लेखक परिचय

डॉ नीलम महेन्द्रा

डॉ नीलम महेन्द्रा

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

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26 जुलाई 2017, 18 वाँ कारगिल विजय दिवस
वो विजय जिसका मूल्य वीरों के रक्त से चुकाया गया,
वो दिवस जिसमें देश के हर नागरिक की आँखें विजय की खुशी से अधिक हमारे  सैनिकों की शहादत के लिए सम्मान में नम होती हैं ।
1999 के बाद से भारतीय इतिहास में जुलाई का महीना हम भारतीयों के लिए कभी भी केवल एक महीना नहीं रहा  और इस महीने की 26 ता० कभी अकेली नहीं आई।
26 जुलाई की तारीख़ अपने साथ हमेशा भावनाओं का सैलाब लेकर आती है।
गर्व का भाव उस विजय पर जो हमारी सेनाओं ने हासिल की थी
श्रद्धा का भाव उन अमर शहीदों के लिए जिन्होंने तिरंगे की शान में हँसते हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दी
आक्रोश का भाव उस दुश्मन के लिए जो अनेकों समझौतों के बावजूद 1947 से आज तक तीन बार हमारी पीठ में छुरा घोंप चुका है।
क्रोध का भाव उस स्वार्थी राजनीति, सत्ता और सिस्टम के लिए जिसका खून अपने ही देश के जवान बेटों की  बली के बावजूद नहीं खौलता कि इस समस्या का कोई ठोस हल नहीं निकाल सकें।
बेबसी का भाव उस अनेक अनुत्तरित प्रश्नों से मचलते ह्रदय के लिए कि क्यों आज तक हम अपनी सीमाओं और अपने सैनिकों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हो पाए ?
उस माँ के सामने असहाय होने का भाव जिसने अपने जवान बेटे को तिरंगे में देख कर भी आँसू रोक लिए क्योंकि उसे अपने बेटे पर अभिमान था कि वह अमर हो गया
उस पिता के लिए निशब्दता और निर्वात का भाव जो अपने भीतर के खालीपन को  लगातार देशाभिमान और गर्व से भरने की कोशिश करता है।
उस पत्नी से क्षमा का भाव जिसके घूँघट में छिपी आँसुओं से भीगी आँखों से आँख मिलाने की हिम्मत  आज किसी भी वीर में नहीं।
26 जुलाई अपने साथ यादें लेकर आती है टाइगर हिल,  तोलोलिंग, पिम्पल काम्पलेक्स जैसी पहाड़ियों की।
कानों में गूँजते  हैं कैप्टन सौरभ कालिया, विक्रम बत्रा,मनोज पाण्डे,संजय कुमार जैसे नाम जिनके बलिदान के आगे नतमस्तक है यह देश।
12 मई 1999 को एक बार फिर वो हुआ जिसकी अपेक्षा नहीं थी
दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्रों में लड़ी गई थी वो जंग
160 किमी के कारगिल क्षेत्र एलओसी पर चला था वो युद्ध
30000 भारतीय सैनिकों ने दुश्मन से लोहा लिया
527 सैनिक व सैन्य अधिकारी शहीद हुए
1363 से अधिक घायल हुए
18000 ऊँची पहाड़ी पर 76 दिनों तक चलने वाला यह युद्ध भले ही 26 जुलाई 1999 को  भारत की विजय की घोषणा के साथ समाप्त हो गया लेकिन पूरा देश उन वीर सपूतों का ॠणी हो गया जिनमें से अधिकतर 30 वर्ष के भी नहीं थे।
” मैं या तो विजय के बाद भारत का तिरंगा लहरा के आऊँगा या फिर उसी तिरंगे में लिपटा
आऊँगा ”  शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा के यह शब्द इस देश के हर युवा के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
कारगिल का  पाइन्ट 4875 अब विक्रम बत्रा टाप नाम से जाना जाता है जो कि उनकी वीरता की कहानी कहता है।
और 76 दिन के संघर्ष के बाद जो तिरंगा कारगिल की सबसे ऊँची चोटी पर फहराया गया था वो ऐसे ही अनेक नामों की विजय गाथा है।
स्वतंत्रता का  जश्न वो पल लेकर आता है जिसमें कुछ पाने की खुशी से अधिक बहुत कुछ खो देने से उपजे खालीपन का एहसास भी होता है।
लेकिन इस विजय के 18 सालों बाद आज फिर कश्मीर सुलग रहा है।
आज भी कभी हमारे सैनिक सीमा रेखा पर तो कभी कश्मीर की वादियों में दुश्मन की ज्यादतियों के शिकार हो रहे हैं।
युद्ध में देश की आन बान और शान के लिए वीरगति को प्राप्त होना एक सैनिक के लिए गर्व का विषय है लेकिन बिना युद्ध के कभी सोते हुए सैनिकों के कैंप पर हमला तो कभी आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान अपने ही देशवासियों के हाथों पत्थरबाजी का शिकार होना कहाँ तक उचित है?
अभी हाल ही के ताजा घटनाक्रम में जम्मू कश्मीर पुलिस के डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को शब ए कद्र के जुलूस के दौरान भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला।
इससे पहले 10 मई 2017 को मात्र 23 वर्ष के आर्मी  लेफ्टिनेन्ट उमर फैयाज़ की शोपियाँ में आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी जब वे छुट्टियों में अपने घर आए थे, अभी छ महीने पहले ही वे सेना में भर्ती हुए थे।
इस प्रकार की घटनाओं से पूरे देश में आक्रोश है।
हमारे देश की सीमाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारे सैनिकों की है जिसे वे बखूबी निभाते भी हैं लेकिन हमारे सैनिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी सरकार की है।
हमारी सरकारें चाहे केंद्र की हो चाहे राज्य की , क्या वे अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं?
अगर हाँ तो हमारे सैनिक देश की सीमाओं के भीतर ही वीरगति को क्यों प्राप्त हो रहे हैं?
क्या सरकार की जिम्मेदारी खेद व्यक्त कर देने और पीड़ित परिवार को मुआवजा देने भर से समाप्त हो जाती है?
कब तक बेकसूर लोगों की बली ली जाती रहेगी?
समय आ गया है कि कश्मीर में चल रहे इस छद्म युद्ध का पटाक्षेप हो।
सालों से सुलगते कश्मीर को अब एक स्थायी हल के द्वारा शांति की तलाश है।
जिस दिन कश्मीर की वादियाँ फिर से केसर की खेती से लहलहाते हुए खेतों से  खिलखिलाएँगी, जिस दिन कश्मीर के  बच्चों के हाथों में पत्थर नहीं लैपटॉप होंगे और कश्मीर का युवा वहाँ के पर्यटन उद्योग की नींव मजबूत करने में अपना योगदान देकर स्वयं को देश की मुख्य धारा से जोड़ेगा उस दिन कारगिल शहीदों को हमारे देश की ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
डॉ नीलम महेंद्र

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