लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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( पूर्वांचल मीडिया ब्यूरो चीफ : डा. राधेश्याम द्विवेदी )
POKकश्मीर की समस्या:- कहा जा रहा है कि कश्मीर की समस्या राजनीतिक है, और हमें इसका राजनीतिक ही ढूंढ़ना होगा। लेकिन यह समस्या, जो कभी राजनीतिक थी, अब राजनीतिक नहीं है। भारत में औपचारिक विलय से पहले यह रियासत कश्मीरियत के रूप में मानक पंथनिरपेक्षता का प्रतीक था। साल 1947-48 में पाकिस्तान की ओर से किए गए आतंकी और कबायली हमलों से उपजे भय का परिणाम था कि भारत के साथ उनका विलय हुआ। कश्मीर की समस्या साल 1949-65 के बीच विशुद्ध तौर पर ‘कूटनीतिक’ रही जिसमें मामला संयुक्त राष्ट्र में जा पहुंचा।साल 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक और युद्ध के बाद से अगले पंद्रह सालों तक कश्मीर में राजनीतिक सत्ता के लिए साजिशें हुर्इं, जिसमें मोहरे और नारे बदलते चले गए। इस दौर में कश्मीर की समस्या ‘राजनीतिक’ ही थी, जब लोकतांत्रिक सरकार से की गई अपेक्षा राज्य के कुप्रबंधन और अस्थिरता में ढल गई थी। 1990 के दशक में लोगों में नाराजगी का अलगाववादी कुनबे ने भरपूर इस्तेमाल किया, जिसका परिणाम हुआ कि कश्मीर की कश्मीरियत मुस्लिम बहुमत पर आधारित धार्मिक पहचान के रूप में परिभाषित हुई और भारत के विचार को विफल साबित करने के लिए द्विराष्ट्रवादी पाकिस्तानी परियोजना परवान चढ़ने लगी।
आईएस के इस्लामिक स्टेट से अलगाववाद की प्रेरणा:-साल 1989 में कश्मीर घाटी ने कश्मीरियत को लगभग त्याग दिया, जब कश्मीरी पंड़ितों को पूरे जनसमाज ने लगभग एकमत से जबरन निकाल दिया। जाहिर है कश्मीर द्विराष्ट्रवाद का पाकिस्तान समर्थित प्रतीक बन गया और पाकिस्तान, निर्विवाद न सही, लेकिन कश्मीर के राजनीतिक समाधान के लिए अलगाववादियों की पसंद बन गया। लेकिन साल 2010 आते-आते कश्मीर में पाकिस्तानी झंड़े थामने वाले हाथों ने आईएस के झंड़े उठाने शुरू कर दिए। इस प्रकार कश्मीरियत द्विराष्ट्रवाद की अवधारणा से निकलकर जेहादी इस्लाम की दिशा में बढ़ गया। ऐसा इसलिए होता चला गया क्योंकि कश्मीर का मसला न तो कूटनीतिक स्तर पर आगे बढ़ सका, न ही राजनीतिक समाधान और नेतृत्व राज्य को विकास की दिशा में आगे ले जा सके। उधर, पाकिस्तान की धर्म के आधार पर कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए आतंकवाद को नैतिक-अनैतिक समर्थन की रणनीति कोई सफलता हासिल नहीं कर पाई। मौजूदा दौर कश्मीर में अलगाववाद की नई प्रेरणा आईएस के इस्लामिक स्टेट से आई है, लेकिन आंतरिक प्रेरणा जेएनयू जैसे संस्थानों में ‘बुरहान वाली आजादी’ से लेकर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारों को कथित छद्म सेकुलर समूह के समर्थन से मिली है। हां, एक और बदलाव है कि जम्मू-कश्मीर में पहली बार भाजपा की कथित तौर पर अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाली पीडीपी के साथ सरकार में साझेदार है।कश्मीर घाटी के अलगाववादियों में निराशा की एक बड़ी वजह यह भी है कि महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी-बीजेपी सरकार ने राज्य में सैनिक कॉलोनी और पंड़ितों की कॉलोनी को लेकर चर्चा शुरू की। यही कारण है कि कश्मीर घाटी में मौजूदा संकट ‘एंटी इंडिया’ से आगे बढ़कर ‘एंटी हिंदु’ भी होने लगा है।
राज्यसभा में चर्चा पर भाजपा सांसद का अलग ही सवाल:-आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में जारी हिंसा पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाते हुए पूरी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। गुलाम नबी के एक के बाद एक आरोपों से बैकफुट पर नजर आ रही सरकार की तरफ से मोर्चा संभाला जम्मू कश्मीर से भाजपा सांसद शमशेर सिंह मिन्हास ने। उन्होंने इस पूरी बहस पर ही यह कहते हुए सवाल खड़ा कर दिया कि जब जम्मू कश्मीर की बात की जाती है तो जम्मू और लद्दाख के लोगों को क्यों भुला दिया जाता है। कश्मीर से ज्यादा आबादी जम्मू और लद्दाख में निवास करती है उनकी चर्चा क्यों नहीं होती? उनके हितों की बात क्यों नहीं होती? राज्य के 55 फीसदी लोग जम्मू रीजन में बसते हैं इनमें से सात लाख युवा विभिन्न डिग्रियां लेकर भी बेरोजगार बैठे हैं क्या वे गन नहीं उठा सकते या वो भी आजादी का नारा नहीं दे सकते। नहीं, वे लोग आज भी अपने देश के साथ हैं। मिन्हास ने गुलाम की उस बात पर भी सवाल खड़ा कर दिया जिसमें उन्होंने कहा कि कश्मीर की लड़ाई युवाओं की बेरोजगारी से जुड़ी है। उन्होंने कहा कश्मीर की लड़ाई राष्ट्रवाद बनाम अलगाववाद की है। यहां की असल समस्या बेरोजगारी नहीं पढ़े लिखे युवाओं को बरगलाने की है। जिन लोगों को लगता है कि कश्मीर के लोगों का भारत में विश्वास नहीं है। या ये कहना कि कश्मीर के सारे लोग आतंकी वारदातों में शामिल हैं, वो गलत हैं। अगर ऐसा होता तो कश्मीर के लोग चुनावों में 60 फीसदी मतदान नहीं करते। लोगों की लोकतंत्र में आस्था थी इसलिए वो वोट देने के लिए घरों से निकले। उन्होंने कहा जब पूरा देश गुलामी की बेडियों में जकड़ा हुआ था तब भी कश्मीर गुलाम नहीं था। आज हम छुआछूत का मुद्दा उठाते हैं सबसे पहले कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने एक दलित को मंदिर में ले जाकर कहा था कि ये मेरे साथ पूजा करेगा। जब मंदिर के पुजारी ने कहा कि मैं इसे पूजा नहीं करने दूंगा तो महाराजा हरि सिंह ने कहा कि मैं तुम्हे उठाकर बाहर कर सकता हूं इस दलित को नहीं।
अलगाववादी कटघरे में:-शमशेर सिंह मिन्हास ने गुलाम नबी आजाद से मुखातिब होते हुए कहा कि वे जानते होंगे की यह लड़ाई एक छोटे से खित्ते में है। अलगाववादी नेताओं से एक बार तो पूछा जाए कि जिन बच्चों के हाथों में लैपटॉप और कलम दी जानी चाहिए थी उनके हाथों में ये पत्थर क्यों पकड़ा देते हैं। चिंता का विषय ये होना चाहिए कि इन बच्चों को कैसे संभाला जाए। सांसद ने सवाल किया कि उग्रवाद वहां पनपा तो पनपा क्यों, ये अलगाववादी नेता आगे बढ़े तो बढ़े क्यों? शमशेर सिंह ने एक और बात का खुलासा करते हुए कहा कि पाकिस्तान परस्त लश्कर ए तोएबा के कमांडर सैयद सलाउद्दीन ने 1987 में राज्य में विधानसभा चुनाव लड़ा था वो हार गया तो पाकिस्तान चला गया और आतंकवादी संगठन तैयार कर लिया। ऐसा क्यों हुआ? शमशेर सिंह ने आजादी के बाद पश्चिमी कश्मीर से आए शरणार्थियों की समस्या को उठाया। कहा दशकों बाद भी आज भी उन्हें न वोट देने का अधिकार है न शिक्षा का। उन पर कोई चर्चा नहीं करता। चर्चा होती है तो फिर उन लोगों की जो कश्मीर में बैठकर अलगाववादियों के इशारे पर चल रहे हैं।

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