लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आर. सिंह

यह खड़ेसरी महाराज उर्फ़ खड़ेसरी बाबा की कहानी है.खड़ेसरी बाबा एक ऐसे पहुँचे हुए संत कहे जाते थे जिन्होंने बारह वर्ष खड़े रह कर हठयोग साधना की थी.कहा जाता है कि वे लगातार बारह वर्ष खड़े रहे थे.खड़ेसरी बाबा ने जब निर्वाण प्राप्त किया था,तब तक उनके भक्तों की संख्या लाखों में पहुँच चुकी थी. हठयोग में बारह वषों तक खड़े खड़े बिताने के कारण ही वे खड़ेसरी बाबा बन गए थे.बाबा ने अभी थोड़े अरसे पहले ही निर्वाण प्राप्त किया था.समाचार पत्रों में उनके निर्वाण प्राप्त करने और उसके पहले की कहानी विस्तार पूर्वक प्रकाशित हुई थी पर उनके बाबा बनने के पहले की कहानी का कहीं जिक्र नहीं था. हो सकता है कि संवाद दाताओं को उनके पूर्व जीवन की जानकारी न रही हो.खड़ेसरी बाबा की कहानी में कमला का ख़ास स्थान है.यह भी कहा जाता है किअगर खड़ेसरी बाबा की जिन्दगी में कमला नहीं आयी होती तो वे खड़ेसरी बाबा की कौन कहे, बाबा जगन्नाथ भी नहीं बनते.आखिर यह कमला कौन थी?उसका ऐसा क्या प्रभाव उनके जीवन पर पड़ा कि वे एक साधारण गृहस्थ से इतने बड़े महात्मा बनगए.?तो आईये ,पहले कमला की कहानी सुनते हैं उसी की ज़ुबानी

कमला

पता नहीं कहाँ से आरम्भ करूँ अपनी कहानी.गरीब घर में जन्मी थी,परजबसे होश सम्भाला था,तब से सुनती आयी थी कि कौशल्या तुम्हारी बेटी तो चाँद का टूकडा है.माँ सुनकर प्रसन्न होती थी या नहीं पर मुझे तो बचपन से ही अपने सौन्दर्य पर नाज होने लगा था..जब मौक़ा मिलता दर्पण लेकर अपना चेहरा देखने लगती.माँ को तो लगता था कि पता नहीं गरीब की बेटी को बिना तिलक दहेज़ के कौन ब्याहेगा?मैं इन सभी बातों से अनजान अपने सपने में डूबी रहती थी. करीब बारह वर्ष की उम्र होगी जब पहली बार मैंने जगन्नाथ को देखा था.उसका विवाह पड़ोस की लडकी से हुआ था जिसको मैं दीदी कहती थी.मुझसे उम्र में शायद चार पांच वर्ष बड़े होगी वह.क्या बांका जवान था जगन्नाथ?.मैं तो देखते ही उस पर लट्टू हो गयी थी.यद्दपि मेरी उम्र अभी विवाह योग्य नहीं थी,परमुझे तो वह मेरे सपनो के राजकुमार जैसा लगा. शादी के समय मैंने उससे थोड़ी बातचीत तो की,पर उसका ध्यान मेरी ओर नहीं गया.मुझे तो वह इतना अच्छा लगा था कि मैं उससे अधिक से अधिक बात करना चाहती थी,पर विवशता थी.वह दीदी को व्याह कर लेगया.तीन चार महीनों के बाद वह फिर ससुराल आया.शादी वाली भीड़ भाड़ तो थी नहीं.मुझे उसके निकट जाने का अधिक मौक़ा मिला और मैंने उससे बहुत बातें की.लगता था कि वह भी मेरी बातों से बहुत प्रसन्न है .इससे मेरा साहस और बढा और मैं उसके और नजदीक आने प्रयत्न करने लगी.एक तो मेरी उम्र कम थी ,दूसरे साली जीजा का नाता भी ऐसा था कि किसी को मुझ पर संदेह भी नहीं हुआ,पर मैं तो उसी उम्र में उससे प्यार करने लगी थी.यह भी तो नहीं पता था कि वह मेरे बारे में क्या सोचता है? जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ती गयी,ससुराल में उसका आना जाना भी बढ़ता गया.फिर तो मुझे लगने लगा कि वह मुझसे मिलने के लिए ही ससुराल के इतने चक्कर लगाता है..मेरे समझ में तो उस समय यह भी नहीं आ रहा था कि जगन्नाथ के साथ मन ही मन जो सम्बन्ध मैंने कायम किये हैं,उसका अंत क्या होगा?उसकी अपनी पत्नी थी और अब तो एक बच्चा भी हो गया था.पर इन सब बातों पर मेरा ध्यान कहाँ था?मैं तो उसके प्यार में पागल थी.

आखिर वही हुआ जो मैंने सपने मे भी नहीं सोचा था.अब मेरी उम्र सोलह वर्ष से अधिक हो गयीथी और उम्र बढ़ने ने साथ ही साथ मेरे सौन्दर्य में भी निखार आ गया था.जगन्नाथ से मेरा सम्बन्ध भी गहरा हो गया था,पर इन सब बातों से अनजान मेरेगरीब माँ बाप ने मेरी शादी एक ऐसे आदमी से तय कर दी,जिसकी उम्र पैंतालीस पार कर चुकी थी. एक तो उन लोगों को मेरे इस लगाव के बारे में मालूम नहीं था दूसरे मालूम भी होता तो शायद मेरी और सामत आ जाती,क्योंकि जगन्नाथ के ससुराल वाले धनी मानी लोग थे ,उनको यदि पता चलता कि मैं उनके दामाद पर डोरे डाल रही हूँ तो मुझे प्राणों से भी हाथ धोने पड़ सकते थे.मेरे माता पिता की जो दुर्गति होती वह तो अलग से.

मेरा श्रीनाथ सिंह के साथ विवाह एक बेमेल विवाह था.मेरे जैसी सुन्दर सोलह वर्ष की लडकीको एक अधेड़ के हवाले कर दिया गया था.माता पिता ने तो केवल यह देखा था कि बेटी खातेपीते घर जायेगी और सुखी रहेगी.दहेज़ देने में असमर्थता के कारण इससे अधिक वे कर भी क्या सकते थे.मेरा सौन्दर्य ऐसा था कि मुझे लगता था कि कोई भीमुझ पर न्योछावर हो सकता है,पर माता पिताकी गरीबी ने मुझे मजबूर कर दिया ऐसे पति का दामन थामने को जिसकी उम्र मुझसे दोगने से भी अधिक थी.मुझे तो सबसे अधिक क्रोध आ रहा था जगन्नाथ पर.उसने भी मेरे लिए कुछ नही किया.श्रीनाथ सिंह की उम्र तो अधिक थी ही.देखने भी वे अच्छे नहीं थे.सांवला रंग और चेहरे पर चेचक के बड़े बड़े दाग.मेरी तो जब पहली बार उनपर नजर पड़ी तो मैं बेहोश होते होते बची .कहाँ मैं दिन रात जगन्नाथ जैसे बांके छबीले जवान के सपनों चूर रहती थी,कहाँ पति मिला ऐसा कि जिसकी एक झलक देखना भी मुझे गवारा नहीं हो रहा था.मैं पिंजड़े में बंद पक्षी की तरह तड़पने लगी.पर बंद पक्षी की तरह हीं मैं पंख फड फडाने के अतिरिक्त कुछ भी करने में असमर्थ थी.मुझे तो लग रहा था कि शायद जिन्दगी भर इसी नर्क में रहना पड़े.उम्मीद की एक किरण था तो जगन्नाथ.पता नहीं मुझे अभी भी क्यों यकीन नहीं हो रहाथा कि जगन्नाथ मुझे इस मझधार में छोड़ देगा.

मेरा विश्वास गल़त नहीं था.जगन्नाथ भी मुझे भूला नहीं था.श्रीनाथ सिंह से भी उसका सम्बन्ध था.रिश्ते में वे जगन्नाथ के बड़े भाई लगते थे .विधि की यह भी विडम्बना ही थी कि कल की छोटी साली आज भाभी बन गयी थी.वह जल्द ही आया.चूंकि मेरेपति के घर में उनके अतिरिक्त केवल उनकी माँ थी अतः मिलने में भी कोई रूकावट नहीं हुई.उसको देखते ही मेरे नेत्रों से अश्रु छलक पड़े.बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें रोका.जगन्नाथ भी काफी गंभीर लग रहा था.घर में श्री नाथ सिंह तो थे नहीं.उनकी माँ का होना न होना बराबर ही था.वे तो समझ भी नहीं समझ सकती थी कि हम दोनों में क्या सम्बन्ध है.मैं उससे इधर उधर की बातें करती रही.फिर वह चाय पी कर चला गया.माँ ने रूकने को भी कहा,पर वह फिर आने को कहकर निकल गया.दूसरी बार जब आया तो श्रीनाथ सिंह घर पर थे अतः मुझ से कोई ख़ास बात नहीं हो सकी .योंही हंसी मजाक चलता रहा.उसके आने से ही मेरे मन में एक प्रकार का उल्लास छा जाता था ,पर उसके जाते हीं गमगीनी छा जाती थी. उस नर्क में भी मेरे दिन जगन्नाथ की प्रतीक्षा में किसी प्रकार कट रहे थे.उसका आना जाना लगा रहा.कभी साफ़ साफ़ शब्दों में तो कभी इशारों इशारों में वह मुझे दिलाशा देता रहा.कभी कभी तो मुझे लगने लगता था कि मुझे इस नर्क से निकालना शायदउसके लिए भी संभव नहीं.इसी आशा निराशा के बीच मैं मर मर कर किसी तरह जिन्दगी की गाडी घसीटती रही. मैंने तो एक बार उससे यह भी कह दिया कि अगर जल्द ही तुमने मेरे लिए कुछ नहीं किया तो मैं जान दे दूंगी,क्योंकि इस नर्क में एक एक दिन मुझे पहाड़ की तरह लग रहा है.पर उसने धैर्य रखने की सलाह दी.उसके आने से मैं प्रफुल्लित अवश्य हो जाती थी,,पर वह आनंद क्षणिक होता था.बाद में तो वही गमगीनी छा जाती थी.एक वर्ष बीतते बीतते मैं तो निराश हो चली थी कि एक दिन मौक़ा मिलते ही वह मुझे उस नर्क से निकाल कर ले भागा.

भागते समय तो मैंने यह भी नहीं सोचा कि मेरे पीछे श्रीनाथ सिंह का क्या होगा या समाज क्या कहेगा?

भाग तो हम दोनों गए थे,पर मुझे तो यह भी ज्ञात नहीं था कि हम जायेंगे कहाँ? जगन्नाथ के गाँव में तो हम दोनों जा नहीं सकते थे.वहाँ उसकी पत्नी थी.बच्चा था.मायके लौटने का तो प्रश्न ही नहीं था.बाद में मालूम हुआ कि मैं व्यर्थ ही यह सब सोच कर परेशान हो रही थी.जगन्नाथ ने पहले से ही इन सबका प्रबंध कर रखा था.हम दोनों नजदीक के एक शहर में पहुँच गए.वहाँ उसने किराए का मकान ले रखा था.वहाँ हा दोनों पति पत्नी की तरह रहने लगे.किसी को संदेह नहीं हुआ,क्योंकि मेरे माथे में सिन्दूर तो था ही.यह तो केवल हम दोनों को ज्ञात था कि यह सिन्दूर किसके नाम का है.पैसे के कोई कमी नहीं थी.मुझे तो यह भी नहीं ज्ञात था कि पैसा कहाँ से आता है?लगता तो नहीं था कि जगन्नाथ के पास कोई नियमित धंधा है.मुझे जानने की कोई आवश्यकता भी नहीं थी.हम दोनों अधिकतर साथ ही साथ बाहर निकलते थे.कुछ दिन योंही बीत गए.जगन्नाथ मुझे बता कर एक सप्ताह केलिए कहीं चला गया.लौटा तो उसके पास ढेर सारे रूपये थे.उन दिनों भूदान और सर्वोदय आन्दोलन बड़े जोरों पर था.पता नहीं क्या हुआ कि वह भूदान आन्दोलन में शामिल हो गया.उसने मुझे भी शामिल होने के लिए कहा..मैं तो समझ भी नहीं सकी कि वह ऐसा क्यों कर रहा है?फिर्सोचा कि जब इसके संग रहना है तो इसके कथनानुसार तो चलना ही पडेगा.मैं जगन्नाथ से थोड़ा डरने भी लगी थी.पहले तो कभी कभी मुलाक़ात होती थी,अतः केवल उसका रोबीला चेहरा और उसकी मुस्कान नजर आते थी,पर अब जब दिन रात का साथ हुआ,तो उस चेहरे के मुस्कान के पीछे की कठोरता भी नजर आने लगी थी.भूदान आन्दोलन में शामिल होकर हम दोनों उसके प्रचार में अनेको स्थान पर गए.मुझे तो तब बहुत आश्चर्य हुआ और साथ साथ डर भी लगा जब वह मुझे मेरे ससुराल के नजदीक वाले कस्बे में भी ले गया. मैं तो अन्दर ही अन्दर बहुत भयभीत थी,पर जगन्नाथ के चेहरे पर तो एक शिकन तक नहीं थी.पता नहीं उसका उस इलाके में क्या प्रभाव था?

उस शहर में हम दोनों ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सके.मैं तो वहाँ बहुत ही भयभीत रहती थी.मुझे लगता था कि उसके मन में भी एक द्वंद्व था जिसकी झलक उसके चेहरे पर मुझे दिख जाती थी.वह अपने चेहरे के भावों को छिपाने का प्रयत्न अवश्य करता था,पर मैंने उसे तहेदिल से प्यार किया था,अतः उसकी एक एक भाव भंगिमा की पहचान मुझे थी.

एक दिन अचानक ही वह बोला,’चलो बंबई चलते हैं.”

अंधा क्या मांगे,दो आँखे..बंबई का नाम सुनते ही मैं तो उछल पडी.मेरे चेहरे की चमक पर उसकी निगाह भी गयी और वह मुस्कुराने लगा.उसकी मुस्कान ऐसी मोहक लगी कि मैं उससे लिपट गयी.मुझे बंबई देखने की बहुत इच्छा थी.गाँव में बहुत नाम सुना था बंबई का.पहले तो मैं यह भी नहीं सोच सकती थी कि वहाँजाने का कभी अवसर प्राप्त होगा और अब हम बंबई में रहने जा रहे थे.

हम लोग दो दिनों के अन्दर ही बंबई प्रस्थान कर गए.वहाँ उसने एक कमरे का घर ले लिया .जगह बहुत छोटी थी,पर हम दोनों को बड़ी जगह की आवश्यकता भी क्या थी?उस महानगर में मुझे रहने का मौक़ा मिला था,यही मेरे लिए बहुत बड़ा सौभाग्य था.

क्या क्या नहीं देखा मैंने वहाँ?मुझे तो स्वर्ग का सुख मिल रहा था.मैं हमेशा सोचती थी कि यह तो जगन्नाथ का साथ है जिसके चलते मैं यह सुख भोग रही हूँ नहीं तो मेरे नसीब यह सब कहाँ था?

काम धाम तो कुछ था नहीं.दिन भर सैर सपाटा और रIत को एक दूसरे के बांहों में समा जाना.एक बात अवश्य खटकती थी.कभी कभी वह एक दो सप्ताह के लिए गायब हो जाता था.जाता तो वह बता कर ही,पर उसने यह कभी नहीं बताया कि वह कहाँ जाता है और क्या करता है.

मुझे पता भी नहीं चला और तीन वर्ष पंख लगाकर उड़ गए.एक दिन अचानक वह बोला,”अब हम लोग बंबई छोड़ देंगे,”

बंबई मुझे बहुत अच्छा लगने लगा था.मुझे तो सपने में भी यह ख्याल नहीं आ सकता था कि कभी बंबई भी छोड़ना पडेगा.सबसे बड़ी बात तो यह थी कि हम दोनों तीन वर्ष से यहाँ रह रहे थे.पड़ोसियोंसे कुछ जान पहचान भी हुई थी,पर इन तीन वर्षों के दौरान किसी ने नहीं पूछा कि हम कहाँ से आये हैं या मेरे पति क्या काम करते हैं.मुझे तो यह भी लगने लगा था कि मैं इतनी सुन्दर हूँ,शायद मुझे फिल्म में भी काम करने का अवसर मिल जाए,पर जब जगन्नाथ ने कह दिया कि बंबई छोड़ना है तो ये सब बातें मन में ही रह गयी.

अब बंबई छोड़कर हम वाराणसी आगये,शिव जी के त्रिशूल पर बसी हुई पुरातन नगरीमें.कोई समानतानहीं थी दोनों नगरों में.जहाँ बंबई में सब दौड़ते हुए नजर आते थे,वहीं वाराणसी में सब कुछ ठहरा हुआ नजर आता था.एक भारत की आधुनिकता का प्रतीक और नए से नए फैशन का सृजक था तो दूसरा अपनी प्राचीनता के गौरव में अपने आप में खोया हुआ.यहाँ भी लोग मस्त मौला अवश्य थे,पर पड़ोसियों के साथ बंबई वाली बेरुखी नहीं थी.यहाँ भी हम दोनों ने किराये का एक मकान लिया था..घर में कदम रखते ही पास पड़ोस की महिलायें मदद के लिए उपस्थित हो गयीं.किसी ने चाय नाश्ते का भी प्रबंध कर दिया.हम पति पत्नी को हर तरह की हिदायतें देने वाले भी उपस्थित हो गए.बुजुर्ग महिलायेंतो इस तरह व्यवहार कर रही थीं,मानो हम उन्हीं के बहू बेटे हों. इस तरह का अपनापन देख कर मन तो प्रफुल्लित अवश्य हुआ,पर एक भय भी सताने लगा कि इन लोगों को कहीं हमारी असलियत न पता चल जाए.वाराणसी न हमलोगों के गाँव से बहुत दूर था और न बंबई जितना बड़ा.पर धीरे धीरे लगने लगा कि मेरा भय निरर्थक था.क्योंकि जगन्नाथ मुझे साथ लेकर पूरे शहर में घूमा. मुझे दशाश्वमेध घाट से लेकर विश्वनाथ मंदिर सहित अन्य दर्शनीय स्थानों पर भी लेगया.भीडभाड वाली इन स्थानों पर मुझे कोई ऐसा चेहरा नहीं दिखा जो हमें पह्चान ले.अब तो मुझे इत्मीनान हो गया कि हम दोनों यहाँ भी सुरक्षित हैं.मैंने अपने लम्बे बालों को तो उसी समय तिलांजलि दे दी थी,जब मैं भूदान आन्दोलन में स्वयंसेविका के रूप में शामिल हुई थी. हम दोनों देखने में आधुनिक जोड़ी लगते थे.सिन्दूर भी मै इस तरह पहनती थी कि ध्यान देने पर ही पता चलता था.कभी कभी लगता था कि यह सब दिखावा किसलिए?पर शायद यह दिखावा भी आवश्यक था नही तो हम दोनों की वास्तविकता सामने आने का खतरा बढ़ जाता.मैं जब विश्वविद्यालय के अन्दर वाले विश्वनाथ मंदिर में गयी तो वहाँ के सात्विक वातावरण में मुझे अनुभव हुआ कि मेरे जैसी पतिता को भगवान शायद हीं क्षमा करे.पर यह भी ख्याल आया कि मैं पापिनी बनी क्यों?क्या इसमे समाज का कोई दोष नहीं?माना कि मैं अपने अज्ञान में एक शादी शुदा व्यक्ति से प्यार करने की भूल कर बैठी थी,फिर भी अगर मेरा वैसा बेमेल व्याह नहीं हुआ होता तो शायद मैं संभल जाती,पर अब यह सब सोचने से कोई लाभ भी नहीं था.

वाराणसी में रहते रहते ऐसा लगने लगा किजगन्नाथ कुछ विरक्त होता जा रहा है.पहले जगन्नाथ छोटी छोटी मूंछें अवश्य रखता था,पर उसकी दाढी सफाचट रहती थी.वह अपनी रहन सहन में छैला दिखता था.पर अब उसकी दाढी बढ़ने लगी थी और दो चार दिन बीत जाने पर ही उन पर उस्तरा फिरता था.इधर कुछ धार्मिक पुस्तकें भी घर ले आया था ,जिनका वह नियमित पाठ करने लगा था.पहले तो हम लोग बहुत कम ही किसी सत्संग या पूजा पाठ में भाग लेते थे,पर अब तो ऐसा होने लगा कि वह नियमित रूप से साधू संतों के बीच उठने बैठने लगा.अब भी कभी कभी मै उसका साथ अवश्य दे देती थी,पर अब वह बहुधा अकेले ही निकल जाता था.ऐसे भी साधू संतों के पास जाना मुझे अच्छा भी नहीं लगता था.धीरे धीरे मुझे लगने लगा कि वह मुझसे दूर हटता जा रहा है.दाढी मूछों के बारे में तो लगता था कि वह भूल ही गया है.धीरे धीरे उसकी दाढी लम्बी होने लगी.साथ साथ उसका धार्मिक पुस्तकों का पारायण और साधू संतों का समागम भी बढ़ने लगा.दिन अब भी किसी तरह कट रहे थे,पर वह उत्साह ,वह उमंग नाम मात्र को भी शेष नहीं था,जिसका दंभ हम दोनों अभी तक भरते आये थे.कही न कही कोई न कोई चीज कचोटने लगी थी.

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आज वह बहुत ही चिंतित नजर आ रहा था.एक गहरी उदासी की रेखा उसके चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी.लग रहा था कि उसके अंतर में द्वंद्व मचा हुआ है और उसी की झलक उसके चेहरे पर है. मैं उससे पूछना चाहती थी कि उसके इस गहरी उदासी का क्या कारण है,पर पूछने का साहस नहीं हो रहा था.आजकल संबंधों में वह निकटता भी नहीं रह गयी थी.एक साथ सोये हुए तो एक अर्सा गुजर चुका था.आखिर उसी ने चुप्पी तोडी,

“श्रीनाथसिंहअब इस दुनिया में नहीं रहे.”

मुझे तो ऐसा नही लगा कि इसमे इतना दुखी होने की आवश्यकता है.उम्र उनकी हो ही चुकी थी.मृत्यु का ऐसे कोई समय नहीं होता,पर इस उम्र में मृत्यु होना कोई ख़ास आश्चर्य नहीं पैदा करता.

मैंने दार्शनिक भाव से कहा,”तो इसमे इतना उदास होने की क्या बात है?जन्म मरण का तो शाश्वत सम्बन्ध है.उम्र भी उनकी कम नहीं थी.चले भी गए तो क्या अंतर पड़ता है?”

मैं तो उस समय यह भी भूल गयी कि आज भी मैं उन्ही की व्याहता हूँऔरउन्ही के नाम का सिन्दूर धारण किये हूं.

“शायद तुम ठीक कह रही हो,पर उनकी जिस तरह दुखद मृत्यु हुई है उससे मुझे पहली बार अपने आप पर ग्लानि होने लगी है.उन्ही के गाँव का एक आदमी मिल गया था.उसने तो मुझे पहचाना नहीं ,पर साधू संत समझ कर अपने मन की व्यथा प्रकट करना लगा.बातों ही बातों में उसने बताया कि उसी के गाँव के एक आदमी का दुखद अंत देखकर उसे संसार असार लगने लगा है.पूछने पर उसने बताया कि वह नौडीहा का रहने वाला है और मृतक नाम श्रीनाथ सिंह था.घर में कोई था नहीं उनकी पत्नी तो बहुत पहले ही अपने यार के साथ भाग गयी थी.माँ के देहांत के बाद वे एकदम अकेले हो गए थे.बीमार तो वे थे ही.देखभाल करने वाला भी कोई नहीं था.एक बुढी खाना वगैरह बना देती थी.फिर अपने घर चली जाती थी.उस रात भी वैसा ही हुआ था,पर सुबह होने पर वे मृत पाए गए थे.आधा शरीर इस अवस्था में पलंग से नीचे लटका हुआ था,जैसे उठने का प्रयत्न करने में प्राण निकल गया हो.अंत समय मुँह में पानी भी नहीं नसीब हुआ था.

मैं उसको क्या कहता?मैं तो अतीत की याद में ऐसा खो गया कि यह भी ध्यान नहीं रहा कि वह कब उठ कर चला गया.ऐसे भी उससे आँख मिलाने का साहस नहीं था मुझमें.उसे तो शायद यही लगा कि महात्मा जी समाधि में चले गए.जबमैंने आँखें खोली तो वह जा चुका था,पर मेरे दिल पर एक बोझ छोड़ कर गया था वह.”

मैं जगन्नाथ को क्या बताती कि असल में तो वह मेरे दिल पर पहाड़ लाद कर चला गया.न जाने किस कुम्भीपाक नर्क की ज्वाला में अब मुझे जलना होगा?मेरा सम्पूर्ण जीवन नग्न रूप में मेरे समक्ष था और मुझे धिक्कार रहा था.आखिर मैं भी तो हिन्दू कन्या थी.मैंने परम्परा के विरुद्ध अवश्य कार्य किया था,पर संस्कार कभी न कभी तो हावी हो ही जाता है.अज मेरे संस्कार मुझे धिक्कार रहे थे.पता नहीं यह वाराणसी का प्रभाव था या साधू संतों की समागम का कि आज मुझे केवल अपना दुर्गुण याद रह गया था.

इसके बाद एक दो दिनों का ही साथ रहा हम दोनों का.जगन्नाथ तो पूर्ण साधू बन गया था.लगता था कि वह मेरे अस्तित्व से भी अनजान हो गया है.फिर एक सुबह जगी तो देखा कि वह नहीं है.पहले तो मुझे संदेह नहींहुआ सोचा इधर उधर कहीं गया होगा ,शाम तक लौट आयेगा,पर जब शाम को नहीं लौटा तो मुझे लगने लगा कि अब मैं उसे नहीं देख सकूंगी,क्योंकि आज तक कभी मुझे बताये बिना रात में बाहर नहीं रहा था.दूसरे दिन सबेरा होते ही मैं उस आश्रम में गयी ,जहाँ वह अक्सर आता जाता था,पर वह वहां भी नहीं था.अब तो मेरा संदेह विश्वास में बदल गया.सप्ताहांत तक तो मैं विक्षिप सी हो गयी और तड़पने लगी.न जिन्दगी का कोई सहारा रह गया था और न जीने की इच्छा.ऐसा लग रहा था कि श्रीनाथ सिंह का भूत निरंतर मेरा पीछा कर रहा है.जब दिल की तड़प असह्य हो गयी तो मैं दौड़ पडी गंगा मैया की ओर उनकी गोद में शरण पाने के लिए.

जगन्नाथ

बचपन में मैं बहुत चंचल और कुछ हद तक शैतान भी था.माँ बाप के अत्यधिक लाड़ प्यार ने आवारा भी बना दिया था.गाँव के सबसे धनी मानी जमींदार की एकलौती संतान था,सबकी आँखों का तारा था मैं.अतः मुझे ज्ञात था कि मेरे सात खून मांफ हैं.पढ़ाई लिखाई की जगह खेल कूद मेंमग्न रहता था..उधम मचाते रहना स्वभाव बन गया था.जमींदार के एकलौते बेटे को रोकता भी कौन?शरीर भी काफी तंदरूस्त था.थोडा बड़ा हुआ तो मुझे अपनेआप पर अभिमान भी होने लगा.लोग भी कहने लगे कि मेरी बराबरी का सुन्दर युवक इलाके में कोई नहीं है.शादी के लिए पैगाम आने आरम्भ हो गए थे.पढ़ने लिखने में कोई अभिरुचि तो थी नहीं माँ का तो स्पष्ट मत था कि अधिक पढ़ाई की आवश्यकता क्या है?कहीं नौकरी तो करनी नहीं है,पर पिताजी की इच्छI थी कि कम से काम मैट्रिक तो पास कर लूं.मैट्रिक की परीक्षा में दो बार अनुतीर्ण रहा था और अब तीसरी बार परीक्षा में बैठने की तैयारी थी.शादी के बारे में पिताजी ने स्पष्ट कर दिया था किमैट्रिक पास करने पर ही शादी होगी.माँ को बहुत बुरा लग रहा था. वह झगड़ती भी थी कि अगर पास नहीं हुआ तो क्या जिन्दगी भर कुंवारा बैठा रहेगा? बुरा लगने का एक कारण यह भी था कि मेरी उम्र के साधारण घर के लड़कों का भी व्याह हो चुका था और मैं जमींदार का लड़का होकर भी अभी कुंवारा था.मेरी उम्र बीस वर्ष के लगभग हो रही थी.इतने वर्ष तक अविवाहित् रहना और वह भी जमींदार के एकलौते बेटे का?उस इलाके के लिए यह सांतवें आश्चर्य से कम नहीं था.पर पिताजी भी जिद पर अड़े थे.खैर इस बार मैं उम्मीद न होते हुए भी मैट्रिक परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया.अब तो पिताजी भी मान गए..फिर तो बड़े धूम धाम से मेरा व्याह हुआ.दस बारह मील दूर के गाँव की एक षोडशी मेरी जीवन संगिनी बन कर मेरे घर आ गयी.पत्नी मृदुभाषिणी और आज्ञाकारिणी मिली.लोगों की निगाह में हमलोगों का जीवन सुख पूर्वक कट रहा था.दो वर्षों के अन्दर ही एक सुन्दर पुत्र रत्न की भी प्राप्ति हो गयी.

पर मैं कहाँ शांत था?धन की कोई कमी तो थी नहीं ,फिर भी कुसंगत के प्रभाव से मैं अपने संगी साथियों के साथ कुछ ऐसे काम में लग गया ,जो पिता जी के नाम को मिट्टी में मिला सकता था,पर पिता जी को पता चलता तब न? लोगों के दिल में मेरा भय इस कदर छाया हुआ था कि कोई जबान खोलने का भी साहस नहीं कर सकता था.पिता का साया भी बहुत दिनों तक सर पर नहीं रहा.पौत्र का मुख देखने के दो वर्ष के अन्दर हीं वे अचानक बीमार पड़े और जब तक गाँव या आसपास के डाक्टर उनकी बीमारी समझ पाते तब तक तो वे परलोक सिधार गए. माँ तो उनके गुजरने के बाद हीं अपने आप में सिमट गयी.पिताजी की मृत्यु ने तो मुझे और स्वच्छंद बना दिया.घर में विधवा माँ और पत्नी के अतिरिक्त अन्य कोई था भी नहीं और उन दोनों में मुझे रोकने टोकने का साहस तो था नहीं

शादी के समय ही ससुराल में एक लड़की दिखी थी.लगभग बारह वर्ष की रही होगी.लडकियाँ तो और भी थीं,पर वह सबसे अलग दिख रही थी..बहुत साधारण वस्त्र पहने थी.लगता था कि किसी गरीब घराने लडकी है,पर उन वस्त्रों में भी उसका सौन्दर्य छलका पड़ रहा था और बरबस मन को मोह रहा था.उस समय तो मैं उसपर अधिक ध्यान नहीं देसका.चार महीने के बाद हीं फिर ससुराल जाने का मौक़ा मिल गया.वह लडकी फिर मिल गयी.उसने अपना नाम कमला बताया.लगता था कि मेरे नजदीक रहने और मुझसे बातें करने के लिए वह लालायित थी.जीजाजी कहते हुए उसके मुँह से फूल झड़ते थे.मैं तो न्योछावर हो गया था,उसकी अदा पर.उम्र अवश्य उसका थोडा कम था,पर उसकी अदाएं मेरे दिल में समा गयी थीं.इसी तरह तीन चार वर्ष बीत गए.कमला से मेरा संपर्क बढ़ता ही गया.किसी को यह सदेह भी नहीं हुआ कि मेरे ससुराल के बार बार चक्कर लगाने का खास कारण कमला का आकर्षण है.सम्बन्ध ऐसा था कि कोईसंदेह नहीं कर पाता था.मुझे मालूम हो गया था कि कमला मन ही मन मुझसे प्यार करने लगी है. मैं भी एक तरह से उसे चाहने लगा था.कमला गरीब माता पिता की संतान थी.उसकी पढाई लिखाई भी गाँव के पाठशाला तक सीमित थी.सोलह वर्ष पार होते होते उसका व्याह तय हो गया.मुझे जब पता चला कि उसकी शादी एक उम्रदराज आदमी से तय हुई है तो मुझे बहुत धक्का लगा और मैं उसकी शादी रूकवाने की भी सोचने लगा,पर मैं उसकी शादी कैसे रोकवा सकता था?मैं उसको बहुत चाहता था,पर मैं स्वयं शादी शुदा था,अतः किसी को अपनी चाहत के बारे में बता भी नहीं सकता था,पर मैं इतना परेशान हो गया था कि दोनों तरफ से आमंत्रित होने पर भी मैं उस शादी में नहीं शामिल हुआ शादी तो उसकी हो गयी और वह ससुराल आ गयी,पर मैं उसको नहीं भूल सका.उसका ससुराल भी मेरे गाँव से अधिक दूर नहीं था.उसके पति रिश्ते में मेरे बड़े भाई लगते थे.कल की छोटी साली आज मेरी भाभी बन गयी थी.उसके पति का नाम श्रीनाथ सिंह था.वे अच्छी कद काठी के सांवले रंग के व्यक्ति थे.ऐसे तो सब ठीक था,पर चेहरे पर चेचक के बड़े बड़े दाग थे और एक आँख की रोशनी भी चेचक के कारण थोड़ी कम हो गयी थी.जिस समय उनका व्याह हुआ,उस समय उनकी उम्र पैंतालीस पार कर चुकी थी.मुझे तो ऐसा लग रहा था कि मेरी आँखों के सामने कमला एक क़साई के हवाले कर दी गयी और मैं कुछ नहीं कर सका.अब मुझे लगा कि मैं कमला को कितना चाहता हूँ.मैं कमला के घर एक दो बार गया भी.रोक टोक तो कोई थी नहीं क्योंकि वह रिश्ते में मेरी भाभी थी.ऐसे भी श्रीनाथ सिंह के घर में उनकी पत्नी औरविधवा माँ को छोड़ कर कोई था भी नहीं .

उसपर नजर पड़ते ही मुझे ऐसा लगता था कि वह मर मर कर जी रही है और अगर मैंने कुछ नही किया तो शायद वह आत्महत्या कर ले.एक वर्ष बीतते बीतते मुझे लगने लगा कि कमला के बिना मेरा भी जीवन व्यर्थ है.अंत में मैंने निर्णय ले लिया और अपनी बंधी बंधाई गृहस्थी को लात मार कर कमला को उसके घर से ले भागा.उस समय तो मैंने यह भी नहीं सोचा कि मेरी पत्नी और बच्चे का क्या होगा.मुझ पर तो एक जूनून सवार था.पता नहीं यहं कमला के प्रति प्रेम था कि उसको पाने का हवश.उस बेचारी को तो लगा कि उसे पिंजड़े से छुटकारा मिला .वह प्रसन्नता पूर्वक मेरे संग रहने चली आयी.

पहले तो हम दोनों नजदीक के ही एक शहर में रहने लगे.कमला के साथ मैं इधर उधर भ्रमण भी करता रहता था.मेरे कहने से उसने अपने लम्बे बालों को भी छोटा कर लिया था.अब हम दोनों आधुनिक जोड़ी लगने लगे थे,जबकी हाल यह था कि हम दोनों में कोई भी अधिक पढ़ा लिखा नहीं था.हम दोनों दीन दुनिया से बेखबर मस्ती में अपने दिन व्यतीत कर रहे थे कि लगा कि अगर यहीं रहे तो क्या मजा है.हो सकता है कि किसी दिन पत्नी बच्चे को लेकर यहाँ पहुंच जाए.

मैं कमला से बोला,’चलो किसी दूसरे शहर में चलते हैं.’

कमला बहुत प्रसन्न हुई.

जब मैंने कहा कि हम बम्बई जायेंगे तो वह एक तरह से उछल पड़ी.मुझे तो लगा कि यह सुनते ही उसका सौन्दर्य और खिल गया है.हम दोनों वहां से बोरिया बस्तर समेट कर बम्बई प्रस्थान कर गए.कमला बम्बई में बहुत प्रसन्न रहने लगी.उसकी आंतरिक प्रसन्नता ने उसके सौन्दर्य में भी चार चाँद लगा दिए. मैं तो उसके सौंदर्य का पुजारी था .कमला जैसी सुन्दरी मेरी अंक शायनी थी ,यह मेरे लिए परमानंद की अनुभूति थी.मैं चाहता था कि वह हमेशा प्रफुल्लित रहे .बम्बई में हम दोनों अनेक स्थानों पर घुमे.गेट वे आफ इंडिया,एलिफेंटा गुफा,चौपाटी,जुहू,कहाँ कहाँ नहीं गए हमदोनो.सबसे अच्छा लगता था शाम को मेरिन ड्राईव में टहलना और डूबते सूर्य का नजारा देखना.ऐसा लगता था कि सूर्य भगवान सचमुच सागर की लहरों में खो गए हैं,पर जब सुबह गेट वे आफ इंडिया के पास समुद्र के बीच पहाडी के पीछे से निकलते तो नजारा कुछ और होता.बंबई में सब ठीक ही चल रहा था.हम दोनों अपनी जिन्दगी जी रहे थे ,न कोई रोकने वाला न कोई टोकने वाला.हम पति पत्नी की तरह रहते थे.हम दोनों का विधिवत व्याह तो नहीं हुआ था,पर कमला के माथे में सिन्दूर तो था ही.यह कौन जानता था कि यह सिन्दूर किसके नाम का है.ऐसे मैं बंबई आ तो गया था और कमला यहाँ प्रसन्न भी दिखती थी,पर मेरा मन अब यहाँ से उबने लगा था.मुझे यहाँ की भीड़ भाड़ रास नहीं आ रही थी.

एक दिन बातों ही बातों में मैं बोला,”बम्बई में रहते हुए तीन चार वर्ष बीत गए पर अभी भी यहाँ की भीड़ भाड़ मुझे अच्छी नही लग रही है,क्यों न वाराणसी न चला जाए.?’

उसने भी मेरी इच्छा जानकर इसके लिए हामी भर दी.

मुझे पहले से ही लग रहा था कि यहाँ से निकल कर अगर वाराणसी जाया जाए तो शायद ज्यादा अच्छा हो.पैसे कोई कमी थी नहीं ऐसे भी मैं ऐसी जिन्दगी जी रहा था,जो केवल मौज प्रधान था.अतः अन्य बातों की ओर मेरा ध्यान भी .नहीं जाता था.वाराणसी मुझे ऐसा स्थान लगा ,जहां बंबई जैसी भाग दौड़ नहीं थीऔर यहाँ भी हम दोनों की जिन्दगी में दखल देने वाला कोई नहीं था.कमला को थोडा संदेह अवश्य था कि घर के नजदीक रहने से शायद कुछ कठिनाईयों का सामना करना पड़े,पर मुझे मालूम था कि वाराणसी भले ही बंबई जितना बड़ा न हो ,पर इतना छोटा भी नहीं है कि कोई हम दोनों के बारे में जान पाए और आये दिन यहाँ आकर हमारी जिन्दगी में दखलंदाजी करे.अब तो वाराणसी आ ही गए थे.सौभाग्यबश मकान भी गंगा के किनारे मिला.अबतो प्रायः नित्य सबेरे ही हम दोनों गंगा स्नान के लिए निकल जाते थे.इधर उधर भ्रमण में दिन कट जाता था रIत को तो मैं होता था और फिर होती थी कमला,मेरी प्रेयसी .पड़ोसियों के साथ यहाँ कमला का कुछ सम्बन्ध भी हो गया था,पर मैं अलग थलग ही रहने का प्रयत्न करता था.मन में एक चोर भी था कि अधिक अंतरंगता मेरा रहस्य न खोल दे.मैं कोई नियमित कार्य भी नहीं करता था.वाराणसी आने का एक कारण यह भी था कि मैंअपने साथियों से संपर्क बनाए रखूँ .खर्च करने के लिए पैसा भी तो चाहिए था.

देखते देखते यहाँ चार पांच वर्ष किस तरह गुजर गए पता भी नहीं चला,पर पता नहीं इस नगरी का प्रभाव था कि बढ़ती उम्र के कारण यह परिवर्तन आ रहा था,मैं अब इस जिन्दगी से उबने लगा था.वह उमंग नहीं रह गया था अब इस जिन्दगी में.कमला से तो इस बाबत बात भी नहींकर सकता था.,पता नहीं वह क्या सोचे?मेरा ध्यान अब धार्मिक पुस्तकों की ओर खींचने लगा था.मैं साधू संतों के साथ भी उठने बैठने लगा था.कभी कमला को भी साथ ले जाता था,पर अधिकतर अकेले ही संत समागम के लिए पहुंच जाता था.धीरे धीरे ऐसा हुआ कि कमला से मेरी दूरी बढ़ने लगी.कमला ने तो ध्यान अवश्य दिया होगा ,पर बोली कुछ नहीं.उसने भी शायद परिस्थितियों के साथ समझौता करने के लिए अपने को तैयार कर लिया था.अब तो मुझे आश्चर्य भी होने लगा था कि इस तरह कैसे जिन्दगी के बारह वर्ष मैंने बिता दिए जब मैं कमला को लेकर भागा था तो केवल एक ही भाव मन में था कि इसको अपना बना कर रखना है.वह मेरी बनी भी रही.पता नहीं क्यों उसको कोई बच्चा भी नहीं हुआ.एक तरह से यह अच्छा ही हुआ नहीं तो कौन जाने उस बच्चे का भविष्य क्या होता?कभी कभी यह भी लगता था कि यह भी एक तरह से अच्छाही हुआ कि वह मेरे साथ चली आई नहीं तो बच्चा नहीं होने पर उस नर्क में उसकी स्थिति बदतर ही हो जाती.

पहले तो मैं सर्वदा अपने को चुस्त दुरुस्त रखने का प्रयत्न करता था.सुन्दर तो मैं था,पर कमला के सौन्दर्य के सामने मैं कुछ भी नहीं था.अतः मैं नियमित अपनी दाढ़ी सफाचट करता था.छोटी छोटी मूछे अवश्य राखी हुई थी.छैला दिखने के प्रयत्न मैं कोई कसर बाक़ी नहीं रखता था.पर अब ऐसा लगता था कि इन सब दिखाओं से क्या लाभ.कभी दाढी बनाता,कभी नहीं.फिर तो धीरे धीरे यह हाल हो गया कि दो चार दिन बीत जाते थे बिना दाढी बनाये हुए ,फिर भी जिन्दगी की गाडी एक तरह से ठीक ही चल रही थी.सम्बन्ध में वह गर्मी तो नहीं रह गयी थी,पर साधारणतः कोई गड़बड़ी भी नहीं आयी थी.धीरे धीरे दाढ़ी लम्बी होने लगी और साथ साथ बढ़ने लगा सत्संग भी.लम्बी दाढी होने के कारण अब तो मैं भी साधू लगने लगा था.

फिर जिन्दगी में आया भूचाल.मैं तो इसके लिए कतई तैयार नहीं था.मुझे तो कभी यह ध्यान नहीं आया था कि कमला को उसके पति के घर से भगाने का जो पाप किया है वह कभी मेरे सर पर चढ़ कर बोलेगा.जुर्म तो मैंने अपनी पत्नी और बच्चे के साथ भी किया था.उनको असहाय अवस्था में छोड़ कर निकला था.बहुत बड़ा जुर्म तो वह भी था.इसके बारे में भी कभी सोचने की आवश्यकता मैंने नहीं समझी थी.यह भी तो ध्यान नहीं था कि जिसकी व्याहता को भगा कर ले जा रहा हूँ उसका क्या होगा?

उस दिन ऐसे ही अकेले एक साधू महाराज की कुटिया में बैठा हुआ था कि एक आदमी आया .उसने मुझे ही साधू समझा और चरण छू कर बैठ गया.फिर सुनाने लगा अपने की पीड़ा.जो बात उसको सबसे अधिक व्यथित किये हुये थी, वह थी उसके गाँव में हाल हीं में हुये एक आदमी का अत्यंत दारुण अंत.उसने जब अपने गाँव का नाम नौडीहा बताया तो मेरा माथा ठनका.इस गाँव में तो कमला का ससुराल था.जैसे मैंने आगे पूछा ,वह श्रीनाथ सिंह के विवाह, उनकी पत्नी के पलायन और उनकी एडियाँ रगड़ रगड़ कर मरने की पूरी कहानी सुना गया. मुझे तो काठ मार गया.मैंने अपनी आँखें बंद कर ली.दिल बहुत व्यथित हो गया था.मेरा पूरा पिछला जीवन मेरे सामने आकर मुझे धिक्कार रहा था.मुझे तो समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ?कहाँ जाऊं?मेरी बंद आँखें देख कर वह आदमी भी उठ कर चला गया.उसके जाने के बाद ही मैंने अपनी आँखें खोली,क्योंकि उससे नज़रे मिलाने का साहस मुझमे नहीं रह गया था..

हृदय की पीड़ा को दबाये घर आया और कमला को यह कहानी सुनाई.उसके हृदय की पीड़ा उसके चेहरे पर झलक आयी.मुझे तो एहसास होने लगा कि सारा दोष मेरा ही है.कमला के लिए पागलपन में मैं ऐसा पाप कर बैठा था जिसका प्रायश्चित भी शायद संभव नहीं था.मेरे इस पागलपन के कारण एक साथ न जाने कितनी जिंदगियाँ बर्बाद हो गयी थी.

एक दो दिन तो मैं योंही तड़पता रहा.कमला की बैचेनी भी उसके चेहरे पर झलक रही थी.बदहवाशी की हालत में उस दिन भोर की बेला में मैंने वह घर छोड़ दिया.मुझे तो उस समय यह भी ध्यान नहीं आया कि कमला का क्या होगा?

वहां से मैं सीधा ऋषिकेश पहुंचा और एक बड़े महात्मा के चरणों में गिर पड़ा.उनको एक साधू को ऐसा करते हुए देख कर आश्चर्य अवश्य हुआ होगा,पर उन्होंने दर्शाया नहीं.उन्होंने मुझे उठाकर बैठा लिया और चेहरे हवाईयाँ उड़ते देख कर मुझे शांत होने के लिए कहा.आश्रम में ही मेरे लिए विश्राम की व्यवस्था कर दी गयी.उन्होंने कहा कि पहले तो परमात्मा का ध्यान करो,अन्य बातें बाद में होगी.पहले तो मैं इतना साहस ही नहीं जुटा सका कि अपने हृदय की पीड़ा उनके सामने प्रकट करूँ पता नहीं वे क्या सोचे? रात भर मैं बेचैन रहा.लगा कि बिना बाबा को बताये ,मुझे चैन या शान्ति नहीं मिलेगी.दूसरे दिन सबेरे ही मैं उनके चरणों में फिर पहुंच गया और अपना दिल खोलकर उनके सामने रख दिया.यह भी नहीं सोचा कि इसके बाद क्या होगा.उस पहुंचे हुए महात्मा जी ने धैर्य पूर्वक मेरी कहानीसुनी.तत्पश्चात इतना हीं बोले,’जगन्नाथ तुमने सबसे बड़ा पाप यह किया कि उस असहाय कमला को छोड़ कर चले आये.पहले जाकर यह पता लगाओ कि उसपर क्या गुज़री?वह अब इस दुनिया में है भी या नहीं ?”

मैं पहले तो ओहा पोह में पड़ा रहा कि वाराणसी जाऊं या नहीं.फिर सोचा,महात्मा जी शायद ठीक ही कह रहे है अब मुझे ध्यान आया कि मैंने यह क्या किया.सचमुच उस नगरी में कमला काअपना कोई नहीं.न जाने उसपर क्या गुज़री हो,फिर भी उहा पोह में ही कुछदिन गुजर ही गए फिर मैं वाराणसी के लिए रवाना हो गया.

वाराणसी मैं आठ या नौ दिनों के बाद लौटा था.मकान में गया तो वह बंद था.घर की एक चाभी मेरे पास थी.खोला तो देखते ही पता चल गया कि कमला बहुत ही बदहवासी की दशा में यहाँ से निकल चुकी है.कमरे की अस्तव्यस्तता देख कर साफ़ जाहिर होता था कि कमला निकलते समय शायद हीं अपने होशोहवास में हो.यह भी लग रहा था कि एक दो दिनों पहले ही वह यहाँ से निकली है.मेरे तो होश गुम हो गए .पता ही नहीं चल रहा था कि क्या करूँ आस पास भी पूछताछ की ,पर पहले तो कुछ पता नहीं चला ,पर बाद में एक वृद्धा ने बताया कि दो दिनों पहले तडके ही उसने कमला को सीधे गंगा की ओर तीव्र गति से जाते देखा था.मेरा माथा ठनका. ह्रदय की धड़कन बढ़ गयी.हम लोगों का घर गंगा किनारे अवश्य था,पर सामने कोई घाट नहीं था.सीधी गहराई थी.तो क्या कमला ने गंगा में छलांग लगा दी?पर इस बात की पुष्टि कैसे होती?मैं किससे पूछता यह सब?बहुत ही मायूस होकर गंगा की ओर गया और किनारे किनारे बहुत दूर तक चला,कि कहीं से कोई सुराग मिल जाए.फिर लौट कर मकान पर आ गया.दो तीन दिनों तक योंही पागलों की तरह भटकता रहा,पर कोई सुराग नहीं मिला.

मेरी हालत विक्षिप्त सी हो गयी.मैं वहाँ से निकल गया और इधर उधर भटकने लगा .ऋषिकेश में महात्मा जी ने मुझे लौट कर आने के लिए कहा था,पर मेरी हिम्मत ने जवाब दे दिया.किस मुँह से मैं उनके सामने उपस्थित होता..कमला की मौत ने तो मेरी पापों की गठरी कोऔर भारी बना दिया था.अब तो यह हाल था के भटकते भटकते जहां शाम हुई वहीं रूक गया.जो मिला वह खा लिया.हृदय की विक्षिप्तता कहीं टिकने हीं नहीं देती थी.लोग महात्मा समझ कर आदर भी देने लगे थे,पर मेरा हृदय ही जानता था कि मैं इस आदर सत्कार के कितना योग्य हूँ. मुझे लग रहा था कि पापों का प्रायश्चित किये बिना मुझे शान्ति नहीं नसीब होगी.कुछ दिनों तक उधेड़ बुन में पड़ा रहा.फिर लगा कि मैंने भयंकर पाप किये हैं,अतः इनसे छुटकारा पाना संभव है या नहीं पर मैं अब हठ योग साधना करूंगा मैंने बारह वर्षों तक खड़े रहने का व्रत ले लिया. मै जानता था कि यह आसान नहीं है,पर मैंने ठान लिया कि इस असाध्य को साध्य करने का प्रयत्न करूंगा.अगर इसमे मेरी मौत भी आजायेगी तो उसे सहर्ष गले लगा लूंगा.

खड़े रहने का व्रत तो मैंने ले लिया,पर मेरे लिए यह बहुत कठिन सिद्ध हो रहा था एक दो दिनों में ही मन विचलित होने लगा,पर मैंने इसको सम्भाला.मैंने हलके तख्ते बनवा लिए थे ,जिनको मैं आसानी से उठा सकता था.मैं इन्ही तख्तों का सहारा लेकर विश्राम भी करता था.कठिनाईयां आती रही,पर मै अडिग होकर सामना करता रहा उन कठिनाईयों का.धीरे धीरे मेरी प्रसिद्धि होने लगी और मैं खड़ेसरी बाबा के नाम से जाना जाने लगा.मेरा दिल अभी भी अपने को इस आदर के योग्य नहीं पाता था.

धीरे धीरे बारह वर्षो की तपस्या पूर्ण हुई..तपस्या पूर्ति के साथ ही मन शांत हो गया था.फिर इस पर्वतीय इलाके में मैंने आश्रम की नींव रखी जो समय बीतते बीतते लोगों के लिए एक पवित्र स्थल बन गया.मैं भी अपने अतीत को भूल कर पूर्ण रूप से परोपकार के लिए समर्पित हो गया तपस्या आरम्भ करने के पहले ही लोग मुझे जगन्नाथ बाबा कहने लगे थे,पर अब तो मैं भूल चुका हूँकि मैं कभी जगन्नाथ सिंह या जगन्नाथ बाबा भी था.अपने अहम् को मै पूर्ण रूप से भष्म कर चुका हूँ,पर कभी कभी पुरानी स्मृतियाँ दिल में हलचल मचा देतीहै.तब मैं गिर जाता हूँ भगवान् के चरणों में और नेत्रों से अविरल अश्रु प्रवाह होने लगता है.भक्तों की भीड़ लगी रहती है,पर कोई नहीं समझ पाता कि बाबा का यह कौन सा रूप है?

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आज मन बहुत शांत है.उम्र की अस्सी की सीमा पार कर चुका हूँ मैं.शरीर बहुत जीर्ण हो गया है. कृष्ण भगवान ने भगवद गीता में कहा है कि यह पार्थिव शरीर परोपकार के निमित प्राप्त हुआ है.अब यह शरीर परोपकार में असमर्थ है,अतः मैं इस शरीर को त्याग देना चाहता हूँ.भक्तों की भीड़ उमड़ पडी है.उनलोगों को लग गया है कि महात्मा के महा निर्वाण का समय समीप है.मेरी आवाज क्षीण होती जारही है,फिर भी मैं शरीर की नश्वरता और उसके के लिए शोकाकुल न होने की सलाह दे रहाहूँ.मेरी आँखें बंद होने लगी है.मन भी बहुत शांत है,पर उस अंतिम क्षण में भी एक नारी मूर्ति की झलक दिखती है.मैं उधर से नजरें हटाकर परमात्मा को पुकार उठता हूँ और मेरी पलकें मूँद जाती हैं.

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2 Comments on "कहानी / खड़ेसरी बाबा"

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आर. सिंह
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आज अचानक नजर पडी कि इस कहानी को धर्म और अध्यात्म की श्रेणी में रखा गया है.इस कहानी का लेखक होने के नाते मैं यही कहना चाहता हूँ कि यह केवल कहानी है और इसका धर्म या अध्यात्म से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है.

shivesh pratap singh
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मैंने अपनी आजी जी से सुना था की खडेश्वरी बाबा हमारे गाँव में तामेश्वर नाथ मंदिर पर आये थे एक बार |बहुत सिद्ध संत थे |आज आप की यसस्वी लेखनी ने जो उदगार किया है …उसका एहसानमंद रहूँगा मै सदैव …..
ह्रदय एवं नयन अश्रु धाराओं में डूब रहे हैं बाबा जी का चरित्र पढ़कर|
आप धन्य हैं
आप का ही …..शिवेश प्रताप सिंह

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