लेखक परिचय

कनिष्क कश्यप

कनिष्क कश्यप

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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मैं शौक से मनाता जश्न उनकी जीत का
उस रौशनी में लेकिन कई घर जल रहे थे
मलाल तो था जरूर उनके जलने का
उनकी छावं मे हम कब से पल रहे थे
वो दरिया था,आकर उन्हे बुझा जाता
दूर कहीं शायद पत्थर पिघल रहे थे
नही थी खबर ज़िन्दगी बसती हैं यहीं
हम तो बस यूं ही उधर से निकल रहे थे
कैसे गुजारे तुमने इतने दिन मेरे बगैर
ये पुछ्ने को मेरे अरमां मचल रहे थे
मैंने न झुकाया पलकों को पल भर
उन्हे देख कर हर गम बहल रहे थे
उस रोज तो रास्तों ने सलाम किया
उस रोज वो मेरे साथ चल रहे थेcouple-holding-hands

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