लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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सिद्धार्थ शंकर गौतम  

चाल, चेहरा और चरित्र की नाव पर सवार भाजपा की हालत इन दिनों १९८० के दशक की जनता पार्टी की याद दिलाती है| कमजोर राष्ट्रीय नेतृत्व, कार्यकर्ताओं का गिरता मनोबल, सत्ता पक्ष के समक्ष विपक्ष की भूमिका के निर्वहन में कोताही बरतना व क्षेत्रीय क्षत्रपों का सियासी तांडव, भाजपा में अंदरखाने कुछ ठीक नहीं चल रहा| एक माह पूर्व नरेन्द्र मोदी-संजय जोशी विवाद, राजस्थान में वसुंधरा के बगावती तेवर, मध्यप्रदेश में नित बढ़ते भ्रष्टाचार के मामले अभी सुलझे भी नहीं थे कि कर्नाटक के नाटक ने पूरे देश में पार्टी की वैचारिक छवि पर कुठाराघात किया है| भाजपा को कार्यकार्ताओं की पार्टी कहने व समझने वाले भी क्षेत्रीय क्षत्रपों की सत्ता पिपासु प्रवृति देख आश्चर्यचकित हैं| खासकर दक्षिण भारत के किसी राज्य में पहली बार बनी भाजपा सरकार का यूँ अस्थिर हो जाना खुद पार्टी की मात्र संस्था संघ को भी नहीं सुहा रहा| कर्नाटक में २००८ में हुए विधानसभा चुनाव में येदुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा को दक्षिण में पहली बार सरकार बनाने का मौका दिया| हालांकि येदुरप्पा २००७ में भी थोड़े समय के लिए मुख्यमंत्री रहे थे किन्तु ३० मई २००८ को राज्य के २५वे मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद उनका राज्य इकाई में सिक्का चलने लगा था| भ्रष्टाचार तथा अवैध खनन के मुद्दे पर आलाकमान द्वारा इस्तीफ़ा मांगने व आरोपमुक्त होने के बाद पुनः पद प्राप्ति के आश्वासन पर उन्होंने अपने विश्वसनीय सदानंद गौड़ा को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनवा दिया| बस यहीं से कर्नाटक में ऐसा राजनीतिक तूफ़ान उठा जो आज तक थमने की राह देख रहा है| कर्नाटक में बहुसंख्यक लिंगायत समुदाय के एकमात्र कद्दावर नेता येदुरप्पा को राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा कई बार दरकिनार किए जाने से येदुरप्पा समेत उनके समर्थक भी नाराज हैं और अब किसी भी कीमत पर गौड़ा को बतौर मुख्यमंत्री बर्दाश्त नहीं करना चाहते|

ताजा घटनाक्रम में येदुरप्पा समर्थक ९ मंत्रियों ने बीते शुक्रवार मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को अपने इस्तीफे सौंप राज्य में नए सियासी नाटक की नींव रख दी थी| हालांकि संवैधानिक रूप से ये इस्तीफे उन्हें राज्यपाल को सौंपने चाहिए थे किन्तु मुख्यमंत्री को इस्तीफे सौंपना उनकी दबाव की राजनीति का हिस्सा था, जिसके आगे केंद्रीय नेतृत्व भी झुकता नज़र आया| ५ जुलाई तक राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की माँग पर अड़े ५० विधायकों की ओर से भी केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव बनाया जाना इस बात का द्योतक है कि येदुरप्पा आज भी कर्नाटक की राजनीति में निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ हैं और उन्हें चुनौती देना राज्य भाजपा इकाई के लेकर केंद्रीय नेतृत्व के बस से बाहर की बात है| सदानंद गौड़ा ने मुख्यमंत्री पदभार संभालने के बाद जिस तरह से येदुरप्पा को हाशिये पर पहुंचाने का कार्य किया उससे उन्होंने येदुरप्पा सहित उनके समर्थकों की नाराजगी मोल ले ली| येदुरप्पा समर्थक इससे पूर्व भी कई बार केंद्रीय नेतृत्व पर गौड़ा को पदच्युत करने का दबाव बना चुके थे किन्तु केंद्रीय नेतृत्व का जो होगा देखा जाएगा की तर्ज़ पर मूकदर्शक बनना आज राज्य में पार्टी की नींव को तो कमजोर कर ही गया है, राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी की छवि नकारात्मक बनती जा रही है|

येदुरप्पा के ही कट्टर समर्थक जगदीश शेटटार को राज्य की कमान सौंपने की जिद पर अड़े ये समर्थक पार्टी की कार्यकर्ता आधारित छवि को तोड़ उसे भी कांग्रेस की भांति एक सत्तात्मक व्यक्तिवादी पार्टी का चोला ओढ़ाना चाहते हैं जो संघ को कतई मंजूर नहीं है किन्तु येदुरप्पा की बढ़ी ताकत और उन्हें प्राप्त समर्थन से उसका अनुशासन का डंडा भी जोर नहीं मार रहा| इन परिस्थितियों में यह संभव है कि केंद्रीय नेतृत्व येदुरप्पा समर्थकों की बात मान जगदीश शेटटार को मुख्यमंत्री नियुक्त भी कर दे तो क्या यह परंपरा भाजपा में कुरीतियों को जन्म नहीं देगी? भाजपा शासित अन्य राज्यों से भी यदि इसी प्रकार का असंतोष उभरा तब केंद्रीय नेतृत्व क्या करेगा? क्या सभी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री बदलना इस संकट का समाधान होगा? कदापि नहीं| इसमें संशय नहीं कि येदुरप्पा कर्नाटक में अभूतपूर्व जनसमर्थन रखते हैं लेकिन इतने भर से उन्हें मनमानी करने की छूट नहीं दी जा सकती| कांग्रेस के नक़्शे-कदम पर चल रही भाजपा में यदि यही हाल रहा तो शासित राज्यों में हर वर्ष एक नए मुख्यमंत्री को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलवानी पड़ेगी| ऐसे में सुशासन व सुराज के पार्टी के दावे का क्या होगा? क्या भाजपा में नेतृत्व का संकट इतना गहरा गया है कि मामूली सा कार्यकर्ता सत्ता में आते ही खुद को सर्वेसर्वा मानने लगता है और अंदर ही अंदर पार्टी कमजोर होती है? जहां तक बात येदुरप्पा की है तो वे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे हैं| क्या वर्तमान में संघ के प्रचारक येदुरप्पा की भांति पद पिपासु हैं? मैंने तो एक भी ऐसा प्रचारक नहीं देखा जिसे पद की इतनी अधिक लालसा हो| आखिर येदुरप्पा किसके सामने और क्या आदर्श प्रस्तुत करना चाहते हैं?

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1 Comment on "कर्नाटक के नाटक में बेबस भाजपा नेतृत्व"

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डॉ. मधुसूदन
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येदुरप्पा की बात ना मानी जाए। अल्प कालिक हानि भले हो, सही जाए।
पर दीर्घ कालिक लाभ होगा।
सत्ता के लिए शॉर्ट कट ना लें। शॉर्ट कट भा ज पा को निगल जाएगा।
भले भा ज पा को सत्ता त्याग करना पडे, येदुरप्पा को बाहर का रास्ता दिखाया जाए।
भा ज पा से जनता की यही अपेक्षाएं हैं।

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