लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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kargil diwasडा. राधेश्याम द्विवेदी
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’।
( या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।)
गीता के इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के शूरवीरों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर कर दिया था। 26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ‘26 जुलाई’ अब हर वर्ष कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
कारगिल विजय दिवस – सप्ताह समारोह –गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी ‘इंडियन इवेंट सौल्युशन्स ’ के सहयोग द्वारा कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिको की स्मृति में दिनांक 21 से 27 जुलाई 2016 तक से कारगिल विजय दिवस- सप्ताह समारोह का आयोजन किया जाना सुनिश्चित हुआ है। समारोह के अंतर्गत संस्था द्वारा प्रस्तावित कार्यक्रमों का विवरण निम्नवत है:-
1. गुरुवार, 21 जुलाई 2016, प्रातः 8 बजे : जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास कार्यालय परिसर में स्थित शहीद स्मारक पर पुष्पांजलि व श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए समारोह सप्ताह का आरम्भ ।
2. शुक्रवार, 22 जुलाई 2016 : जनपद उन्नाव में विभिन्न स्थानों पर भारतीय सेना के लिए सन्देश व हस्ताक्षर अभियान का आयोजन ।
3. शनिवार, 23 जुलाई 2016 शनिवार, 23 जुलाई 2016, प्रातः 10 बजे : जनपद के एकमात्र कारगिल शहीद लांसनायक अमर बहादुर सिंह जी के पैतृक निवास ग्राम-बजौरा,पोस्ट व थाना-बिहार में जाकर शहीद स्मारक में उनकी प्रतिमा का माल्यार्पण व श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन ।
4. रविवार, 24 जुलाई 2016, प्रातः 9 बजे : आवास विकास में स्थित संस्था कार्यालय से “बाइक रैली” का आयोजन, रैली शहर में विभिन्न स्थानों व गलियों से होते हुए संस्था कार्यालय में समाप्त होगी ।
5. सोमवार, 25 जुलाई 2016 सायं 5 बजे : आवास विकास स्थित लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल पार्क में “संगीतमय श्रद्धांजलि” कार्यक्रम का आयोजन, जिसमे जनपद के पूर्व सैनिकों को प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित करना । इस कार्यक्रम का विषय देशभक्ति व सूफी संगीत पर आधारित होगा ।
6. मंगलवार, 26 जुलाई 2016 सायं 5:30 बजे : कारगिल विजय दिवस के उपलक्ष्य में गत वर्षो की भांति इस वर्ष भी संस्था कार्यालय से निराला पार्क तक कैंडल मार्च का आयोजन ।
7. बुधवार, 27 जुलाई 2016 सायं 7 बजे : आवास विकास स्थित लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल पार्क में “काव्य गोष्ठी” का आयोजन किये जाने तथा उसके उपरांत समारोह में विशेष रूप से सहयोगियों की भूमिका निभा रहे सदस्यों को प्रतीक चिन्ह देकर समारोह का समापन । उपरोक्त समारोह पूर्णतः गैर-राजनैतिक है तथा इसमें जनता की उपस्थिति व सहयोग आयोजक को ऊर्जा व उत्साह प्रदान करेगा ।
कारगिल विजय दिवस 26 जुलाई :-
विजय दिवस प्रत्येक वर्ष ’26 जुलाई’ को मनाया जाता है। भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य में आज से 17 वर्ष पहले भारतीय सेनाने 26 जुलाई, 1999 के ही दिन नियंत्रण रेखा से लगी कारगिल की पहाड़ियों पर कब्ज़ा जमाए आतंकियों और उनके वेश में घुस आए पाकिस्तानी सैनिकों को मार भगाया था। पाकिस्तान के ख़िलाफ़ यह पूरा युद्ध ही था, जिसमें पांच सौ से ज़्यादा भारतीय जवान शहीद हुए थे। इन वीर और जाबांज जवानों को पूरा देश ’26 जुलाई’ के दिन याद करता है और श्रद्धापूर्वक नमन करता है। देश की इस जीत में कारगिल के स्थायी नागरिकों ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी। आज ही का दिन था, जब सारा देश जीत की खुशी से ज्यादा अपने सपूतों को खोने के ग़म में डूबा हुआ था। यकीन ही नहीं आता कि उस बात को बीते एक दशक हो चुका है, लेकिन आज भी अगर हर हिन्दुस्तानी का मन टटोला जाए तो उस बात के निशान बिल्कुल ताज़ा ही मिलेंगे। एक लंबा अरसा बीत जाने के बाद भी वो यादें अनायास ही आंखों को भिगोने के लिए काफ़ी हैं। अब अगर युवापीढ़ी की बात करें तो मुझे नहीं लगता 5 या 10 % से ज्यादा को इस बात की भनक भी होगी, खैर छोड़िए इस बात को क्योंकि अगर मैंने ” इसे दुर्भाग्य कहें इस देश का या पश्चिमी सभ्यता का असर, जहाँ वैलेनटाइन्स डे का तो हर नवयुवक और नवयुवती को पता है मगर इस ख़ास दिन के बारे में उन्हें याद दिलाना पड़ता है” ऐसा कुछ कह दिया तो मेरे एक मित्र जो मेरे इन विचारों को दकियानूसी बताने से बाज़ नहीं आते, इस बार भी टीका-टिप्पणी करने से नहीं चूकेंगे। इसलिए चुपचाप बता देने में ही भलाई है कि हम बात कर रहे हैं । 26 जुलाई यानी कारगिल विजय दिवस की जो 1999 के कारगिल युद्ध में अपना बलिदान देने वाले सैनिकों की स्मृति में हर साल मनाया जाता है।
464 जवानों ने देश की सीमाओं के भीतर घुस आए दुश्मन को मुंह-तोड़ जवाब देते हुए जिस अदम्य साहस, शौर्य और पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए, उसे हम लफ्जों में बयाँ तो नहीं कर सकते, हाँ उस जज़्बे को सलाम ज़रूर कर सकते हैं। आज भी जब उस समय का ज़िक्र चलता है तो याद आते हैं कारगिल, द्रास, बटालिक और मुश्कोह घाटी जैसे स्थान। याद आती हैं टाईगर हिल, तोलोलिंग, पिम्पल काम्प्लेक्स जैसी पहाडियाँ। याद आते हैं मनोज पाण्डेय, विक्रम बत्रा, संजय कुमार, सौरभ कालिया जैसे नाम। किस तरह कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर असम तक फैला यह देश अपने इन वीरों की सलामती की दिन-रात दुआएं मांगता था, ये भी याद आता है। कैसे जब किसी सैनिक का तिरंगे में लिपटा हुआ ताबूत आता था तो सारे इलाके में शोक की लहर दौड़ जाती थी। धर्म, जाति, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर सिर्फ़ एक ही भाव प्रबल था : देशप्रेम। काश! ये भाव ही चिरस्थायी प्रबल रहे तो कितना अच्छा हो ।
युद्ध की पृष्ठभूमि:- कारगिल युद्ध, जो ‘कारगिल संघर्ष’ के नाम से भी जाना जाताहै, भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में मई के महीने में कश्मीरके कारगिल ज़िले से प्रारंभ हुआ था। इस युद्ध का महत्त्वपूर्ण कारण था बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित आतंकवादियों का ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर घुस आना। इन लोगों का उद्देश्य था कि कई महत्त्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सड़क का नियंत्रण हासिल कर सियाचिन ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमज़ोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा करना। पूरे दो महीने से भी अधिक समय तक चले इस युद्ध में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। स्वतंत्रता का अपना ही मूल्य होता है, जो वीरों के रक्त से चुकाया जाता है।
जवानों की शहादत:- इस युद्ध में भारत के पाँच सौ से भी ज़्यादा वीर योद्धा शहीद हुए और 1300 से ज्यादा घायल हो गए। इनमें से अधिकांश जवान अपने जीवन के 30 वसंत भी नहीं देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर भारतीय सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्र ध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था।
युद्ध के अवशेष:- पाकिस्तान के विरुद्ध लड़े गए चौथे युद्ध के चिह्न कारगिल में नज़र आ जाते हैं। पाकिस्तानी गोलाबारी से बचने के लिए घरों में बनाए गए बंकर भी मौजूद है। पर्यटन बढ़ने के साथ-साथ अब उन्हें गेस्ट हाउस व होटलों में परिवर्तित किया जा रहा है।कारगिल युद्ध को खत्म हुए 17 साल बीत जाने के बाद भी सेना काफ़ी सतर्क है। 168 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा जो द्रास, कारगिल और बटालिक से गुज़रती है, उस पर नज़र के लिए सेना की संख्या काफ़ी बढ़ा दी गई है। 1999 में यह तादाद जहाँ 4000 हज़ार थी, वो अब 20 हज़ार के क़रीब है। जिस कारगिल को पाने के लिए सैकडों जवानों को शहीद होना पड़ा, उसकी जीत के इतने साल पूरे होने पर सेना एक बार फिर उन्हें श्रद्धांजलि देकर ये दिखाना चाहती है कि आज भी उनकी यादें यहाँ की फिजाओं मंन ज़िंदा है।
पर्यटन का विकास:- कारगिल के साथ ही साथ द्रास व बटालिक भी लोकप्रिय पर्यटन स्थल बन गए हैं। गत वर्ष लगभग बीस हज़ार देशी पर्यटक यहाँ आए थे। सहायक पर्यटन निदेशक रह चुके ‘मोहम्मद हुसैन’ बताते हैं कि कश्मीर के बिगड़े हालातों का ख़ामियाजा कारगिल को भी भुगतना पड़ा है। विदेशी टूरिस्ट कारगिल की ओर कम रुख़ कर रहे हैं। लेकिन जून अंत तक बीस हज़ार देशी पर्यटक कारगिल पहुंच चुके थे। पर्यटन की दृष्टि से हुए विकास को छोड़ दें तो कारगिल के हालात नहीं बदले हैं।
भौगोलिक स्थिति :- द्रास में ‘वॉर मेमोरियल’ के अलावा कुछ नहीं है। युद्ध में उजड़े कई गांव आज भी नहीं बस पाए हैं। सर्दियों में छह-सात माह तक यह पूरा इलाका दुनिया से कट जाता है, क्योंकि इसे ‘अमरनाथ यात्रा’ के बेस कैंप बालटाल से जोड़ने वाला ‘जोजिला दर्रा’ भारी बर्फबारी के कारण बंद हो जाता है। रोहतांग दर्रा बंद होने पर मनाली-लेह वाला दूसरा रास्ता भी रुक जाता है।
नागरिक :- यहाँ के नागरिक जीवट वाले और मिलनसार होते हैं। स्थानीय लोगों के लिए ये छह-सात महीने बहुत कठिन होते हैं। उनकी देशभक्ति की दाद सेना भी देती है। सेना का मानना है यदि वे मदद नहीं करते तो विजय में बहुत मुश्किलें आतीं। दर्रा बंद होने के बाद राशन भी मिलना मुश्किल हो जाता है। जोजिला में टनल बनाने की योजना है ।
व्यापार:- लेह, कश्मीर, जनकसर, पाक़ कब्ज़े वाले कश्मीर का स्कदरू और चीन की कई जगहों से कारगिल बराबर दूरी पर है। यदि कारगिल स्कदरू रोड को खोल दिया जाता है तो व्यापार के नए रास्ते खुलेंगे। भारत-पाक के बीच कुछ साल पहले तीन सड़कें खोलने पर सहमति बनी थी, लेकिन बनते-बिगड़ते रिश्तों के चलते इन सड़कों को अब तक खोला नहीं गया है। जिस रास्ते को पूरा करने में आज 4-5 दिन लग जाते हैं। कारगिल-स्कदरू सड़क के खुलने के बाद उसे केवल 5-6 घंटो में पूरा किया जा सकेगा।
टाइगर हिल:- साढ़े सोलह हज़ार फीट की ऊंचाई पर टाइगर हिल को दुश्मन के कब्जे से छुड़ाना सेना के लिए सबसे कठिन लड़ाई थी। इसी लड़ाई में ‘परमवीर चक्र’ विजेता ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने शौर्य दिखाया था। वीरता की गाथा कहने वाली यह पहाड़ी अब पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो रही है। यहाँ से सूर्योदय व सूर्यास्त बहुत सुंदर दिखाई देता है। इसलिए इस पहाड़ी को सनराइज और सनसेट पॉइंट के रूप में विकसित किया जा रहा है।
पोलो का खेल:- ग्यारह साल पहले तोप के गोलों से गूंजने वाला द्रास अब पोलो के लिए विश्वभर में जाना जाएगा जो क्षेत्र की अपनी अलग पहचान है। हाल ही में राज्य सरकार ने द्रास-बटालिक के पोलो ग्राउंड को अंतरराष्ट्रीय रूप देने के लिए एक लाख रुपए देने की घोषणा की है।
मान्यताएँ :- माना जाता है कि द्रास में पोलो पाकिस्तानी कब्जे के बल्तीस्तान से आया है। द्रास के राजा की शादी बल्तीस्तान में हुई थी और रानी के साथ पोलो भी आ गया। द्रास के द्राड़ लोगों के पुरखे भी पोलो खेलते थे। इसके सबूत आज भी देखे जा सकते हैं। द्रास और बटालिक में कारगिल विजय दिवस से लेकर हर छोटे-बड़े आयोजन के दौरान पोलो मैच ज़रूर होता। यह पोलो आधुनिक पोलो से ही मिलता-जुलता है।
श्रद्धांजलि :- कारगिल युद्ध में इस देश की खातिर, इसके अमन-चैन की खातिर, इस तिरंगे की खातिर, हम सब की खातिर कितनी ही माँओं ने अपने बच्चे खोये, कितनी स्त्रियों ने अपने सुहाग, कितनी बहनों ने राखी बंधवाने वाली कलाइयां, पिताओं ने अपने कलेजे के टुकड़े खोये । अगर हम ही उनकी कुर्बानी को भुला बैठेंगे तो इससे बड़ी कृतघ्नता और क्या होगी ? उन्होनें इस महायज्ञ में अपनी आहुतियाँ इसलिए नहीं दी कि हम उसे धुंआ बनकर उड़ जाने दें और कहीं खो जाने दें। इसलिए हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हमें उन्हें उस खुली हवा में महसूस करें, जिसमें हम साँस लेते हैं, उन बहारों-फिजाओं में महसूस करें, जिनका हम आनंद लेते हैं, अपनी हर खुशी में महसूस करें, अपने हर जश्न में शरीक करें। यही इन वीरों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
“जो योद्धा लड़ाई के मैदान में प्राण विसर्जन करता है !
उसकी मृत्यु के लिए शोक नहीं करना चाहिए !
क्योंकि वह स्वर्ग में सम्मानित होता है ।“
– कारगिल युद्ध स्मारक, द्रास

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