लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

kanhaiyaदिल्ली में इन्दिरा गान्धी की जघन्य हत्या के बाद जो नर संहार हुआ , उसको कन्हैया कुमार भीड़ की करतूत बता रहा है । बिहार का कन्हैया कुमार पिछले साल जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय दिल्ली के छात्र संघ का एक साल के लिए प्रधान चुना गया था । अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में वह राजनीति में सक्रिय हो गया है । इसका उसे पूरा अधिकार है । लेकिन उसने अपनी राजनीति की शुरुआत उस समूह के साथ खड़े होकर की जो विश्वविद्यालय में अफ़ज़ल गुरु को फाँसी दिए जाने के दिन को शहादत दिवस के तौर पर मना रहा था । उसके इस अभियान में उसके साथ उमर ख़ालिद और कश्मीर के कुछ आतंकवादी भी शामिल थे । अपनी राजनीति की शुरुआत इस ग्रुप ने भारत के हज़ार टुकड़े करने के के संकल्प से की ।
धीरे धीरे कन्हैया कुमार ने अपनी भावी राजनीति का एजेंडा देश में घूम घूम कर स्पष्ट करना शुरु किया । कन्हैया सी पी आई के छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडैंट फैडरेशन से जुड़ा हुआ है । अत स्वाभाविक था कि सी पी आई के मंच पर वह अपना राजनैतिक घोषणा पत्र जारी करता । लेकिन सी पी आई और सोनिया कांग्रेस का आपस में पुराना रिश्ता है । आपात काल में कांग्रेस पार्टी के साथ यदि कोई पार्टी ताल ठोंक कर खड़ी थी तो वह सी पी आई ही थी । शायद यही कारण था कि सोनिया कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गान्धी और एक दूसरे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शशि थरूर स्वयं जाकर कन्हैया कुमार के इस नये राजनैतिक आन्दोलन में शामिल हुए । थरूर ने तो उन्हें नए युग का भगत सिंह ही बताना शुरु कर दिया । राहुल गान्धी स्वयं कन्हैया कुमार का संदेश लेकर देश भर में घूमने लगे । असम तक में कन्हैया कुमार की प्रशंसा में क़सीदे पढ़ने लगे । सब मिल कर कन्हैया की पालकी उठाने को ही अपनी राजनीति का साध्य मानने लगे ।
अब जब सोनिया कांग्रेस कन्हैया के लिए इतना कुछ कर रही थी तो कन्हैया कुमार चुप कैसे रह सकते थे । पिछले दिनों कन्हैया ने कांग्रेस का यह क़र्ज़ा दिल्ली में चुकाया । उसमें कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गान्धी की जघन्य हत्या के बाद जो नर संहार हुआ था , उसके लिए कोई दोषी नहीं है , क्योंकि वह भीड़ की करतूत थी । इस नरसंहार में सैकड़ों लोग मारे गए थे । लोगों को ज़िन्दा जला दिया गया । राजीव गान्धी अपनी माँ के स्थान पर प्रधानमंत्री बने थे । जब उनका ध्यान देश की राजधानी दिल्ली में हो रहे इस नर संहार की ओर दिलाया गया था तो उन्होंने इत्मीनान से कहा कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती तो हिलती ही है । वे बड़ा पेड़ गिरने पर हिलती हुई धरती पर निर्दोषों की चीख़ पुकार को आराम से सुनते रहे । पुलिस ने इन निर्दोषों की हत्याएँ रोकने का कोई प्रयास नहीं किया । सेना नहीं बुलाई गई । जब धरती पूरी तरह हिल चुकी और सैकड़ों बेक़सूर लोगों की बलि ले ली गई तो सरकार ने सेना बुलाई । दिल्ली का बच्चा बच्चा जानता है कि यह सारा काम कांग्रेस पार्टी पूरी सरकारी सहायता से करवा रही थी । कांग्रेस पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं पर अभी तक कचहरियों में इन हत्याओं को लेकर मुक़द्दमे चल रहे हैं । कांग्रेसी इस काम के लिए बाहर से लोगों को लेकर पूरी योजना से लेकर आए थे । क्योंकि इन हत्याओं में दिल्ली के स्थानीय लोग शामिल नहीं थे । सोनिया कांग्रेस अभी तक इस नरसंहार का श्राप भोग रही है । लेकिन कन्हैया कुमार के लिहाज़ से यह सारा नर संहार भीड़ का कारनामा था । शुद्ध भीड़ का । यानि इस नरसंहार में न कोई योजना थी न कोई षड्यन्त्र था । यह ठीक है कि कन्हैया कुमार इन पीड़ितों की कोई सहायता तो नहीं कर सकते , क्योंकि उनका इस पूरे घटनाक्रम सो कोई ताल्लुक कुछ नहीं है । लेकिन उनको इन पीड़ित परिवारों के ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने का क्या अधिकार है ?
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की रणनीति बिल्कुल स्पष्ट है । सोनिया कांग्रेस को यह सर्टिफ़िकेट चाहिए कि १९८४ के दंगों में उसका कोई सम्बंध नहीं है । यह सर्टिफ़िकेट इसलिए भी जरुरी है क्योंकि पंजाब में विधान सभा चुनाव कुछ महीनों बाद ही होने वाले हैं । ऐसे वक़्त यदि दिल्ली की हत्याओं को लेकर सोनिया कांग्रेस को निर्दोष होने का फ़तवा हासिल हो जाता है तो उसे पंजाब व दिल्ली में राजनीति करने में आसानी हो सकती है । राहुल गान्धी के कन्हैया कुमार के पीछे पीछे घूमने का रहस्य भी इस घटनाक्रम से समझा जा सकता है । पहले किसी का क़द बढ़ाओ फिर उससे बड़ा काम करवाओ । राहुल गान्धी कन्हैया के पक्ष में जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय न पहुँचते तो क्या किसी का ध्यान उसकी ओर जाता ? राहुल गान्धी जे एन यू न जाते तो सरस्वती ढाबे पर नारे लगाते कन्हैया को कौन जानता ? राहुल गान्धी ने पहले तो कन्हैया कन्हैया चिल्ला कर सारे देश की नज़रों में उसकी हैसियत बनाने का प्रयास किया और जब यह काम हो गया तो कन्हैया से उसकी क़ीमत बसूल ली । कन्हैया ने भी यह क़ीमत देने में क्षण भर की देरी नहीं की । उसे अपनी राजनीति की शुरुआत करनी है । यह सिद्धान्तों की राजनीति भी हो सकती है और अवसर वादी राजनीति भी हो सकती है । लेकिन कन्हैया कुमार ने दूसरी राजनीति को ही तरजीह दी ।
परन्तु सोनिया कांग्रेस ने इस पूरी रणनीति में एक भूल कर दी । जिस कन्हैया कुमार को उसके निर्दोष होने की प्रमाणपत्र देने के लिए तैयार किया उसकी हैसियत उस सिख समाज में क्या है , जिसने धरती के हिलने का सबसे ज़्यादा कष्ट भोगा ? जो प्रमाणपत्र उसे न्यायालयों से लेना चाहिए , सोनिया कांग्रेस वह कन्हैया कुमार से प्राप्त करके ही फूली नहीं समा रही । हो सकता है वह इस प्रमाण पत्र को भी न्यायालय में चल रहे मुक़द्दमों में बतौर सबूत ही पेश कर दे । कपिल सिब्बल इस प्रमाण पत्र की एक एक पंक्ति को परख रहे होंगे । सोनिया कांग्रेस को स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने के लिए अंत में मिला भी तो कन्हैया कुमार । राहुल गान्धी को बधाई । लेकिन क्या के टी एस तुलसी और एच एस फूलका दोनों बतायेंगे कि कन्हैया कुमार अब किसकी राजनीति कर रहा है ?

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2 Comments on "दिल्ली के नरसंहार पर कन्हैया का सर्टिफ़िकेट"

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Himwant
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कन्हैया का यह वक्तव्य, कांग्रेस और नव-नक्सलियों की मिली-भगत उजागर करता है. कांग्रेस भी जिस झूठ को कभी नहीं बोल सकी उसे कन्हैया कितनी बेशर्मी से बोल रहा है.

बी एन गोयल
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बी एन गोहेड यल

एक कहावत है छाज तो बोले सो बोले पर छलनी भी बोले जिस में सत्तर छेद

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