लेखक परिचय

अजीत कुमार सिंह

अजीत कुमार सिंह

अजीत कुमार सिंह, झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली, भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर लिंग में से एक बाबा की नगरी बैद्यनाथधाम, देवघर के रहने वाले हैं। इनकी शिक्षा-दीक्षा स्नातक तक यहीं हुई। बाद में पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिप्लोमा किया और अभी ‘’राष्ट्रीय छात्रशक्ति’’ मासिक पत्रिका, दिल्ली में संपादन मंडल सदस्य हैं।

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Kargil Vijay Diwas 26 julyअजीत कुमार सिंह
कारगिल विजयदिवस पर विशेष
जरा याद करो कुर्बानी…गीत सुनते ही रोम-रोम में देशभक्ति का संचार हो जाता है। इसी गीत को गुनगुनाते हुए सीमा पर कितने जवान मातृभूमि की रक्षा करते-करते अपने प्राण को न्यौछावर कर देते हैं। आज का दिन हम भारतवासियों के लिए गौरव का दिन है। आज ही के दिन यानि 26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध में पाकिस्तान पर अधिकारिक रूप से विजय प्राप्त की थी।
आज से ठीक 17 साल पहले, ऑपरेशन विजय के तहत कारगिल में जमे पाकिस्तानी घुसपैठियों को भारतीय सेना ने खदेड़कर भारत से बाहर किया था। दुश्मनों पर मिली इसी जीत को हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज से ठीक 17 साल पहले जो बच्चा पैदा हुआ होगा वो आज अपने किशोरावस्था की दहलीज को पार कर रहा होगा। आज जब वो बच्चा अपने बड़े-बुजुर्गों से कारगिल विजय की गाथा को सुन रहा होगा तो गर्व से उसका सीना चौड़ा हो रहा होगा।
कारगिल का युद्ध कई मायनों में पूर्व में हुए युद्ध से अलग है क्योंकि हमारे सैनिकों ने जिन विषम परिस्थितियों में दुश्मनों का मुकाबला किया वो अकथनीय है। उन दुर्गम पहाड़ों में बिना भोजन-पानी के सप्ताह भर डटे रहना। एक तरफ दुश्मन गोले बरसा रहे थे तो दूसरी तरफ प्रकृति भी…उनके धैर्य की परीक्षा लेने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती थी। चोटी पर दुश्मन और सैनिकों के सामने पर्वत की खड़ी चुनौती। चहुंओर बर्फ ही बर्फ। खाने-पीने की सामग्री का अकाल…इन सब पर हमारी सेना ने हार नहीं मानी और असंभव को संभव कर दुनिया को चकित कर दिया। तभी दुनिया में हमारी सेना का साख बहुत ऊंची है।
03 मई 1999 को जब स्थानीय गड़ेरियों ने पाकिस्तानी घुसपैठ की सूचना हमारे जवानों की दी थी, उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि आगे चलकर इतना बड़ा भीषण युद्ध होगा। घुसपैठ की सूचना पर भारतीय सेना का गश्ती दल जब वहां पहुंचा तो उन आस्तीन के सांपों ने हमारे पांच सैनिकों को बंधक बना लिया और यातनाएं देकर मौत के घाट उतार दिया। पाकिस्तान का मूल मकसद कश्मीर से लद्दाख से जोड़ने वाली एकमात्र सड़क एनएच-1 पर कब्जा करना था। इससे सियाचीन ग्लेशियर पर भारतीय उपस्थिति पर विपरीत असर पड़ता और उसे कश्मीर की विवादित सीमा के मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण करना भी था। एक जून को पाकिस्तान ने एनएच-1 पर बम बरसाने शुरू भी कर दिये थे। जब 6 जून को भारतीय सेना के द्वारा जोरदार जवाबी हमला किया गया तो पाकिस्तान के पांव उखड़ गये। 6 जून के बाद भारतीय सेना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और आगे बढ़ते गये। पहले बाल्टिक सेक्टर की दो अहम चौकियों पर कब्जा, फिर द्रास में तोलोलिंग पर कब्जा…और यह क्रम बढ़ता गया। अंत में हार मानकर 5 जुलाई को पाकिस्तान ने अपनी सेना को वापस बुलाने की घोषणा कर दी।
सरकारी आंकड़े के अनुसार भारत के 527 जवान शहीद हो गए और करीब 1363 जवान घायल हुए। जवानों की इतनी बड़ी कुर्बानी को हम इतनी आसानी से भूल नहीं सकते। आज कश्मीर का मुद्दा सबसे ज्यादा हावी है। जिस कश्मीर की सुरक्षा में हमारे सैनिक दिन-रात डटे रहते हैं। उसी कश्मीर में जवानों पर पत्थर बरसाना बहुत ही निंदनीय है। 08 जुलाई को कुख्यात आंतकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर में हिंसा भड़क उठी। उसके बाद वहां कि विधि व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कर्फ्यू लगाना पड़ा। आज पाकिस्तान मानवता की दुहाई दे रहा है और बुरहान को शहीद का दर्जा देकर उसकी याद में ब्लैक डे भी मना रहा है। इससे ज्यादा बेर्शमी क्या हो सकती है कि जिस समय पाकिस्तान के एक स्कूल में सौ से ज्यादा बच्चो को मौत के घाट उतार दिये जाते हैं तब उन्हें मानवता याद नहीं आती है और न ही आतंकियो के विरोधी में कोई ब्लैक डे मनाया जाता है।
कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के पराक्रम की अनेक गाथाएं है। इस युद्ध में हमारे जवानों ने साहस और शौर्य की वह मिशाल पेश की जो भावी पीढ़ी को प्रेरणा देती रहेगी। आज अगर हम देश की सरहद के बीच सुकून और सुरक्षित होने का अहसास कर पा रहे हैं तो वह हमारे सैनिकों की वजह से है। हर भारतीय के लिए विजय दिवस गर्व करने का दिन है। ऐसे में इस जंग में शहीद वीर सपूतों और उनके शौर्य को याद करना ही उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।

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