लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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LEAD Technologies Inc. V1.01डॉ. मयंक चतुर्वेदी

ये काश आज भारत की उस त्रासदी से जुड़ा है, जो भारत विभाजन की विभीषिका का स्याह पन्ना है। भारत का विभाजन हुआ यह सभी ने देखा, कहा जाता है कि नीयति ही उस दिन की ऐसी थी, पहले से सब कुछ तय था । पटकथा लिखी जा चुकी थी, परिवर्तन की संभावना शुन्य थी। लेकिन इतिहास तो ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब पूर्ण बेग विपरीत दिशा में था उसके बाद भी परिवर्तन संभव हो सके, जो कहीं वर्तमान में दिखाई नहीं देते थे।
भारत विभाजन का एक सच यह भी है, यदि उस समय देश को महात्मा गांधी के रूप में अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रतपति अब्राहम लिंकन मिले होते तो शायद यह देश खण्डा-खण्ड होने से बच जाता । दुनिया जानती है कि अमेरिका में गृहयु्द्ध किस चरम पर रहा है, किंतु लिंकन ने परिस्‍थ‍ियों को सतत प्रयास करते हुए राष्ट्राहित में अपने कब्जे में कर लिया था। वहीं दूसरी ओर इन परिस्‍थ‍ितियों से दो-चार होता कांग्रेस का भारतीय नेतृत्व था, जिसने देश का विभाजन इस भय से कि कलकत्ता के डारेक्ट एक्शन की तरह कहीं और ऐसा न हो विभाजन स्वीकार कर लिया, लेकिन परिणाम क्या हुआ ? वही जिस भय से यह विभाजन स्वीकार्य किया गया था। देश का विभाजन भी हो गया और लाखों लोगों को सम्‍पत्‍त‍ि , घर-द्वार यहां तक कि जानें तक गवांनी पड़ीं।
द्वि‍तीय विश्वह युद्ध के बाद अंग्रेजों का भारत छोड़कर जाना अपरिहार्य हो गया था, किंतु भारत विभाजन बिल्कुल अपरिहार्य नहीं था। यह तथ्य आज सभी को जानना चाहिए कि कराची में प्रवेश करते समय जिन्ना ने अपने ए.डी.सी. से क्या कहा। उसने कहा कि ‘मैंने कल्पंना तक नहीं की थी कि ऐसा होगा। मुझे आशा नहीं थी कि जीते जी पाकिस्ता‍न देख सकूंगा’
जब भारत पर पहला आक्रमण करने वाला सिकंदर 3 साल में विश्व विजय का अपना स्वप्न त्यागकर भारत से हार मानते हुए पलायन करने को विवश हो गया। जब उसके बाद कुषाण, बर्बर शक और हूण आए तो वे सभी हमेशा-हमेशा के लिए भारत के होकर यहां की संस्कृति के साथ आत्मसात हो सकते हैं तब बाद में आया इस्लाम जिससे कि लगातार 800 वर्षों से भारतीय मेधा और पौरुष संघर्ष कर रहा था, उसे क्यों नहीं यह भारतीय संस्कृति-धर्मध्वजा आत्मसात कर सकती थी। यदि इसका कोई उत्तर होगा तो वह यही होगा कि समय के साथ अवश्यं ही भारतीय संस्कृति में इस्लाम स्वयं को आत्मसात पाता, क्यों कि यही भारतीय धरा की खासीयत है। लेकिन अफसोस कि ऐसा हुआ नहीं।
इस्लाम का जहाजी बेड़ा सात समुद्रों को तो बेरोकटोक पार कर गया और अजेय रहा, पर जब वह हिन्दुस्तान पहुंचा तो गंगा के पानी में डूब गया था, किंतु उसे बाहर निकालने का कार्य जितना अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की नीति पर अमल करके किया, उससे ज्यादा कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं के बयानों, उनके निर्णयों और कई बार अनिर्णय की स्‍थ‍िति में बने रहने के कारण, यह जहाज गंगा में डूबने के बाद भी बाहर निकल आया।

हिन्दू और मुस्लिम दो अलग संस्कृतियां हैं ये कभी एक साथ नहीं रह सकती इसलिए दो धर्म, दो देश, दो निशान के आधार पर देश का बंटवारा होकर रहेगा, यह कहना और इस सिद्धांत के सामने नतमस्तक हो जाना तत्कालीन नेतृत्व की कौन सी समझदारी थी, यह बात पिछले 69 सालों में आज तक समझ नहीं आई है। कत्ल और विद्रोह के भय से यदि यह निर्णय लिया गया है तब तो यह निश्‍चित ही बहुत दुखान्त है। इसलिए यहां कहा जा रहा है कि इस देश को गांधी के रूप में लिंकन का नैतृत्व मिलना चाहिए था, जिसने कि गृहयुद्ध में अपने देश की अखण्डता बनाए रखने के लिए हजारो जीवन कुर्बान कर दिए लेकिन अमेरिका को खण्ड-खण्ड नहीं होने दिया।
यह बात इसलिए भी तर्कसंगत है, क्योंकि लाहौर में हुए 1929-30 के कांग्रेसी अधिवेशन में 31 दिसम्बर को रावी के तट पर जवाहरलाल नेहरू से अपनी अध्यक्षता में सभी कांग्रेस नेताओं के जरिए देश वासियों को पूर्ण स्वाधीनता की प्रतिज्ञा दिलाई थी। किंतु खेद का विषय है कि जिस रावी के तट पर यह प्रतिज्ञा ली गई, आजाद भारत में वह रावी नदी कहीं नहीं है। उस प्रतिज्ञा के कर्णधार महात्माह गांधी और पं. नेहरू यहां तक कि अन्य दिग्गज कांग्रेसी भी 14 अगस्त 1947 को ली गई अपनी ही पूर्व प्रतिज्ञा भूल गए।
1940 में जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान संबंधी प्रस्ताव स्वीकार्य किया था। इस मांग पर महात्मा गांधी ने हरिजन समाचार पत्र में कुछ इस तरह समय-समय पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। दो राष्ट्रों का सिद्धांत बेतुका है…जिन्हें ईश्वर ने एक बनाया है, उन्हें मनुष्य क्या कभी बांट सकेगा ?
इसी में अन्य एक जगह लिखा… बंटवारे का अर्थ है सच्चाई से मुंह मोड़ना । मेरी समुची आत्मा इस विचार से विद्रोह कर रही है। मेरे विचार से ऐसे सिद्धांतों को स्वीकार करना ईश्वर को नकारना है । मैं हर अहिंसात्मक उपाय से इसे रोकूंगा, क्योंकि इसका अर्थ है एक राष्ट्र के रूप में साथ-साथ रहने के लिए अनगिनत हिन्दू और मुसलमानों ने सदियों तक जो परिश्रम किया है, उस पर पानी फेर देना।
इससे इतर महात्मा गांधी का ही एक और उदाहरण लें, वे हरिजन में लिखते हैं और कई जगह अपने भाषणों में भी कोड करते हैं कि …..भारत का दो भागों में बंटवारा तो अराजकता से भी भयंकर है। इस अंग-भंग को सहन नहीं किया जा सकता। भारत के टुकड़े करने से पहले मेरे टुकड़े कर डालो।…….
कांग्रेस के एक अन्य लीडर डॉ.राजेन्द्र प्रसाद ने तत्कालीन समय 1945 में अपने कारावास के दौरान ‘इण्डिया डिवाइडेड’ नाम से पुस्तक लिखी थी, उन्होंने बड़े ही तार्किक ढंग से जिसमें कि भौगोलिक, आर्थि‍क, रक्षात्मक, सामाजिक, ऐतिहासिक सभी दृष्‍ट‍िकोण एवं विश्लेषण समाहित थे के माध्‍यम से यह बताया था कि किस तरह पाकिस्तान की मांग अव्यवहारिक है। लेकिन हुआ क्या वे दो साल बाद ही खंडित आजादी प्राप्त भारत के पहले राष्ट्रपति बने।
आज भारत के विभाजन के लिए किसे दोषी माना जाए ? तत्कालीन नेतृत्व को या अकेले महात्मा गांधी को जिनमें कि समुचा भारत अपनी पूर्ण निष्ठा‍ रखता था और जिनके अड़े रहने पर कभी देश विभाजि‍न होना संभव नहीं होता, भले ही आजादी 1 या 2 साल आगे मिलती।
जिन्ना और उस जमाने के मुस्लिम लीग के नेता सही कहते थे कि वे खुद नहीं समझ पा रहे हैं कि पाकिस्ता‍न हकीकत बन चुका है। हमारे लिए तो यह केवल सत्ता में अधिक हक पाने से ज्यादा कुछ नहीं था। काश, भारत का नेतृत्व सही निर्णय लेता ?
फिर भी आशा बलवती है। यदि हजारों वर्ष बाद भी दुनियाभर में फेले यहूदी अपना देश इजराइल पा सकते हैं और कई पीढ़ियों के गुजरजाने के पश्चात येरुशलम में मिल सकते हैं तो जरूर हम भारतीयों को अपनी आशा बनाए रखनी होगी। आज नहीं तो कल रावी का तट हमारा होगा। लव-कुश का लाहौर और हिन्दुएकुश पर्वत भी वृहद भारत होगा। अखण्ड भारत दिवास्वप्न नहीं, भविष्य के गर्त में छिपा हमारा संकल्प है, जो आज नहीं तो कल साकार रूप अवश्य लेगा, क्योंकि यदि भारत का विभाजन एक त्रासद नीयति थी तो उसका समापन एक सुखद भविष्य है। यही है हमारी पीढ़ि‍यों की जि‍जीविषा का सत्य, परम सत्य‍, सुखद अनुभूति से पूर्ण सत्य ।
इति शुभम्

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