसी मांओं को भी यदि कलयुग की मांएं तथा मां की ममता को मिथक प्रमाणित करने वाली मांएं कहा जाए तो यह गलत नहीं होगा।
इसी प्रकार यदि हम सामान्य पारिवारिक रिश्तों पर नज़र डालें तो भी हमें ऐसी तमाम घटनाएं सुनने व देखने को मिलेंगी जिन्हें देखकर हमें यही महसूस होगा कि कलयुग के इस दौर में मांओं का किरदार कितना नकारात्मक होता जा रहा है। तीन-चार दशक पूर्व तक प्रत्येक मां अपनी बेटी को बाल्यकाल से ही ऐसे संस्कार देती थी ताकि बच्ची को इस बात का एहसास रहे कि वह भले ही इस घर में यानी अपने माता-पिता के साथ क्यों न पल रही हो परंतु हक़ीक़त में वह किसी दूसरे घर-परिवार की अमानत है।
मिसाल के तौर पर यदि बच्ची से कोई छोटी-मोटी गलती भी हो जाया करती थी तो उसकी मां उसे बचपन में ही ऐसे ताने सुनाती थी कि-‘अपने घर जाकर मां-बाप को कलंकित करेगी या तेरे ससुराल वाले क्या कहेंगे कि तेरे मां-बाप ने यही सिखाया है। गोया लड़की को अच्छी बातें बताकर सुसंस्कारित कर, तमीज-तहजीब व सास-ससुर के साथ कैसे पेश आना है इस तरह के तरीके सिखाकर लोग अपनी बेटी को बिदा करते थे। अपनी बच्चियों को लोग सहनशक्ति भी सिखाते थे। चुग़लखोरी या ससुराल की बात मायके में करने जैसी बातों से परहेज करने की सलाह देते थे। परंतु आज तो हालात ठीक इसके विपरीत नज़र आ रहे हैं। लड़कियों को उनकी मांएं उलटी शिक्षा दे रही हैं। यानी बेटी को मां सिखाती है कि पति और सास-ससुर की कोई सख्त बात नहीं सुननी। अपनी मायके वालों की कोई बुराई सहन मत करना। जरा-जरा सी बात पर लड़कियों की मांएं अपनी बेटियों को मायके वापस बुला लेती हैं। घरों में विवाह के बाद चूल्हे अलग करने के सुझाव या मां-बाप को छोडकर अलग मकान में रहने की सलाह माता-पिता द्वारा अपनी बेटियों को दी जाती है। हद तो यह है कि इस तरह नवविवाहित लोगों के बीच तनावपूर्ण स्थिति पैदा होने पर लड़कियों की मांए मोटी रकम लेकर बेटी को पति से अलग हो जाने या तलाक लेने तक के लिए तैयार करती हैं। उन्हें नवजात शिशुओं या छोटे-छोटे बच्चों की भी परवाह नहीं होती।
कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि निश्छल प्रेम को लेकर जिस ‘मां की ममता’ को प्रेम के एक उत्कर्ष के रूप में जाना, माना व पहचाना जाता था आज संभवतः वही ‘मां की ममता’ उपरोक्त घटनाओं व हादसों की बदौलत कलयुग का एक मिथक साबित होने लगी हैं। और निश्चित रूप से ऐसी सिथति हमारे समाज विशेषकर मानवजाति के लिए कतई सुखद नहीं है।

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