लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

 

देश की रक्षा में तैनात सैनिकों और बाढ़ पीडि़त नागरिकों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दीवाली मनाने के मेल-जोल को भी राजनेता और अलगाववादी हलके स्तर पर ले रहे हैं। इस यात्रा को जम्मू-कश्मीर में 21 जनवरी 2015 से पहले होने वाले विधानसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में कश्मीर में दांव चलने की परिघटना के रुप में भी देखा जा रहा है। कांग्रेस के महामंत्री पीसी चाको ने तो कह भी दिया कि मोदी राज्य का दौरा चुनावी माहौल रचने के लिए कर रहे हैं। उन्हें प्राकृतिक आपदा प्रभावित राज्य में राजनीति नहीं करनी चाहिए। जबकि किसी भी देश का प्रधानमंत्री केवल किसी दल का नहीं रह जाता, वह हरेक नागरिक का प्रधानमंत्री होता है। इसलिए मोदी की यह यात्रा सैनिकों के उत्साहवर्धन और बाढ़ पीडि़तों के मानवीय पहलू से जुड़ी है। बावजूद इसमें राजनीतिक गंध आ रही है तो वह भी कोई गलत नहीं है। लोकतांत्रिक दलीय व्यवस्था में वोट का स्वार्थ अक्सर दलों की व्यावहारिक रणनीति में बदलाव का कारण बनता है। लिहाजा मोदी यदि अपने दल के राजनीतिक लाभ के लिए दुख दर्द बांटने के बहाने मुस्लिमों से संबंध बनाने की कोशिश कर भी रहे हैं तो उसमें गलत कुछ भी नहीं है ? फिर कश्मीर में बाढ़ पीड़ा अकेले मुस्लिमों ने नहीं झेली है, कम संख्या में ही सही, हिंदुओं, सिखों और बौद्धों ने भी झेली है। प्रधानमंत्री के नाते संकटग्रस्त नागरिकों को दिलासा दिलाना एक संवेदनशील प्रधानमंत्री का दायित्व बनता है। हकीकत तो यह बनती जा रही है कि मोदी के इरादों की उंचाई की तुलना में अन्य नेता बौने लगने लगे हैं।

मोदी राजनीति के इतने चतुर खिलाड़ी हैं कि अवसर का लाभ कैसे उठाया जाए, उनसे सीखने की जरुरत है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने ऐसा कोई अवसर नहीं चूका, जिससे जुड़कर एक नया संदेश न दिया हो। फिर चाहे वह राजनीति और जयंतियों से जुडे़ अवसर हों अथवा वैज्ञानिक और सामरिक उपलंिब्धयों से जुड़े अवसर। शिक्षक दिवस पर सीधे विद्यार्थियों से बात करके जहां उन्होंने उनमें एक नई स्फूर्ति  चेतना का संचरण किया, वहीं गांधी जयंती पर खुद सफाई करके स्वच्छता अभियान की कारगर मुहिम छेड़ दी। शौचालय निर्माण का संदेश मोदी ने 15 अगस्त के दिन लाल किले की प्राचीर से दिया, वहीं आदर्श ग्राम योजना लागू करके सांसदों को एक जिम्मेबारी से बांधने की कोशिश की है। बहरहाल कहने का आशय यह है कि जिस तरह दीये का प्रकाश चहुंओर फैलता है, उसी तरह मोदी की निगाहें चौतरफा टिकी हैं। एक सजग व सतर्क प्रधानमंत्री ऐसी ही होना चाहिए।

इसमें कोई दो राय नहीं कि कश्मीर में बाढ़ से बड़ी तबाही हुई है। 285 जानें गई हैं। करीब 95000 घर ध्वस्त हुए हैं और करोड़ों की फसलें चौपट हो गई हैं। इनकी भरपाई कोई भी सरकार केवल आर्थिक मदद के रुप में बड़े से बड़ा पैकेज देकर नहीं कर सकती है। हालांकि प्रधानमंत्री ने इस प्राकृतिक आपदा को शुरूआत से ही संजीदगी से लिया है। मोदी ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को तत्काल राज्य के दौरे पर भेजा और बाढ़ की भयावहता की जानकारी मिलते ही खुद भी दौरे पर गए और फिर तत्काल 1000 करोड़ रुपए की मदद की। यह ऐसा विकट दौर था, जब राज्य सरकार पूरी तरह ठप हो गई थी और कश्मीर में आग लगाने वाले अलगाववादी बचाव की पहल करने की बजाय, खुद सुरक्षा के खोलों में दुबक गए थे। अब अलगाववादी कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री अपनी संस्कृति हम पर थोपने आ रहे हैं। क्या अपनों के दुख दर्द बांटना कोई सांस्कृतिक हस्तक्षेप है ? प्रधानमंत्री ने श्रीनगर की धरती पर जाकर यह तो नहीं कहा कि आप दीवाली मनाईए, बाढ़ की त्रासदी के संत्रास को पटाखे फोड़कर या फुलझड़ी जलाकर दूर करिए। मोदी अगर ऐसा कुछ कहते तो इसे सांस्कृतिक पहल कहा जा सकता था। मोदी ने अस्पतालों की बद्हाली दूर करने के लिए 745 करोड़ रुपए की मदद की है। क्या यह सांस्कृतिक हस्तक्षेप है ? अच्छा रहा कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने संकीर्ण और दलीय राजनीति से उपर उठकर प्रधानमंत्री की यात्रा का स्वागत किया।

बहरहाल नरेंद्र मोदी कोई हिंदुत्ववादी संस्कृति थोपने की बजाय, दर्द बांटने के इस पुनीत कार्य से अलगाववादियों से दूर रहने वाले धर्मनिरपेक्ष मुस्लिमों को यह संदेश जरुर दे गए कि आपके व्यापक हित तंग नजरिए के लोग साघ देंगे, ऐसा संभव नहीं है। क्षेत्रीयता के दायरे में सिमटे रहकर कश्मीर की राजनीति व सत्ता को ढो रहे दो परिवारों के चंगुल से भी बेहतरी के लिए मुक्ति तलाशनी होगी। क्योंकि इन परिवारों के राजनीतिक संस्कार सामंती आचरण में तब्दील हो गए हैं। इस नजरिये से मोदी का कश्मीर में आगमन और आर्थिक मदद उन्हें विधानसभा चुनाव में मददगार साबित हो सकते हैं।

हालांकि भारतीय जनता पार्टी की पहंुच अब उन सब मतदाताओं तक बन रही है, जिनके लिए अब तक भाजपा अछूत बनी हुई थी। ऐसा, जज्बाती मुद्दों को छोड़ देने और ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारा देने के कारण संभव हुआ है। इसीलिए अब भाजपा की जीत में आदिवासी, दलित और मुस्लिम मतदाताओं का वोट प्रतिषत बढ़ने के आंकड़े सामने आ रहे हैं। भाजपा के जज्बाती मुद्दों में राम मंदिर के निर्माण, समान नागरिक संहिता और धारा 370 को समाप्त कर देने के मुद्दे शामिल हैं। ये तीनों ही मुद्दे मुस्लिमों में बेचैनी व आशंकाएं पैदा करने वाले हैं। धारा 370 तो सीधे-सीधे जम्मू-कश्मीर राज्य की स्वायत्तता से जुड़ा मुद्दा है। इन तीनों ही मुद्दों को फिलहाल भाजपा ने हाशिये पर डाल दिया है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने एक भी बार इनमें से किसी मुद्दे का जिक्र अपने भाषण में नहीं किया। उन्होंने हमेशा सवा सौ करोड़ देशवासियों के उत्थान की बात की है। यही वजह है कि मुस्लिम भाजपा की ओर खुद-ब- खुद आकर्षित हो रहे है। भाजपा भी ऐसी कोशिशों में है कि मुस्लिमों से उसके रिश्ते मजबूत हों। इसलिए अब भाजपा के बौद्धिक प्रकोष्ठों से जुड़े बुद्धिजीवी भी कहने लगे हैं कि यदि भाजपा देश के किसी भी समुदाय की बड़ी आबादी को नहीं लुभा पाती है तो यह उसके नेतृत्व की असफलता है। इसी कम में मोदी और राजनाथ सिंह कह भी चुके हैं कि यदि बहस से यह निश्चित हो जाए कि धारा 370 कश्मीरियों के हित में है तो भाजपा इस पर अपनी सोच बदल सकती है। लेकिन आष्चर्य है कि धर्मनिरपेक्षता का दंभ भरने वाले अन्य दल और नेता जातीय, क्षेत्रीय और सांप्रदायिक मुद्दों पर गोलबंदी के संकीर्ण दायरों से बाहर निकलने की शुरूआत करते ही दिखाई नहीं दे रहे।

भारत सवा सौ करोड़ देशवासियों का एक लोकतांत्रिक समाज है। जिसमें बहुलतावादी संस्कृति की झलक और हलचल है। इस संस्कृति की पुरातन व सनातन परंपराओं में उत्सवधर्मिता पीडि़तों के बीच पहंुचकर मेल-जोल बढ़ाकर दुखियों के पीड़ा-हरण से जुड़ी है। इसे सामाजिक कर्तव्य के रुप में भी देखा जाता है। इसलिए मोदी ने पीडि़तों के बीच पहुंचकर उनकी पीड़ा में साथ देने की सहानुभूति तो जताई ही, साथ ही अलगाववादियों को भी यह संदेश दे दिया कि महज जातीय और सांप्रदायिक सोच को उकसाकर अब कश्मीरियों को बरगलाया नहीं जा सकता है। अच्छा है, हमारे अन्य नेता दीवाली और नए वर्ष जैसे उत्सव किसी पांच सितारा होटल अथवा प्राणी अभ्यारण्य में मनाने की बजाय अपने मतदाताओं के बीच पहुंच कर मनाएं। दरअसल, भारतीय उत्सव हैं ही जोड़ने के लिए। दुख दर्द बांटने से ही मानव समुदाय परस्पर अर्से तक जुड़े रह सकते हैं। अब यदि मोदी जुड़ने के इस क्रम में राजनैतिक लाभ उठाने की इच्छा रखते हैं तो यह उनकी राजनैतिक चतुराई है। जिसका लाभ भाजपा को विधानसभा चुनाव में मिल सकता है।

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