लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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-डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री-
article 370

जम्मू कश्मीर में जब भी चुनाव होते हैं तो संघीय संविधान के अनुच्छेद ३७० का प्रश्न सदा प्रमुख रहता है। चुनाव चाहे लोक सभा के हों या विधान सभा के, अनुच्छेद ३७० का मुद्दा कभी ग़ायब नहीं होता। जम्मू और लद्दाख के लोगों ने तो इस अनुच्छेद को हटाने के लिये १९४८ से लेकर १९५३ तक प्रजा परिषद के झंडे तले एक लम्बी लड़ाई भी लड़ी थी जिसमें १५ लोग पुलिस की गोलियों से शहीद हो गये थे। अभी तक भी प्रजा परिषद आन्दोलन की विरासत समाप्त नहीं हुई बल्कि दिन प्रतिदिन और भी घनीभूत होती गई । लेकिन इस बार के चुनावों में अनुच्छेद ३७० को लेकर चर्चा एक नये रुप में हो रही थी । इस बार चुनावों के दौरान मुख्य मुद्दा यह था कि अनुच्छेद ३७० को लेकर बिना किसी पूर्वाग्रह के आम जनता में बहस होनी चाहिये कि इस अनुच्छेद से राज्य की आम जनता को क्या कोई लाभ हो रहा है या फिर यह वहाँ के निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा आम आदमी के शोषण के लिये हथियार के रुप में इस्तेमाल की जा रही है ?

लेकिन सोनिया कांग्रेस समेत राज्य की प्रमुख शासक पार्टी,अब्दुल्ला परिवार की नेशनल कान्फ्रेंस, इस बहस से बचती रही। उसने अत्यन्त शातिराना तरीक़े से बहस को इस दिशा में मोड़ना चाहा कि सीधे सीधे इस बात पर बहस की जाये की अनुच्छेद ३७० को हटाया जाना चाहिये या नहीं ? इस विषय पर उस ने अपना स्टैंड भी स्पष्ट कर दिया कि अनुच्छेद ३७० को हटाने की अनुमति नहीं दी जायेगी। इतना ही नहीं नेशनल कान्फ्रेंस का मालिक अब्दुल्ला परिवार इस सीमा तक आगे बढ़ा कि उसने सार्वजनिक रुप से घोषणा कर दी कि अनुच्छेद ३७० के हटाये जाने की स्थिति में जम्मू कश्मीर भारत का अंग नहीं रहेगा। यह नैशनल कान्फ्रेंस का घोषित स्टैंड रहा। उसने अपने चुनाव प्रचार को इसी के इर्द गिर्द केन्द्रित रखा। नेशनल कान्फ्रेंस इतना तो जानती ही थी कि अपने इस स्टैंड को पूरा करने के लिये उसे राज्य की जनता का समर्थन चाहिये। राज्य में जन समर्थन प्राप्त करने के लिये नेशनल कान्फ्रेंस ने अपने सहयोगी दल सोनिया कांग्रेस के साथ मिल कर राज्य की छह सीटों के लिये प्रत्याशी खड़े किये। जम्मू, उधमपुर और लद्दाख सीट पर सोनिया कांग्रेस के प्रत्याशी खड़े थे और कश्मीर घाटी की तीन सीटों श्रीनगर,बारामुला और अनन्तनाग के लिये नैशनल कान्फ्रेंस के प्रत्याशी मैदान में थे । लेकिन राज्य की जनता ने नेशनल कान्फ्रेंस और सोनिया कांग्रेस द्वारा उठाये प्रश्न का उत्तर एकमुश्त दे दिया। नेशनल कान्फ्रेंस और सोनिया कान्ग्रेस दोनों के सभी प्रत्याशी पराजित हो गये। राज्य से लोक सभा की छह सीटों में से तीन सीटें भारतीय जनता पार्टी ने और तीन पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने जीत लीं।

स्वाभाविक रूप से जनप्रतिनिधि के नाते डॉ जितेन्द्र सिंह ने अनुच्छेद ३७० से राज्य को मिल रही लाभ हानि को परख लेने की बात कही। जैसा अब्दुल्ला परिवार कह रहा है कि इस अनुच्छेद को रहना ही चाहिये, उस के लिये भी आखिर यह देखना तो जरुरी है कि इससे राज्य के लोगों को फ़ायदा भी मिल रहा है या फिर इस का फ़ायदा केवल अब्दुल्ला परिवार या उन की जुंडली के लोग ही उठा रहे हैं ? यदि यह पता चल जाये कि सचमुच इससे रियासत के लोगों को फ़ायदा मिल रहा है, फिर तो इसे रखा ही जाना चाहिये। लेकिन यदि यह पता चल गया कि आम लोगों को तो कोई फ़ायदा नहीं मिल रहा अलबत्ता अब्दुल्ला ख़ानदान के लिये यह अनुच्छेद धन कुबेर साबित हो रहा है तो फिर रियासत के लोग ही उनसे सवाल करना शुरु कर देंगे कि इस अनुच्छेद को क्यों बरक़रार रखा जाये ? ज़ाहिर है कि इस ख़ानदान के लिये तब जनता के इस प्रश्न का जबाव देना मुश्किल हो जायेगा। इसे देखते हुये राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मूल प्रश्न का सामना करने से बचने के लिये चीं चीं (ट्वीट शब्द का हिन्दी अनुवाद यही सकता है) करना शुरू कर दिया कि “मेरी इस बात को नोट कर लिया जाये और मेरी इस चीं चीं को भी सुरक्षित कर लिया जाये । जब मोदी सरकार केवल भविष्य की स्मृतियों में सुरक्षित रह जायेगी, तब या तो जम्मू कश्मीर भारत का अंग नहीं होगा या अनुच्छेद ३७० का अस्तित्व बचा हुआ होगा। इन दोनों में से एक ही स्थिति रहेगी। भारत और जम्मू कश्मीर के बीच अनुच्छेद ३७० ही सांविधानिक सेतु है।”

जितेन्द्र सिंह तो अनुच्छेद ३७० की लोक उपादेयता पर सकारात्मक बहस चला कर राज्य में जन सशक्तिकरण की बात कर रहे हैं लेकिन उमर अब्दुल्ला उससे घबरा कर मरघट की धुनें बजा रहा है । जो व्यक्ति और पार्टी आम जनता की भावनाओं और उसकी धडकनों से कट कर महलों में क़ैद हो जाती है उसका व्यवहार इसी प्रकार का होने लगता है । इन चुनावों में अब्दुल्ला परिवार और उनकी पार्टी के हश्र ने इसको सिद्ध कर दिया है। इस प्रश्न पर चर्चा करना जरुरी है कि क्या अनुच्छेद ३७० का जम्मू कश्मीर के भारत का अंग होने या न होने से कोई सम्बंध है ? बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि रियासतें वहाँ के महाराजाओं द्वारा अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर देने के बाद भारत का हिस्सा बनीं । दरअसल यह अवधारणा ही अपने आप में ग़लत है और इसी के कारण कालान्तर में अनेक भ्रम पैदा हुये । इन रियासतों को तो कहा ही भारतीय रियासतें या अंग्रेज़ी भाषा में इंडियन स्टेटस जाता था । अब ऐसा तो नहीं माना जा सकता कि भारतीय रियासत भारत का हिस्सा नहीं था । दरअसल जब अंग्रेज़ भारत में आये तो देश के बहुत से हिस्से पर अलग अलग महाराजाओं का शासन था और कुछ हिस्से पर मुग़ल वंश का शासन था । अंग्रेज़ों ने अनेक रियासतों के महाराजाओं को अपदस्थ करके वहाँ अपना शासन स्थापित कर लिया । देश के जिन हिस्सों पर अंग्रेज़ों का शासन स्थापित हो गया वह ब्रिटिश इंडिया कहा जाने लगा और शेष बची रियासतें भारतीय रियासतें कहलातीं थीं । ब्रिटिश इंडिया और भारतीय रियासतों में एक अन्तर तो बहुत ही स्पष्ट था कि एक में विदेशी शासक थे और भारतीय रियासतें स्वदेशी शासन का प्रतीक थीं ।

१९४७ में अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद भारत का वह हिस्सा जो ब्रिटिश इंडिया कहलाता था दो भागों में बँट गया । एक भाग भारतीय डोमीनियन के नाम से और दूसरा पाकिस्तान डोमिनियन के नाम जाना गया । पाकिस्तान डोमीनियन भारत से अलग हो गया । भारत डोमीनियन जल्दी ही गणतन्त्र बनने वाला था , इसलिये उसके लिये एक ठीक लोकतांत्रिक संविधान बनाने की जरुरत थी । लेकिन रियासतों के लोग भी छटपटा रहे थे कि वहाँ भी राजशाही समाप्त करके देश के शेष हिस्सों की तरह लोकतांत्रिक शासन पद्धति की व्यवस्था की जाये। यदि केवल इंडिया डोमीनियन के लिये ही नहीं बल्कि भारतीय रियासतों के लिये भी एक लोकतांत्रिक संविधान को , या उसके कुछ हिस्सों को, लागू किया जाना जरुरी था तो लाज़िमी था कि इंडिया डोमीनियन के लिये संविधान बना रही संविधान सभा का भी विस्तार किया जाये । लेकिन इसके लिये रियासतों के राजाओं का सहमत होना अनिवार्य था । इस हेतु भारतीय रियासतों के महाराजाओं ने भारत डोमीनियन की सरकार के रियासती मंत्रालय द्वारा तैयार किये गये अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किये। इससे स्पष्ट है कि भारतीय रियासतों के महाराजाओं द्वारा अधिमलन पत्र पर हस्ताक्षर का अभिप्राय रियासतों का भारत में शामिल होना नहीं था, क्योंकि अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर देने से पूर्व भी ये रियासतें भारत का ही हिस्सा थीं । अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर का अर्थ केवल इतना ही था कि भारत के विभिन्न हिस्सों में चल रही अलग अलग शासन प्रणालियों को समाप्त कर एकसमान सांविधानिक शासन व्यवस्था को सभी हिस्सों पर समान रुप से लागू करना था ।
अत स्पष्ट है कि जम्मू कश्मीर १९४७ में रियासत के महाराजा हरि सिंह द्वारा अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करने से पहले भी भारत का ही अंग था । अन्तर केवल इतना था कि वहाँ की प्रशासन प्रणाली ब्रिटिश भारत की प्रशासन प्रणाली से अलग थी । अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद जब सारे भारत में विभिन्न प्रशासनिक प्रणालियाँ समाप्त करके एक संघीय प्रशासनिक प्रणाली लागू करने की बात आई तो महाराजा हरि सिंह ने भी उसमें अपनी सहमति जताई और अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किये । इसका जम्मू कश्मीर के भारत का अंग होने या न होने से क्या ताल्लुक़ है ? देश के लिये जो नई सांविधानिक व्यवस्था की गई उसमें एक अस्थायी अनुच्छेद ३७०वां शामिल किया गया । यह अनुच्छेद राज्य में संघीय संविधान लागू करने की पद्धति का वर्णन करता है । प्रश्न पूछा जा सकता है कि इस राज्य के लिये अलग से पद्धति निर्धारित करने की जरुरत क्यों पड़ी ? दरअसल जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान द्वारा आक्रमण कर दिये जाने के कारण वहाँ स्थिति असाधारण हो गई थी । इसलिये उस असाधारण परिस्थिति से निपटने के लिये इस अनुच्छेद को संघीय संविधान में शामिल करना जरुरी था ।

अब्दुल्ला परिवार का कहना है कि अनुच्छेद ३७० के हटने से राज्य भारत का अंग नहीं रहेगा । एक काल्पनिक प्रश्न है । लेकिन जम्मू कश्मीर को समझने के लिये इस काल्पनिक प्रश्न को समझ लेना और भी जरुरी है । मान लीजिये किसी दिन जम्मू कश्मीर की विधान सभा यह प्रस्ताव करती है कि अनुच्छेद ३७० को हटा देना चाहिये । जम्मू कश्मीर विधान सभा की इस सिफ़ारिश को संसद स्वीकार कर लेती है और अनुच्छेद ३७० को निरस्त कर देती है । ऐसी स्थिति में अब्दुल्ला परिवार के लोग क्या कहेंगे कि जम्मू कश्मीर का भारत से सम्बंध टूट गया है और अब वह भारत का अंग नहीं है ?

इसी प्रकार की एक और काल्पनिक स्थिति की कल्पना कीजिए । मान लीजिए अब्दुल्ला परिवार ने अनुच्छेद ३७० की पृष्ठभूमि पढ़ कर और वर्तमान सांविधानिक स्थिति का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि इसे किसी भी तरीक़े से निरस्त नहीं किया जा सकता । अब संसद इसे संविधान में संशोधन कर समाप्त कर देती है । तब अब्दुल्ला परिवार इस को चुनौती देने के लिये उच्चतम न्यायालय में जा सकता है और यदि न्यायालय को लगेगा कि यह संविधान संशोधन विधि सम्मत नहीं है तो वह इसे अमान्य कर देगा । लेकिन इन सभी परिस्थितियों में जम्मू कश्मीर के भारत से अलग होने की बात कहाँ आती है ? अब्दुल्ला परिवार एक जुमला बार बार उछालता रहता है कि जम्मू कश्मीर रियासत का भारत में एक्सेशन हुआ है मर्जर नहीं । अंग्रेज़ी शब्द एक्सेशन का हिन्दी अनुवाद अधिमिलन है और मर्जर का अर्थ विलय है । जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है कि एक्सेशन या अधिमिलन से अभिप्राय भारत की दो विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों द्वारा एक समान प्रशासनिक व्यवस्था हेतु परस्पर सहमति देना है । इसके लिये एक इकाई का शासक प्रस्तावक था और दूसरी इकाई का शासक गवर्नर जनरल उस प्रस्ताव को स्वीकार करने वाला था । इस प्रकार १९४७-१९४८ में पाँच सौ से भी ज़्यादा भारतीय रियासतों का भारत डोमीनियन में एक समान प्रशासनिक व्यवस्था की कामना से अधिमिलन हुआ । लेकिन इनमें से अनेक प्रशासनिक इकाइयाँ या देशी रियासतें बहुत छोटी थीं , इसलिये बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था के लिये उनका आपस में या नज़दीक़ के प्रान्त में विलय किया गया । यह मोटे तौर पर उनकी सहमति से ही किया गया । जम्मू कश्मीर क्योंकि पहले ही क्षेत्रफल की दृष्टि से काफ़ी बड़ी प्रशासनिक इकाई थी ,इसलिये उसके किसी दूसरी इकाई में विलय की जरुरत ही नहीं थी । यद्यपि १९४७-४८ में राज्य के अनेक हिस्सों से माँग आती रहती थी कि उनका विलय साथ की प्रशासनिक इकाइयों में कर दिया जाये । लद्दाख के लोग पड़ोसी पूर्वी पंजाब (उन दिनों लद्दाख का पड़ोसी ज़िला लाहुल स्पिति पूर्वी पंजाब का हिस्सा होता था) की प्रशासनिक इकाई में विलय चाहते थे । इसी प्रकार जम्मू के लोग पूर्वी पंजाब के पठानकोट और काँगड़ा ज़िला (काँगड़ा ज़िला उन दिनों पूर्वी पंजाब में होता था) को मिला कर डुग्गर प्रदेश के नाम से एक और प्रशासनिक इकाई का गठन चाहते थे । लेकिन भारत की विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में विलय देश की आन्तरिक प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है उसका भारत के किसी भू भाग का भारत से अलग हो जाने से कोई ताल्लुक़ नहीं है । पर अब्दुल्ला परिवार विलय और अधिमिलन , दोनों ही शब्दों की जानबूझकर कर ग़लत व्याख्या करता है । यह व्याख्या शेख़ अब्दुल्ला के समय से शुरू हो गई थी जो उमर अब्दुल्ला तक बदस्तूर जारी है ।
दरअसल अब्दुल्ला परिवार ने नेहरु की कृपा से रियासत की सत्ता अलोकतांत्रिक तरीक़े से संभालने के तुरन्त बाद ब्रिटिश और अमेरिका के मालिकों से ट्यूशन लेना शुरु कर दिया था । उन मालिकों ने इस परिवार को अनेक अंग्रेज़ी शब्दों की जो व्याख्याएँ सिखा दी , आज तक वे उसी की जुगाली कर रहे हैं । यदि वे थोड़ी कश्मीरी और डोगरी भाषा की ट्यूशन भी किसी देशी विद्वान से ले लेते तो उन्हें अपने आप समझ आ जाता कि कि अनुच्छेद ३७० का रियासत के भारत का अंग होने या न होने से कोई नाता नहीं है । इस बार रियासत की जनता ने कोशिश तो की कि यह परिवार थोड़ी कश्मीरी भी सीख ले लेकिन हार के बाद भी यह पार्टी अमेरिकी प्रभुओं के पढ़ाये पाठ को भूलने को तैयार नहीं है ।

अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हुये वे एक और हास्यस्पद बात कहते हैं जिसे सुन कर विश्वास नहीं होता कि वे सचमुच ऐसा मानते होंगे । क्योंकि इस प्रकार की बातों से उनकी छवि भी राहुल गान्धी की पप्पू नुमा छवि में तबदील होने लगती है। उमर साहिब का कहना है कि अनुच्छेद ३७० के बारे में कोई फ़ैसला तो राज्य की संविधान सभा ही कर सकती थी अब क्योंकि वह सभा अपनी उम्र भोग कर मर चुकी है इसलिये अब अनुच्छेद ३७० अमर हो गया है। यानि बाप मरने से पहले जो लिख गया था अब उसको हाथ नहीं लगाया जा सकता क्योंकि उसमें हेर फेर का अधिकार तो बाप को ही था । अब वह नहीं रहा तो अनुच्छेद ३७० भी अमर हो गया । यह सोच ही अपने आप में सेमेटिक सोच है । उमर अब्दुल्ला को जान लेना चाहिये कि यह बात “आतिशे चिनार” के बारे में तो सच हो सकती है अनुच्छेद ३७० के बारे में नहीं । जम्मू कश्मीर राज्य की संविधान सभा, जिन दिनों ज़िन्दा भी थी, उन दिनों भी वह संविधान सभा के साथ साथ राज्य की विधान सभा का काम भी करती थी और इसी प्रकार भारत की संविधान सभा भी संविधान सभा होने के साथ साथ संसद का काम भी करती थी। जम्मू कश्मीर की विधान सभा ,उसी राज्य संविधान सभा की वारिस है और इसी प्रकार भारत की संसद उस संघीय संविधान सभा की वारिस है। अनुच्छेद ३७० को विधि द्वारा संस्थापित भारत की संसद और राज्य की विधान सभा सांविधानिक तरीक़े से बदल सकती है । डॉ जितेन्द्र सिंह इसी विषय पर बहस करने की बात कह रहे हैं, जिसे सुन कर अब्दुल्ला परिवार झाग उगल रहा है।

फ़िलहाल अनुच्छेद ३७० को हटाने की बात तो कोई कर ही नहीं रहा। देश के बुद्धिजीवी वर्ग, विधि विशारदों और संविधान विशेषज्ञों में इस बात को लेकर बहस छिड़ी है कि अनुच्छेद ३७० से जम्मू कश्मीर के आम लोगों को कोई लाभ भी है या उलटा इससे उनको नुक़सान हो रहा है और उनको अनेक सांविधानिक अधिकारों से बंचित किया जा रहा है ? किसी भी सांविधानिक व्यवस्था की श्रेष्ठता की अंतिम कसौटी बहुजन हिताय बहुजन सुखाय ही है। विशिष्ट जन हिताय विशिष्ट जन सुखाय नहीं हो सकती। कौन सी व्यवस्था बहुजन हिताय है इसका निर्णय भी लोकतंत्र में जनता ही करती है। अब्दुल्ला परिवार की चिन्ता इस बात को लेकर है यह बहस अब कश्मीर की विभिन्न घाटियों यथा श्रीनगर घाटी, गुरेज़ घाटी और लोलाब घाटी तक में होने लगी है और इसके पक्ष -विपक्ष दोनों अखाड़ों में बहस केन्द्रित हो रही है। नेशनल कान्फ्रेंस इस प्रश्न पर किसी भी ढंग से बहस को रोकना चाहती है क्योंकि इससे पहल जम्मू कश्मीर की आम जनता के हाथ आ जायेगी। अब्दुल्ला परिवार किसी भी स्थिति में यह पहल जनता के पास नहीं देना चाहता क्योंकि यदि ऐसा हो गया तो वह ख़ुद घाटी में अप्रासंगिक हो जायेगा। भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में स्पष्ट किया है कि पार्टी अनुच्छेद ३७० को समाप्त किये जाने के लिये बचनवद्ध है और इसके लिये वह सभी सम्बंधित पक्षों से बातचीत करेगी । इतनी स्पष्ट बचनबद्धता के बावजूद पार्टी ने लोकतांत्रिक परम्पराओं के अनुरूप इस विषय पर बहस, बातचीत और आपसी संवाद को ही प्रोत्साहित किया जिसका स्वागत किया जाना चाहिये ।

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