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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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राजेश कश्यप

उत्तरी भारत की खाप-प्रथा के खिलाफ ओमपुरी द्वारा अभिनीत फिल्म ‘खाप’ आगामी २९ जुलाई को रीलिज होने जा रही है। क्योंकि फिल्म अत्यन्त संवेदनशील मुद्दे पर बनी है, तो फिल्म के निहितार्थ कुछ तथ्यों पर गहन मन्थन करना अत्यन्त अनिवार्य हो जाता है। चूंकि सिनेमा, समाज का दर्पण होता है और उसने खाप को केन्द्रित करके पूरी फिल्म का निर्माण किया है तो निश्चित तौरपर मसला कोई मामूली नहीं है। फिल्म के प्रोमो देखकर पूरी फिल्म का सारांश सहज स्पष्ट हो जाता है। फिल्म मीडिया रिपोर्टों, कुछ कानूनी फैसलों और प्रकाश में आई आWनर किलिंग की सनसनीखेज घटनाओं के आधार पर बनाई गई है। साधारण तौरपर तो फिल्म का मुख्य मुद्दा मात्र गोत्र के नाम पर होने वाली कथित प्रेमी-प्रेमिकाओं की हत्या का विरोध करना है। क्या वास्तव में ही इतना-सा मसला है? नहीं, मसला इससे कहीं अधिक गंभीर है। वरना खाप-पंचायतें फिल्म का इतना मुखर विरोध कदापि नहीं करतीं।

अगर फिल्म की गंभीरता से विवेचना की जाए तो कई विवादास्पद पहलू नजर आएंगे। सबसे पहले फिल्म के मुख्य मुद्दे ‘सगोत्र विवाह की पैरवी’ को लेते हैं। यह बिल्कुल सही है कि हमारे देहात में ‘सगोत्र विवाह’ को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा रहा है। ऐसा केवल वर्तमान दौर में नहीं हो रहा है। यह तो सदियों से चली आ रही परंपरा और रीति-रिवाज है। ऐसा क्यांे है, ‘गोत्र’ क्या हैं और इस मान्यता के पीछे क्या भेद है, क्या इस बारे में आलोचकों ने कभी गहराई से सोचा है? शायद नहीं। देहात में सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, ‘गौती भाई, बाकी अश्नाई’ अर्थात गौत्र वाले सभी भाई हैं और बाकी सभी रिश्तेदारी से हैं। इसका मतलब यह है कि ‘गौत्र’ अपने मूल दूध-खून से निर्मित एक परिवार का नाम है। क्या एक खून-दूध से जन्में हुए व्यक्तियों का आपसी रिश्ता बहन-भाई का नहीं बन जाता? यदि हाँ तो देश का कौन सा कानून या सभ्य समाज भाई-बहन को प्रेमी-प्रेमिका या पति-पत्नी बनाने की इजाजत दे सकता है? क्या एक व्यक्ति की संतानों की संतानें और उनकीं संतानें आगे दो-चार पीढ़ियों के बाद अपने खूनी-रिश्तों से मुक्त हो जाएंगी? कदापि नहीं। तो फिर ‘सगौत्र’ अर्थात एक ही गौत्र यानी आपसी बहन-भाईयों का विवाह कैसे संभव हो सकता है? यहां यह स्पष्ट करना अत्यन्त अनिवार्य है कि ‘सगौत्र विवाह’ और ‘अंतरजातीय विवाह’ में जमीन-आसमान का अंतर है। पहले तो देहात में जाति बन्धनों को अटूट बनाया गया था, लेकिन बदलते दौर में यह अटूट नहीं रह गए हैं और संभवत: खापों ने भी अंतरजातीय विवाहों को दबी जुबान में अपनी सहमति दी हुई है। अब यदि सिर्फ दूध-खून के रिश्ते को छोड़कर अन्य कहीं भी शादी करने की स्वीकृति मिल रही है तो फिर विवाद किस बात का?

फिल्म में खापों को खूंखार और हैवान रूप में दिखाया गया है। अब फिर सवाल उठता है कि क्या कोई शहरी व्यक्ति ‘खाप’ के अर्थ, उनकी प्रकृति और उनके इतिहास के बारे में जानता है? यदि नहीं, तो उन्हें स्वयं खापों के बीच बैठकर जानना चाहिए, सिर्फ कुछ अल्पबुद्धिजीवियों की मनघड़ंत लेखनी को पढ़कर अथवा सुनकर अपनी राय नहीं बनानी चाहिए। खाप का प्रचलन महाराजा हर्षवद्र्धन काल से चला आ रहा है और विदेशी आक्रान्ताओं व हमारी सभ्यता एवं संस्कृति को छिन्न-भिन्न करके पश्चिमी संस्कृति को लादने वाले षड़यंत्रकारियों के खिलाफ डटकर लोहा लेने तथा अपने राजा-महाराजाओं व देश के मान-सम्मान के लिए मर-मिटने की पहचान रखती आई हैं, खाप पंचायतें। यह दूसरी बात है कि आधुनिक खाप पंचायतों में कुछ सिरफिरे, गैर-जिम्मेदार, असामाजिक तत्व और संकीर्ण राजनीतिक प्रवृति के लोग खापों के रहनुमाओं का मुखौटा पहने हुए हैं। ऐसे में मुद्दा खापों के गौरवशाली अतीत पर कीचड़ फेंकने के बजाय, खापों में आई विकृतियों को समूल नष्ट करने का आन्दोलन चलना चाहिए। स्वयं खाप प्रतिनिधियांे को भी आत्म-मंथन करना चाहिए कि उनके नेतृत्व में गौरवशाली खाप परंपरा के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह क्यों लग रहे हैं?

फिल्म के पोस्टर में ग्रामीण बुजुर्गों द्वारा हाथ में पकड़ी हुई छड़ी को विषैले नाग के फन में चित्रित करके दिखाया गया है। यह चित्रण करते समय किसी ने क्या यह तनिक भी सोचा कि इस छड़ी का क्या मतलब है और इसकी क्या गरिमा है? दरअसल यह छड़ी, देहात में ‘डोगा’ के नाम से जानी जाती है और यह बुजुर्गों के सम्मान की प्रतीक होती है। किसी भी सभ्यता, संस्कृति, परंपरा एवं मान्यता के तहत जिस चीज को सम्मानजनक स्थान दिया गया हो, उस पर घिनौना प्रहार करना, क्या आपराधिक श्रेणी में नहीं आता है? यदि देश के सम्मान की प्रतीक किसी भी चीज से छेड़छाड़ करके विकृत अथवा आपत्तिजनक रूप दिया जाए तो क्या वह गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं आता है? तो फिर ग्रामीण समाज के सम्मान की प्रतीक छड़ी को विषैले नाग के रूप में प्रदर्शित करके क्या फिल्मकारों ने भयंकर भूल नहीं की है?

इसके बाद फिल्म एक अत्यन्त गंभीर प्रश्न खड़ा करती है, कि क्या आज भी प्यार करने की सजा, मौत है? प्रश्न जितना पेचीदा है, उत्तर उतना ही आसान। हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि हमेशा से ही समाज की प्रचलित परंपराओं और रीति-रिवाजों के आधार पर कानूनों का निर्माण होता आया है अर्थात् परंपराओं से कानून बने हैं, न कि कानूनों से सामाजिक परंपराएं बनी हैं। जब सदियों से समाज की परंपरा व रिवाज रहा हो कि खून-दूध से जुड़े सदस्य और गाँव व गौहाण्ड (साथ लगते गाँव) के लोगों के बीच एक पारिवारिक व भाईचारे का रिश्ता रहेगा तो इसे गैर-कानूनी कैसे ठहराया जा सकता है? जब देहात के व्यक्ति को गाँव-गौहाण्ड अथवा गौत्र की कोई लड़की मिलती है तो वह उसे सम्मान के रूप में दस रूपये देकर आशीर्वाद देने और अपनी बहन-बेटी का दर्जा देने जैसी परंपराओं के निर्वहन में अपना गौरव समझता हो, तो भला वह गंवार कैसे ठहराया जा सकता है? और वह अपनी गौरवमयी सामाजिक परंपराओं से हो रही खिलवाड़ पर अपना विरोध दर्ज करवाता है तो उसे जानवर और हैवान की संज्ञा देने का क्या आधार बनता है?

अब रही प्यार करने वालों की बात। प्यार क्या होता है? क्या पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में पथ-भ्रष्ट हुई आधुनिक युवा पीढ़ी को पता है? आजकल के युवा सिर्फ विषय-वासना और शारीरिक भूख मिटाने वाली पाश्विक प्रवृति को ही ‘प्रेम’ का आवरण दे रहे हैं। पाश्विक प्रवृति के चलते वह अपने-पराए, अच्छे-बुरे आदि हर तरह के ज्ञान को भूल चुका है। उदाहरण के तौरपर हरियाणा में रोहतक जिले के गाँव कबूलपूर की घटना को लिया जा सकता है। गाँव की एक लड़की सोनम ने अपने सामने वाले घर में रहने वाले लड़के, जिसे वह सार्वजनिक रूप में भाई के तौरपर संबोधित करती थी, के साथ अपनी वासना के वशीभूत होकर नाजायज सम्बंध बनाए। पता लगने पर, परिवार वालों ने उन्हें समझाया। उनपर कोई असर पड़ता न देख, परिवार वालों ने लड़की को रोहतक के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्रावास में भेजा। वहां पर भी इस रासलीला में कोई कमी नहीं आई। अंतत: दु:खी होकर उसे वापिस घर पर रखा गया। जब परिवार में काफी विरोध बढ़ा तो उस लड़की ने १४ सितम्बर, २००९ की रात को पहले अपने परिवार के सभी सात सदस्यों माता-पिता, दादी और चार बहन-भाईयों को खाने में बेहोशी की दवा खिलाई और फिर अपने कथित प्रेमी के साथ मिलकर परिवार के सभी सदस्यों को बड़ी बेरहमी से मौत की नींद सुला दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। इस भयंकर और हृदय विदारक घटना को अंजाम देने के बाद परिवार की लाशों के बीच लेटकर उन दोनों ने पूरी रात खुलकर सेक्स किया। इससे और अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि कानून की पकड़ में आने के बावजूद उस लड़की ने सीना ठोंककर बयान दिया कि उसे अपने इस कृत्य पर किसी तरह का कोई मलाल नहीं है। क्या आधुनिक युवा पीढ़ी द्वारा थोपे गए इस विकृत पैशाचिक विषय-वासना को एक सभ्य समाज अपनी स्वीकृति दे सकता है? क्या पे्रम के नाम पर ऐसे कुसंस्कारी कुसंतानों के कुकर्मों पर समाज की मान-मर्यादाओं को स्वाहा किया जा सकता है? मेरे हिसाब से इसका जवाब देने की आवश्यकता नहीं है।

देहात में प्यार करने को बुराई नहीं समझा जाता है। यदि कायदे-कानूनों के दायरे में रहकर कोई प्यार-प्रेम करता है तो समाज उसका सम्मान करता है। लेकिन रीति-रिवाजों को तोड़कर पाश्विक आचरण करना, उन्हें तनिक भी नहीं भाता है। ऐसे में एक पारिवारिक इकाई से लेकर, पड़ौसी, ग्रामवासी, रिश्तेदारी, गौत्र और खाप जैसी सामाजिक इकाईयां तक वासना के वशीभूत सामाजिक मर्यादाओं से खिलवाड़ करने वाले युवकों एवं युवतियों को बड़े लाड़-प्यार से समझाया जाता है। घर के बड़े-बुजुर्ग अपने स्वाभिमान की प्रतीक पगड़ी उनके पैरों में रखकर अच्छे-बूरे का भेद समझाने की कोशिश करते हैं और यहां तक माताएं अपने दूध का वास्ता तक देती हैं, लेकिन तब भी कथित पे्रमी-प्रेमिकाओं के सिर से वासना का भूत नहीं उतरता है। जिस माता-पिता ने उन्हें बड़े कष्टों के साथ पाला-पोषा हो, खून-पसीना एक करके उन्हें पढ़ाया लिखाया हो, उनके बड़े-बड़े नाज नखरे उठाए हों, उनसे कुछ अभिलाषाएं एवं उम्मीदें पाल ली हों तो ऐसे में उनपर क्या बीतती होगी, क्या कभी किसी ने इस बारे में तनिक भी सोचा है? समाज में उन्हें किन-किन कटाक्षों को झेलना पड़ता है, उसका किसी ने जरा सा भी अहसास किया है? जब वे अपने कलेजे के टूकड़े को बुरी मौत मरते देखते हैं तो क्या उससे बढ़कर अभिशाप उनके लिए और कोई हो सकता है? हालांकि कोई भी खून-खराबे की पैरवी नहीं करता है। यदि कोई आWनर किलिंग के नाम पर किसी तरह का खून खराबा करता है तो वह कानूनी सजा भुगतता है।

इसके बाद फिल्म के मूल प्रश्न का शेष हिस्सा है प्यार करने की सजा, मौत? कब तक? वर्तमान समीकरणों के अनुसार इसका बेहद आसान सा जवाब है, ‘हिन्दू विवाह अधिनियम, १९५५ में संशोधन होने तक’। यदि इस विवाह अधिनियम की धारा ३ के अन्तर्गत उपधारा (छ) की उपधारा (पअ) के बाद संशोधन करके यह जोड़ दिया जाए कि ‘एक ही गौत्र या माँ के गौत्र, एक दूसरे की साथ लगती रिहायश, तथा भाईचारे का गाँव में हो, चाहे वह किसी गोत्र या जाति का हो, या एक दूसरे की रिहायश उस गाँव में हो, जहां पर खासी तादाद में एक दूसरे गौत्र के लोग रहते हों तो उन्हें प्रतिसिद्ध नातेदारी की डिग्रियों के अन्दर माना जाएगा।’ सिर्फ इतना सा संशोधन इस तरह के कथित आWनर किलिंग के नाम पर हो रहे खून खराबे पर अंकुश लग सकता है। क्योंकि जब समाज की संस्कृति व रीति-रिवाज के खिलाफ होने वाली शादियों को कानून इजाजत ही नहीं देगा तो निश्चित तौरपर अनैतिक प्रेम संबंधों की घटनाओं मंे कमी आएगी और यदि इसके बावजूद यदि कोई गैर-कानूनी शादी करता है तो माता-पिता व समाज कानून हाथ में लेने की बजाय, उलटा कानून का ही सहारा लेगा। इससे समाज व कानून के बढ़ते टकरावों की समस्या से भी निजात मिल सकेगी।

अब रहा खापों द्वारा फिल्म का विरोध करने का मसला। तो खापों को ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की तर्ज पर प्रदेश में फिल्म के प्रदर्शन पर ऐतराज नहीं करना चाहिए। चूंकि सिनेमा अभिव्यक्ति का एक साधन है तो उस पर अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए। यदि फिल्म के किसी पक्ष पर किसी को कोई ऐतराज है तो कानूनी सहारा लिया जा सकता है। अपनी ताकत के बलपर फिल्म प्रदर्शित करने से रोककर, खापें अपनी नकारात्मक छवि ही बनाएंगी, उससे उसका भला होने वाला नहीं है। खाप प्रतिनिधियों को पता होना चाहिए कि इस तरह विरोध करके तो फिल्म को और ज्यादा प्रचार मिलेगा। इससे पहले पंजाब की पृष्ठभूमि पर बनी प्रेम कहानी ‘आक्रोश’ प्रदर्शित हुई थी, वह कब आई और कब गई, क्या किसी को पता चला? तो फिर ‘खाप’ फिल्म पर विरोध जताकर अपनी छवि को नकारात्मक बनाने में कौन सी समझदारी है? वैसे समझदारी तो इसी में है कि खाप पंचायतों द्वारा अपने वैचारिक पक्ष को मजबूत किया जाए और अपनी आक्रामक शैली पर अंकुश लगाकर धैयै एवं संयम का परिचय देते हुए तार्किक आधार पर अपने रीति-रिवाजों एवं परंपराओं का बोध अज्ञानी व अबोध लोगों को करवाया जाए।

(राजेश कश्यप)

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3 Comments on "‘खाप’ बनाम ‘खाप’ के निहितार्थ चन्द यक्ष प्रश्न"

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डॉ. राजेश कपूर
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कश्यप जी आपने भेड़चाल से ऊपर उठ कर बड़े आधारभूत, मौलिक प्रश्नों को उठाने की क्षमता व साहस का प्रदर्शन किया है. परम्पराओं को एक स्वर से गीदड़ों की हुआ-हु की तरह नकारने की भेड़ चाल चल पडी है. बिना सोचे, बिना समझे एक बहाव में बहने की भूल हो रही है. या भारत- भारतीयता के विरुद्ध चल रहे अभियान का ये एक अंग है ? सगोत्री और अंतरजातीय विवाह में अंतर करने की समझ तो होनी ही चाहिए. पशुओं तक के गर्भाधान में उसी नर की संतान मादा से उसे नहीं मिलाया जता. अन्यथा इससे पैदा होने वाली संतति… Read more »
Rajesh Kashyap
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अवनेश जी, लेख पढ़ने व प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद। जहां तक गलती का सवाल है तो भाई जी, मैंने अमरीश पुरी नहीं, ओमपुरी ही लिखा है। कृपया लेख की प्रथम पंक्ति को दोबारा पढ़ने का कष्ट करें। धन्यवाद।

अवनीश राजपूत
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भाई जी अमरीश पुरी का देहावशान हुए काफी साल हो गया है। आपने अपने लेख के प्रथम पंक्ति में ओम पुरी की जगह अमरीश पुरी लिखा है, कृपया इसे सुधारें।

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